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समाजवादी आंदोलन का इतिहास विलय, टूट और फिसलन का इतिहास रहा है

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प्रवीण मल्होत्रा
25 दिसम्बर 1950 को कांग्रेस के दक्षिणपंथी गुट के नेतृत्वकर्ता सरदार पटेल के निधन के बाद कांग्रेस पर फैबियन समाजवादी जवाहरलाल नेहरू का वर्चस्व हो गया था। इसके बाद उन्होंने जयप्रकाश नारायण को सहयोग का आमंत्रण दिया था। कई वार्ताओं के बाद जेपी ने नेहरूजी के समक्ष एक 14 सूत्री कार्यक्रम रख दिया। नेहरूजी सिद्धान्ततः उस कार्यक्रम से सहमत थे, लेकिन जेपी का जोर उन्हें तत्काल लागू कराने का था। जो कि तत्कालीन परिस्थितियों में व्यवहारिक नहीं था। बाद में नेहरूजी ने समाजवादियों के सहयोग के बिना ही अवाडी के अधिवेशन में समाजवादी पैटर्न के समाज की रचना का प्रस्ताव पारित करा लिया। इसके बावजूद समाजवादियों ने नेहरूजी के साथ सहयोग करना जरूरी नहीं समझा, बल्कि वे ‘समाजवादी ढांचे के समाज’ की भी खुल कर आलोचना करने लगे। काल और समय ने यह प्रमाणित कर दिया है कि नेहरूजी समाजवादियों की अपेक्षा अधिक व्यवहारिक थे। उस समय देश का औद्योगिकीकरण जरूरी था, इसकी व्यवहारिकता को सिर्फ नेहरूजी ने ही समझा था। आज देश में जितनी भी नवरत्न सार्वजनिक कंपनियां हैं, वैज्ञानिक और मेडिकल संस्थान, बांध, थर्मल और हाइड्रो प्लांट्स, भारत हेवी इलेक्ट्रिक्स लि., हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लि., भाभा एटॉमिक सेंटर, इंडियन ऑयल कारपोरेशन (IOC), गैस ऑथोरिटी ऑफ इंडिया लि.(GAIL) इत्यादि हैं, वे सब जवाहरलाल नेहरू की ही देन हैं। नेहरूजी ने यह सब नहीं बनाया होता तो मोदीजी अपने दोनों लालों (अडानी और अम्बानी) को क्या बेचते?
उस समय यदि जेपी और लोहिया समेत समाजवादियों ने नेहरूजी के साथ सहयोग किया होता तो भारत में लोकतांत्रिक समाजवादी समाज की रचना सम्भव थी। लेकिन तब समाजवादी हड़बड़ी में थे। आजादी से पहले ही उनका एक बड़ा वर्ग जिसमें नम्बूदरीपाद, गोपालन, अरूणा आसफअली आदि शामिल थे, कम्युनिस्ट पार्टी में जा चुके थे और वहां नेतृत्व की प्रथम पंक्ति में शामिल हो गए थे। बाद में नेहरूजी के आव्हान पर कई अन्य समाजवादी नेता पुनः कांग्रेस में चले गए जिनमें अशोक मेहता प्रमुख थे। 
1957 के आम चुनाव की निराशा के बाद जयप्रकाश नारायण हतोत्साहित होकर राजनीति को त्याग कर सर्वोदयी हो गए। डॉ. लोहिया ‘एकला चलो’ की नीति पर चलते रहे और दिन ब दिन नेहरूजी के प्रति कटु होते गये। लेकिन सोशलिस्ट कभी भी संसद में प्रमुख विपक्षी दल नहीं बन पाए। डॉ. लोहिया की असामयिक मृत्यु के बाद तो समाजवादी आंदोलन दिशाहीन होकर अवसरवादी समझौतों में उलझ कर रह गया। रही-सही कसर 1977 में जनतापार्टी के गठन ने पूरी कर दी।
जनता पार्टी भानुमति का ऐसा कुनबा था जिसकी तुलना शिवजी की बारात से की जा सकती है। इस बारात में सोशलिस्ट, सर्वोदयी, पूंजीवादी, दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक सभी शामिल थे। इस बारात को बिखरना ही था, सो वह तीन साल में ही बिखर गयी और सारे बारातियों ने या तो पुनः अपने नए घर बना लिये या दूसरों के घरों में घुस कर अपने लिये खटिया (सत्ता की कुर्सी) का जुगाड़ करने में लग गए। 
इस वैचारिक-अवसरवादी-सत्तावादी द्वंद्व में संघी सबसे सफल रहे, क्योंकि उन्होंने अपने मूल संगठन – आरएसएस – से सम्बन्ध विच्छेद नहीं किया था, बल्कि वे उसी के मार्गदर्शन में सतत कार्य कर रहे थे। सबसे अधिक नुकसान में समाजवादी रहे, जिन्होंने अपना संगठन, अपने सिद्धान्त, अपने कार्यक्रम और नीतियां तथा अपना नाम और झंडा सबकुछ त्याग दिया था। परिणामस्वरूप 1980 के बाद समाजवादियों को जहां जगह और अवसर मिला वे वहीं समा गए। कुछ लोकदलीय हो गए, कुछ भाजपाई हो गए, कुछ कम्युनिस्ट हो गए (यमुना प्रसाद शास्त्री) तो अधिकांश कांग्रेस में खप गये। जो बचे रह गए उन्होंने अपनी अलग सोशलिस्ट पार्टी बना ली। 
बाद में वह भी कई टुकड़ों में बिखर गये और सभी गुटों के नेताओं ने अपनी अलग-अलग पार्टियां बना लीं। इनमें सिर्फ दो-तीन पार्टियां अपने-अपने राज्यों में सत्ता में आने में जरूर सफल रहीं, लेकिन समाजवादी सिद्धांतों का पूरी तरह से त्याग कर जातिवादी और वंशवादी पार्टी बनने के बाद, जैसे उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी तथा बिहार में आरजेडी तथा जनता दल। 
कुल मिलाकर समाजवादी आंदोलन का इतिहास विलय, टूट और फिसलन का इतिहास रहा है। अब जो कुछ बुजुर्ग समाजवादी जीवित और अपने स्तर पर सक्रिय भी हैं, वे मूलतः अतीतजीवी हैं। उनकी सोच अभी भी पिछली सदी के साठ और सत्तर के दशक से आगे नहीं बढ़ पायी है। अधिकांश समाजवादी डॉ. लोहिया के 1955 से 1965 के बीच बोले गये वाक्यों को ही दोहराते रहते हैं, जैसे पुराणों और रामकथा के प्रवचनकर्ता उनमें लिखी बातों को दोहराते रहते हैं। 
डॉ. लोहिया के बाद बहुत कम समाजवादी चिंतक हुए हैं जैसे मधु लिमये, किशन पटनायक, सच्चिदानंद सिन्हा इत्यादि जिन्होंने 1980 के आगे की राजनीतिक – सामाजिक परिस्थितों पर विमर्श किया और चिंतन के स्तर पर कुछ नया देने का प्रयास किया। सच्चिदानंद जी के अलावा मधु लिमये और किशन पटनायक जब तक स्वस्थ रहे, राजनीति, लेखन और चिंतन के क्षेत्र में सक्रिय रहे। सच्चिदानंद जी आज भी  लेखन में सक्रिय हैं, लेकिन कितने कथित समाजवादी उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं? 
प्रो.आनन्द कुमार, रघु ठाकुर, प्रो राजकुमार जैन, प्रो. प्रेमसिंह आदि भी अपने स्तर पर सक्रिय हैं लेकिन वे सब भी एक होकर देश में एक लोकतांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी का गठन करने में असमर्थ हैं, क्योंकि सभी के अपने पृथक एजेंडा हैं। कुल मिलाकर फिलहाल तो भारत में समाजवादी आंदोलन के पुनर्जीवित होने की संभावना नहीं ही है। हां, एकेडमिक विमर्श की वस्तु वह अवश्य बना रहेगा।
नरेश सहगल ( Naresh Saigal ) जी की पोस्ट पर एक टिप्पणी जो 800 से अधिक शब्द होने के कारण उनके कमेंट बॉक्स ने स्वीकार नहीं की है।
The seed of today’s corporate – dominated economy was sown during  Nehru regime. Nehru’s  successors , excluding Shastri, perpetuated capitalism in the garb of socialism .During the reign of Narsimharao capitalism emerged  topless on  the economic stage of India. Modi government is undauntedly  and  shamelessly dancing on the flute of Corporates on the cost of the poor the labour class and the farmers .
# Naresh Saigal

Ramswaroop Mantri

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