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सरकार बनी जनतंत्र की “भक्षक” और तानाशाही की “रक्षक”

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मुनेश त्यागी

   केंद्र सरकार पिछले लगभग एक महीने से विपक्ष के सवालों से भाग रही है, विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब नहीं दे रही है। विपक्ष गरीबी, भुखमरी, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बढ़ती आर्थिक समानता और सरकार की जन विरोधी, किसान विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों पर मजबूती से सवाल उठा रहा है। विपक्ष अडानी द्वारा किए गए फ्रॉड की कार्यवाही पर भी जेपीसी की मांग कर रहा है, मगर सरकार जनाब देने बच रही है और भाग रही है।
 अब सरकार ने विपक्ष के सवालों का जवाब न देकर, तुच्छ आरोपों के आधार पर पर दोषी साबित किए गए राहुल गांधी की सदस्यता खत्म कर दी है। यह अघोषित तानाशाही का प्रकटीकरण है। दुनियाभर के पैमाने पर ऐसा कहीं नहीं हुआ है। यह दुनिया में पहला देश है कि जहां "मदर ओफ डेमोक्रेसी" नामक देश में, तुच्छ आरोपों के आधार पर केवल और केवल एक्सप्रेस हड़बड़ी में, सरकार ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को बलि का बकरा बनाया है। आखिर ऐसी क्या जल्दी थी? एक-दो माह का इंतजार किया जा सकता था और समय व अवसर देकर राहुल गांधी की सदस्यता पर बात की जा सकती थी। थोड़ा इंतजार करके सदस्यता रद्द करने में क्या परेशानी थी?
 इस केस में किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष की मानहानि नहीं की गई है। पिछले पिछत्तर साल की आजादी के दौरान विरोधियों ने सत्तापक्ष को क्या-क्या नहीं कहा? उन्होंने चोर को चोर कहा, भ्रष्टाचारी को भ्रष्टाचारी कहा, बेईमान को बेईमान कहा। ऐसा कहने वालों के खिलाफ सरकार द्वारा कभी कोई कार्यवाही नहीं की गई। अगर जनतांत्रिक व्यवस्था में चोर को चोर, बेईमान को बेईमान और भ्रष्ट को भ्रष्ट नहीं कहा जाएगा, फ्रोड को फ्रॉड, नहीं कहा जाएगा तो कैसे काम चलेगा?
 यह राहुल गांधी पर की गई कार्यवाही की ही बात नहीं है, यह सरकार की मनमानी और तानाशाहीपूर्ण हरकत, यह जनतंत्र में तानाशाही और फासीवादी व्यवस्था का थोपा जाना है। यह पूरे विपक्ष को और अपने तमाम विरोधियों को डराने, धमकाने की पहली चाल है। यह 2024 के संसदीय चुनाव में बढ़त हासिल करने के लिए, विपक्ष का सफाया करने की चाल है। अब इस भयभीत सरकार से, विपक्षी पार्टियों को मानवीय और माननीय व्यवहार की कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
  बहुत साल पहले भाजपा नेता और भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने कहा था कि जब विपक्ष को और विपक्षियों की आवाज को डराया, धमका जाने लगे, बंद कराया जाने लगे, तो तब विपक्ष समेत जनता की आजादी छीन ली जाती है, जनतांत्रिक व्यवस्था का विनाश और तब तानाशाही का आगाज हो जाता है।
 अब सत्ता पक्ष, सत्ता के गुरूर में, इतना अंधा हो चुका है कि उसे अपने नेताओं की चेतावनियां अभी याद नहीं रह गई हैं। आज हालात इतने खराब हो गए हैं कि झूठ को झूठ कहने पर और सच को सच कहने पर भी पाबंदी लगाने के पूरे इंतजाम कर लिए गए हैं। अब तो लगने लगा है कि आने वाले समय में गरीबी, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ती हुई आर्थिक असमानता और सरकार की जनविरोधी, मजदूर विरोधी और किसान विरोधी नीतियों पर सवाल उठाना संभव नहीं रह जाएगा। ऐसा करने से शोषण, जुल्म, अन्याय, भेदभाव, गैर बराबरी, ऊंच-नीच, छोटे बड़े  की मानसिकता और सोच को बरकरार रखने वाली ताकतों और अंधविश्वास में विश्वास करने वाली ताकतों की भावनाएं, भयंकर रूप से आहत हो जाएंगी।
    अब किसी भी सरकार विरोधी आदमी या पार्टी को, अपनी बात रखने की इजाजत नहीं है, सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की इजाजत नहीं है, किसी व्यक्ति द्वारा बड़े पैमाने पर फ्रॉड की जांच करने की इजाजत नहीं है। किसी कवि ने क्या खूब कहा है,,,,,

सोच समझ कर बातें करना सीधी बातों के भी अब उल्टे सीधे अर्थ निकाले जाएंगे,
अब चेहरों के दाग छुपाने की खातिर
आईनों में भी नुक्स निकाले जाएंगे।

 हम पूरे विश्वास के साथ कहना चाहेंगे कि विरोध और विरोधियों को दबाने वाले, जनतंत्र के सबसे बड़े "भक्षक" होते हैं और ऐसा करने वाले फासीवाद और तानाशाही के सबसे बड़े "रक्षक" होते हैं। अब विरोधियों को सरकार और पूंजीपतियों की सत्ता से किसी रूरिआयत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अब उनकी आवाज और विरोध को शाम, दाम, दंड, भेद यानी, सब तरह की मक्कारियों और बेईमानियों का इस्तेमाल करके दबाया और दफनाया जाएगा और उन पर झूठे मुकदमे दायर किए जाएंगे, उन्हें मनमाने तरीके से दंडित किया जाएगा, उनकी सांसदी और विधायकी छीनी जाएगी और उनकी आवाज को ताले लगाकर बंद किया जाएगा।
 भारतीय समाज का यह सबसे काला समय चल रहा है। विपक्ष जनता के मुद्दे उठा रहा है, सरकार की कमियों, नाकामियों, पक्षपात और बेईमानी का विरोध कर रहा है, उसके जनविरोधी और देशविरोधी कुकर्मों की बखिया उधेड़ रहा है। हालात इतने खराब है कि विरोधी आवाज को दबाने के लिए, सत्ता पक्ष और सत्ता पार्टी अपनी सत्ता को बचाने के लिए सब कुछ करने पर आमादा हो गए हैं।
यह केवल राहुल गांधी की संसदीय सीट रद्द करने का मामला ही नहीं रह गया है, बल्कि यह करोड़ों लोगों का बलिदान करके हासिल की गई आजादी की निर्मम हत्या है। यह लोकतंत्र का खुलेआम अपहरण और समाप्ति का संदेश है। यह भारतीय लोकतंत्र पर और संसदीय एवं संवैधानिक मर्यादाओं पर आज तक का सबसे बड़ा हमला है।
  सरकार जो कर रही है, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। हम सरकार की जनविरोधी और तानाशाही पूर्ण हरकतों का पुरजोर विरोध करते हैं। अब विपक्षी पार्टियों के साथ-साथ जनता की बारी है कि वह हिंदू मुस्लिम की नफरत भरी मुहिम को छोड़कर, संघर्ष के मैदान में सड़कों पर उतरे और जनतंत्र एवं आजादी की हत्या करने पर उतारू सर्व सत्तावादी सरकार को हराए, गद्दी से हटाए और उसे सत्ता से तुरंत ही अपदस्थ कर दे। आज देश के जनतंत्र और नागरिकों की स्वतंत्रता पर की आजादी पर भयंकर कुठाराघात हो रहा है। यह सिर्फ राहुल गांधी के साथ खड़े होने का समय ही नहीं है, बल्कि देश के जनतंत्र, देश की आजादी, देश के गणतंत्र, देश के संविधान और कानून के शासन को बचाने का अति महत्वपूर्ण समय है। यह सरकार की दुर्नीतियों के सामने सर झुका कर नहीं, सर उठा कर और सीना ठोककर, चलने का समय है।
  अब सत्ता पक्ष और सत्ता पार्टी यह मान बैठे हैं कि सरकार भी उनकी, पुलिस भी उनकी, अदालत भी उनकी, अब कोई विरोधी नहीं बच पाएगा। मगर यह भारत की जनता है। इसने हजारों आतताईयों का, आक्रमणकारियों का, सामना किया है, उनकी हरेक जनविरोधी नीतियों, चालबाजियों, हत्याओं और हिंसक वारदातों का मुकाबला किया है। संकट की इस अभूतपूर्व घड़ी में वह एकजुट होकर, इन जनतंत्र के "भक्षकों" का और तानाशाही के "रक्षकों" का मुकाबला करेगी और इन्हें मात देगी और इनके तमाम देशविरोधी और जनतंत्र विरोधी मनसूबों को परास्त और धाराशाई करेगी।

Ramswaroop Mantri

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