मधुकर पवार
मैं सुबह की सैर करने जाते समय सड़कों पर चलने वाले वाहनों से ज्यादा कुत्तों से बचकर चलता हूँ। वैसे तो दोनों से ही बहुत बचकर चलना होता है। पता नहीं कब वाहन पीछे से धक्का देकर सीधे अस्पताल पहुंचा दे या कोई कुत्ता झपट्टा मारकर 10- 20 ग्राम मांस खींच कर रफूचक्कर हो जाये। सुबह –सुबह की सैर के दौरान तो इन दोनों से ही सबसे ज्यादा खतरा होता है। हालाकि वाहन चालक कभी – कभी हार्न बजाकर सचेत कर देते हैं और कुत्ते भी भौंक कर। लेकिन दोनो से बचने के लिये सतर्क रहने की जिम्मेदारी तो अपनी ही होती है.
मेरे एक जागरूक मित्र चोखेलाल ने बताया कि सुबह की सैर के दौरान वे हमेशा दायीं ओर से चलते हैं ताकि सामने से आ रहे वाहन से बच तो सकते हैं… यदि बाईं ओर से चल रहे हैं तो वाहन पीछे ठोक सकता है। मैंने जिज्ञासावश पूछ ही लिया… और कुत्तों से बचने के लिए…. तो वे बड़े ही आत्मविश्वास से कहने लगे…. पहले तो भौंकते थे लेकिन अब पहचानने लगे हैं। इसलिए थोड़ा कम डर लगता है। उन्होने बताया कि हाथ में एक डंडा भी रख लेता हूँ. जरूरत पड़ जाये तो कुत्तों को डराने और भगाने के काम आ जाता है. डंडा साथ में रखने से सैर करने वाले अन्य लोगों पर भी रौब पड़ता है. डर नहीं लगने की एक बड़ी वजह वे यह भी बताते हैं कि कुछ कुत्तों की लगाम उनके मालिकों के हाथ में होती है और कुत्ता आगे – आगे चलता है। तब यह भी अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि मालिक, कुत्ता को घुमाने लाया है या कुत्ता, मालिक को।
वैसे कुत्तों के स्वामीभक्ति के अनेक किस्से सुने रखे हैं। पढ़े हैं और देखे भी हैं लेकिन वे अपने स्वामी यानी केवल अपने मालिक के स्वामीभक्त होते हैं और राहगीरों के कट्टर दुश्मन। इसलिए उनसे बचकर चलना ही सबसे पहली प्राथमिकता होती है । पालतू कुत्ते तो गेट (घर) के अंदर ही रहते हैं और जब उनके घर के सामने से गुजरते हैं तब अक्सर घर के अंदर का शेर ज़ोर – ज़ोर से भौंक कर पूरे क्षेत्र को सिर पर उठा लेता है। उस समय ऐसा महसूस होता है जैसे हमने उसके क्षेत्र में अतिक्रमण कर लिया है या चोरी करने के लिए आये हैं और उस स्वामीभक्त ने मालिक को आगाह कर दिया है ।
आजकल कुत्ते पालने का शौक भी बढ़ते ही जा रहा है। मेरे मोहल्ले में भी अनेकों लोगों ने अलग – अलग प्रजाति के बहुत सारे कुत्ते पाल रखे हैं लेकिन मैं इन्हें केवल दो ही श्रेणी में रखता हूँ… घर वाले और बाहर वाले । घर वाले कुत्ते चहारदीवारी और बड़े – बड़े गेट के अंदर शेर बनकर रहते हैं और बाहर वाले कुत्ते अपने – अपने मोहल्ले के शेर तो होते ही हैं. उनकी सीमा में मजाल कि कोई दूसरे मोहल्ले का कुत्ता घुस आये और आकर गुर्राये या धमकाये (भौंके).
कुत्तों के भौंकने से ज्यादा डर उनके गुर्राने से लगता है. जब कोई कुत्ता सामने आकर पीछे के दोनो पैर पर जोर देते हुये गुर्राये तो अच्छे – अच्छे पहलवानों के भी होश ठिकाने आ जाते हैं. ज्ञानी लोग कहते हैं कि घोड़े के पीछे और अफसर के आगे कभी मत पड़ो… लेकिन कुत्तों के न तो आगे और न ही पीछे रहो. गुर्राने वाले कुत्ते जरूरी नहीं कि काटे ही बल्कि अक्सर बिना गुर्राने वाले कुत्ते काटने में ज्यादा माहिर होते हैं.
बाहर वाले कुत्तों के खानपान में तो वैसे कोई परिवर्तन नहीं आया है. ऐसा मेरा मानना है क्योंकि उन्हें मैंने जब बचपन में देखा था तब वे इधर – उधर मुंह मारते रहते थे और आज भी वैसा ही करते हैं. कुछ परिवारों में अभी भी परम्परा चल रही है…. पहली रोटी गाय को और आखिरी रोटी कुत्ते को खिलाने के लिये रखते हैं. शहरों में गाय अब कम दिखाई देती हैं इसलिये अब तो शहरों में गाय के हिस्से की रोटी भी कुत्तों को मिलने लगी है.. इससे बाहर वाले कुत्तों की थोड़ी मौज तो हो गई होगी लेकिन घर वाले कुत्तों के खानपान में तो जबर्दस्त परिवर्तन देखने को मिल रहा है.
एक दिन मैं आईसक्रीम खरीदने गया. दुकान पर एक महिला आई. वह दुकानदार से कहने लगी.. भैया, हमारे लिये एक बटरस्काच का फैमिली पैक और मेरे डागी के लिये वेनिला कप दे दीजिये. उसने बड़ी शान से बताया कि जब हम आईसक्रीम खायेंगे तो भला डागी को कैसे वंचित कर सकते हैं ? मेरे डागी को केवल वेनिला ही पसंद है. दुकानदार ने उसकी हां में हां में मिलाते हुए कहा- हां मेडम, कुत्ता भी तो परिवार का सदस्य ही होता है. उसकी पसंद का भी तो ख्याल रखना जरूरी है.
विश्व के सभी देशों में हेप्पीनेस का सर्वे कराया जाता है. भारत की स्थिति में कोई महत्वपूर्ण सुधार दिखाई नहीं देता. सर्वे करने वाली एजेंसी को परिवार की हेप्पीनेस में परिवार के सभी सदस्यों के आनंद में नये सदस्यों के आनंद को भी शामिल करना चाहिये जिससे हेप्पीनेस के मामले में हमारे देश की स्थिति में सुधार हो सकेगा. मुझे पूरा विश्वास है कि नये सदस्यों के भोजन में वेनिला के शामिल हो जाने से उनके आनंद में जरूर इजाफा हो रहा होगा. इसका एक और फायदा यह भी हो सकता है कि खानपान में हो रहे बदलाव से कुत्तों में शाकाहारी होने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है. यह शोध का विषय भी हो सकता है. शाकाहारी होने से कुत्तों द्वारा मनुष्यों को काटे जाने की घटनाओं में भी कमी आ सकती है.





