निर्मल कुमार शर्मा
आज से लगभग 20 साल पूर्व 27 फरवरी 2002 को गुजरात में प्रायोजित दंगे करवाए गए थे,मिडिया के अनुसार उस भीषण दंगे में कुल 1102 इंसानों की बेरहमी से या तो जला दिया गया या उनकी गर्दन काट दी गई या उनके पेट में खंजर घोंप दिया गया ! वैसे वास्तविकता यह है कि उस भीषण दंगे में इस संख्या से बहुत ज्यादे लगभग 2000 इंसानों की अमूल्य जानें गईं थीं । उन्हीं दंगों में गुलबर्गा हाउसिंग सोसायटी में निवास करने वाले कांग्रेस के सांसद एहसान जाफरी को भी दंगाई दरिंदों ने उनके यहाँ शरण लिए 68 अन्य लोगों के साथ जिंदा जला दिए थे ! जैसे-तैसे उनकी पत्नी जाकिया जाफरी बच गईं थीं ! उस समय गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र दास दामोदर दास मोदी ही थे और वहाँ के गृहमंत्री श्री अमित शाह हुआ करते थे। अतिदुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत में समय के साथ परिस्थितियां ऐसी बदलीं हैं कि श्रीयुत् श्री नरेंद्र दास दामोदर दास मोदी जी आज इस देश के प्रधानमंत्री हैं और श्री अमित शाह इस देश के गृहमंत्री बने बैठे हैं ! उसी समय से उस भीषण दंगे में मारे गए दिवंगत एहसान जाफरी की विधवा श्रीमती जाकिया जाफरी अपने पति के हत्यारों, दंगाइयों और दरिंदों को दंडित करने के लिए सुप्रीमकोर्ट सहित तमाम न्यायालयों में अपील दर अपील कर न्याय पाने के लिए संघर्षरत हैं,लेकिन कथित भारतीय न्यायिक व्यवस्था इतनी शिथिल, सुस्त और असंवेदनशील है कि पिछले लगभग 20 साल के लम्बे समयावधि में भी इस विधवा को न्याय मिलना अभी भी बहुत धूमिल और अत्यंत क्षीण बना हुआ है ! भारतीय सुस्त और शिथिल न्यायिक व्यवस्था पर वह मशहूर मुहावरा बहुत ही सटीक बैठता है जिसमें कहा गया है कि ‘न्याय में देरी -न्याय से वंचित हो जाना है या Delay in Justice-denial of Justice ‘ आज इस देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि वर्तमान समय में आज भारत के श्रव्य,प्रिंट व दृश्य मिडिया के इक्का-दुक्का पत्रकारों को छोड़ दिया जाय,तो इस देश के लगभग सारे पत्रकार,लेखक,स्तंभकार, सम्पादक और रिपोर्टर्स सत्ता से इतने भयभीत और डरे हुए हैं कि आज सच को सच कहने को कोई भी राजी ही नहीं है ! यह कटुसच्चाई है कि आज यह पूरा देश मोदी और शाह नामक इन दो व्यक्तियों की वजह से श्मशान घाट और एक निस्तेज, डरे हुए कथित लोकतंत्र में तब्दील होकर रह गया है ! इस स्थिति से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता,लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद भारत के इस बेइंतहा क्रूर,नरभक्षी, असंवेदनशील,अमानवीयजीवी,दया और करूणाविहीन,आदमखोर और दंगाई व्यक्ति के मुँह से कोविड में मरे उन लाखों मृतकों के सहानुभूति व संवेदना के लिए अभी तक एक उफ् शब्द तक नहीं निकला है ! जो सरकारी कुव्यवस्था के चलते कोविड की वजह से समय से पूर्व ही अपने जीवन से हाथ धो बैठे हैं ! यह एक ही उदाहरण इस नरभक्षी व्यक्ति को रोम के क्रूरता और असंवेदनशीलता के मामले में इतिहास में युगों-युगों से कुख्यात और बदनाम नीरो तक को भी काफी पीछे छोड़ चुका है !
इस असहिष्णु और मानवेत्तर व्यक्ति के जीवन का पूरा इतिहास ही क्रूरतापूर्ण कुकृत्यों से अँटा पड़ा है,इस असहिष्णु व्यक्ति की वजह से इसके बाप को खुद को भी मौत को गले लगाने को मजबूर होना पड़ा था ! आज इस व्यक्ति के कुकृत्य से इसकी बीवी न विधवा है,न सधवा,न कुँआरी,न विवाहित ! कितने शर्म,ग्लानि और हतप्रभ करनेवाली बात है कि यह व्यक्ति इस पूरे राष्ट्र राज्य से अपनी शादीशुदा होने और अपनी अदद पत्नी होने की बात को भी पूरे 46 वर्ष तक झूठ बोलता रहा..बकौल नरेन्द्र भाई दामोदर भाई मोदी के बड़े भाई श्री सोमाभाई दामोदर भाई मोदी के अनुसार नरेन्द्र भाई दामोदर भाई मोदी और जशोदाबेन चिमनलाल मोदी की शादी का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि ‘हम सामाजिक व आर्थिक रूप से गुजरात राज्य के एक अत्यंत पिछड़ी जाति के लोग हैं,इसलिए हमारे समाज में बालविवाह की प्रथा प्रचलित थी,इसीलिए नरेन्द्र मोदी की शादी मात्र 17 वर्ष की उम्र में 16 वर्षीया जशोदाबेन चिमनलाल मोदी से 1968 में हो गई थी,शादी होने के मात्र 3 साल बाद ही दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए ! हालांकि दोनों ने कभी भी अपनी शादी को खत्म नहीं किया ! ‘नरेन्द्र मोदी की पत्नी श्रीमती जशोदाबेन चिमनलाल मोदी अपने पति नरेन्द्र मोदी द्वारा छोड़कर भाग जाने के बाद अपने जीवन यापन के लिए तथा समय बिताने के लिए एक स्कूल शिक्षिका का काम 1978 से शुरू किया,अब वे सेवानिवृत्त हो चुकीं हैं,अपने जीवन के इस सांध्यकाल में अपने मायके में अपने एक भाई के साथ रहकर अपना वैधव्य सरीखा जीवन गुजारने को मजबूर हैं ! सबसे खेदजनक व विस्मित करने वाली बात यह भी है कि श्री नरेन्द्र भाई दामोदर भाई मोदी अपनी शादीशुदा होने की बात 46 वर्ष बाद भी स्वेच्छा से नहीं बताए,अपितु उन्हें रिप्रेजेंटेशन ऑफ पिपल ऐक्ट-1951 के तहत मजबूर होकर बतानी पड़ी ! क्योंकि भारतीय सुप्रीमकोर्ट ने 2013 में एक आदेश पारित किया कि ‘भारत का कोई भी चुनावी प्रत्याशी को अपने नामांकन पत्र में माँगी गई सभी जानकारियों को देना ही पड़ेगा,अगर नामांकन पत्र का कोई कॉलम खाली छूटता है तो उसका नामांकन पत्र निरस्त किया जा सकता है और यह भी कि भारतीय मतदाताओं को अपने चुनावी प्रत्याशी के बारे में सब कुछ जानने का संवैधानिक अधिकार भी है। ‘ श्रीयुत् श्रीमान नरेन्द्र भाई दामोदर भाई मोदी को अपनी शादी की बात इसलिए छिपानी पड़ी थी,क्योंकि इस बात से गोदी मिडिया को मोदी के बारे में इस छवि को गढ़ने और दुष्प्रचार करने में सुविधा हो कि मोदी अपना घर-बार छोड़कर बिल्कुल अकेले हैं इसलिए वे किसके लिए धनसंग्रह या भ्रष्टाचार करेंगे ? कितने दुःख की बात है कि 21 वर्षीय युवा नरेन्द्र मोदी जब घर छोड़कर पलायन करने लगे तब इनकी पत्नी यशोदाबेन ने इनसे अनुनय किया था कि वे उन्हें भी अपने साथ ले चलें,लेकिन यह निष्ठुर व्यक्ति अपनी पत्नी के अनुरोध को ठुकराते हुए उसे छोड़कर भाग खड़ा हुआ ! आज वह स्त्री अपने पति के रहते हुए भी अपना जीवन एकसूनेपन और नैराश्यपूर्ण वैधव्य जीवन जीने को अभिशप्त है ! कितनी खेद की बात है कि श्रीयुत् श्रीमान् नरेन्द्र दास दामोदर दास मोदी जी 2002,2007 और 2012 के गुजरात विधानसभा के चुनावों में अपने चुनावी नामांकन फॉर्म के हलफनामे में अपनी शादी को छिपाने के लिए अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में कोई जानकारी ही नहीं दिए ! लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले सुप्रीमकोर्ट के भारी दबाव में श्रीमान् मोदीजी को अपने हलफनामे में अपनी शादी श्रीमती यशोदाबेन से होने की बात कबूल करना पड़ा और भारत की 1 अरब 35 करोड़ जनता को भी यह पता चला कि श्रीमान् मोदीजी की श्रीमती यशोदाबेन नामक कोई अदद विवाहिता पत्नी भी है ! लेकिन श्रीमान् मोदीजी अपने तमाम कागजातों यथा आधार कार्ड, पैन कार्ड और अपने जायदाद से जुड़े डाकुमेंट्स में अपनी विवाहिता पत्नी श्रीमती यशोदाबेन के बारे में सारी सूचनाएं फिर छिपा दिए ! कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है इस व्यक्ति की पत्नी,श्रीमती यशोदा बेन अपने पति जो भारतीय गणराज्य का सबसे ताकतवर व समृद्धशाली प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति के रहते होने के बावजूद भी आज वह एक बहुत ही उपेक्षित, तिरस्कृत व वैधव्य जीवन जीने को अभिशापित है !
इस व्यक्ति के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते गुजरात दंगों में क्या-क्या हुआ,इसका संक्षेप में एक शब्दचित्र प्रस्तुत है। इस व्यक्ति द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में मुसलमानों की छवि खराब करने के लिए ताकि हिन्दुओं के वोट की फसल काट ली जाए,के लिए गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाकर,9 पुरूषों,25 महिलाओं और 25 बच्चों सहित कुल 59 लोगों की,जिनमें सभी हिन्दू थे,हत्या कर दी गई ! पूरे गुजरात में तीन दिन तक लगातार दंगे कराकर कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी सहित 2000 लोगों की निर्ममतापूर्वक जलाकर या तलवार से काटकर हत्या कर दी गई ! अनुमान है कि हिंसा के दौरान 230 मस्जिदें और 274 दरगाहें नष्ट कर दी गईं। मुस्लिमों की दुकानों को लूटा। यह अनुमान लगाया गया है कि हिंसा के दौरान 150,000 लोगों को विस्थापित किया गया था। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि हिंसा को नियंत्रित करने की कोशिश के दौरान 200 पुलिस अधिकारियों की मौत हो गई और ह्यूमन राइट्स वॉच ने बताया कि असाधारण वीरता के कार्य हिंदुओं,दलितों और आदिवासियों द्वारा किए गए थे जिन्होंने मुसलमानों को हिंसा से बचाने की भरपूर कोशिश की थी। सांप्रदायिक दंगों के इतिहास में पहली बार हिंदू महिलाओं ने भी भाग लिया,इस संबंध में गुजरात दंगों में एक बीजेपी की तीन बार विधायक और एकबार मंत्री रही श्रीमान् मोदी और इस देश में दंगों का बीज बोनेवाला असली सूत्रधार और खलनायक लालकृष्ण आडवाणी की भी खासमखास महिला माया कोडनानी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है,जिस पर आरोप है कि वह गुजरात दंगों में उस दंगाई भीड़ का नेतृत्व कर रही थी, जो अल्पसंख्यक मुसलमानों के घरों को आग लगा रहे थे और उनकी निर्ममतरीके से हत्या कर रहे थे !
हिंसा के बाद यह स्पष्ट हो गया कि कई हमले न केवल मुस्लिम आबादी बल्कि मुस्लिम महिलाओं और बच्चों पर भी केंद्रित थे। ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों ने हिंसा के दौरान राहत शिविरों के लिए अपने घरों से पलायन करने वाले पीड़ितों की मानवीय स्थिति को संबोधित करने में विफलता के लिए भारत सरकार और गुजरात राज्य प्रशासन की आलोचना की । दिनांक 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद के मोरजारी चौक और चारोदिया चौक जिलों में हुईं पुलिस की गोलीबारी से मारे गए सभी चालीस लोग मुस्लिम थे। गुजरात दंगों में हुई अमानवीय बर्बरता की घटना पर अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस,जर्मनी और श्रीलंका आदि की सभी महिला अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से बनी एक अंतर्राष्ट्रीय तथ्य-खोज समिति ने बताया था कि, ‘राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को आतंकित करने की रणनीति के रूप में यौन हिंसा का इस्तेमाल किया जा रहा था। ‘
यह अनुमान लगाया जाता है कि गुजरात दंगे के दौरान कम से कम अपराधिक दरिंदों और गुँडों द्वारा 250 लड़कियों और महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर उन्हें जलाकर मौत के घाट उतार दिया गया। बच्चों को जबरदस्ती पेट्रोल पिलाया गया और फिर उनको आग में झोंक दिया गया ,गर्भवती महिलाओं को पकड़कर उनके पेट को तेज चाकू से फाड़कर उनके अजन्मे मानव भ्रूण के शरीर का सार्वजनिक प्रदर्शन करके उन्हें दिखाया गया ! नरोदा पाटिया में 90 लोगों की लाशों की एक सामूहिक कब्र मिली थी,जिसमें 36 औरतें या कुँवारी लड़कियों के अधजले शव थे ! दंगाइयों ने घरों में भी पानी भर दिया या पूरे परिवारों को अंदर ही अंदर जलाकर मौत के घाट उतार दिया। महिलाओं के खिलाफ हिंसा में उन्हें नग्न करना, उनसे छीना-झपटी करना,उनके स्त्रियोचित अंगों के साथ कदाचार करना और फिर उन्हें मौत के घाट उतार देने जैसे बीभत्स कुकृत्य किए गए ! पत्रकार कल्पना कन्नबीरन के अनुसार बलात्कार एक सुव्यवस्थित,जानबूझकर और पूर्व नियोजित रणनीति के हिस्से थे और जो तथ्य हिंसा को राजनीतिक प्रोग्राम और नरसंहार की श्रेणियों में रखते हैं। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अन्य कार्यों में एसिड अटैक,मार-पीट और गर्भवती होने वाली महिलाओं की हत्या शामिल थी। बच्चों को उनके माता-पिता के सामने भी मार दिया गया था। जॉर्ज फर्नांडीस ने हिंसा पर संसद में एक चर्चा में राज्य सरकार के अपने बचाव में व्यापक हंगामा किया,यह कहते हुए कि यह पहली बार नहीं था कि भारत में महिलाओं की शील का उल्लंघन और बलात्कार किया गया था !
बच्चों को जिंदा ही जलाकर मार दिया गया था ! जो लोग सामूहिक कब्र खोदते थे,उनके अनुसार कब्रों के भीतर मौजूद शवों को मान्यता से परे जले हुए और बुझाए हुए के रूप में वर्णित किया गया था। बच्चों और शिशुओं को आग में फेंके जाने से पहले ही उन्हें मार दिया गया था और उन्हें अलग रखा गया था। महिला पत्रकार रेणु खन्ना ने मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ यौन हिंसा के बारे में बताते हुए लिखा है कि जीवित बचे हुए लोगों ने बताया कि इसमें जबरन नग्नता,सामूहिक बलात्कार,गैंग-रेप, उत्परिवर्तन,शरीर में वस्तुओं का प्रवेश,स्तनों को काटना,पेट को मरोड़ देना और महिलाओं और कुँवारी लड़कियों को जबरन गर्भवती करना आदि कुकृत्य शामिल हैं। अल्पसंख्यक महिलाओं के शरीर के अंगों पर हिंदू धार्मिक प्रतीक चिन्हों की नक्काशी करना,चिंतित नागरिक न्यायाधिकरण ने बलात्कार के उपयोग की विशेषता के बारे में बताया कि एक समुदाय के वशीकरण और अपमान के लिए एक उपकरण के रूप में दंगों का प्रयोग किया गया।चिंतित नागरिक न्यायाधिकरण में एक मानवाधिकार समिति द्वारा इस प्रकार गवाही दी गई एक द्रुतशीतन तकनीक मे इस बार सबूतों को बहुत बड़ी संख्या में जानबूझकर विनाश किया गया था,उन्हें मिटा दिया गया। यौन हिंसा के अधिकांश मामलों में कुछ महिलाओं को छोड़कर पीड़ित महिलाओं को नग्न कर परेड कराई जाती थी फिर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता था और उसके बाद उन्हें जलाकर मौत की नींद सुला दिया जाता था। गुजरात के छुटभैये और गुँडे टाइप के नेताओं ने छोटी बच्चियों को जिंदा जलाने से पहले उनके साथ बलात्कार भी किया,इनमें कुछ लड़कियों की उम्र 11 वर्ष से भी कम थी ! यहां तक कि 20 दिन के शिशु या उसकी मां के गर्भ में पल रहे भ्रूण को भी नहीं बख्शा गया,उन्हें भी आग में जिन्दा ही झोंककर मौत के मुँह में धकेल दिया गया !
एक अन्य महिला पत्रकार वंदना शिवा ने कहा कि गुजरात में हिंदुत्व के नाम पर अल्पसंख्यक युवा लड़कों को जलाकर मारना,लड़कियों से बलात्कार करना और उन्हें मारना सिखाया गया है। गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार और एहसान जाफरी की हत्या पर लिखते हुए एक पत्रकार डायन बन्शा ने कहा है कि जब जाफरी ने भीड़ को महिलाओं को छोड़ने के लिए भीख मांगी,तो उन्हें सड़क पर घसीटा गया और जै श्री राम कहने से इनकार करने पर उन्हें परेड करने के लिए मजबूर किया गया। फिर उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें आग के हवाले कर दिया गया ! इसके उपरांत दंगाइयों ने लौटकर दो छोटे लड़कों सहित जाफरी के शेष परिवार को जलाकर मार डाला। गुजरात दंगों में हुए आगजनी और नरसंहार के बाद गुलबर्ग सोसायटी के मकान एक हफ्ते तक आग की लपटों में झुलसते रहे ! उन्हें जानबूझकर जलते हुए छोड़ दिया गया, ताकि सबूत पूरी तरह नेस्तनाबूद हो जाएं !
इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति इसके आगे के जीवन में भी सतत चलता है,मसलन कथित पाकिस्तान में भारतीय सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक करना,जिसमें भारतीय सेना के 62 जवान शहीद हुए,पाकिस्तान का केवल एक सैनिक गलती से भारतीय समझ उसे पाकिस्तानियों ने ही मार दिया था,मरा। पुलवामा काँड,जिसमें इसने अपने ही 44 अर्धसैनिकों को बम से उड़ा दिया ! इस देश की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में दंगे कराकर,सैकड़ों लोगों,विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की तीन दिन तक नरपशुओं क्रमशः कपिल मिश्रा,प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर द्वारा दंगे भड़काकर,जिंदा जलाकर,चाकू घोंपकर,मौत के घाट उतार दिया ! इसके द्वारा आम जनता की गई हत्याओं का सिलसिला बहुत लंबा है मसलन अचानक नोटबंदी करके सैकड़ों लोगों को मारा,अचानक लॉकडाउन करके हजारों मजदूरों को हजारों किलोमीटर भयंकरतम् लू में पैर घसीटने को मजबूर करके सैकड़ों लोगों की जान ले लिया ! अब कोरोना के इस भीषण और त्रासद समय में इस पूरे देश में ऑक्सीजन, जीवन रक्षक दवाओं, वेंटिलेटर की भयंकर कमी करके विशेषकर भारतीय स्वास्थ्य सेवा की बजट में कटौती करके उसका भट्ठा बैठाकर अब तक बीसियों लाख लोगों को मौत के घाट उतार चुका है,न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार दुनियाभर में कोविड से सबसे ज्यादे भारत में लगभग 42 लाख लोग मरे हैं। वैसे वर्तमानसमय की मोदीसरकार द्वारा नियोजित सरकारी आँकड़े के अनुसार भारत में केवल 2 लाख लोग मरे हैं !
अब न्याय का तकाजा है कि गुजरात दंगों सहित उक्तवर्णित क्रूरता व बर्बरता करनेवाले दरिंदों को उनके किए की सजा मिलनी ही चाहिए, जिस प्रकार 1984 में दिल्ली में कराए गये दंगे में मारे गए हजारों सिखों के हत्यारे दरिंदे को जेल की सलाखों के पीछे जाना ही पड़ा है !
-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र,





