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बच्चों की शिक्षा की घोर उपेक्षा, चिंतनीय

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सुसंस्कृति परिहार
शिक्षा की अनिवार्यता और संविधान में इसका नि:शुल्क प्रावधान होने के बावजूद यदि आज भी मां बाप सबसे ज्यादा चिंता करते हैं तो वह है बच्चों की पढ़ाई को लेकर ही है। सरकारी और गैर-सरकारी का जो विभेद है उसने एक नई मानसिकता को जन्म दिया है वह है निजी विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाना।इसे सामाजिक प्रतिष्ठा के पर्याय के रुप में देखा जाता है। दैनंदिन मज़दूरी करने वाले भी अपने पेट को काटकर बच्चे को निजी विद्यालयों में भेजते हैं। जहां विद्यालय का शुल्क उन्हें हिला कर रख देता है ।एक दो साल तो जैसे तैसे चला लेते हैं पर आगे मुश्किल होता है।बाद में ऐसे बच्चे शासकीय स्कूल में फट्टी पर बैठना नापसंद करते हैं और उनका नाता पढ़ाई से टूट जाता है।      निजी स्कूलों के मुकाबले शासकीय स्कूलों की हालत बहुत पतली होती है ।ये सभी जानते हैं । शिक्षकों का अभाव इतना कि एक शिक्षक कक्षा एक से लेकर पांच तक सबको एक साथ बैठाकर पढ़ाता है। सुविधाएं तो दूर की बात ।इसी वजह से वहां छात्र संख्या बहुत कम होती है।  कई बार इस तरह की आवाज उठाई गई कि शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजने का नियम बनाया जाए ताकि यहां की व्यवस्थाएं सुधरें पर इस पर कहीं कोई ठोस काम नहीं हुआ। दिल्ली में ज़रुर किए गए प्रयास कुछ हद तक सफल रहे।
ये बात समझ लेनी चाहिए कि निजी और सरकारी विद्यालयों में असमानता के कारण दो तरह के संस्कार जन्म ले रहे हैं जो घातक है और अनिवार्य शिक्षा और नि:शुल्क शिक्षा की अवधारणा के ख़िलाफ़ है ।इस विभेद को समाप्त कर हम एक जैसी शिक्षा देकर बच्चों के मनोबल को बढ़ाकर उनका विकास कर पाएंगे।
यही बात कोरोना काल में दी जा रही आन लाईन शिक्षा के बारे में देखी जा रही है।जिस देश में बच्चों को सामान्य आहार मुश्किल से मिल पाता हो उसे मोबाइल पर शिक्षा मज़ाक से कम नहीं ।ये बात सही है कि हर घर में मोबाइल है पर वह सिर्फ ज़रुरत के लिए है मसलन गैस का नंबर लगाने , साहिब के आदेश सुनने और नातेदारों से बात के लिए ।इसके लिए घर का मुखिया बमुश्किल 10से 50रु₹ख़र्च कर पाता है। वहां स्मार्ट मोबाइल का  होना जरूरी है जो कम से कम वाला 8000 ₹ में आता है फिर प्रत्येक 28दिन बाद रीचार्ज में 599 का ख़र्च उठाना आम भारतीय परिवार के लिए कितना कठिन होगा इस बात को बिना समझे आन लाइन दी जा रही शिक्षा को क्या कहा जाएगा ?
मान लीजिए,जैसे तैसे मां बाप इसे मुहैया करा भी दें तो गांव में बिजली की हालत किसी से छुपी नहीं है ।घर में मान लीजिए दो बच्चे हैं तो दोनों के मोबाइल अलग अलग भी चाहिेए।वे कैसे सुलभ होंगे इसलिए शहरों में बच्चे किसी दूसरे के घर बैठते हैं जो कोरोना काल में अनुचित है।मतलब यह है  कि ऑनलाइन पढ़ाई कार्यक्रम केवल सुविधा संपन्न बच्चों के लिए संभव हो पा रहा है . गरीब एवं निम्न मध्यम वर्ग के बच्चे इससे वंचित हो रहे हैं । पढ़ाई का माहौल ना होने के कारण और अनुशासन की अनुपस्थिति और पास कर दिए जाएं की वजह से बच्चों में अध्ययन के प्रति अरुचि उत्पन्न हो रही है । लंबे अर्से से घरों में कैद बच्चे  मानसिक तौर पर भी बीमार हो रहे हैं।जो बच्चे आन लाईन पढ़ रहे  हैं वे भी संतुष्ट नज़र नहीं आते। परेशानी का सबब भी मोबाइल बन रहे हैं जिनके हाथ में  पहली बार स्मार्ट फोन आया है उससे वे इन लाइन शिक्षा भले ना लें दीगर गैर ज़रूरी चीजें ग्रहण कर रहे हैं ।यह प्रवृत्ति ना सिर्फ बच्चों के लिए बल्कि समाज के लिए परेशानियों में डालने वाली है। सबसे बड़ी बात है कोरोना कर्फ्यु हटने के बाद बच्चे बातरह घूम-फिर रहे हैं।रास्ते भीड़भाड़ भरे हैं इससे तो बेहतर है बच्चों को शालाओं में ही बिठाया जाए और तीसरी आने वाली लहर की चेतावनी और सुरक्षा उपायों के बारे में बताया जाए ताकि वे सुरक्षित रहना सीख लें।साथ साथ ज़रुरी विषयों में उनकी दिलचस्पी पैदा कर पठन पाठन की ओर उन्हें लाया जाए । बच्चों को जब अपने दोस्त मिलेंगे वे शैतानियां करेंगे तभी उनके मनोविकार दूर होंगे उनका मनोबल बढ़ेगा।दिन के पांच छै घंटे उनके जीवन को विनष्ट होने से बचाएंगे। मोबाइल की दोस्ती एक उम्र में ठीक होती है किशोर वय में उससे दूरी जितनी जल्दी हो इसके लिए सरकार को शालाओं को खोलना ही होगा वरना एक बहुत बड़ी संख्या में ये नाकारा बच्चे देश के लिए अनुपयोगी और बोझ बन जायेंगे।
यह भी विचारणीय है कि यदि आमजन ने ये मांग मज़बूती से नहीं उठाई तो सरकार भविष्य में आनलाइन शिक्षा पर ज़ोर देकर स्कूल कालेज भी बंद कर सकती है।तब सिर्फ रह जाएंगे निजी विद्यालय । जिनमें अमीर मां बाप के बच्चे ही पढ़ सकेंगे ।अपरोक्ष रूप से गरीब लोगों का नौकरियों में ख़ात्मा हो जाएगा वे क्या करेंगे ,कैसे खायेंगे सोचकर तकलीफ़ होती है ।वे दास या गुलाम बना लिए जाएंगे।यानि आन लाइन शिक्षा हमें सामंतवाद की ओर ले जाएगी । इसलिए शिक्षा के प्रति सरकार की अरुचि को ध्यान में रखकर, सजगता आवश्यक है वरना शिक्षा से भारत का एक वृहत्तर समुदाय वंचित रह जाएगा।

Ramswaroop Mantri

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