*जे. एन. शाह*
ऐतिहासिक रूप से भारत में ट्रेड यूनियनों, मजदूर आंदोलनों का जो उभार रहा है वह व्यापक स्तर पर एकता और संघर्ष के सिद्धांत का प्रयोग ही रहा है। सैद्धांतिक, अपरिहार्य व्यवहारिक-विभाजनों के बीच केंद्रीय श्रम संगठनों तथा सेक्टरवार फेडरेशनों का संयुक्त मंच ही कोई मजबूत (1974, 1981) चुनौती सरकार को दे पाया है। आज इस प्रक्रिया में गंभीर भटकाव और विकृति आ चुकी है। स्वतंत्र पहलकदमियों और संयुक्त कार्यवाई के बीच संतुलन या सामंजस्य की कमी, श्रमिक वर्ग की वैचारिक पहचान और व्यापक वर्ग एकता के बीच संतुलन की कमी, नियोक्ता के खिलाफ आर्थिक संघर्ष तथा सरकार की नीतियों से उनके संबंध की बारीक पहचान की कमी, आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनसे आज का रेल मजदूर आंदोलन तथा उसका नेतृत्व पूरी तरह से विमुख हो चुका है। मजदूर वर्ग की मुक्ति के लक्ष्य को लेकर शुरू हुआ मजदूर आंदोलन आज सम्मानजनक वेतन, एक समान वेतन, न्यूनतम वेतन के रास्ते आज ‘‘कोई श्रमिक अधिकार नहीं’’ की दहलीज तक पहुंच चुका है। मशीनरी मजदूर वर्ग के बीच मजबूत और कमजोर बिंदुओं को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दे रही है। इसमें मजदूरों की एक समान कार्यपरिस्थितियां परंतु पृथक वर्गीय पृष्ठभूमि सबसे बड़े कारक है। ट्रेड संबंधी संकुचित मनोवृत्ति, अराजनीतिकरण, वर्गीय चेतना का अभाव, उपभोक्तावाद, आदि ने आज रेल मजदूरों की स्थिति एक ऐसे मशीनीकृत इंसान के रूप में कर दी है कि उसकी “प्रोग्रामिंग” व्यवस्था जैसा चाहे वैसा कर ले रही है। विनिवेश, तात्कालिक आर्थिक सुधारों, ठेकाकरण के द्वारा, रेलवे के कारखानों, स्टेशनों, रनिंग रूमों में कैजुएल वर्कर्स (उसमें भी महिला कर्मियों की भारी संख्या) की ऐसी फेहरिस्त ला दी गई है, जो बिल्कुल ही मजदूर वर्ग की चेतना से विलग है। नेतृत्व, संगठन, सदस्य सब आज एक दूसरे के ऊपर अविश्वास और दोषरोपण करते हैं और इसके पीछे वाजिब, ठोस कारण भी हैं। आज मौकापरस्त या प्रतिक्रियावादी और अपने को क्रांतिकारी कहने वाली ट्रेड यूनियनों के बीच की विभाजन रेखा लगभग क्षीण हो चुकी है।
*जे. एन. शाह*
*क्रमशः भाग 9 में…
निजीकरण की राह पर रेलवे*
*अंतिम भाग -9*
अब मजदूर आंदोलन को अपने कार्यप्रणाली, योजना (शार्ट टर्म-लांग टर्म) में व्यापक परिवर्तन लाते हुए संगठित मजदूरों के साथ असंगठित मजदूरों, चाहे वे सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र में हो या निजी क्षेत्र में, साथ लेकर उन्हें वर्गीय चेतना से लैस कर व्यापक एकता बनाने की जरूरत है। अपना वजूद बचाने, मान्यता बचाने के जद्दोजहद से जूझ रहे ट्रेड यूनियनों से आज कुछ भी उम्मीद करना बेमानी है। सबसे बड़ा सवाल उनके बीच आज नेतृत्व के संकट का खड़ा हो गया है। सक्षम नेतृत्व का अभाव तथा उसके परिणामस्वरूप संगठन के सदस्यों का नेतृत्व के प्रति नजरिया आज एक काफी निराशाजनक माहौल बना डालने में महती भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही साथ नेतृत्व के लिए विकल्पहीनता का माहौल भी पैदा हो गया है क्योंकि सक्षम, जुझारू, प्रतिबद्ध, नेतृत्व संघर्षों से पैदा होता है और जमीनी स्तर पर ठेठ संघर्ष कहीं हो नहीं रहा है। जो हो रहा है वह महज रस्मी और खानापूर्ति हेतु हो रहा है। वर्गीय चेतना के अभाव में भावनात्मक रूप से जुड़ने वाली कतारें एक झटके के बाद कहां छू मंतर हो जाती है, पता ही नहीं चलता। आज यदि आर्थिक, सामाजिक, नीतिगत मसलों पर संघर्ष की योजना बनानी हो तो हमें सबसे पहले अपनी कतारों की राजनीतिक चेतना, वर्गीय चेतना और फिर से नए बदले आर्थिक, सामाजिक परिवेश में नई ट्रेड यूनियन संस्कृति का ककहरा सबसे पहले पढना-पढ़ाना होगा।
निश्चित रूप से स्थापित मजदूर संघों के नेता कर्मचारियों की उदासीनता को दूर करने और युवा पीढ़ी के मजदूरों को शोषण और जुल्म का प्रतिकार करने के लिए उत्प्रेरित करने में विफल रहे हैं। मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक, वर्तमान तथा भावी दायित्व कोरोना महामारी संकट के दौरान यह उजागर हो गया है किसी भी कठिन, असामान्य समय में सरकारी, सार्वजनिक उपक्रम ही आम और खास दोनों नागरिकों के काम आते हैं। निजी अस्पताल, परिवहन, विद्यालय कठिन समय में सबसे पहले मैदान से भागने वालों में होते हैं। जैसा कि अभी तक निजी अस्पतालों में कोरोना मरीजों का भर्ती न लिया जाना कड़वी सच्चाई बयां कर रहा है। लाकडाउन में सीमित संसाधनों के बावजूद जान जोखिम में डालकर हमारे सरकारी अस्पताल, उनके डाक्टर ही काम पर डटे हैं तथा अब तक अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए सैकड़ों डाक्टर, नर्स अपनी शहादत दे चुके हैं। कारखानों, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के बंद होने से, बेरोजगारी, भुखमरी के भय से बदहवास, पैदल अपने घरों की ओर भाग रहे कामगारों को सार्वजनिक उपक्रम रेल ने ही अंतिम समय में उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचाया। इसलिए अपनी जिम्मेदारी तथा देश के प्रति सच्ची निष्ठा और नागरिक बोध का परिचय देते हुए मजदूर वर्ग का (अगुवा दस्ता होने के नाते खासकर रेलवे के मजदूरों की) यह महत्वपूर्ण कार्यभार बनता है कि राष्ट्रीय महत्व के इस सरकारी उपक्रम के निजी हाथों में सौंपे जाने के पीछे के सरकार के मंसूबों को आमजनों के बीच लगातार अभियान चलाकर, बेनकाब करने का बीड़ा उठाए, आगे के दिनों में निजीकरण के विरोध में संघर्ष की तैयारी के लिए समाज के सभी तबकों- किसानों, छात्रों, बेरोजगारों, महिलाओं के बीच व्यापक एकजुटता बनाए, जिससे वर्षों के बलिदान, खून-पसीने से खड़े किए गए राष्ट्रीय महत्व के भारतीय रेल को बचाया जा सके। और अन्त में दुष्यंत कुमार के शब्दों मे-पक गई है आदतें, बातों से सर होंगी नहींकोई हंगामा करो, ऐसे गुजर होगी नहींआज मेरा साथ दो, वैसे मुझे मालूम हैपत्थरों में चीख हरगिज कारगर होंगी नहीं।
*जे. एन. शाह*





