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भूले-बिसरे चेहरे कांग्रेस को कर पाएंगे अनुशासित और बनेंगे संकटमोचक?

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– अरुण पटेल
विविध भारती से सुमधुर और अपने जमाने के यादगार फिल्मी गानों का कार्यक्रम भूले बिसरे गीत  काफी लोकप्रिय रहा है। उसके चाहने वाले पूरी शिद्दत के साथ उसे सुनते रहे हैं। मध्यप्रदेश में इन दिनों कांग्रेस के भीतर असली संकट अनुशासन का है और पार्टी को अपनों से ज्यादा खतरा महसूस हो रहा है। कौन कब तक साथ रहता है और आगे जाकर कब धीरे से पाला बदल लेता है या अपनी टीम में सेल्फ गोल कर संतोष का अनुभव करता है ऐसा होना कांग्रेस में कोई अनहोनी बात नहीं। डेढ़ दशक बाद सत्ता में आई कांग्रेस बमुश्किल डेढ़ साल ही सत्ता सुख भोग सकी और  विधायकों के दल बदलने से सत्ता से बेदखल हो गई। 28 विधानसभा उपचुनाव हुए और कांग्रेस को केवल 9 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। 27 सीटों पर 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का परचम लहराया था। उपचुनाव में कांग्रेस की हार का एक कारण कुछ क्षेत्रों में  भितरघात हुआ। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने प्रदेश में नए सिरे से 8 सदस्य अनुशासन समिति का गठन किया और उसमें  तीन- चार नेताओं को छोड़ कर शेष  ऐसे हैं जिनके चेहरे और योगदान से कांग्रेस की नई पीढ़ी अनजान है। देखने वाली बात यही होगी कि क्या भूले बिसरे चेहरे कांग्रेस के सामने इस समय जो समस्या है उसका निदान करते हुए कांग्रेसियों को अनुशासित और संकटमोचन की भूमिका में आकर पार्टी को संगठित कर पाएंगे , ताकि वह भाजपा के सामने टिक पाए। भाजपा एक ओर नई पीढ़ी को निरंतर मौका दे रही है तो  वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अभी तक पुराने चेहरों पर ही प्रदेश में अधिक भरोसा जता रही है। अब अनुशासन समिति नई पौध से कैसे तालमेल बैठा पाएगी यह आने वाले कुछ समय में पता चल सकेगा क्योंकि समिति को कुछ महत्वपूर्ण अनुशासनहीनता के मामलों में अपना फैसला सुनाना है।      प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में नए क्षत्रपों का उदय न होने के कारण पार्टी को अपने वर्चस्व को बचाए रखने के लिए जो भूले-बिसरे चेहरे हैं उनकी ही ताजपोशी करना पड़ रही है।  अनुशासन समिति में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के उन समर्थकों को जगह मिल गई है  जो लंबे समय से पार्टी की मुख्यधारा से कटे हुए थे। इस समिति में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अजिता वाजपेयी पांडे का है। श्रीमती पांडे अगस्त 2015 में रिटायर हुईं थीं। वर्ष 2018 के विधानसभा के आम चुनाव से पहले कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुई थीं और कांग्रेस का चुनाव वचनपत्र तैयार करने में उन्होंने कमलनाथ की मदद की थी। अजिता वाजपेयी पांडे भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने से पहले मध्य प्रदेश युवक कांग्रेस में काफी सक्रिय भूमिका में रहीं हैं। अनुशासन समिति में जाति-धर्म और क्षेत्र को साधने का फार्मूला लागू किया है। समिति में अल्पसंख्यक वर्ग से साजिद अली को रखा गया है। वे पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के करीबी हैं। जनजाति वर्ग के नन्हेलाल धुर्वे को रखा गया है, धुर्वे भी सक्रिय राजनीति में नजर नहीं आते हैं। वे महाकौशल के आदिवासी अंचल से हैं पर शायद अब महाकौशल की राजनीति में बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो उनसे परिचित होंगे। अनुसूचित जाति वर्ग से ही पूर्व सांसद बाबूलाल सोलंकी को जगह मिल गई है जो कि ग्वालियर-चंबल अंचल से हैं। सोलंकी 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में मुरैना से सांसद चुने गए थे। ब्राहण वर्ग से पूर्व विधायक विनय दुबे को समिति में जगह मिली है। पूर्व कांग्रेस विधायक दुबे राज्य लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं और दिग्विजय सिंह के भरोसेमंद नेताओं में हैं। पूर्व मंत्री रामेश्‍वर पटेल पिछड़ा वर्ग से हैं। वे मालवा क्षेत्र से हैं अपने जमाने में इंदौर इलाके में पिछड़े वर्ग के बड़े नेता रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी में संगठन का कामकाज देख रहे उपाध्यक्ष चंद्रप्रभाष शेखर को समिति में भी उपाध्यक्ष बनाया गया है। शेखर हजारीलाल रघुवंशी की अध्यक्षता वाली अनुशासन समिति में भी  थे तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के भरोसेमंद हैं। जहां तक भरत सिंह का सवाल है उनकी उम्र को देखकर यह कहा जा सकता है कि अनुशासन समिति का काम अप्रत्यक्ष तौर चंद्रप्रभाष शेखर ही देखेंगे। विनय दुबे और साजिद अली पिछली अनुशासन समिति में भी सदस्य रह चुके हैं। भारत सिंह के जरिए पुराने समर्थकोंं को सक्रिय करने की रणनीति को ध्यान में रखते हुए समिति का अध्यक्ष पूर्व मंत्री भारत सिंह को बनाया गया है। भारत सिंह का जन्म 1945 का है तथा उन्होंने विधानसभा का आखिरी चुनाव 1998 में लड़ा था। चुनाव जीते भी थे। 2003 के आम चुनाव के बाद से ही उनकी गतिविधियां भी सीमित हो गईं थीं। भारत सिंह राजपूत हैं, रतलाम जिले के जावरा तहसील के निवासी हैं। माना जाता है कि भारत सिंह को महत्व देकर दिग्विजय सिंह समूचे प्रदेश में अपने समर्थकों को जो घरों में बैठ गए हैं उन्हें सक्रिय करना चाहते हैं  ताकि उनका उपयोग कांग्रेस को मजबूत करने के लिए किया जा सके और वह घरों से निकलकर पार्टी की मजबूती के लिए काम करें तथा अपने आप को उपेक्षित ना समझें।और अंत में….     समान्यत: अनुशासन समिति में उम्रदराज नेताओं को ही जगह दी जाती रही है। पिछली समिति के अध्यक्ष हजारीलाल रघुवंशी थे। उनका निधन हो गया है। नई अनुशासन समिति राजनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश में हाल ही में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं। उपचुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों द्वारा भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के कारण हुए। उपचुनाव में कांग्रेस ने सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र ग्वालियर-चंबल की लगभग सभी  सीटों पर कड़ी चुनौती दी और कुछ सीटें बचाने में सफल रही। जो सीटें भाजपा ने जीती हैं, उन पर कांग्रेस के पराजित उम्मीदवार अपनी ही पार्टी के नेताओं पर भितरघात का आरोप लगा रहे हैं। भिंड जिले की मेहगांव सीट भी भाजपा ने जीती है। भिंड जिला कांग्रेस कमेटी ने पूर्व मंत्री और लहार के विधायक डॉ.गोविंद सिंह के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया है। जिला अध्यक्ष श्रीराम बघेल ने कई आरोप भी डॉ.गोविंद सिंह पर लगाए। गोविंद सिंह नेता प्रतिपक्ष पद के दावेदार भी हैं। अनुशासन समिति के समक्ष यह मामला रखा जाना है। ग्वालियर-चंबल के साथी  बुंदेलखंड और निमाड़ मालवा अंचल में भी अन्य नेताओं पर पर भी भितरघात का आरोप है। ऐसे में अनुशासन समिति का काम और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि कांग्रेस को भी नगरीय निकाय चुनावों का नए साल में सामना करना है और इन चुनावों में भितरघात की संभावना कम से कम हो इसको देखते हुए अनुशासन समिति की सिफारिशें काफी मायने रखेंगी। समिति की सिफारिशों पर प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को फैसला करना है और वह जिन पर कार्रवाई खुद करना चाहेंगे करेंगे और कुछ मामलों को हाईकमान को भी भेज सकते हैं।

लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।

Ramswaroop Mantri

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