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लोकतंत्र के पराभव का कारण:निरंतर न्यायपालिका का कमज़ोर होना !

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-सुसंस्कृति परिहार 

इन दिनों हालांकि तमाम सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं को जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने अपने दहशतगर्द रवैए के घेरे में लपेट कर रखा है उसमें चारों स्तंभों में सबसे महत्वपूर्ण संस्था न्यापालिका भी इस कदर सरकार की मुखापक्षी होगी। ऐसा भारतीय जनमानस ने और संविधान निर्माताओं ने कभी सोचा भी ना होगा। न्याय की उम्मीद अब जाती रही है। मनुवाद के तहत् जैसे दलित, पिछड़े और अपने विरोधियों के लिए व्यवस्थाएं थीं।वे सब भाजपा इस लंबे शासन में परवान चढ़ चुकी हैं। न्याय अब बिकाऊ और सरकारी तंत्र का पूरी तरह गुलाम  नज़र आ रहा है।

एक तो पहले से ही न्यायप्रणाली इतनी धीमी गति से काम करती आ रही है कि बहुतेरे मामलों में न्याय मिलते मिलते सम्बंधित लाभार्थी दुनिया से विदा हो चुका होता है।यदि याचिका कर्ता को न्याय मिल भी जाता है तो उसका क्रियान्वयन भी जटिल होता है 

कई मामलों में सुको के आदेश को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है तथा 

कभी कभी उसे अमल में लाने की कवायद इतनी जटिल हो जाती है कि बिना रिश्वत दिए कुछ नहीं हो पाता।

आजकल तो मुश्किलात इतनी बढ़ गई हैं कि सरकार के विरुद्ध फैसला देने में न्यायाधीश स्वतःउससे हटने लगे हैं।जिससे संगीन भाजपा नेता अपने को सुरक्षित और सुप्रीम समझने लगते हैं तथा याचिकाकर्ताओं को किसी गंभीर मामले में फंसाकर उनका जीवन संकट में डाल देते हैं।

ऐसा एक मामला कटनी जिले के विजयराघवगढ़ के क्षेत्र के अमीर विधायक, पूर्व मंत्री संजय पाठक का है जिनके ख़िलाफ़ कई मामले दर्ज़ हैं इनमें अवैध खदानों पर हुई कार्रवाई पर करोड़ो का जुर्माना लगा क्रियान्वयन ना होने पर मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। तब अपराधी भाजपा नेता ने जज से फोन पर बात करनी चाही। इस बात का जवाब देने उन्हें  उस फैसले पर मजबूती से निर्णय सुनाना चहिए था। लेकिन जज डर गए  उन्होंने इस बात को सार्वजनिक कर दिया  और मुख्य न्यायाधीश महोदय से इस केस से हटने की सूचना दे दी और  वे हट जाते हैं लेकिन मुख्य न्यायाधीश आज तक ना तो उस गंभीर आर्थिक अपराध मामले के कोई बेंच तय कर पाए हैं और ना ही स्वत:इस मामले पर कोई सुनवाई किए हैं।सब पेंडिंग है। गुनहगार मौज कर रहे हैं तथा वे अपने खिलाफ अपराध दर्ज कराने वालों को फंसाने की साज़िश में लग गए हैं।

ऐसा ही एक और मामला दमोह जिले के सतरिया गांव का आया जहां एक पंडित जी एक पिछड़ी जाति के व्यक्ति से ना केवल चरण धुलवाते बल्कि उस पानी को पिलवाते भी हैं।इसे एक जज साहिब स्वत: संज्ञान लेकर इस कृत्य में शामिल सभी लोगों को सिर्फ गिरफ्तार ही नहीं करवा देते हैं बल्कि जेल भेज देते हैं।जज का स्वत: संज्ञान लेना और पंडित लोगों को जेल भेजना मनुवादी सरकार को इतना नागवार गुजरता है कि जज साहिब का केवल स्थानांतरण 

ही नहीं किया जाता बल्कि उनकी सीनियारिटी भी छीन ली जाती है।

इससे ज्यादा कष्ट तब हुआ जब यह मामला दूसरी बेंच के पास पहुंच जाता है तो वह बेंच भी मारे डर के इस फैसले को सुनने से इंकार कर हट जाती हैं।

उधर दिल्ली दंगा के आरोपियों की जमानत से फिर इंकार कर दिया जाता है इस पर कपिल सिब्बल लिखते हैं सुप्रीम कोर्ट में उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और अन्य की ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान जो सच सामने आया, वो किसी भी लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल साहब ने अदालत के सामने वो आंकड़े रखे जिन्हें सुनकर देश का हर संवेदनशील नागरिक सोच में पड़ जाएगा।

कपिल सिब्बल साहब ने सुप्रीम कोर्ट में बताया: कि 55 तारीखों पर जज छुट्टी पर।26 तारीखों पर कोर्ट में टाइम नहीं था।59 तारीखों पर स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ही गायब।यानी 140 से ज़्यादा सुनवाई सिर्फ़ “सिस्टम की गैर-ज़िम्मेदारी” में बर्बाद हुईं, और दिल्ली पुलिस आज भी कहती है; “आरोपी ट्रायल टाल रहे हैं।”

उन्होंने बताया है 751 FIRs में उमर खालिद का नाम सिर्फ़ एक FIR में, और उस एक केस में भी ट्रायल शुरू नहीं हो पाया, फिर भी वो बीते 5 साल से जेल में हैं।क्या यही है “मदर ऑफ डेमोक्रेसी” का न्याय?

जहाँ नाम ‘उमर’ हो तो अदालतें भी ठहर जाती हैं?जहाँ तारीख़ पे तारीख़ मिलती है, पर इंसाफ़ नहीं?3नवम्बर सुनवाई में बहस हुई लेकिन इसे 6नवम्बर तक के लिए फिर टाल दिया गया।

ऐसे अनेक मामले है जिनमें दहशत ज़दा जजों ने अब ऐसे मामले जिनमें सरकार को निर्णय से चोट पहुंचती है उनको या तो सालों साल पेंडिंग रखा जाता हैं या सरकार की इच्छा के अनुरूप फैसला दे दिया जाता है।

हाल ही में सेवानिवृत्त सीजेआई एन वेंकट रमणा का एक बयान सामने आया जिसमें वे कह रहे हैं जजों पर सरकार का इतना अधिक दबाव तो होता ही है किंतु मेरे परिवार जनों पर क्रिमिनल केस लादकर मुझे परेशान किया गया। जस्टिस लोया की मौत भी चीख चीखकर ये बता रही है वे बिके और झुके नहीं। सिद्ध करता है भय के माहौल में 2014के बाद जिस तरह फैसले सुनाए गए हैं और न्यायमूर्तियों को प्रलोभन दबिश के आगे झुकना पड़ा वह बेशर्म होते लोकतंत्र का परिचायक है।लोग कह देते हैं जज भी आखिर इंसान है।

अब सवाल यही खड़ा होता है कि जब जज भी अपने सही फैसले लेने के काबिल नहीं रहे तो अदालतों की क्या उपयोगिता रह जाती है।क्या देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना उनका उत्तर दायित्व नहीं। यदि वे सामर्थ्य नहीं रखते तो उन्हें  स्वेच्छा से हट जाना चाहिए।क्या तमाम जज अपने न्याय के हितार्थ इस मुद्दे पर एक होकर प्रतिरोध नहीं कर सकते।यदि नहीं तो फिर नागरिकों के मौलिक अधिकार की रक्षा कैसे कर सकते हैं।

आज जब लोकतंत्र के शेष तीनों स्तंभों ने अपनी गरिमा को गर्त में पहुंचा दिया है ,सिर्फ अपने निजी स्वार्थ के लिए अपने ज़मीर को बेचकर तो ऐसे में देव तुल्य समझे जाने वाले प्रेमचंद के ये पंच परमेश्वर उसी राह पर चल देश का बेड़ा ग़र्क करने की इस कोशिश को हर जगह नाकाम करने की ज़िद यदि ठान लें  तो देश में न्याय बच सकता है। जिससे देश सुदृढ़ और मज़बूत होगा। अन्यथा एक दिन न्याय,सत्य वगैरह सब इस देश में व्याप्त अंधकार में विलीन हो जाएगा! दुष्यंत याद आते हैं एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो/कौन कहता है आसमान में सुराख हो नहीं सकता।

Ramswaroop Mantri

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