रीवा । भारत तिब्बत मैत्री संघ की एक बैठक प्रदेश अध्यक्ष अजय खरे की उपस्थिति में स्थानीय स्वामी विवेकानंद पार्क में रविवार 25 दिसंबर को संपन्न हुई । बैठक में प्रमुख रूप से सेवानिवृत्त अधीक्षण यंत्री एच एल त्रिपाठी , सेवानिवृत्त पोस्ट मास्टर श्रवण प्रसाद नामदेव, डॉ पी के तिवारी, नारी चेतना मंच की पूर्व अध्यक्ष नजमुन्निशा, संगीता चतुर्वेदी,सुधा सिंह, डॉ श्रद्धा सिंह, श्वेता पांडे , कलावती रजक , माया सोनी, दीपक गुप्ता एडवोकेट आदि ने भाग लिया । संपन्न बैठक में भारत की उत्तरी सीमाओं पर खासतौर से लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में चीन की जबरिया दखलअंदाजी पर गहरी चिंता एवं आक्रोश व्यक्त किया गया। बैठक को संबोधित करते हुए भारत तिब्बत मैत्री संघ की मध्यप्रदेश राज्य इकाई के अध्यक्ष अजय खरे ने कहा कि तिब्बत की आजादी और भारत की सुरक्षा का सवाल अनदेखा नहीं किया जा सकता। तिब्बत को हड़पने के बाद चीन लगातार भारत के लिए सरदर्द बना हुआ है। चीन को मुंहतोड़ जवाब देते हुए भारत को तिब्बत मुक्ति अभियान की अगुवाई करनी चाहिए। विश्वासघाती चीन के द्वारा सन 1962 पर भारत पर किए गए हमले के बावजूद उस पर भरोसा बरकरार रखना भारत की संप्रभुता के लिए कतई अच्छा नहीं है। बीसवीं सदी में जब दुनिया के अधिकांश देश आजाद हो रहे थे तब चीन के द्वारा तिब्बत को गुलाम बना लिया जाना दुनिया के स्वतंत्रता के पक्षधरों के लिए एक बड़ी चुनौती की बात बनी हुई है । चीन के द्वारा तिब्बत को हड़पने के दौरान वहां के आध्यात्मिक नेता और शासक परम पावन दलाई लामा और उनके हजारों अनुयायियों को चीनी दमन चक्र से बचते हुए भारत आना पड़ा था। तिब्बत की आजादी के बगैर उनका वहां वापस लौटना साम्राज्यवादी चीन की दासता को स्वीकार करना जैसा होगा । इतिहास इस बात का गवाह है कि चीन कभी भारत का पड़ोसी देश नहीं रहा है। भारत की सीमाएं तिब्बत से मिलती थीं चीन से नहीं। भारत का तिब्बत से सांस्कृतिक संबंध काफी पुराना और प्रगाढ़ रहा है । तिब्बत की आजादी के लिए भारत को ही आगे आना होगा । तिब्बत की आजादी के लिए भारत को पड़ोसी धर्म का निर्वाह करना चाहिए जो बात भारत की सुरक्षा के लिए भी अहमियत रखती है ।
तिब्बत की आजादी और भारत की सुरक्षा का सवाल अनदेखा नहीं किया जा सकता





