~ पुष्पा गुप्ता
गुजरात मॉडल के नाम पर जो कुछ बताया गया, छलावा ही था. कथित धर्मवादी सत्तासीनों का असली मॉडल तो मणिपुर मॉडल है. इसे पूरी दुनिया देख रही है, बिना बीजेपी के प्रचार किए.
कांग्रेस इस समय मणिपुर के मुद्दे को लेकर फ्रंट फुट पर खेल रही है। टीएमसी और दूसरे दलों को मणिपुर में अपनी राजनीतिक ज़मीन उर्वर करनी है। बीजेपी को मणिपुर में डबल इंजन सरकार बचानी है। एन. बीरेन सिंह को अपनी कुर्सी बचानी है। लेकिन जो औरतें अपनी इज्ज़त नहीं बचा पाईं, उन्हें लेकर इस देश का समाज बस एक क्षणिक उबाल खाकर सो जाएगा। हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा वैसे ही ठूंठ हो चुका है।
मणिपुर की हिंसा न जाने कितनी ज़िंदा लाशें केवल सांस लेने के वास्ते छोड़ जाएंगी। बहुत सी ऐसी माएँ और बहनें होंगी, जिनके शरीर से लेकर आत्मा तक गिद्धों ने नोचा होगा, उनके केस नहीं दर्ज़ हुए होंगे।
इस दंश को उनकी पीढ़ियां नहीं भूल पाएंगी। इसके लिए किन-किन लोगों को जि़म्मेदार माना जाये?
मणिपुर में नरसंहार, औरतों की इज़्ज़त तार-तार होने वाली घटनाओं से इस देश की पुलिस, क्रिमिनल-जस्टिस सिस्टम, राजनीतिक दल, सीएम से लेकर पीएम और राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल, महिला आयोग तक एक्सपोज़ हो चुके हैं. हमारे समाज में एक खाया-पिया अघाया वर्ग नमूदार हुआ है, जिसे सुबह से देर रात सोशल मीडिया, व्हाट्सअप ग्रुप पर केवल भजन-कीर्तन, मोदी-मोदी जपना है.
नफ़रत का मणिपुर मॉडल अमृतकाल का कड़वा सच है. गुवाहाटी से प्रकाशित दैनिक पूर्वोदय में आज का कॉलम-
मणिपुर में मानवता शर्मसार हुई है, यह कोई विषय नहीं है। यह वही क्लास है, जो अपने बाल-बच्चों को लेकर अत्यंत संवेदनशील व पोजे़सिव रहता है। क्लबों-पार्कों, किटी पार्टियों की गॉसिप इसकी गवाह हैं। यह कहानी केवल एक अपार्टमेंट की नहीं है, देश के लाखों सोसाइटी ग्रुप इसी माइंडसेट से चल रहे हैं।
जब समाज बंट चुका है, तो पढ़े-लिखे अधाये लोग क्यों न बंटें? सेलरी पैकेज, प्रोमोशन, ब्रांडेड ट्रेंडी कपड़े, ज्वेलरी सब चाहिए। आये दिन इस सवाल से परेशान कि हमारी गाड़ी उसकी गाड़ी से छोटी क्यों है?
बच्चे विदेश सेटल हों, तो ‘तीर्थाटन‘ कर आयें, इसी जुगाड़ में दिन-रात लगे लोगों के लिए न पहले दिल्ली व गुजरात के दंगे मायने रखते थे, न आज की तारीख़ में राजस्थान, छत्तीसगढ़ या मणिपुर की हिंसा, औरत की इज्ज़त तार-तार करने की घटनाएं मायने रखती हैं।
पैदा होते ही कबीर की उस उलटवाणी को कंठस्थ कर लो, ‘सबसे भले वे मूढ़, जिन्हें न व्यापे जगत गति।‘ स्मार्ट फोन में चारों पहर गर्क़ नई पीढ़ी को ऐसे ही लोगों ने अपने से चार क़दम और आगे बढ़ा दिया है। लोमड़ की तरह स्वार्थी नया जनरेशन!
नार्थ ईस्ट, शेष देश को अबतक संगठित लगता रहा है। सरकारी नारों में ‘सेवेन सिस्टर्स‘ का बखान जो लोग सुनते रहे, इस सच से कोसों दूर हैं कि समूचा उत्तर-पूर्व विभिन्न कबीलों में बंटा समाज है। माहौल ऐसा बन गया कि मणिपुर में एक कबीला, अपने से असहमत दूसरे कबीले के ख़ून का प्यासा दीखता है।
मणिपुर की 53 प्रतिशत आबादी मैतेई है, जिनके पूर्वज म्यांमार और आसपास से आने के बावज़ूद यहां का मूल निवासी होने का दावा करते हैं। इनका बड़ा हिस्सा हिंदू धर्म के प्रति आस्थावान है, जो बाद में बीजेपी की राजनीति के लिए ऊर्जावान साबित हुआ। लगभग 16 प्रतिशत मैतेई पारंपरिक सनमाही धर्म का पालन करते हैं। इनमें 8 फीसद वो लोग भी हैं, जो इस्लाम धर्म को मानते हैं। 1.6 प्रतिशत मैतेई ईसाई भी हैं।
बहुसंख्यक मैतेई रासलीला, जन्माष्टमी, होली, हराओबा, चेइराओबा, याओसांग, जगन्नाथ रथ यात्रा, होली, दिवाली, रामनवमी पूरे उत्साह से मनाते हैं। मैतेई की तरह कुकी की जड़ें म्यांमार में हैं। मंगोल मूल के कूकी का बड़ा हिस्सा ईसाई धर्मावलंबी है। मैतेई ज़्यादातर इंफाल घाटी में रहते हैं, जबकि कुकी आस-पास की मिजो पहाड़ियों और उससे आगे दक्षिणी असम से लगे सीमाई हिस्से में रहते हैं।
बोड़ो, नगा, कूकी, चिन और मैतेई नेता अरसे से अलग होमलैंड की मांग करते रहे। यहां नेपाली आबादी भी अच्छी ख़ासी है। दस्तकारी, हथकरघा, पर्यटन और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला मणिपुर आरक्षण की आग में अब लुट-पिट चुका है।
देश का ‘आर्किड बास्केट‘ बोलते हैं मणिपुर को, इस सूबे की पहचान फूलों की 500 प्रजातियों की वजह से रही है। आईटी उद्योग ने भी यहां पांव पसारना आरंभ किया था।
उत्तर में नगालैंड, दक्षिण में मिजोरम, पश्चिम में असम और पूरब में म्यांमार सीमा तक 8 हज़ार 628 वर्गमील में फैला मणिपुर 15 अक्टूबर 1949 में भारतीय संघ में विलय से पहले प्रिंसली स्टेट हुआ करता था। 1962 में केंद्रशासित प्रदेश अधिनियम के अंतर्गत 30 चयनित तथा तीन मनोनीत सदस्यों की एक विधानसभा स्थापित की गई।
21 जनवरी, 1972 को मणिपुर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और 60 निर्वाचित सदस्यों वाली विधानसभा गठित की गई। इसमें 19 अनुसूचित जनजाति और 1 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। राज्य में लोकसभा के लिए दो और राज्यसभा में एक प्रतिनिधि है।
मणिपुर में 15 साल कांग्रेस सत्ता में रही। 2017 में 28 सीटों के बहुमत के बावज़ूद कांग्रेस 21 सीटों वाली बीजेपी की जोड़तोड़ के आगे टिक नहीं पाई। एन. बीरेन सिंह कांग्रेस के प्यादे से बीजेपी के वज़ीर बन गये।
आरक्षण की राजनीति से इतर देखा जाए, तो मणिपुर के जातीय समूहों में टकराव की मूल वजह अलग होमलैंड की मांग भी रही है। आप सात रंगों के कांगलेईपाक ध्वज पर ग़ौर कीजिए, जो मैतेई अस्मिता की पहचान है।
यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) 1964 में बना था। पीपुल्स रेवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलेईपाक (पीआरईपीएके) को अलग राष्ट्र और अलग घ्वज चाहिए था। मैतेई मिलिटेट्स का एक और गुट बना, ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी‘।
उसके बरक्स 1993 में बने कूकी-ज़ूमी ग्रुप अलग होमलैंड के लिए लड़ रहा था। कूकी नेशनल आर्गेनाइजेशन (केएनओ) के तहत 17 विद्रोही समूह हैं। कूकी विद्रोहियों का एक और भी समूह है, यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (यूपीएफ) जिसमें आठ गुट अलग से हैं।
नगा आक्रामकता को काउंटर करने के वास्ते एक और रेवोल्यूशरी ग्रुप, ‘कूकी-ज़ो‘ 2006 में बना था। इन सबों का एक ही लक्ष्य रहा है, होमलैंड।
10 अगस्त 2005 को कूकी नेशनल आर्गेनाइजेशन (केएनओ) ने एक एसओओ (सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन) पर सेना के साथ हस्ताक्षर किये, इस समझौते के तहत शांति बहाली करनी थी। इसके प्रकारांतर केंद्र, मणिपुर सरकार और केएनओ के बीच 22 अगस्त 2008 को अभियान स्थगन पर हस्ताक्षर किया गया।
उसी दिन कूकी विद्रोहियों का दूसरा समूह यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट (यूपीएफ) ने भी ‘एसओओ‘ पर हस्ताक्षर किया। आईआईटी गुवाहाटी में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफेसर एन. किपजेन जानकारी देते हैं कि 14 कैंपों में 2200 कुकी विद्रोही युद्ध विराम के बाद, मय हथियार रखे गये हैं।
मैतेई को अनुसूचित जनजाति बना देने के कोर्ट आदेश के बाद, चूडाचांदपुर में हिंसा की जो पहली घटना 3 मई 2023 को हुई, उसके बारे में बताया गया है कि कुकी विद्रोहियों ने सबसे पहले समझौता तोड़ा था, वहां रखे हथियार लूटे गये थे। लेकिन, उस जगह विशेष पर कुकी विद्रोहियों द्वारा हथियार लूटने वाली बात बाद में ग़लत निकली।
कूकी की तरफ से बोलने वाले तमाम लोग सीधा मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह और मणिपुर के पुलिस प्रमुख पर आरोप लगाते हैं कि इनकी सरपरस्ती में हिंसा बढ़ती चली गई है। अगर ऐसा है, तो एन. बीरेन सिंह को “राजधर्म” की याद कौन दिलायेगा?
एन. बीरेन सिंह को बार-बार बयान देना पड़ रहा है कि वो इस्तीफा नहीं देंगे। लेकिन सूबे का मुख्यमंत्री जब मीडिया के सामने यह स्वीकार कर रहा हो कि औरतों की इज्ज़त लूटने, उन्हें नंगा घुमाने, उनके परिजनों की हत्या, गांव के गांव लूटने-जलाने की असंख्य वारदातें हुई हैं, तो यह क्या केंद्र की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त नहीं था?
आखि़र क्यों सुप्रीम कोर्ट को सीघी कार्रवाई करने का बयान देना पड़ा? सुप्रीम कोर्ट इसका भी रिव्यू करे कि मणिपुर के तपते हुए माहौल को जानने के बावजूद वहां के हाईकोर्ट द्वारा आरक्षण का आदेश देना कहाँ तक उचित था? नफरत की आग तो कोर्ट आदेश के बाद ही लगी है. हमारे देश में राष्ट्रीय महिला आयोग है, संवेदनशील राष्ट्रपति हैं। लेकिन चारों तरफ सन्नाटा समाज में निराशा का संदेश देता है।
जिन लड़कियों के साथ हैवानियत हुई, उनमें से एक की मां का वायरल हुआ बयान इस सन्नाटे को क्यों नहीं चीर पाई? उसके शब्द पिधले सीसे की तरह कानों में उतर आते हैं, ‘पुलिस मौके पर मौजूद थी। वो लोग कपड़े उतरवा रहे थे। भीड़ हमारी बच्चियों को नोंच रही थी, सामूहिक बलात्कार हो रहा था, लेकिन पुलिस चुप खड़ी थी। भीड़ ने मेरे पति और बेटे को मार डाला, फिर बेटी को ले गए।‘
लड़कियों, उनके परिजनों को हिंसक दरिंदों के हवाले करने वाली मणिपुर पुलिस का बाल बांका नहीं होना पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है।
उस विडियो को दिखाने पर अब रोक लग चुकी है। मामला 4 मई 2023 का है। इसकी पहली एफआईआर, घटना के 48 दिन बाद 21 जून को दर्ज की गई थी। एफआईआर के एक माह बाद, पहली गिरफ्तारी गुरुवार 21 जुलाई को हुई। वह संसद के मानसून सत्र की शुरूआत का पहला दिन था।
प्रधानमंत्री मोदी मीडिया को संबोधित कर रहे थे। मणिपुर पर देश के प्रधानमंत्री का पहला संक्षिप्त बयान, ‘दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।‘ बयान से पहले मुख्य अभियुक्त पकड़ा गया था, बाद में चार और गिरफ्तार किये गये। लेकिन क्या केवल चार-पाँच लोग ही हत्या और हैवानियत में शामिल थे? क्या मालूम जब ये दरिंदे जेल से छूटें, और इनके समुदाय के लोग इन्हें अपना हीरो बना दें। कोई मंत्री माला भी पहनाने चला जाए?
मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह फुटबॉल के खिलाड़ी होने के साथ-साथ पत्रकारिता से जुड़े रहे। उन्होंने खिलाड़ी कोटे से बीएसएफ में भी नौकरी की थी। एन. बीरेन सिंह को राष्ट्र के लिए उनके असाधारण कार्य के लिए 2018 में ‘चैंपियंस ऑफ चेंज‘ से सम्मानित किया गया था। पांच वर्षों बाद जो कुछ उनके राज्य में हुआ, उसे लेकर क्या कहेंगे?
यही चेंज है? इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण है दो ढाई महीने तक सूबे की महिला राज्यपाल का मौन रहना। गवर्नर अनुसूइया उइके तब बोलीं, जब पीएम बोले। छतीसगढ़ से बीजेपी की राज्यसभा सदस्य रहीं अनुसूइया उइके ने मणिपुर के डीजीपी को कहा कि जिसने यह सब किया-कराया, उसके विरूद्ध कार्रवाई कीजिए।
ठीक से देखा जाए, तो केंद्र से लेकर राज्य तक हर शिखर नेता-नौकरशाह, 19 अप्रैल को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा देने वाला हाईकोर्ट तक अपनी खाल बचाने में लगा हुआ है। संसद सत्र से दो दिन पहले 77 दिन पुराना यह वीडियो वायरल नहीं होता, सारा सच दफन हो जाता।





