सुसंस्कृति परिहार
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अभी लगभग दो साल बकाया थे किंतु वे मानसून सत्र के प्रथम दिन ही राज्यसभा से विदाई ले लिए। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इस्तीफा देने वाले वे पहले उपराष्ट्रपति हैं। हालांकि उनका स्वास्थ्य जब तब गड़बड़ होता रहा है किंतु फिलहाल ऐसी हालत अभी तो नहीं थी वे सत्र के प्रथम दिवस ठीक ठाक थे। सदन में हंगामे से शायद परेशान हो गए होंगे। लोगों से बराबर मिले भी। फिर अचानक क्या हुआ अगर वे आक्रोशित विपक्ष से परेशान होने से भयभीत थे तो प्रधानमंत्री की तरह चंद रोज़ राज्य सभा से दूरी बना सकते थे जैसे हमारे प्रधानमंत्री जी विदेश दौरे पर सदन से तेज़ी से निकल कर राहत की सांस लेकर चल दिए।

मगर अचानक कुछ खास तो हुआ है या तो बिहार चुनाव आड़े आया है या वे सुप्रीम कोर्ट से डर गए। कतिपय लोगों का कहना है कि हरियाणा चुनाव के दौरान उन्हें बंगाल राज्यपाल के पद से हटाकर उपराष्ट्रपति बनाया गया था।अब शायद बिहार चुनाव में जीत के लिए बिहार से राष्ट्रपति की तलाश पूरी हो गई होगी। हो सकता है नीतीश कुमार को बहलाने और जदयू को प्रसन्न करने के लिए उनसे इस्तीफा लिया गया हो। दूसरी बात भी अहमियत रखती है राज्यसभा के सभापति के तौर पर विपक्षी दलों से उनकी बहसें अक्सर सुर्खियों में रहीं। इसी साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट पर उनकी सख़्त टिप्पणी भी चर्चा का विषय बनी थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले को लेकर कहा था कि ‘अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं।’
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने हाल में विधेयकों को मंज़ूरी देने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए समय-सीमा तय करने की बात कही थी। इस पर उपराष्ट्रपति ने कहा था कि ‘संविधान का अनुच्छेद 142 एक ऐसी परमाणु मिसाइल बन गयी है, जो लोकतांत्रिक ताक़तों के ख़िलाफ़ न्यायपालिका के पास चौबीसों घंटे मौजूद रहती है।’सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की तलवार उन पर लटकी हुई थी।वरना एक जाट इस तरह पलायन नहीं कर सकता था।
उनका राजनीतिक करियर हमेशा विवादग्रस्त रहा है। कभी जनता दल से लेकर कांग्रेस और फिर बीजेपी तक के सफ़र में उन्होंने कई अहम भूमिकाएं निभाईं। लेकिन इस दौरान वे कई बार अपने बयानों और फैसलों को लेकर विवादों में भी घिरे। जुलाई 2019 में पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनने के बाद से वो लगातार राजनीतिक सुर्खियों में बने रहे। राज्य में उनका ममता सरकार के साथ कई मुद्दों पर टकराव रहा। उन पर सरकार के पक्षधर होने के गंभीर आरोप भी लगे। जिसे वे हंसते हुए टालते रहे।
बहरहाल वे राज्यसभा को सभापति विहीन कर अचानक चले गए। उपसभापति हरिवंश सिंह उनके स्थान को संभालेंगे। किंतु ख़बर ये है उनका भी अगले माह कार्यकाल समाप्त हो रहा है। उपराष्ट्रपति के चुनाव में लंबे समय का इंतजार करना पड़ सकता है।
पूर्व उपराष्ट्रपति स्वस्थ रहें हृदय को मज़बूत रखें इसी शुभेच्छा के साथ नवागत उपराष्ट्रपति की प्रतीक्षा रहेगी।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)





