*लोहिया विचार मंच की सभा में गरजे सोशलिस्ट नेता रघु ठाकुर*
*अभिनव कला समाज में हुए समाजवाद व आपातकाल की यादों पर दो आयोजन*
स्टेट प्रेस क्लब में रघु ठाकुर ने कहा सत्ता के आकर्षण में हम आदर्शों को पहचानना भूले*
इन्दौर, । सुप्रसिद्ध समाजवादी चिंतक व लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक रघु ठाकुर ने कहा है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जो ‘ सम्पूर्ण क्रान्ति ‘ आन्दोलन पचास साल पहले शुरू हुआ था उसके पांच मुद्दों में मंहगाई, भ्रष्टाचार, काले कानून की समाप्ति के साथ विकेन्द्रीकरण व चुनाव सुधार शामिल थे। आज जो लोग लोकतंत्र सेनानी या मीसाबंदी की सम्मान राशि सरकार से ले रहे हैं उन्हें इस पर विचार करना चाहिए कि क्या ये पांच मुद्दे अब तक हल हो पाये हैं?

श्री रघु ठाकुर गत मंगलवार को इन्दौर के अभिनव कला समाज में सभा को मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित कर रहे थे।
स्टेट प्रेस क्लब इंदौर व लोहिया चेतना मंच ने अभिनव कला समाज के सभागार में मंगलवार को शाम पांच से आठ बजे के बीच आपातकाल के पचास वर्ष के उपलक्ष्य में क्रमशः दो कार्यक्रम आयोजित किए थे।
लोहिया चेतना मंच के आयोजन में पूर्व केंद्रीय सत्यनारायण जटिया विशेष रूप से उपस्थित थे। उन्होंने आपातकाल की यादों को साझा करते हुए कहा कि आज जो लोग संविधान की किताब हाथ में लिए घूम रहे हैं उन्हीं की दादी या पूर्वज नेताओं ने संवैधानिक अधिकार निलंबित कर आपातकाल लगाया था। आपातकाल में सवा लाख लोग जेल के सींखचों में थे और इतने ही लोग बाहर जनजागरण कर रहे थे, पर्चे बांट रहे थे। श्री जटिया ने बताया कि उन्हें राजगढ़ जेल में रखा गया था। जेल के अफसरों ने आतंकित करने के लिए अपराधियों के साथ बंद रखा , कंबल परेड का भय दिखाया गया। लेकिन इसका उत्तर सुतली बम फोड़कर दिया गया। पुलिस अधीक्षक सिविल ड्रेस में आये तो उन्हें भी बर्दी में आने के लिए कह दिया गया। श्री जटिया ने बताया कि बाद में भैरोगढ़ जेल में भेज दिया गया।
रघु ठाकुर ने इस अवसर पर आपातकाल में जेल में रहे लोकतंत्र सेनानी या मीसाबंदियों को संबोधित करते हुए कहा कि जब घोषित आपातकाल था तब लोगों में चेतना थी, वे जिन्दा थे। आज के समय को जब अघोषित आपातकाल कहा जा रहा है तब लोग चेतनाशून्य हैं।

जयप्रकाश नारायण के बिगुल का गीत तो लोग गाते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि वह बिगुल बजा क्यों था, क्या वे सब मुद्दे हल हो गये, और यदि नहीं हुए तो सब निष्क्रिय क्यों हो गये।
जेपी ने तो इलाहाबाद और पटना में साफ कहा था कि डॉ लोहिया की सप्तक्रांति ही उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति है। फिर अब तक दाम नीति क्यों नहीं बन पायी, चुनाव सुधार क्यों लागू नहीं हुए?
रघु ठाकुर ने कहा कि आपातकाल में संवैधानिक अधिकारों के साथ साथ मानवाधिकार व न्यायपालिका के अधिकारों का निलंबित किया गया था। तब कहा जाता था – ‘ न अपील, न दलील, न वकील।’
लेकिन आपातकाल के पचास वर्ष बाद भी क्या राजनीतिक मुकदमों के लिए अलग से कोई संहिता बनाने पर विचार हुआ है? एकमात्र लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी ही है जो अलग से राजनीतिक संहिता की बात कर रही है, शिक्षा के निजीकरण को समाप्त करने व चिकित्सा को मौलिक अधिकार बनाने की बात कर रही है।
रघु ठाकुर ने कहा कि लोग एक जैसे नाम की पार्टियों के विलय की बात करते हैं। लेकिन बिना कार्यक्रम, नीति व सिद्धांत पर चर्चा के यह कैसे हो सकता है? लोगों को सोचना चाहिए कि जिस समय रेणुकूट में एक कारखाना डालमिया को दो करोड़ रुपए में बेचने के लिए हिन्द मजदूर पंचायत संगठन से जुड़े श्रमिकों पर गोली चलाई गई तब क्या उन्हीं की सरकार नहीं थी जो लोहिया का नाम लेकर सत्ता में आये और उनके सिद्धांतों के खिलाफ काम किया।

लोहिया यदि कांग्रेस के शासन में हुई हिंसा की आलोचना करते थे तो ऐसी ही हिंसा पर केरल में अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री से भी इस्तीफा मांग सकते थे।
डॉ लोहिया से जब कहा गया था कि वे यदि जनसंघ के अध्यक्ष से बात कर लें तो चुनाव में उनकी जीत पक्की हो जायेगी, तब लोहिया जी ने कहा था कि वे केवल कार्यक्रम पर बात करेंगे, सीटों के बंटवारे पर नहीं। उस समय जब जनसंघ ने लोहिया के खिलाफ प्रत्याशी खड़ा करने पर चर्चा की तब जनसंघ के ही लोगों ने कहा था कि लोहिया के खिलाफ प्रत्याशी उतारना जनसंघ को उप्र में बहुत क्षति पहुंचायेगा।
रघु ठाकुर ने कहा जब हम स्वयं की और अपनी ही पार्टी की आलोचना करेंगे तब सच्चा लोकतंत्र आयेगा। डॉ लोहिया भी यही कहते थे। समाजवाद का सबसे बड़ा दुश्मन वह है जो सच नहीं बोलता। यह कैसे हो सकता है कि तथाकथित समाजवादी दल का परिवारवाद ठीक हो और दूसरे दलों का ग़लत?
आज जब हम लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद की चर्चा करते हैं तब हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि यह रणनीति थी, रणनीति समय के अनुसार होती है पर सिद्धांत स्थायी और शास्वत होते हैं। रणनीति लक्ष्य नहीं है, सिद्धांतों को लागू करना लक्ष्य है। जो सिद्धांत पर चले केवल वही अपना है। दिक्कत यह है कि लोगों का मोह सत्ता से है, सिद्धांत से नहीं।
रघु ठाकुर ने राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र पर बोलते हुए कहा कि अगर दलों में आंतरिक लोकतंत्र होता तो सुप्रीमो और हाइकमान जैसे शब्द कहां से आते। अवसरवादी लोगों ने ‘ गैर-कांग्रेसवाद ‘ और गैर- भाजपावाद दोनों का ही लाभ उठाया है। लोकतंत्र सेनानियों को आज घर में और बाहर दोनों जगह लोकतंत्र का वातावरण बनाने के काम में लगना चाहिए। उन्हें यह संकल्प लेना चाहिए कि हर अलोकतांत्रिक कानून व व्यवस्था को अस्वीकार करेंगे।
आपातकाल के दिनों को याद करते हुए रघु ठाकुर ने कहा कि वे और उनके भाई कृष्णवीर सिंह मीसा में उन्नीस महीने जेल में रहे, यातनाएं सहीं। लेकिन मीसाबंदी की सम्मान राशि लेना रघु ठाकुर ने स्वीकार नहीं किया क्योंकि वे मानते हैं कि देश के लिए संघर्ष कुछ पाने के लिए नहीं किया जाता। जबलपुर की जेल में आपातकाल के दौरान उन्होंने गांधी जयंती पर इंदिरा गांधी का पुतला जलाया था। इसके कारण उन्हें लम्बे समय तक दिगंबर वेश में बेड़ियां डालकर रखा गया। बाद में जबलपुर से इंदौर जेल भेज दिया गया। वैसे जेल में कोई कष्ट नहीं था। सिवाय इसके कि किसी तरह की आजादी नहीं थी। २६ जून १९७५ से पहले भी सागर में पानी के सवाल को लेकर आंदोलन चल रहा था। ऐसे कई मुद्दों पर हुए आंदोलनों में रघु ठाकुर लंबे समय तक मीसाबंदी के रूप में जेल में रहचुके थे।
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए श्री रामबाबू अग्रवाल ने कहा लोकनायक जेपी कहते थे सत्य की गाड़ी में बैठोगे तो रास्ते में कष्ट के स्टेशन तो आयेंगे। आज हमें शिक्षा, न्याय व रोजगार के लिए संघर्ष की जरूरत है। लोकतंत्र सेनानियों को अब इस दिशा में अपना दायित्व निभाना चाहिए।
लोहिया विचार मंच के इस कार्यक्रम के मंच पर मीसाबंदी श्री मोहन ढाकोनिया भी उपस्थित थे।कार्यक्रम का संचालन रामस्वरूप मंत्री ने व धन्यवाद ज्ञापन सुभाष खंडेलवाल ने किया।
लोहिया विचार मंच के आयोजन से पहले स्टेट प्रेस क्लब के तत्वावधान में हुए ‘ रूबरू ‘ कार्यक्रम में विश्व में समाजवाद की जरूरत को रेखांकित करते हुए रघु ठाकुर ने कहा कि समाजवाद समता का सिद्धांत है और यह प्रकृति का दिया हुआ सिद्धांत है। प्रकृति ने सब को सब कुछ बराबर दिया है, मनुष्य ने ही हर तरह की गैर बराबरी पैदा की है। व्यक्ति और संगठन भले हार जायें पर समाजवाद का विचार हमेशा आदर्श रहेगा। दुनिया में एक तरफ ऐसे लोग हैं जो तीनसौ करोड़ रुपए रोज कमा रहे हैं, दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो दिन में तीन सौ रुपए भी नहीं कमा पा रहे। यह विषमता घृणा – हिंसा और अस्थिरता पैदा करती है। यदि डॉ लोहिया के सपनों के अनुरूप विश्व- संसद बन जाये तो देशों के बीच युद्ध समाप्त हो सकते हैं, हथियारों पर पैसा खर्च नहीं होगा और बराबरी पर आधारित समाज बन सकेगा। हर युद्ध के पीछे साम्राज्यवादी – शोषणकारी शक्तियां रहती हैं। आज बजट का बीस फीसदी कर्मचारियों के वेतन पर , इतना ही विदेशी कर्ज की अदायगी और कमोबेश इतना ही हथियारों की खरीद पर खर्च होता है। अगर ये खर्च बदल जायें तो बेहतर दुनिया बन सकती है। मुल्कों के शासक तो चाहते हैं कि समस्या रहे। नागरिकों को देखना चाहिए कि वे किस राजनीति को वोट दे रहे हैं, समता के लिए या अनुपातहीन सम्पत्ति के लिए। जिसका जनतंत्र में विश्वास होगा वह सिविल नाफरमानी को मानेगा। सिविल नाफरमानी से ही जनतंत्र जिंदा रहता है। संतति और संपत्ति के मोह से बचने से ही समाजवाद आयेगा।
रघु ठाकुर ने आपातकाल के दिनों को याद करते हुए कहा श्रीमति विजयराजे सिंधिया ने मुश्किल से इस दौरान सिर्फ एक दो दिन जेल में गुजारने के बाद लिख दिया कि वे राजनीति से कोई नाता नहीं रखेंगी, उन्हें छोड़ दिया गया। दूसरी ओर इंदौर जेल में काका दौलत सिंह जैसे लोगों ने कोई माफीनामा तब भी नहीं दिया जब उनकी पत्नी घोर संकट से जूझ रही थीं और गरीबी से मृत्यु की शिकार हुई।हमारा आदर्श कौन होगा यह समझ हममें होनी चाहिए।समाजवादी भी उसे माना जाये जिसका आचरण समाजवादी हो। समाजवादी बनने के लिए कीमत चुकाने को तैयार रहना होता है। नींव का पत्थर बनना पड़ता है। लोगों को भी जाति और पैसे के बजाय जमीन से जुड़े लोगों में नेतृत्व खोजना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या यह आपातकाल से भी बुरा दौर है, रघु ठाकुर ने कहा यह सच है कि आपातकाल में मानवाधिकार व संवैधानिक अधिकारों का हनन हुआ था , लेकिन आज तो लड़ने वाले ही भयभीत हैं, ईडी के छापे से डरे हुए हैं। हमने भय को स्वीकार कर लिया है। समाज मानसिक रूप से भयभीत है। जरूरत इस बात की है कि हम खुद को निर्भय बनायें।
पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव पर बोलते हुए रघु ठाकुर ने कहा घाव बढ़ जाता है तो अपने आप ठीक हो जाता है। आज पूंजीवादी ही पूंजीवादी का विरोध कर रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प व एलन मस्क की दोस्ती टूटने जैसी अनेक घटनाएं इसका संकेत हैं। समाजवाद तो हर तरह की फिजूलखर्ची का विरोध करता है।
यह पूछे जाने पर कि यदि आपकी सरकार होती तो पहलगाम जैसे प्रकरण के बाद क्या करते, रघु ठाकुर ने कहा पहले तो भारत- पाक- बांग्लादेश महासंघ को मजबूत करते या फिर पाक अधिकृत कश्मीर लेकर रहते। आधा – अधूरा अभियान नहीं छोड़ते। पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। पंडित जवाहरलाल नेहरू का इस विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाना ही गलत फैसला था।
यह पूछे जाने पर कि पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मंत्रिमंडल की इंदौर के राजबाड़ा में हुई बैठक पर करोड़ों रुपए खर्च हुआ है, ऐसी डेस्टीनेशन मीटिंग का क्या अर्थ, उत्तर में रघु ठाकुर ने कहा मैं देवी अहिल्याबाई होलकर का बहुत सम्मान करता हूं पर जनतांत्रिक संस्थाओं का राजमहलों से कोई संबंध नहीं होता।
स्टेट प्रेस क्लब के इस आयोजन का संचालन संस्था के अध्यक्ष व वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण खारीवाल ने किया। रामस्वरूप मंत्री ने संस्था परिसर में डा लोहिया सामाजिक समिति और स्टेट प्रेस क्लब द्वारा स्थापित कल्याण जैन स्मृति पुस्तकालय का अवलोकन भी श्री रघु ठाकुर को कराया।





