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अंतर्जगत : प्राणों का रहस्यमय प्रबंधन

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डॉ. विकास मानव

  _प्राण और श्वास का अपना एक विज्ञान है जिस पर सम्पूर्ण योग-विज्ञान आधारित है। जिस प्रकार भौतिक विज्ञान के मूल में विद्युत् शक्ति है, उसी प्रकार योग-विज्ञान के मूल में प्राण- शक्ति है। प्राण का विषय अत्यंत रहस्यमय है।_
    वैदिक विज्ञान के अनुसार गहरा श्वास लेने पर शरीर के भीतर ऑक्सीजन और कार्बनडाई ऑक्साइड की मात्रा में परिवर्तन हो जाता है। उनके अनुपात में परिवर्तन हो जाता है। ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड के अनुपात में परिवर्तन होने से मनुष्य की साधना में प्रभाव पड़ता है।

   ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड-ये मूलतत्व हैं प्रकृति के और इन्हीं दोनों तत्वों के बीच 'जीवन' और 'मरण' का खेल चलता है। एक का परिणाम जीवन है तो दूसरे का परिणाम है--मृत्यु।
 _जब शरीर के भीतर ऑक्सीजन की मात्रा धीरे- धीरे कम हो जाती है तो अन्त में शेष रह जाता है-कार्बन डाई ऑक्साइड जिसका अर्थ है--मृत्यु। एक शव में कार्बन डाई ऑक्साइड के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहता।_
   उदाहरण के लिए यदि एक जलती हुई लकड़ी को लें। जब तक ऑक्सीजन प्राप्त होती रहती है तब तक लकड़ी जलती रहती है। लकड़ी का जलना जीवन है। उसका ताप जीवन का ताप है। ऑक्सीजन के समाप्त होते ही आग बुझ जाती है। उसका ताप समाप्त हो जाता है।  
  _अर्थात् जीवन समाप्त हो जाता है। अंत में रह जाता है--कोयला। कोयला कार्बन है। मृत शरीर बुझे हुए कोयले के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और उसी बुझे हुए कोयले को हम चिता पर फिर जलाते हैं जिसका परिणाम है--मुट्ठीभर राख। हमारे शरीर के भीतर ऑक्सीजन और कार्बनडाई ऑक्साइड--दोनों समान रूप से काम कर रहे हैं।_
   ये दोनों भौतिक विज्ञान के शब्द हैं। योग की भाषा में इन दोनों को 'श्वास' और 'प्रश्वास' कहते हैं।
   वैदिक विज्ञान के अनुसार प्राण परमात्मा की शक्ति है। यदि हम यह कहें कि प्राण ही परमात्मा है तो अतिशयोक्ति न होगी। परमात्मा कोई विशेष व्यक्ति नहीं है।

वह एक स्वयंभू शक्ति है जो अविनाशी है। वह एक प्रवाह है–नदी के प्रवाह की तरह एक प्रवाह जो अपने आप में अनंत है। नदी के प्रवाह को न तो यह मतलब है कि वह अपने तट के वृक्षों को नष्ट कर दे और न यह प्रयोजन है कि उन वृक्षों की जड़ों को और मजबूत कर दे।
नदी का प्रवाह निर्लिप्त और निरपेक्ष भाव से चलता रहता है। परमात्मा के विषय में भी इसी तरह से हम सोचते-विचारते रहते हैं। उसके साथ व्यक्ति की तरह व्यवहार करने लगते हैं। अपनी कामना बना लेते हैं।धारणा निश्चित कर लेते हैं। यह सब भारी भ्रम है और इसी भ्रम के कारण से हम न तो परमात्मा को समझ पाते हैं और न अपने आप को।
हमें यह समझ लेना चाहिए कि किसी भी शक्ति के साथ व्यक्ति जैसा व्यवहार होता है तो हानि के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं होता। यदि शक्ति को शक्ति स्वीकार कर व्यवहार किया जाय तो उसका परिणाम लाभ में होता है।

   परमात्मा की तरह प्राण भी एक शक्ति है। उसके भी वही नियम हैं जो परमात्मा के हैं। योग उसी नियम को  पालन करने का नाम है।
  _यदि हम योग के अनुसार प्राण-शक्ति का उपयोग करते हैं तो हमारे लौकिक और पारलौकिक-- दोनों जीवन में 'परमचेतना' का विकास होगा और हमारी आत्मशक्ति विकसित होगी जिसके परिणामस्वरूप हम मन, प्राण और वाणी--तीनों पर विजय प्राप्त कर लेंगे जिसका अर्थ है प्रकृति पर विजय और इस विजय को प्राप्त करना ही योग का एकमात्र लक्ष्य है।_

प्राण पर विजय यानी प्रकृति पर विजय :
जीवन का एकमात्र प्रारंभिक और वास्तविक ज्ञान-स्रोत वेद है। वेद की दृष्टि में दो ‘मूलतत्व’ हैं। पहला है–
‘देवतत्व’ और दूसरा है–‘भूत तत्व’। पहले को ‘अक्षर’ और दूसरे को ‘क्षर’ कहते हैं। भूततत्व का निर्माण देवतत्व से हुआ है।
देवतत्व की अभिव्यक्ति सृष्टि के सन्दर्भ में तीन रूपों में हुई है–1-वृक्ष–वनस्पति, 2 -पशु-पक्षी और 3 -मानव। इन तीनों रूपों में जो शक्ति चैतन्य और क्रियाशील है, उसे वैदिक भाषा में ‘प्राणाग्नि’ कहते हैं। सरल शब्दों में वही प्राण-शक्ति है।
प्राण का दूसरा नाम जीवन है। जहाँ प्राण है, वहां जीवन है। प्राण जीवन का चैतन्य रूप है इसलिए प्राण को ‘चेतना’ भी कहते हैं। चेतना का केंद्र ‘ह्रदय’ है। सोलह प्रकार की विद्याएँ होती हैं, तंत्र में उन्हीं सोलह विद्याओं को ‘षोडसी विद्या’ कहते है।
इन्हीं विद्याओं में एक विद्या है–‘प्रजापति विद्या’। इसी प्रजापति विद्या का उत्कृष्ट रूप प्राण या जीवन है।

प्राण का स्वरुप :
मानव जीवन में यदि कोई सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तु है तो वह है–‘प्राण’। प्राण ही आयु है। प्राण ही शरीर में तीन अग्नियाँ है–जठराग्नि, वड़वाग्नि और दावाग्नि। शरीर का ताप दावाग्नि का परिणाम है। भूख-प्यास जठराग्नि का परिणाम है।
इसी प्रकार शरीर में रक्त की गति, ह्रदय की धड़कन और वायु का सञ्चालन वड़वाग्नि का परिणाम है। ब्रह्माण्ड के मूल में प्राण ही हैं, इसीलिए प्राणविद्या को विश्व विद्या बतलाया गया है। पंचतत्व अर्थात् पंचभूत, प्राण और मन– इन तीनों का समन्वय ‘जीवनतत्व’ है।
जीवनतत्व क्या है, उसके नियम क्या हैं–इनका उत्तर वेद विद्या है। जहाँ प्राण है, वहां जीवन है और जहाँ जीवन है उस स्थान को ‘यज्ञ’ कहा गया है। इस यज्ञ का प्रारम्भ प्राण के दो रूपों–श्वास–प्रश्वास के स्पंदन से होता है। अन्य शक्तियों की तरह इसका भी ऋण से धन और धन से ऋण की ओर आना-जाना होता है।
_प्राण शक्ति का ऋण से धन की ओर जाने की क्रिया को ‘एत च्’ और धन से ऋण की ओर जाने की क्रिया को ‘प्रेति च्’ कहते हैं। प्राण के स्पन्दन की समाप्ति जीवन की समाप्ति है। जिस दिन मनुष्य जीवन का पहला श्वास लेता है, उसी दिन उसका अंतिम श्वास भी निश्चित हो जाता है।
मनुष्य की मृत्यु प्रश्वास में होती है। श्वास तो जीवन है।

  जब शरीर में अधिक मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड एकत्र हो जाती है तो सुस्ती छा जाती है, आलस्य से घिर जाते हैं हम। यही एकमात्र कारण है कि दिन की अपेक्षा रात में निद्रा सरल होती है। क्योंकि दिन में ऑक्सीजन और रात में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़ी हुई होती है।
  _ऑक्सीजन का मूल स्रोत 'सूर्य' है। सूर्य से निःसृत ऑक्सीजन अर्थात् प्राणतत्व समस्त विश्व को अनुप्राणित करता है। प्राणतत्व अति सूक्ष्म है। उसी का स्थूल रूप प्राणवायु है। भौतिक विज्ञान प्राणतत्व को ही 'ईथर' कहता है।_
  ऑक्सीजन के अभाव में पेड़, पौधे, लता, पुष्प आदि रात में कुम्हला जाते हैं। सारी प्रकृति रात के अंधकार में लीन हो जाती है। लेकिन एक विशेष बात है कि ऑक्सीजन का अनुपात एक समान नहीं रहता है। इसी के आधार पर हमारे शास्त्रकारों और तत्ववेत्ताओं ने रात्रि को 'महामाया' के रूप में परिकल्पित किया है और इसी परिकल्पना के आधार पर रात्रि को चार रूपों में विभक्त किया है जिनके नाम हैं--मोहरात्रि, दारुण रात्रि, महारात्रि और कालरात्रि।
   _श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि 'मोहरात्रि' है। होलिका-दहन की रात्रि 'दारुण रात्रि' है। शिवरात्रि 'महारात्रि' है और दीपावली की रात्रि 'कालरात्रि' है। हमें मालूम होना चाहिए कि महामाया भगवान की योगमाया है जिसका आश्रय लेकर भगवान् अपनी लीला किया करते हैं। तभी तो समस्त चराचर जगत योगमाया-ग्रस्त होकर निद्रा में डूब जाता है रात्रि की गोद में।_
     निद्रा अति रहस्यमयी है। यह तीन प्रकार की होती है--शरीर की निद्रा, मन की निद्रा और आत्मा की निद्रा। मृत्यु आत्मा की निद्रा है इसीलिए उसे 'चिरनिद्रा' कहते हैं। शरीर की निद्रा में सपने दिखाई देते हैं और मन की निद्रा को 'सुषुप्ति' कहते हैं। सुषुप्ति अवस्था स्वप्नरहित अवस्था है।
   संकोच और विस्तार दो क्रियाएँ प्राण की हैं। यही जीवन का रूप है। यही स्पन्दन का रूप है। स्पन्दन की साधना में श्वास-प्रश्वास दोनों समान हो जाते हैं। शरीर के भीतर प्राणतत्व की मात्रा बढ़ने लगती है और जैसे-जैसे यह मात्रा बढ़ती जाती है, वैसे-ही-वैसे शरीर में जो प्रसुप्त शक्तियां हैं वे जागृत होने लगती हैं।
   उन प्रसुप्त शक्तियों के केंद्र को ही योग-तंत्र की भाषा में *चक्र* कहते हैं।
   _हमें जीवित रहने के लिए जितनी ऑक्सीजन की मात्रा की आवश्यकता है, उसकी मात्रा निश्चित है। प्राणायाम के द्वारा प्राण की साधना होती है।_
     श्वास में ऑक्सीजन होती है लेकिन कम मात्रा में  होती है और प्रश्वास में होती है-कार्बन डाई ऑक्साइड, लेकिन अधिक मात्रा में। सच पूछा जाय तो यही ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड के अंतर से आयु का क्षरण होता रहता है। प्राणायाम के अभ्यास से  धीरे-धीरे यह असमानता कम होने लगती है और अंत में समानता में बदल जाती है।
   _इस अवस्था में जितना ऑक्सीजन हमारे शरीर में भीतर जाता है उतना ही कार्बन बाहर  भी निकलता है।_
  साधना के दूसरे चरण में श्वास की मात्रा और मात्रा के अनुसार श्वास की गति बढ़ाई जाती है जिसके फलस्वरूप उसी के अनुपात में कार्बन की भी मात्रा कम होने लगती है। और अन्त में एक ऐसी स्थिति आती है जब कार्बन की मात्रा शरीर में बहुत कम और ऑक्सीजन की मात्रा शरीर में बहुत ज्यादा हो जाती है।
  _इस स्थिति में प्राण ही एकमात्र योगी का आहार हो जाता है। वह फिर न कुछ खाता है और न कुछ पीता है। इसी प्राणाहार से योगिगण सैकड़ों वर्षों तक जीवन यापन करते रहते हैं।_

    _*अपान प्राण की महत्ता :*_
   स्त्री-पुरुष क्यों दूसरे स्त्री-पुरुषों के प्रति आकर्षित होते हैं ?
   इसका कारण है--अपान प्राण। जो एक से संतुष्ट नहीं हो सकता, वह कभी संतुष्ट नहीं होता। उसका जीवन एक मृग-तृष्णा है। इसलिए भारतीय योग में ब्रह्मचर्य आश्रम का यही उद्देश्य रहा है कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करे।
   _इसका अर्थ यह नहीं कि पुरष नारी की ओर देखे भी नहीं। ऐसा नहीं था--प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्य को अभ्यास कराता था जिसमें 'अपान प्राण' और 'कूर्म प्राण' को साधा जा सके और आगे का गृहस्थ जीवन सफल रहे--यही इसका गूढ़ रहस्य था।_
   प्राचीन काल में चार आश्रमों का बड़ा ही महत्व था। यह यों ही नहीं था। इसके पीछे गंभीर आशय था। जीवन को संतुलित कर, स्वस्थ रहकर अपने कर्म को पूर्ण करना उद्देश्य रहता था। लेकिन आज के मनुष्य का जीवन ताश के पत्तों की तरह बिखरा-बिखरा रहता है।
   _वह समेटना चाहता है लेकिन जीवन है कि समेटने में नहीं आता। यही अशांति का कारण है। जीवन में प्राण का महत्व है।_

   *समान प्राण और कृकल प्राण की उपादेयता :*
  अपान प्राण की ही तरह 'समान प्राण' भी काफी महत्वपूर्ण है। समान प्राण नाभि के मध्य में रहता है। उसका कार्य पेट के पाचन-तंत्र को दुरुस्त करना है। गरमाहट और पित्त, चंचलता और उत्साह, शरीर में तेज आदि समान प्राण की ही देन है।
  _त्वचा में कोमलता, चमक ,भूख लगना 'कृकल प्राण' का कार्य है। सर्दी का कम लगना समान प्राण और कृकल प्राण के संयोजन की विशेषता  है। भूख लगना ,स्फूर्ति, उत्साह ,शरीर में तेज, सर्दी कम लगना--समान प्राण और कृकल प्राण के स्पन्दन पर निर्भर करता है।_
 जिन लोगों में समान प्राण का स्पन्दन कम होता है,

उन्हें सर्दी अधिक लगती है। स्नान करना सर्दी में बड़ा कष्टकारी रहता है उनके लिए। गर्म कपडे पहनने पर भी उन्हें सर्दी महसूस होती रहती है।
जरा-सा भोजन करते ही पेट भरा-भरा-सा लगने लगता है। मनुष्य के पास सब कुछ होते हुए भी वह खिन्न बना रहता है, असंतुष्ट रहता है। शरीर का कोई-न-कोई अंग बीमार ही बना रहता है। पेट का भारीपन, थकान, आँखों की कमज़ोरी आदि रोग अक्सर घेरे रहते हैं।
आयुर्वेद ने सारे रोगों की जड़ पेट को माना है। यदि पेट ठीक है तो शरीर में रोगों की सम्भावना कम रहती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि समान प्राण ही हमारे स्वास्थ्य का मुख्य कारण है।
तंत्र-योग में प्राण-साधना एक कठिन क्रिया है। अगर प्राण नहीं सधता तो तंत्र की सारी क्रिया व्यर्थ है।
तंत्र में ‘ ‘प्रणाकर्षिणी विद्या’ की साधना काफी दुरूह है लेकिन साधक उसे साधता है। बिना प्राण साधे ध्यान, समाधि, सूक्ष्म लोक का विचरण, देहातीत का अनुभव प्राप्त होना संभव नहीं है।
जिस प्रकार ‘पुरुष’ के बिना ‘प्रकृति’ अपनी लीला नहीं कर सकती, उसी प्रकार पांच महाप्राण बिना पांच लघुप्राण संतुलित नहीं हो सकते। महाप्राण और लघुप्राण शिव और शक्ति के प्रतीक हैं।
जिस तरह बिना शिव-शक्ति के चराचर जगत शून्य है ,ब्रह्माण्ड स्पन्दनहीन है, उसी प्रकार दसों प्राणों का स्पन्दन ही जीवन है।

 'प्राण तोषणी क्रिया' तंत्र का काफी गूढ़ विषय है। यह क्रिया अगर सध जाय तो साधक प्राण पर नियंत्रण कर शरीर के तापमान को प्रकृति के अनुसार घटा-बढ़ा सकता है।
  _प्राण को सहस्त्रार में स्थापित कर सैकड़ों वर्षो तक समाधि को उपलब्ध हो सकता है। कुण्डलिनी योग में षट्चक्र- भेदन बिना प्राणों के सन्धान के सम्भव नहीं। तंत्र ने प्राण को असीम ऊर्जा माना है।_
  उदान प्राण का निवास कण्ठ प्रदेश है। इसे साधने में "श्री" और "समृद्धि" दोनों का उदय होता है। कण्ठ प्रदेश को लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। इसी कारण स्वर्ण आभूषण गले में धारण किया जाता है। कण्ठ को 'स्फुटा ग्रन्थ' भी कहा गया है।
 _स्फुटा को जागृत करने के लिए मोती की माला, रत्न और स्वर्ण आभूषण धारण करना शुभ होता है। उदान के पूर्ण होने पर मनुष्य कभी अभावग्रस्त नहीं होता। साधक प्राण की विशेष क्रिया द्वारा 'स्फुटा ग्रंथि' जागृत कर लेता है। भौतिक व आध्यात्मिक सुख जब चाहे प्राप्त कर सकता है।_
     लेकिन विरले साधक ही इसका उपयोग भौतिक सुखों के लिए करते हैं। उनका उद्देश्य वाक्सिद्धि और मन्त्रसिद्धि के लिए होता है।

  धनंजन प्राण का स्पन्दन पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से होता रहता है। वह सभी प्राणों का प्रमुख है क्योंकि उसका सूक्ष्म सञ्चालन सूक्ष्म केंद्रों के आलावा  शरीर के बाह्य सूक्ष्म तरंगों को भी करता है आकर्षित। इसलिए कपाल प्रदेश में इसका मुख्य निवास माना गया है जहाँ सहस्त्रार चक्र है, वह शिव-शक्ति का सामरस्य मिलन-स्थल है। इसी को तंत्र में शिवलोक कहा गया है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है--"प्राणों में मैं धनञ्जय प्राण हूँ।" 
   _हमारा मस्तिष्क रहस्यमय है। विज्ञान भी अभी तक इसके रहस्यों को पूर्ण रूप से उजागर नहीं कर पाया है। यह अद्भुत सुप्त शक्तियों का भण्डार है। संसार में ऐसे अनेक महान पुरुष हुए हैं जिन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा से लोगों को हैरत में डाल दिया।_
      जाने-अनजाने यह धनंजन प्राण का ही चमत्कार है। इसमें शिथिलता आने पर या स्पन्दन कम हो जाने पर मानसिक बीमारियां, चिन्ता आदि का शिकार हो जाता है व्यक्ति। मस्तिष्क का विकास धनंजन प्राण पर ही निर्भर है।
  हज़ारों वर्ष पहले ऋषि-महर्षियों ने प्राण पर बेहद गम्भीर विचार किया था। साथ ही यह शोध किया था कि यदि प्राण कुपित हो जाय या मंद पड़ जाय तो उसे सन्धान कैसे किया जाय। लेकिन योग हो या तंत्र हो, बिना गुरु के निर्देशन के नहीं करना चाहिए। नहीं तो लाभ के वजाय हानि उठानी पड सकती है।
   _इसीलिए योग को परम ज्ञान और तंत्र को गुह्य ज्ञान कहा गया है._          
   (लेखक मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक एवं चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)

Ramswaroop Mantri

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