सुसंस्कृति परिहार
पिछले दिनों भोपाल में शिवराज सरकार की कैबिनेट की बैठक हुई. इसमें कई अहम फैसले लिए गए. मंत्री विश्वास सारंग बताया कि मध्य प्रदेश मंदिरों में सेवा देने वाले पुजारियों को 5000 रुपये तक का मानदेय दिया जाएगा। इसके अलावा सामान्य वर्ग के निर्धन परिवारों को सभी सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा इससे सर्वहारा समाज का विकास होगा। संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए भी शिवराज सरकार ने कैबिनेट में बड़ा फैसला लिया. संस्कृत के अतिथि विद्वानों की तुरंत भर्ती की जाएगी. इसके अलावा संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों को एमपी सरकार छात्रवृत्ति देगी।ये तमाम घोषणाएं यूं तो पहली नज़र में होने वाले प्रदेश के पंचायत चुनाव और आगामी वर्ष हो रहे विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण वोट पाने की चाहत ही नज़र आती है यह एक बड़ा मुद्दा है भी क्योंकि ब्राह्मण आज भी समाज में वर्चस्व रखता है और उसकी नाराज़गी सरकार को भारी पड़ सकती है।इसलिए परशुराम जयंती गुफा मंदिर भोपाल में परशुराम की मूर्ति के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में वे ये सब घोषणाएं करते हैं।आदि शंकर की भव्य विशाल मूर्ति ओंकारेश्वर में स्थापित करने की पहल करते हुए। भक्तों को साधकर जनता में अक्षय तृतीया के दिवस अक्षय सरकार का स्वप्न भी देखते हैं।यह एक चुनावी ज़रुरत की तरह देखा जा रहा है।
किंतु,यह मामला सिर्फ इतना ही नहीं है शिवराज आजकल संघ के इशारों पर काम कर रहे हैं उन्हें भाजपा से ज्यादा संघ पर भरोसा है क्योंकि उन्होंने उत्तर प्रदेश में संघ के दबदबे से योगी आदित्यनाथ को जीतते देखा है इसलिए पहले पंडितों को ख़ुश करना अपना उसूल बनाया है।जो काम योगी बनारस विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों के लिए नहीं कर पाए वो शिवराज करने में लग गए हैं। विश्वनाथ मंदिर किस तरह अब पूरी तरह धर्म का व्यापारिक केंद्र बन गया है यह बात किसी से छुपी नहीं है वहां का पूरा कमांड संघ के हाथ में है और पंडित आज भी पीड़ित हैं। यहां तक कि पुराने ट्रस्ट द्वारा चलाए जा रहे कालेज की जर्जर इमारत की तरफ कोई ध्यान नहीं।समाजसेवा अब मंदिर का लक्ष्य नहीं रहा।
जहां तक मध्यप्रदेश का सवाल हैशासन द्वारा गठित सामान्य वर्ग आयोग मध्यम और निर्धन श्रेणी में आने वाले सवर्णों के उत्थान हेतु युद्ध स्तर पर नीतिगत काम कर रहा है। आयोग सामान्य वर्ग के लिए कौन सी विकास संबंधी योजनाओं को धरातल पर ले जा सकता है। इस पर अफसर नए तरीकों के साथ कार्य में जुटे हुए हैं। सामाजिक न्याय विभाग के अधीन संचालित सामान्य वर्ग आयोग ने मंदिरों के पुजारियों को विकास की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए नया प्लान तैयार किया है। आयोग का कहना है कि प्रदेश की 23 हजार ग्राम पंचायतों में 55 हजार ग्राम हैं। इनमें से पंचायत मुख्यालयों के अलावा छोटे मजरा टोला को जोड़ें तो 47 हजार ऐसे ग्राम हैं, जहां मंदिरों में पुजारियों की तैनाती है। अधिकारियों का कहना है कि इन ग्रामों में छोटे और बड़े मंदिरों में जो पुजारी पूजा करते हैं, इनका स्थानीय स्तर पर निवास भी होता है। पुजारियों को आवास की चिंता ना रहे इसलिए इन्हें स्थाई पट्टा देने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। अफसरों की मानें तो पूरा भौगोलिक सर्वे करने के बाद प्रस्ताव तैयार करने का निर्णय आयोग द्वारा लिया गया है। इस पर प्रदेशभर से आ रहे सुझावों के आधार पर तीव्र गति से काम हो रहा है।इस तरह गांव-गांव अपनी पहुंच बनाने की सरकार की मंशा पूरी की जा रही है।
अभी तक जिन मंदिरों की जमीन नहीं है, उनके पुजारियों को 3000 रुपए महीना, जिन मंदिरों की 5 एकड़ या कम जमीन है, उनके पुजारियों को 2100 रुपए और जिन मंदिरों की 5 एकड़ से ज्यादा जमीन है, उनके पुजारियों को 1500 रुपए महीना मानदेय दिया जाता है।इधर प्रदेश के ही एक मंदिर जमीन के विवाद पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था किसी भी मंदिर की जमीन का मालिक सिर्फ भगवान होता है, पुजारी या सरकारी अधिकारी नहीं।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुजारी और प्रबंधन समिति सिर्फ सेवक ही होगी, मालिक नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाते हुए भू राजस्व के रिकॉर्ड से पुजारियों के नाम हटाने के भी आदेश दिए।
जबकि ऐसा लग रहा है कि सरकार की नज़र अब मंदिरों की सम्पत्ति और ज़मीन पर लगी है वह पुजारियों को ख़ुश कर शतरंजी चाल में पुजारियों और पंडितों को बुरी तरह फांस रही है । मंदिरों के ट्रस्टों को उनके अधिकारों से वंचित कर धीरे धीरे सब पर अप्रत्यक्ष तौर पर अपना कब्जा करना चाहती है। केन्द्र की वर्तमान सरकार जिस तरह संघ के इशारे पर अयोध्या के राम मंदिर और बनारस के विश्वनाथ मंदिर को व्यवसाय का केन्द्र बना चुकी है तथा देश की तमाम पड़ी हुई शासकीय भूमि पर उसकी कारवाई चल रही है वह परेशानी वाली है।
आज ज़रूरत इस बात की है मंदिर ट्रस्ट अपनी इस ज़मीन और मंदिरों को बचाने शासकीय अनुदान या किसी भी आर्थिक मदद से दूर रहें क्योंकि सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने से अनेकों खतरे हैं। हिंदू समाज इतना गया बीता तो नहीं हो गया है कि वह अपने पुजारियों को सरकार की सिर्फ 5000रुपए की मदद के लिए उसके भरोसे छोड़ दें।
जहां विवादास्पद स्थितियां हैं या बड़ी कमाई के केंद्र हैं वहां सरकारी पुजारी ट्रस्ट की नाकामी की वजह से बैठाया गया है हालांकि जिसके परिणाम सामने हैं लोग भर्ती निकालने, पाठ्यक्रम तैयार कर परीक्षा के किसी भी वर्ग या धर्म के लोगों को रोज़गार की भी मांग करने लगे हैं।ऐसा तमिलनाडु में शुरू भी हो गया है।यह ज़रूरी और संवेधानिक प्रक्रिया होगी इस तरह से मानदेय दिया जाना उचित है तो उसकी मांग कीजिए।वरना सरकारी मानदेय को ठुकरा देने में ही समझदारी है ।इस दूरगामी योजना को समझने की ज़रूरत है वरना गांव गांव की मंदिर की ज़मीनें किस कारपोरेट या संघी अनुषंगी संगठन के पास पहुंचेगी कहना मुश्किल है।तब ज़रा सा मानदेय हमें ना घर का ना घाट का छोड़ेगा।
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