हिमाकत – 48 साल पहले हाउसिंग बोर्ड को बेची गई जमीन की रजिस्ट्री कराई… जिस जमीन पर मकान बन गए उसे कृषि भूमि बताकर नामांतरण करवा लिया
करतूत – हाउसिंग बोर्ड की आपत्ति के बावजूद तहसीलदार ने नामांतरण के साथ ही दूसरे की जमीन पर बटांकन कर डाला
इंदौर। कबीटखेड़ी स्थित करीब आठ एकड़ जमीन खरीदकर अपने स्वामित्व की अन्य जमीनों के साथ हाउसिंग बोर्ड ने जिन जमीनों पर इमारतें बनाकर लोगों को मकान और फ्लैट बेच दिए, उस जमीन के एक हिस्से को भूमाफियाओं ने कौडिय़ों में खरीदकर न केवल अपने नाम पर जमीन का नामांतरण करवा लिया, बल्कि तहसीलदार से सांठगांठ कर दूसरे भूस्वामी की खाली पड़ी जमीन पर उक्त खसरे का बटांकन तक करवा डाला। इस दौरान कई बार हाउसिंग बोर्ड आपत्तियां दर्ज कराता रहा, लेकिन तहसीलदार ने सारी आपत्तियों को कूड़े में डाल दिया।
आज से करीब 47 साल पूर्व वर्ष 1976 में कबीटखेड़ी की खसरा नंबर 132/3, 137 एवं 141/3 की 3.250 हेक्टेयर, यानी करीब आठ एकड़ भूमि का सौदा हाउसिंग बोर्ड ने भूस्वामी नंदकिशोर पिता हीरालाल एवं गंगाबाई बेवा हीरालाल यादव से 10 हजार 500 रु. प्रति एकड़ के मान से किया और उक्त भूमि के एवज में चेक से 25 हजार रुपए का अग्रिम भुगतान कर भूमि का कब्जा प्राप्त कर लिया। भूमि की शेष रकम तीन माह में नजूल एवं सीलिंग एनओसी दिए जाने के बाद अदा की जाना थी, लेकिन भूस्वामी जब नजूल एनओसी एवं सीलिंग एनओसी हासिल नहीं कर सके तो उन्होंने हाउसिंग बोर्ड को कुछ और राशि दिए जाने के लगातार आवेदन दिए। इस पर हाउसिंग बोर्ड ने दिनांक 14-4-77 को 30 हजार रुपए, 18-1-78 को 10 हजार रुपए एवं 4-7-79 को 14900 रुपए की राशि देते हुए एक और अनुबंध निष्पादित करवाया, जिसमें बची हुई मात्र 5 प्रतिशत राशि सीलिंग एनओसी लाने एवं रजिस्ट्री कराते वक्त दिए जाने की बात लिखी गई। इससे पहले हाउसिंग बोर्ड प्रथम अनुबंध के दिन ही विक्रेता पक्ष से भूमि का कब्जा ले चुका था। चूंकि हाउसिंग बोर्ड को अपनी योजना विकसित करना थी, इसलिए बोर्ड ने स्वयं उक्त भूमि के सीलिंगमुक्ति का आवेदन अपनी अन्य 74.53 एकड़ भूमियों के साथ लगाकर दिनांक 8.12.87 को सीलिंगमुक्ति के आदेश प्राप्त कर लिए, जिसमें अनुविभागीय अधिकारी ने हाउसिंग बोर्ड को अद्र्धशासकीय संस्था मानते हुए अनापत्ति जारी कर दी। इसके पश्चात हाउसिंग बोर्ड ने उक्त भूमि पर अपनी योजना विकसित कर दी, लेकिन चूंकि उक्त आठ एकड़ भूमि की रजिस्ट्रियां नहीं हो पाई थीं, इसलिए हाउसिंग बोर्ड के नाम पर उक्त भूमि का नामांतरण नहीं हो पाया था और विक्रेताओं का नाम राजस्व अभिलेखों में चढ़ा रह गया। इसका फायदा उठाते हुए भूस्वामी की वारिस कौशल्याबाई ने उक्त भूमि मिलिंद पिता महेंद्र चौकसे को बेच दी, जबकि इसके पहले कौशल्याबाई स्वयं हाउसिंग बोर्ड से पत्र व्यवहार कर यह स्वीकार कर चुकी थीं कि उक्त भूमि उनके वारिसों ने हाउसिंग बोर्ड को बेची है। उक्त तथ्यों को जानते-बूझते खरीदारों ने उक्त जमीन पर नामांतरण के लिए आवेदन लगाया तो हाउसिंग बोर्ड ने कई आपत्तियां दर्ज कराईं, लेकिन लगातार आपत्तियों के बावजूद तहसीलदार नीतीश भार्गव ने उन्हें नजरअंदाज करते हुए खसरा नंबर 132/3 रकबा 1.38 एकड़ जमीन का नामांतरण चौकसे के नाम कर दिया। चूंकि उक्त भूमि पर हाउसिंग बोर्ड इमारतें बना चुका था, इसलिए समस्या भूमि के बटांकन की थी। इस पर तहसीलदार ने पास ही में स्थित वडनेरे फार्मास्युटिकल की रिक्त भूमि पर उक्त जमीन का बटांकन कर डाला और हाउसिंग बोर्ड की जमीनों को विवादित बनाने के साथ ही वडनेरे फार्मास्युटिकल की भूमि को भी विवादित बनाने का षड्यंत्र रच डाला। अब वडनेरे फार्मास्युटिकल के साथ ही हाउसिंग बोर्ड ने अनुविभागीय अधिकारी के यहां अपील कर जब तथ्यों के दस्तावेज पेश किए तो वरिष्ठ अधिकारी भी चकित रह गए।
अधिग्रहण से छूट गई थी इसलिए हाउसिंग बोर्ड को जमीन खरीदना पड़ी
दरअसल हाउसिंग बोर्ड ने अपनी योजना के लिए कबीटखेड़ी की करीब 66 एकड़ जमीन अधिगृहीत की थी, लेकिन यह आठ एकड़ भूमि अधिग्रहण से बच गई थी, जो योजना का हिस्सा थी। इस पर हाउसिंग बोर्ड ने मुआवजे की राशि से विक्रय अनुबंध कर उक्त जमीन को खरीदने का निर्णय लिया। चूंकि यह जमीन विक्रय अनुबंध से हासिल की गई थी, इसलिए उक्त जमीन का रकबा और खसरा अधिग्रहण में शामिल नहीं था और भूमाफिया हाउसिंग बोर्ड के कर्मचारियों से सांठगांठ कर सूचना के अधिकार में यह जानकारी लेते रहे कि क्या उक्त खसरा अधिग्रहण में शामिल है। उक्त कर्मचारी उसका उत्तर नहीं में देते रहे, क्योंकि वह जमीन अधिग्रहीत तो नहीं की गई थी, लेकिन यह तथ्य छुपाते रहे कि उक्त जमीन खरीदी गई है।
आश्चर्य… तहसीलदार हाउसिंग बोर्ड की आपत्तियों को कचरे में डालते रहे
हाउसिंग बोर्ड उक्त जमीन के नामांतरण के प्रयास को विफल करने के लिए लगातार आपत्तियां दर्ज कराता रहा है। बोर्ड ने 15 अप्रैल 2010 को अनुबंध के साथ ही पंचनामा और मौका भी उपलब्ध कराया। इसके बाद 1-9-2021 को भी भूमि पर मंडल का नाम दर्ज कराने का आवेदन दिया, जिस पर तहसीलदार ने उद्घोषणा भी जारी की, जिसमें उक्त खसरे शामिल थे। इसके बावजूद खसरा क्रमांक 132/2 रकबा 1.38 हेक्टेयर भूमि का नामांतरण कर दिया गया तो मंडल ने 13-7-2022 को नामांतरण पर आपत्ति जताते हुए बटांकन रोकने की गुहार लगाई, लेकिन तहसीलदार ने उक्त आवेदन को भी नकारते हुए नामांतरण के बाद बटांकन भी कर डाला।





