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जाति~ स्मरण : पूर्व जन्म की स्मृतियों में प्रवेश का विज्ञान 

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डॉ. विकास मानव

     _जाति—स्मरण का अर्थ है, पिछले जन्मों के स्मरण की विधि। पहले जो हमारा होना हुआ है, उसके स्मरण की विधि। ध्यान का ही एक रूप है जाति—स्मरण। ध्यान का ही एक प्रयोग है। स्पेसिफिक, एक खास प्रयोग है ध्यान का।_

       जैसे नदी है, और कोई पूछे कि नहर क्या है? तो हम कहेंगे कि नदी का ही एक विशेष प्रयोग है —सुनियोजित, नदी का ही, पर नियंत्रित, व्यवस्थित। नदी है अव्यवस्थित, अनियंत्रित।

     नदी भी पहुंचेगी कहीं, लेकिन पहुंचने की कोई मंजिल का पक्का नहीं है। लेकिन नहर सुनिश्चित है कि कहां पहुंचानी है।

ध्यान बड़ी नदी है। पहुंचेगी सागर तक। पहुंच ही जाएगी। परमात्मा तक पहुंचा ही देगा ध्यान। लेकिन ध्यान के और अवांतर प्रयोग भी हैं। ध्यान की छोटी—छोटी शाखाओं को नियोजित करके नहर की तरह भी बहाया जा सकता है।

      जाति—स्मरण उनमें एक है। ध्यान की शक्ति को हम अपने पिछले जन्मों की तरफ भी प्रवाहित कर सकते हैं। ध्यान का तो मतलब है सिर्फ अटेंशन। ध्यान का मतलब है, ‘ ध्यान’। किस चीज पर ध्यान देना है, उसके बहुत प्रयोग हो सकते हैं। उसका एक प्रयोग जाति—स्मरण है, कि मेरे पिछले जन्मों की स्मृति कहीं पड़ी है।

       स्मृतियां मिटती नहीं, ध्यान रहे। कोई स्मृति कभी नहीं मिटती है, सिर्फ स्मृति दबती है या उभरती है। दबी हुई स्मृति, मिटी हुई मालूम पड़ती है। अगर मैं आपसे पूछूं कि उन्नीस सौ पचास की एक जनवरी को आपने क्या किया था?

     तो ऐसा तो नहीं है कि आपने कुछ भी न किया होगा, लेकिन बता आप कुछ भी न पाएंगे कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या किया। एकदम खाली हो गया है एक जनवरी उन्नीस सौ पचास का दिन। पर खाली न रहा होगा जिस दिन बीता होगा, उस दिन भरा हुआ था। लेकिन आज खाली हो गया है।

      आज का दिन भी कल इसी तरह खाली हो जाएगा। दस साल बाद आज के दिन का भी कोई पता नहीं चलेगा। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास नहीं था। न इसका यह मतलब है कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को आप नहीं थे.

        न इसका यह मतलब है कि चूंकि आप स्मरण नहीं कर पाते हैं, इसलिए उस दिन को हम कैसे मानें। वह था और उसे जानने का भी उपाय है। ध्यान को उसकी तरफ भी ले जाया जा सकता है। और जैसे ही ध्यान का प्रकाश उस पर पड़ेगा, आप हैरान हो जाएंगे, वह उतना ही जीवंत वापस दिखाई पड़ने लगेगा, जितना जीवंत उस दिन भी न रहा होगा।

जैसे कि कोई टार्च को लेकर एक अंधेरे कमरे में आए और घुमाए। तो वह बाईं तरफ देखे, तो दाईं तरफ अंधेरा हो जाता है, लेकिन दाईं तरफ मिट नहीं जाता। वह टार्च को घुमाए और दाईं तरफ ले आए, तो दाईं तरफ फिर जीवित हो जाता है लेकिन बाईं तरफ छिप जाता है।

      ध्यान का एक फोकस है और अगर विशेष दिशा में प्रवाहित करना हो तो टार्च की तरह प्रयोग करना पड़ता है ध्यान का। और अगर परमात्मा की तरफ ले जाना हो, तो दीये की तरह प्रयोग करना पड़ता है ध्यान का।

 *इसको ठीक से समझ लें :*

       दीये का कोई फोकस नहीं होता, दीया अनफोकस्‍ड है। दीया सिर्फ जलता है। चारों तरफ रोशनी उसकी फैल जाती है। रोशनी किसी एक दिशा में नहीं बहती है, बस बहती है, चारों तरफ एक—सी। दीये का कोई मोह नहीं कि यहां बहे वहां बहे, यहां जाए वहां जाए।

       इसलिए जो भी है वह दीये की रोशनी में प्रकट हो जाता है। लेकिन टार्च दीये का फोकस के रूप में प्रयोग है। उसमें हम सारी रोशनी को बांधकर एक तरफ बहाते हैं। इसलिए यह हो सकता है कि दीये के कमरे में जलने पर चीजें साफ दिखाई न पड़े; दिखाई पड़े, लेकिन साफ दिखाई न पड़े।

       साफ दिखाई पड़ने के लिए दीये की रोशनी को हम एक ही जगह बांधकर डालते हैं, वह टार्च बन जाती है। तब फिर एक चीज पूरी तरह साफ दिखाई पड़ती है। लेकिन एक चीज पूरी साफ दिखाई पड़ती है, तो शेष सब चीजें दिखाई पड़नी बंद हो जाती हैं।

       असल में एक चीज को अगर साफ देखना हो, तो सारे ध्यान को एक ही दिशा में बहाना पड़ेगा, शेष सब तरफ अंधेरा कर लेना पड़ेगा।

तो जिसे सीधे जीवन के सत्य को ही जानना है, वह तो दीये की तरह ध्यान को विकसित करेगा। अन्य कोई प्रयोजन नहीं है उसे। और सच तो यह है कि दीये का प्रयोजन इतना ही है कि दीया अपने को ही देख ले, बस इतना ही प्रकाशित हो जाए तो काफी है। बात खतम हो गई।

      अगर कोई विशेष प्रयोग करने हों, जैसे पिछले जन्मों के स्मरण का, तो फिर ध्यान को एक दिशा में प्रवाहित करना होगा। उस दिशा में प्रवाहित करने के दो —तीन सूत्र है.

एक घटना : 

     एक प्रोफेसर महिला कोई दो —तीन वर्ष तक ध्यान के संबंध में मेरे निकट में रही। उसका अति आग्रह था कि जाति—स्मरण का प्रयोग करना है, पिछला जन्म जानना है। तो उसे मैंने जाति—स्मरण के प्रयोग करवाए। मैंने उससे बहुत कहा भी कि यह प्रयोग अभी न करो तो अच्छा है। क्योंकि ध्यान पूरा विकसित हो जाए, तब तो जाति—स्मरण के प्रयोग से कोई खतरा नहीं होता है। लेकिन पूरा विकसित न हो, तो खतरे हो सकते हैं। क्योंकि एक ही जीवन की स्मृतियों को झेलना भी बहुत बोझिल है। दो —चार जीवन की स्मृतियां एकदम से द्वार तोड़ कर भीतर आ जाएं, तो आदमी पागल भी हो सकता है।

      इसीलिए प्रकृति ने व्यवस्था की है कि आप भूलते चले जाएं। जानने से ज्यादा भूलने की व्यवस्था की है। जितना आप स्मरण करते हैं, उससे ज्यादा विस्मरण करवा दिया जाता है, ताकि आपके चित्त के ऊपर ज्यादा बोझ कभी भी न हो जाए।

       चित्त की सामर्थ्य बढ़ जाए, तो ज्यादा बोझ झेला जा सकता है। लेकिन सामर्थ्य न बढ़े और बोझ आ जाए, तो कठिनाई शुरू हो जाती है। पर उनका आग्रह था, वह नहीं मानीं और उन्होंने प्रयोग किये।

जिस दिन उनको पहले दिन पिछले जन्म की स्मृति की धारा टूटी, उस दिन रात के कोई दो बजे वह भागी हुई मेरे पास आईं। एकदम हालत उनकी खराब थी। बहुत ही मुश्किल और कठिनाई में पड गई थीं वह।

       उन्होंने कहा, अब किसी तरह इसको बिलकुल बंद हो जाना चाहिए, मैं उस तरफ कुछ देखना ही नहीं चाहती। लेकिन इतना आसान नहीं है कुछ नहर को बुला लेना और फिर एकदम से बंद कर देना। इतना आसान नहीं है। द्वार टूट जाए तो उसे एकदम से बंद करना बहुत मुश्किल है। क्योंकि द्वार खुलता नहीं, टूटता है।

      वक्त लगा कोई पंद्रह दिन, तभी वह स्मृतियों की धारा बंद हो सकी।

*कठिनाई क्या आ गई?*

      उन देवी को अत्यंत पवित्र, चरित्रवान होने का खयाल था। और पिछले जन्म की स्मृति आई कि वह वेश्या थी। और जब वेश्या होने के सारे चित्र उभरने शुरू हुए, तो उनके प्राण कैप गए। और इस जीवन की जो सारी नैतिकता थी, वह सब डावांडोल हो गई।

     वह स्मृति ऐसी नहीं आती कि कोई और वेश्या थी। ऐसी नहीं है वह स्मृति। यही जो अब चरित्रवान है, वही वेश्या थी। और अक्सर ऐसा होता है कि पिछले जन्म में जो वेश्या हो, वह इस जन्म में बहुत सती हो जाए। वह पिछले जन्म की प्रतिक्रिया है, पिछले जन्म का दुख भाव है। वह पिछले जन्म की पीड़ादायक स्मृति है, जो उसे सती बना देती है।

       इसलिए अक्सर ऐसा हो जाता है कि पिछले जन्म के गुंडे इस जन्म में महात्मा हो जाते हैं, इस जन्म के महात्मा अगले जन्म में गुंडे हो जाते हैं। इसलिए महात्माओं और गुंडों में बड़ा गहरा संबंध है। अक्सर यह प्रतिक्रिया हो जाती है। उसका कारण यह है कि जो हम जान लेते हैं, उससे हम पीड़ित हो जाते हैं, उससे हम विपरीत चले जाते हैं।

          चित्त का जो पेंडुलम है, वह बिलकुल विपरीत घूमता रहता है। बाएं को छू लेता है, फिर दाएं की तरफ जाना शुरू हो जाता है। दाएं को छू नहीं पाता है कि फिर बाएं की तरफ जाना शुरू हो जाता है। जब घड़ी के पेंडुलम को आप बाईं तरफ जाते देखें, तो आप समझ लेना कि वह दाईं तरफ जाने की तैयारी कर रहा है। बाईं तरफ जब वह जा रहा है तब वह दाईं तरफ जाने की शक्ति जुटा रहा है।

        जितनी दूर तक बाएं जाएगा, उतनी ही दूर तक दाएं जाएगा। और इसलिए जीवन में अक्सर ऐसा होता रहता है, बुरा अच्छा बन जाता है, अच्छा बुरा बन जाता है। निरंतर यह होता रहता है। प्रत्येक जीवन में यह डावांडोलपन होता रहता है।

      इसलिए आमतौर से ऐसा मत सोचना कि जो आदमी इस जन्म में महात्मा बन गया है, वह पिछले जन्म में भी महात्मा रहा हो। ऐसा जरूरी नहीं है। जरूरी इससे उलटा कहीं ज्यादा है। पिछले जन्म में जो उसने जाना है, उसकी पीड़ा ने उसे भर दिया है।

    *एक दृष्टांत :*

 एक पड़ोस में एक साधु है और सामने एक वेश्या है। वे दोनों मरे हैं एक ही दिन। वेश्या स्वर्ग की तरफ जा रही है और साधु नर्क की तरफ जा रहा है। और वे जो उसे लेने आए हैं यमदूत, वे बड़े हैरान हैं।

      यमदूत आपस में पूछते हैं कि यह क्या गड़बड़ हो गई है, कुछ भूल तो नहीं हो गई? क्योंकि इस साधु को हम नर्क क्यों ले जा रहे हैं? यह साधु साधु था। तो उनमें जो जानता है, वह कहता है कि वह साधु जरूर था, लेकिन वेश्या के प्रति निरंतर ईर्ष्या से भरा था।

        निरंतर यह सोचता था कि पता नहीं कौन—सा राग —रंग वहां चल रहा है! कौन—सा सुख वहां मिल रहा है! वेश्या के घर से आते हुए वीणा के स्वर उसके प्राणों को बहुत कंपा देते थे, और वेश्या के घर से बजते हुए थर की आवाज उसे इतना आंदोलित कर देती थी जितना वेश्या के सामने बैठे हुए लोग आंदोलित नहीं होते थे।

    उसका चित्त वहीं लगा रहता था। वह भगवान की पूजा भी करता था, तो भी उसके हाथ वेश्या की तरफ ही जुड़े रहते थे। और वह वेश्या निरंतर सोचती थी कि साधु न मालूम किस आंतरिक आनंद में जी रहा है, मैं कैसी गर्त में पड़ गई हूं। मैं न मालूम कैसे दुख में पड़ गई हूं।

     जब वह साधु को सुबह पूजा के फूल लिये हुए जाते देखती थी, तो सोचती थी कि कब ऐसा संभव होगा कि मैं भी प्रभु के मंदिर में पूजा के फूल ले जाने के योग्य हो जाऊंगी। लेकिन मैं तो इतनी अपवित्र हूं कि मंदिर में जाने का साहस भी नहीं जुटा सकती हूं। और जब साधु के घर में पूजा का धुआ उठता था और पूजा के दीप जलते थे और पूजा की घंटियां बजती थीं, तो वेश्या किसी ध्यान में खो जाती थी, जैसा साधु कभी नहीं खो पाता था। और ऐसा उलटा होता रहा।

      वेश्या ने निरंतर अर्जन कर लिया था साधु होने का और साधु ने अर्जन कर लिया था वेश्या होने का। उनकी यात्राएं, जो बिलकुल विपरीत थी, बिलकुल विपरीत हो गई थीं। जो बिलकुल उलटी मालूम होती थीं, वह बिलकुल बदल गई थीं।

   _अक्सर ऐसा होता है। इसके होने के नियम हैं।_

      तो उन देवी को जब पूर्वजन्म का स्मरण आया, तो उन्हें बहुत पीड़ा हुई। पीड़ा यह हुई कि उनका सारा अहंकार गल गया और टूट गया।

       जो उन्होंने जाना, वह कंपा देने वाला सिद्ध हुआ। अब उसे भुलाना चाहती हैं। मैंने उनको कहा था कि इसे याद करना, करने की तैयारी रखनी चाहिए। अगर तैयारी न हो तो याद नहीं करना चाहिए।

पहली तो बात यह है कि अगर जाति—स्मरण में उतरना हो, अतीत जन्म को जानना हो, तो पहली जो जरूरत है चित्त की, वह भविष्य की तरफ से चित्त को मोड़ना पड़ता है। हमारा चित्त भविष्यगामी है। हमारा चित्त जो है वह फ्यूचर सेंटर्ड है आमतौर से, अतीतगामी नहीं है।

       चित्त आमतौर से भविष्य की तरफ गति करता है। चित्त की जो धारा है, वह भविष्य की तरफ उन्‍मुख है। और जीवन के हित में यही है कि भविष्य की तरफ चित्त उन्मुख हो, अतीत की तरफ उन्‍मुख न हो। क्योंकि अतीत से अब क्या लेना—देना है, वह गया, वह जा चुका। अभी जो आने को है उसकी तरफ हम उत्सुक हैं।

          इसीलिए तो हम ज्योतिषियों के पास पूछते फिरते हैं कि कल क्या होने वाला है? भविष्य में क्या होने वाला है? भविष्य के प्रति हम उत्सुक हैं कि क्या होने वाला है। अब जिस व्यक्ति को अतीत स्मरण करना हो, उसे भविष्य की उत्सुकता बिलकुल छोड़ देनी पड़ती है।

      क्योंकि चित्त का जो फोकस है, उसकी जो धारा है, अगर भविष्य की तरफ बह रही है उसके टार्च की धारा, तो अतीत की तरफ नहीं बह सकती है।

  पहला तो काम यह करना पड़ता है कि भविष्य उन्‍मुखता बिलकुल तोड़ देनी पड़ती है कुछ महीनों के लिए, एक निश्चित समय के लिए। छह महीने के लिए भविष्य को नहीं सोचूंगा, भविष्य का खयाल आ जाएगा, तो उसको नमस्कार कर लूंगा। भविष्य का भाव आएगा, तो मैं उस तरफ नहीं बहुंगा। भविष्य है ही नहीं, ऐसा छह महीने मानकर चलूंगा। सिर्फ अतीत ही है और पीछे की तरफ बहुंगा। पहली बात।

     जैसे ही भविष्य टूटता है, चित्त की धारा पीछे की तरफ मुड़नी शुरू हो जाती है। फिर पीछे की तरफ पहले तो इसी जन्म में पीछे की तरफ लौटना पड़ेगा। एकदम पिछले जन्म में नहीँ लौटा जा सकता है। इसी जन्म में पीछे की तरफ लौटना पड़ेगा।

       जैसे एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को आपने क्या किया, इसका आपको कोई पता नहीं है। तो इसका प्रयोग है, इसे जाना जा सकता है।

   ध्यान करें और दस मिनट के बाद जब ध्यान में चित्त चला जाए, शरीर शिथिल हो जाए, श्वास शिथिल हो जाए, मन शांत हो जाए, तब एक ही बात चित्त में रह जाए कि एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या हुआ?

    बस यह एक ही बात चित्त में रह जाए, सारा चित्त इस पर घूमने लगे—स्व जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या हुआ? एक जनवरी उन्नीस सौ पचास को क्या हुआ? बस चित्त के चारों तरफ गूंजता हुआ यह एक ही स्वर रह जाए।

      तो आप दो —चार दिन में पाएंगे कि अचानक एक दिन जैसे पर्दा उठ गया और एक जनवरी आ गई और सुबह से सांझ तक एक—एक चीज दौड़ गई। और आपने इस तरह एक जनवरी देखी, जैसी आपने उस दिन भी न देखी होगी, क्योंकि इतना होश आपने उस दिन भी न रखा होगा। जिस दिन एक जनवरी गुजरी थी, इतना होश उस दिन भी न रहा होगा।

तो पहले इसी जन्म में पीछे लौट कर प्रयोग करना पड़ेगा। फिर पांच वर्ष तक प्रयोगों को ले जाना बहुत सरल है। पांच वर्ष की उम्र तक पीछे लौटना बहुत सरल है, बहुत कठिन नहीं है। लेकिन पांच वर्ष के बाद बड़ी बाधा पड़ती है।

      इसलिए आमतौर से हमारी स्मृति पांच वर्ष की उम्र के पहले की नहीं होती। पीछे से पीछे की स्मृति करीब पांच वर्ष के करीब की होती है। ही, कुछ लोगों को तीन वर्ष तक हो सकती है, लेकिन तीन वर्ष से पहले तो बहुत ही मुश्किल बात हो जाती है। वहां एकदम द्वार अटक जाता है, जैसे सब बंद —हो गया है वहा तक।

       लेकिन जो व्यक्ति इसमें समर्थ हो जाएगा, पांच वर्ष की उम्र तक की किसी भी दिन की स्मृति को पूरा जगाने लगेगा… और वह पूरी तरह जगने लगती है। और फिर उसको इस तरह जांच कर लेनी चाहिए। जैसे आज का दिन गुजर रहा है, तो आज के दिन की कुछ बातें नोट करके ताले में बंद कर दें। दो साल बाद आज के दिन को याद करें।

       वह सब खो जाएगा आज का दिन। और तब स्मरण करें, और स्मरण करके फिर ताला तोड़े, और फिर मेल करें कि वह बात मेल खा गई कि नहीं। और आप हैरान होंगे.. आप हैरान होंगे कि जितनी बातें आपने लिखी थीं, उनसे बहुत ज्यादा बातें और भी याद आई हैं जो आप उस दिन भी नोट नहीं कर पाए थे। वे तो सब बातें याद आ ही जाएंगी।

        *आलय विज्ञान :*

इसको बुद्ध ने नाम दिया है, आलय—विज्ञान। मनुष्य के मन का एक कोना है, जिसको उन्होंने आलय—विज्ञान कहा है। आलय—विज्ञान का मतलब होता है, स्टोर हाउस आफ काशसनेस। जैसे घर में एक कबाड़खाना होता है, जहां हम सब बेकार हो गई चीजों को डालते चले जाते हैं।

         ऐसा चित्त की स्मृतियों को संग्रह करने वाला एक स्टोर हाउस है, जहां सब चीजें संगृहीत होती चली जाती हैं जन्मों—जन्मों की। वे कभी वहां से हटती नहीं हैं, क्योंकि कब जरूरत पड़ जाए उनकी, इसलिए वे वहा संगृहीत होती हैं। शरीर बदल जाता —है, लेकिन वह स्टोर हाउस हमारे साथ चलता है।

        वह कब जरूरत पड़ जाएगी उसकी, कुछ कहा नहीं जा सकता है। और जिंदगी में जो —जो हमने किया है, जो—जो हमने जीया है, जो—जो भोगा है, जो —जो जाना है, जो —जो जीया है, वह सब वहां संग्रहीत है।

जिस व्यक्ति —को यह पाच वर्ष तक स्मरण आने लगे, वह पाच वर्ष के पीछे उतर सकता है। कठिनाई नहीं है बहुत। प्रयोग यही रहेगा पांच वर्ष के पीछे उतरने का। पाच वर्ष के पीछे फिर एक दरवाजा है, जो वहां तक ले —जाएगा जहां तक जन्म हुआ, पृथ्वी पर आना हुआ। फिर एक कठिनाई मालूम होती है, क्योंकि मां के पेट की स्मृतियां भी हैं, वे भी मिटती नहीं हैं।

       उसमें भी प्रवेश किया जा सकता है। तब उस क्षण तक पहुंचा जा सकता है, जिस क्षण कंसेप्शन होता है, जिस क्षण मां और पिता के अणु मिलते हैं और आत्मा प्रवेश करती है। और वहां तक पहुंच जाने के बाद ही फिर पिछले जन्मों में उतरा जा सकता है।

     सीधे नहीं उतरा जा सकता है। इतनी यात्रा पीछे करनी पडे, तब पिछले जन्म में भी सरका जा सकता है।

पिछले जन्म में सरकने पर पहला स्मरण जो आएगा, वह अंतिम घटना का आएगा। ध्यान रहे जैसे कि हम किसी फिल्म को उलटा चलाएं, तो समझ में नहीं आएगी एकदम से। अगर किसी फिल्म की रील को उलटा चलाएं तो समझ में नहीं आएगी, या कोई आदमी किसी उपन्यास को उलटा पढ़े तो समझ में बिलकुल नहीं आएगा, बहुत मुश्किल में पड़ जाएगा।

        इसलिए पहली दफा पीछे की तरफ लौटने में कुछ भी समझ में नहीं आएगा, क्योंकि यह बिलकुल उलटा है। घटना के घटने का जो कम था, उससे यह बिलकुल उलटा कम है।

       अगर आप पीछे लौटेंगे, तो जन्म पहले आएगा इस जन्म का, और मृत्यु बाद में आएगी पिछले जन्म की। मृत्यु पहले आएगी, बुढ़ापा पहले आएगा, फिर जवानी आएगी, फिर बचपन आएगा, फिर जन्म आएगा। तो उलटा कम होगा और उलटे कम में पहचानना बहुत मुश्किल होगा।

इसलिए पहली दफा स्मरण आ जाने पर बड़ी बेचैनी और तकलीफ शुरू होती है, क्योंकि पहचानना मुश्किल होता है कि यह क्या हो रहा है। जैसे कि कोई आदमी तय कर ले कि मैं उपन्यास को उलटा पढूंगा या फिल्म को उलटा देखूंगा, तो बहुत कठिनाई में पड़ जाएगा। दस—पच्चीस दफे देखकर शायद वह ठीक जमा पाए कि यह इस तरह घटना घटी होगी।

         पिछले जन्म की स्मृति का जो सबसे बडा कठिन श्रम है, वह है कि उलटे में देखना पड़ेगा उसको जो सीधे में घटा था। और सीधा—उलटा क्या है, हमारे आने —जाने का सवाल है।

        बीज को हम बोते हैं, आखिर में फूल आता है। अगर उलटा लौटना पड़े तो पहले फूल आ जाएगा, फिर कली आएगी, फिर पौधा आएगा, फिर पत्ते आएंगे, फिर सिकुड़ कर छोटा अंकुर रह जाएगा, फिर बीज आएगा। और इस उलटे कम का हमें कोई बोध नहीं होता।

       इसलिए पिछले जन्म की स्मृति को आ जाने पर भी व्यवस्थित करने में बहुत समय लग जाता है—साफ—साफ व्यवस्थित करने में कि कैसी घटना घटी होगी, उसका क्या तारतम्य रहा होगा। अब यह बहुत अजीब बात है न कि मृत्यु पहले आएगी, फिर बुढापा आएगा, फिर बीमारी आएगी, फिर जवानी आएगी, चीजें उलटी घटेंगी।

       यानी किसी से अगर हमने शादी की होगी और तलाक दिया होगा, तो तलाक पहले आएगा, फिर प्रेम होगा, फिर शादी होगी। तो इस उलटे कम में उसको समझ पाना एकदम मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि हमारे चित्त के समझने का कम एक तरफ है, एक दिशा में है, वन डायमेंशनल है। चित्त के समझने का जो आयाम है, वह एक दिशा में है।

        उलटा देखना बहुत ही कठिन मामला है। और कभी हमें उलटे का कोई अनुभव नहीं होता है, सीधे ही हम जीते हैं। लेकिन प्रयास किया जाए, तो उलटे देखकर भी समझा जा सकता है। लेकिन यह बहुत अदभुत अनुभव होगा।

 अगर हम उलटा देख सकें, तो हम बहुत हैरान होंगे। क्योंकि तलाक अगर पहले घट जाए, फिर प्रेम हो, फिर विवाह हो, तो हमको चीजें पहली दफा दिखाई पड़ेगी कि यह तो बहुत हैरानी की बात है। तब हमें दिखाई पड़ेगा कि तलाक घटना तो बिलकुल अनिवार्य था।

      जिस तरह का प्रेम हुआ था, उसमें तलाक होने ही वाला था। और जिस तरह का विवाह हुआ था, उसकी तलाक ही परिणति थी। लेकिन जब हमने विवाह किया था, तब हमने सोचा भी न था कि इसमें तलाक घट सकता है। लेकिन तलाक उसी विवाह का फल था।

      जब हम इस बात को पूरी तरह देख लेंगे, तो आज प्रेम करना बहुत और हो जाएगी बात, क्योंकि उसमें तलाक हमें पहले से दिखाई पड़ सकता है। उसमें मित्रता करने के पहले शत्रुता का आगमन दिखाई पड़ सकता है।

      पिछले जन्म की स्मृति इस जन्म को अस्त—व्यस्त कर देगी एकदम से, क्योंकि आप फिर उसी तरह से नहीं जी सकेंगे जैसा आप पिछले जन्म में जीए थे। उस बार ऐसा लगा था, और अभी भी ऐसा लग रहा है. अभी भी ऐसा लग रहा है कि धन इकट्ठा करते जा रहे हैं, धन इकट्ठा करते जा रहे हैं, धन इकट्ठा करते जा रहे हैं. तो बड़ी सफलता मिल जाएगी, बड़ा आनंद मिल जाएगा।

       उसमें उलटा दिखाई पड़ेगा। उसमें दिखाई पड़ेगा कि दुख मिला और फिर धन इकट्ठा कर रहे हैं… और धन इकट्ठा कर रहे हैं। दुख मिलना पहले दिखाई पड़ जाएगा और धन इकट्ठा करना पीछे दिखाई पड़ेगा।

       तब यह साफ दिखाई पड़ जाएगा कि वह धन इकट्ठा करना सुख में ले जाने का आधार नहीं था, वह ले गया दुख में। मित्र बनाना शत्रु बनाने में ले गया। जिसे हम प्रेम करना कहते थे वह घृणा में ले गया है। जिसे हम मेल कहते थे, वह विरह में ले गया है।

       तब चीजें अपने पूरे अर्थ में प्रकट होंगी और वह अर्थ हमारे इस जीवन के जीने को एकदम बदल देगा। एकदम बदल देगा, क्योंकि तब बड़ी अन्यथा बात हो जाएगी।

 *फ़कीर की समस्या :*

     कोई  फकीर के पास गया.  उसने उससे कहा कि बड़ी कृपा होगी, मैं आपका अनुयायी बनना चाहता हूं।

    उस फकीर ने कहा, अब अनुयायी न बनाऊंगा।

उस आदमी ने पूछा, क्यों न बनाएंगे?

 उसने कहा, पिछले जन्म में बनाए थे, लेकिन जिनको अनुयायी बनाया था, वे ही पीछे दुश्मन बन गए। अब मैं देख चुका हूं घटना को और अब मैं जानता हूं कि अनुयायी बनाना यानी दुश्मन बनाना। मित्र तय करना यानी शत्रुता के बीज बोना।

    तो उसने कहा, अब मैं शत्रु किसी को नहीं बनाना चाहता हूं, इसलिए मित्र भी नहीं बनाता हूं। और अब किसी को दुश्मन नहीं बनाना है, इसलिए मैत्री भी नहीं करता हूं। अब मैंने जान लिया है कि अकेला होना ही काफी है। दूसरे को पास लाना, दूसरे को दूर ले जाने का उपाय है।

         बुद्ध ने कहा है, प्रिय के मिलने से खुशी होती है, अप्रिय के बिछुड़ने से खुशी होती है। प्रिय के बिछुड़ने से दुख होता है, अप्रिय के मिलने से दुख होता है। ऐसा देखा था, ऐसा समझा था।

       लेकिन यह बहुत बाद में समझ में आया है कि जिसे हम प्रिय कहते हैं, वही अप्रिय बन जाता है; और जिसे हम अप्रिय कहते हैं, वही प्रिय भी बन सकता है।

      अगर पिछले स्मरण आ जाएं, तो ये स्थितियां बहुत बदल जाएंगी, बहुत भिन्न हो जाएंगी। यह स्मरण संभव है, आवश्यक नहीं। संभव है, अनिवार्य नहीं। और कभी—कभी तो ध्यान करते —करते आकस्मिक रूप से भी टूट पड़ता है, कोई प्रयोग बिना किए भी। और अगर ध्यान करते —करते आकस्मिक रूप से प्रकट भी हो जाये, तो भी उसमें बहुत रस मत लेना, देख लेना और साक्षी — भाव ही रखना।

        क्योंकि साधारणत: चित्त की इतनी सामर्थ्य नहीं होती कि इतने उपद्रवों को, इतने अनंत उपद्रवों को एक साथ झेल सके। उस झेलने में विक्षिप्त हो जाने की पूरी संभावना है।

    *वह 15 साल की लड़की और मैं :*

वाराणसी में एक लड़की मेरे पास लाई गई थी, 15 वर्ष की। उसे तीन जन्मों का स्मरण था, आकस्मिक रूप से ही। कोई प्रयोग नहीं किया है उसने।

       कई बार आकस्मिक रूप से, कुछ कारणों से यह भूल हो जाती है। यह भूल ही है प्रकृति की, यह कोई कृपा नहीं है उसके ऊपर।

       इसमें प्राकृतिक रूप से कुछ गलती हो गई है। जैसे किसी व्यक्ति को तीन आंखें आ जाए या चार हाथ आ जाएं, वह भूल है। और चार हाथ दो हाथ से कम ताकतवर होते हैं। और चार हाथ उतना काम नहीं कर पाते जितना दो हाथ कर पाते हैं। चार हाथ कमजोर कर जाते हैं शरीर को, शक्तिशाली नहीं कर जाते. 

       इस संबंध में बहुत खोज—बीन हुई। पिछले जन्म में, जहां मैं रहता था, वहां से कोई अस्सी मील दूर जिस घर में थी, उस घर में वह चालीस वर्ष की होकर ‘ मरी। उस घर के लोग अब मेरे ही गांव में रहते हैं। तो वह उन सबको पहचान सकी। अपने भाई को, अपनी लड़कियों को, अपनी लड़कियों के बच्चों को, अपने दामादों को, उन सबको वह हजारों लोगों की भीड़ में भी खड़ा करने पर पहचान सकी थी।

       वह दूर—दूर के रिश्तेदारों को पहचान सकी और ऐसी बहुत सी बातें वह उनसे कह सकी जो कि वे भी भूल गए थे। उसका बड़ा भाई अभी जिंदा है। उसके सिर पर थोड़ी सी चोट का निशान है।

      तो मैंने उस 15 साल की लड़की से पूछा कि उस चोट के संबंध में तुम्हें कुछ पता है? वह लड़की हंसी, उसने कहा कि भाई को भी पता न होगा। भाई ही बता दे कि यह चोट कब लगी और कैसे लगी। भाई खुद ही याद नहीं कर पाया कि चोट कब लगी।

       उसने कहा कि मुझे खयाल ही नहीं है। उस लड़की ने कहा कि जब मेरे भाई की शादी हुई, वह घोड़े पर बैठा था, और घोड़े से गिर पड़ा। लेकिन तब उसकी उम्र केवल दस साल थी। और यह घोड़े से गिरने से शादी के वक्त चोट लग गई थी।

       इसको गांव के बडे —बूढ़ी ने भी कन्‍फर्म किया कि यह बात ठीक है कि यह लड़का घोड़े से गिरा था। लेकिन वह व्यक्ति खुद ही भूल चुका था। फिर तो उसने घर में गड़ा हुआ खजाना भी बताया जो वह गड़ा गई थी। वह भी उसने खोज कर बताया। ठीक जगह पर उसने वह जगह भी खोदकर बता दी।

        पिछले जन्म में वह चालीस वर्ष की होकर मरी। और उससे पहले वह आसाम के किसी गांव में पैदा हुई थी, जहां वह सात वर्ष की होकर मरी। उस गांव का वह पता नहीं बता पाई, नाम भी नहीं बता पाई। लेकिन सात वर्ष की लड़की जितनी आसामी भाषा बोलती है, उतनी वह बोल सकती थी।

        सात वर्ष की लड़कियां जिस तरह नाच सकती हैं, गाना गा सकती हैं आसामी का, उतना भी वह कर सकती थी। बहुत ही खोजबीन की, लेकिन उस परिवार का कोई पता नहीं चल सका।

        अब उसको सैंतालीस वर्ष का तो पिछला अनुभव है और बारह वर्ष का यह। तो उसकी आंखों में आप बराबर पैंसठ —सत्तर साल की स्त्री की झलक देख सकते हैं, और है वह बारह साल की। उसके चेहरे पर पैंसठ—सत्तर साल की स्त्री का भाव है।

        न तो वह खेल खेल सकती है किसी बच्चे के साथ, क्योंकि वह बूढी है। स्मृति तो सत्तर साल पुरानी है, तो उसको सत्तर साल के होने का खयाल है। उसकी उस तो बारह साल है। वह स्कूल में पढ़ नहीं सकती, क्योंकि वह अपने शिक्षक को बेटा कह सकती है। उसकी जो स्मृति है वह सत्तर साल की है, उसका व्यक्तित्व सत्तर साल का है। और उसका शरीर बारह साल का है। वह खेल नहीं सकती, वह कोई रस नहीं ले सकती।

         वह गंभीर बातों में जैसा कि बूढी स्त्रियां बातें करती हैं, उनमें ही रस ले सकती है और किसी बात में रस नहीं ले सकती। और उसमें इतना तनाव है और इतनी परेशानी है, क्योंकि शरीर उसका बारह साल का है और स्मृति सत्तर साल की है। इनमें कोई तालमेल नहीं बैठता है। एकदम उदास और पीड़ित और परेशान है।

    मैंने उसके मां और पिता को कहा कि उसे मेरे पास ले आएं, मैं उसकी स्मृति को भुला दूं। क्योंकि जो स्मृति को याद करने का रास्ता है, उससे उलटा जाने से स्मृतियां भूल भी जाती हैं। उसकी स्मृतियां भुला दें……। लेकिन वे तो रस में थे, उनको तो आनंद आ रहा था, भीड़— भाड़ होती थी, लाखों लोग आते थे। लड़की की पूजा शुरू हो गई थी।

       उन्होंने कहा कि भुलवाएंगे क्यों! मैंने उनको कहा, लड़की पागल हो जाएगी। लेकिन वे नहीं माने और आज लड़की की हालत करीब—करीब पागल जैसी हो गई है। क्योंकि वह उतनी स्मृतियों को झेल नहीं सकती है। और उसकी कठिनाई यह हो गई है कि अब उसका विवाह कैसे हो!

       वह ऐसा ही सोचती है कि वह सत्तर साल की बूढ़ी औरत है और अब विवाह करने का सोच रही है। तो उसके मन का कहीं तालमेल ही नहीं है किसी बात का। शरीर उसका जवान है और मन बूढ़ा है, तो बहुत कठिनाई हो गई। उसे जीने में बहुत कठिनाई हो रही है।

पर यह आकस्मिक है। आप प्रयोग से भी यह धारा तोड़ सकते हैं। लेकिन उस धारा को तोड्ने की दिशा में जाना कोई बहुत आवश्यक नहीं है। किन्हीं को उसकी उत्सुकता हो, तो प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन उन प्रयोगों से पहले ध्यान में काफी गहरे प्रयोग जरूरी हैं, ताकि मन इतना शांत और शक्तिशाली हो जाए कि कोई भी चीज जब टूट पड़े, तो आप उसको साक्षी— भाव से देख सकें।

       अगर कोई व्यक्ति साक्षी— भाव में विकसित हो जाता है, तब पुराने जन्म देखे गये सपनों से ज्यादा नहीं मालूम पड़ते हैं। तब उनसे कोई पीड़ा नहीं होती। तब ऐसा ही लगता है, जैसे ये सपने हमने देखे हैं। सपनों से ज्यादा उनका अर्थ नहीं रह जाता। और जब हमें पुराने दो —चार जन्म याद आ जाते हैं और सपनों की तरह मालूम पड़ते हैं, तो यह जन्म भी तत्काल सपने की तरह मालूम पड़ने लगता है।

        जिन लोगों ने इस जगत को माया कहा है, उनके माया कहने का और कोई बुनियादी कारण नहीं है, फिर और सब तो कुछ भी बातें होती हैं। उसका बुनियादी कारण जाति—स्मरण ही है। जिन्होंने भी पिछले स्मरण किए हैं, सब मामला माया हो गया है। एकदम इलूजन, सपना हो गया है। क्योंकि कहां हैं वे मित्र, जो पिछले जन्म में थे? कहां हैं वे मकान? कहां है वह पत्नी? कहां हैं वे बेटे? कहां गई वह दुनिया जो पिछले जन्म में थी? कहां गया वह सब, जिसको हमने इतना सत्य मान रखा था कि वह है? कहां गईं वे चिंताएं जिनके लिए हम रात भर नहीं सोए थे? कहां गए वे दुख, वे पीड़ाएं जिनको हमने पहाड़ समझ रखा था और ढोया था? कहां गए वे सुख जिनके लिए हमने आकांक्षा की थी? कहां गया वह सब जिसके लिए हम दुखी, पीड़ित, परेशान हुए थे?

        अगर पिछला जन्म याद आ जाए और सत्तर वर्ष आप जीए हों, तो उन सत्तर वर्षों में जो देखा गया था वह एक सपना मालूम पड़ेगा या सत्य? एक सपना ही मालूम पड़ेगा, जो आया और गया।

      *उस राजा की मुसीबत :*

एक राजा अपने बेटे के पास बैठा है। उसका बेटा मरने के करीब है। और एक ही बेटा है। आठ रातें हो गई हैं, और वह न तो बचाया जा सकता है, न मृत्यु आ रही है, बहुत मुश्किल हो गयी है। अब यह खुद ही सोचने लगा है कि इतनी पीड़ा है कि मर ही जाए। मन कहता है कि बच जाए, लेकिन एक मन कहता है कि इतना दुख, इतनी पीड़ा है कि मर ही जाए तो भी ठीक है। आठ रात से सम्राट सोया नहीं है।

       कोई चार बजे होंगे रात के और सम्राट को झपकी लग गई है। और उस झपकी में वह सपना देखने लगता’ है। और सपने अक्सर हम वही देखते हैं, जो जिंदगी में कमी रह जाती है।

       एक ही बेटा था और वह भी मरने के करीब पहुंच रहा है। तो उसने सपना देखा है कि उसके बारह बेटे हैं। और वे बड़े सुंदर हैं, उनकी स्वर्ण जैसी काया है, बड़े —बड़े महल हैं, बड़ा साम्राज्य है, सारी पृथ्वी का वह मालिक है और बड़े आनंद में है। और वह यह सपना देख ही रहा था …. क्योंकि

        सपना देखने में बहुत देर नहीं लगती है। सपने का टाइमिंग जो है वह हमारी जिंदगी के समय की धारा से बिलकुल भिन्न है। तो हम क्षण में वर्षों का सपना देख सकते हैं। एक क्षण झपकी लगे, आप इतना बड़ा सपना देख सकते हैं कि वर्षों तक फैल जाए और जागकर आपको मुश्किल मालूम पड़े कि इन कुछ क्षणों में वर्षों का सपना कैसे देख लिया! असल में समय की गति सपने में बहुत तीव्र है।

        कहीं एक क्षण में वर्षों पार किए जा सकते हैं। तो उस एक क्षण में उसने सपना देख लिया है, बारह लड़के हैं, उनकी सुंदर स्त्रियां हैं, बड़े सुंदर भवन हैं, बड़ा राज्य है। और तभी उसका वह बाहर का लड़का मर गया। पत्नी चीख मारकर चिल्लायी है तो सम्राट की नींद खुल गयी।

        नींद टूटी तो वह एकदम से चौंका हुआ उठा। पत्नी ने समझा कि शायद वह घबरा गया है। उसने पूछा, इतने घबरा क्यों गये हो, आंखों में आंसू भी नहीं हैं! कुछ बोलते भी नहीं हो! सम्राट ने कहा, नहीं, मैं घबरा नहीं गया हूं, बड़ी मुश्किल में पड गया हूं।

         मैं यह सोचता हूं कि मैं किसके लिए रोऊं। अभी बारह लड़के थे, वे खो गये, उनके लिए रोऊं। या एक लड़का यह खो गया है, इसके लिए रोऊं! मैं इस चिंता में पड गया हूं कि कौन मरा है। और मजा यह है कि जब मैं उन बारह लड़कों के बीच में था, तो इस लड़के का मुझे कोई पता नहीं था, यह था ही नहीं।

        यह खो गया था, तू खो गई थी, यह महल खो गया था। अब यह महल है, तू है, यह लड़का है; लेकिन वे महल खो गए, वे लड़के खो गए। कौन सत्य है? यह सत्य है या वह? और मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूं।

        अगर एक बार पिछले जन्मों का स्मरण आ जाए, तो आप बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे कि जो अभी देख रहा हूं, वह सत्य है? क्योंकि ऐसा तो बहुत बार देखा है, लेकिन सब मिट गया है, सब खो गया है। तो एक सवाल उठ जाएगा कि जो हम देख रहे हैं वह, वह भी उतना ही सच है जितना वह था।

         वह भी एक सपने की तरह दौड़ जाएगा और मिट जाएगा। और जैसे सब सपने अंत तक पहुंच गए, वैसे ही यह सपना भी अंत तक पहुंच जायेगा।

जब हम फिल्म बैठकर देखते हैं, तब फिल्म भी सच मालूम होने लगती है। जब पर्दा उठता है, अंधेरा मिट जाता है, और जब हम हाल के बाहर जाने लगते हैं, तब भी दो —चार क्षण लग जाते हैं वापस लौटने में। आंख मीचते —मीचते हाल के बाहर आते हैं, तब जरा होश आता है कि वह सब एक सपना है।

         एक नाटक था, जो देखा। लेकिन वहां रो भी लिए, आंसू भी पोंछ लिए। सच तो यह है कि चौबीस घंटे जो लोग नहीं रो पाते, वे अपना रोना वहां जाकर निकाल लेते हैं फिल्म देखने के बहाने। और बड़ा अच्छा हुआ। रोते तो हैं वे, तो कोई दूसरा बहाना खोजना पड़ता, यह बहाना बहुत मुक्त कर सकता है। वहां रो लेते हैं, हंस लेते हैं। न दिन में हंसते हैं न रोते हैं। वहा एक उपाय मिल जाता है।

        तो बाहर आकर एकदम चौंकते हैं, और जो पहला खयाल आता है वह यह आता है कि बडे दुख में पड़ गए। लेकिन कोई रोज—रोज ऐसा सिनेमा देखता रहे, तो फिर धीरे— धीरे यह धोखा साफ होने लगता है। लेकिन पिछले सिनेमा की स्मृति भूल जाती है बार—बार। जब फिर दुबारा देखने जाते हैं, तो फिर वह सच मालूम होने लगता है।

यदि पिछले जन्मों की. स्मृतियां आ जाएं, तो जो जन्म अभी चल रहा है, वह भी सब सपने जैसा मालूम पड़ेगा। ये हवाएं कितनी दफे नहीं चलीं! लेकिन अब वे हवाएं कहां हैं जो चलीं? और ये आकाश में बादल कितने दफे नहीं घिरे! लेकिन अब वे बादल कहां हैं जो घिरे? वे सब खो गए, ये सब भी खो जाएंगे। ये सब भी खोने के कम में ही लगे हुए हैं।

        यह अगर बोध हो जाए, तो माया का अनुभव होगा। लेकिन इसके साथ ही दूसरा भी अनुभव होगा किं चीजें बड़ी असत्य हैं, घटनाएं बड़ी असत्य हैं, आती हैं और खो जाती हैं, लेकिन एक चीज बिलकुल नहीं खोती—मैं। मैं बिलकुल नहीं खोता। एक सपना आता है, दूसरा सपना आता है, तीसरा सपना आता है। लेकिन वह जिसको सपने आते हैं, वह बचा ही रहता है।

         वह यात्री जो एक शरीर से निकलता है, दूसरे शरीरों में चला जाता है। एक देह मिट जाती है, दूसरी मिट जाती है, तीसरी खो जाती है, लेकिन वह यात्री चलता चला जाता है।

         तो एक ही साथ दो अनुभव होते हैं—एक अनुभव कि जगत माया है, और द्रष्टा सत्य है; दृश्य असत्य है और द्रष्टा सत्य है, यह एक ही साथ दोनों अनुभव होते हैं। दृश्य तो रोज बदल जाते हैं, हर बार बदल गए हैं, लेकिन द्रष्टा, वह देखने वाला, वही है, वही है, वही है।

      ध्यान रहे, जब तक दृश्य सत्य मालूम होते हैं, तब तक द्रष्टा पर ध्यान नहीं जाता है। जब दृश्य एकदम असत्य हो जाते हैं, तब द्रष्टा पर ध्यान जाता है।

    जाति स्मरण उपयोगी तो है, लेकिन उपयोगी उनके लिए है जो थोड़े ध्यान में गहरे जाएं और प्रयोग करें। ध्यान में गहरे उतरें, तो फिर जीवन को सपने की तरह देखने की क्षमता आ जाए। जैसे महात्मा होना उतना ही सपना है, जितना चोर होना सपना है।

          सपने अच्छे भी देखे जा सकते हैं और बुरे भी देखे जा सकते हैं। और मजे की बात यह है कि चोर होने का सपना जरा जल्दी टूट भी सकता है, लेकिन महात्मा होने का सपना जरा देर से टूटता है, क्योंकि वह बड़ा सुखद मालूम पड़ता है।

       इसलिए महात्मा होने का सपना, चोर होने के सपने से ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि वहा बड़ा सुख मालूम पड़ता है। ऐसा लगता है सपना चलता ही रहे। सुखद सपने होते हैं और दुखद सपने भी होते हैं। सुखद सपने में यह खराबी होती है कि उसको चलाये रखने का मन होता है।

       दुखद सपने में जहां छाती पर कोई चढ़ गया है और प्राण संकट में पड़े हैं और पहाड़ पर से गिर गये हैं—अपने आप ही टूटने का मन होने लगता है कि टूट जाये, घबड़ाहट इतनी ज्यादा है।

इसलिए बहुत बार यह हो जाता है कि पापी पहुंच जाते हैं परमात्मा के पास, पुण्यात्मा नहीं पहुंच पाते। क्योंकि पापी का सपना बड़ा दुखद है। महात्मा का सपना बहुत सुखद है। गेरुवे वस्त्रों में लिपटे हुए सपनों को बचाने का बड़ा मन होता है। वे बड़े प्रीतिकर हैं।

    जाति—स्मरण के लिए तो प्रयोग में उतरना पड़ेगा। लेकिन अभी आज से ही हम भीतर उतरना शुरू करें, तभी पीछे भी उतर सकते हैं। भीतर ही कोई न उतरना चाहे तो मुश्किल है।

      जैसे कि कोई बड़ा मकान है और उसके नीचे तलघरे हैं। आदमी मकान के बाहर खड़ा है और वह कहता है कि मुझे तो मेरे तलघरों तक जाना है। तो हम उसे कहेंगे कि पहले अपने मकान के भीतर तो घुसो। क्योंकि तलघरों के भीतर जाने का रास्ता मकान के भीतर से होकर जाता है, मकान के बाहर से नहीं।

      वह आदमी कहता है, मैं अपने मकान के बाहर खड़ा हूं और मुझे तलघरों तक जाना है। वह आदमी तलघरों तक नहीं जा सकता। तलघरों तक जाया जा सकता है, लेकिन पहले उसे मकान के भीतर घुसना पड़ेगा।

जिंदगी जो बीत गई है वह हमारा तलघरा हो गई है। जो जीवन हो चुके हैं वह हमारे तलघरे हैं। उन खंडों में हम कभी जीए थे, हमने उन खंडों को छोड़ दिया है। हम दूसरे खंडों में जी रहे हैं। लेकिन हम खंडों में नहीं जी रहे हैं, अभी हम मकान के बाहर खड़े हैं, हम अपने बाहर खड़े हैं।

       हम पीछे नहीं उतर सकते जब तक हम भीतर न उतर जाएं। पीछे उतरने की पहली शर्त है कि पहले भीतर उतर जाएं। जो भीतर उतर जाता है तो उसे पीछे जाने में न कोई कठिनाई है, न कोई खतरा है, न कोई उपद्रव है।

*पूर्वजन्म में प्रवेश के गुप्त सूत्रों का रहस्‍य :*

        पहले स्‍मरण करना पड़ेगा जन्‍म तक, जन्‍म के दिन तक। लेकिन वह असली जन्‍म-दिन नहीं है। असली जन्‍म दिन तो उस दिन है। जिस दिन गर्भाधान शुरू हुआ था। जिस को हम जन्‍म दिन कहते है। वह जन्‍म के नौ महीने के बाद का दिन है। जिस दिन गर्भ में आत्‍मा प्रवेश करती है। उस दिन तक स्‍मृति को गर्भ तक ले जाना कठिन नही है। और न ही इसमें बहुत ही खतरा है। क्‍योंकि वह इसी जीवन की स्‍मृति है।

        उसे ले जाने के लिए जैसा मैंने कहा, भविष्‍य से मन को मोड़ लें। और थोड़ा सा ध्‍यान कर पाते है, उन्‍हें कोई कठिनाई नहीं है भविष्‍य को भूलने में। भविष्‍य में याद करने को है भी क्या है। भविष्‍य है ही नहीं। उन्मुखता बदलनी है। भविष्‍य की तरफ न देखें। पीछे की तरफ देखें। और अपने मन में धीरे-धीरे क्रमश: संकल्‍प करते जाये। एक साल लोटे, दो साल लोटे, दस साल लोटे, बीस साल लोटे, पीछे लोटते ही जाएं। और वह बड़ा अजीब अनुभव होगा। 

साधारणत: अगर होश में हम पीछे लौटें बिना ध्‍यान किए, तो जितने हम पीछे लौटेंगे उतनी स्‍मृति धुँधली होगी। कोई कहेगा की मैं पाँच साल से आगे नहीं जा सकता। पाँच साल तक मुझे याद आता है। कि ऐसा हुआ था। वह भी एक आध घटना याद आयेगी। जैसे-जैसे हम करीब आयेंगे अपनी उम्र के वैसे-वैसे स्‍मृति साफ होती चली जाती है।

     आज की और साफ होगी। परसों की और कम होगी,वर्ष भर की और कम होगी। पच्‍चीस साल की और कम होगी, पचास साल की और कम होगी।

             लेकिन जब ध्‍यान में आप प्रयोग करेंगे,तो आप बहुत हैरान हो जायेंगे। स्‍थिति बिलकुल ही उलटी हो जायेगी। जितनी बचपन की स्‍मृति होगी उतनी साफ होगी। क्‍योंकि बच्‍चे के पास जितना साफ स्‍लेट होता है, उतनी फिर कभी नहीं होती। उस पर जितनी साफ लिखावट उभरती है। उतनी कभी नहीं उभरती है।

        जब आप ध्‍यान में स्‍मृति पर जाएंगे तो आप बहुत हैरान होते जाएंगे। स्‍मृति उलटी हो जायेगी। जितनी बचपन में जायेंगे उतना साफ मालूम होगा। जितने बड़े होने लगेंगे स्‍मृति में, उतना धुंधला होने लगेगा। आज का दिन सबसे धुंधला होगा। ध्‍यान में। आज से पचास साल पहले का दिन, जन्‍मदिन पहला दिन सबसे स्‍पष्‍ट होगा क्‍योंकि ध्‍यान में हम स्‍मरण नहीं कर रहे।

*इस फर्क को समझ लें :*

        जब हम होश में स्‍मरण करते है तो स्‍मरण कर रहे है। होश के स्‍मरण में क्‍या फर्क है। अगर मैं याद कर रहा हूं अपने बचपन को, तो मैं हुं तो पचास साल का, पचास साल का हूं, आज हूं अभी हूं। और खड़ा होकर स्‍मरण कर रहा हूं स्‍मृति को। पाँच साल की, दो साल की, एक साल की। यह पचास साल का मेरा मन बीच में खड़ा है। इसलिए वह धुंधला हो जायेगा। क्‍योंकि पचास साल की परतें बीच में है और उनके पास मैं झांक रहा हूं।

        ध्‍यान की प्रक्रिया में पचास साल के नहीं हो, पाँच ही साल के हो गए। जब तुम ध्‍यान में स्‍मरण कर रहे हो, तो तुम पाँच साल के ही हो गए। पचास साल के होकर पाँच साल की स्‍मृति को याद नहीं कर रहे हो।

     पाँच साल की स्‍मृति में वापस लौट गये हो। इसलिए होश में—उसको हम रिमेंबरिंग कहें, स्‍मरण कहे; और ध्‍यान में उसे री-लिविंग कहें। वह पुनजींवन है, पूनर्स्‍मरण नहीं।

      इन दोनों में फर्क है। पूनर्स्मरण में बीच में स्‍मृतियों की बड़ी परत होती है। जो धुंधला कर जाती है। पुनर्जीवन : पाँच साल के हो गये ध्‍यान की अवस्‍था में।

मेरी एक ध्यानविद्यार्थिनी  कहती है कि ध्‍यान में उसे अचानक अजीब-अजीब ख्‍याल आ रहे है। कि वह छोटी हो गई है। गुड्डे-गुड्डियों से खेल रही है। और वह ख्‍याल इतना मजबूत हो जाता है कि एक दम वह डर जाती है। कि कहीं कोई आकर देख न ले। नहीं तो कहेगा की इस उम्र में गुड्डे-गुड्डी से खेल रही है। वह आँख खोल कर देख लेती है, कि कहीं कोई आ तो नहीं गया।

      उसकी उम्र मिट गई है। उसे यही ख्‍याल है कि यह स्‍मृति है, यह री-लिविंग है। यानि वह पाँच साल की हो गई है। अब वह एक युवक है। जो ध्‍यान करेगा तो अंगूठा मुंह में चला जाएगा। वह छह महीने का हो जा रहा है। जो ध्‍यान करेगा तो अंगूठा मुंह में चला जाएगा। वह छह महीने का हो जा रहा है। वह जैसे ही ध्‍यान में गया कि उसका अंगूठा मुहँ में गया। वह जब छह महीने का रहा होगा, तब की स्‍थिति में पहुंच गया।

      तो स्‍मरण और पुनर्जीवन, फिर से जीना, इनके फर्क को समझ लेना जरूरी है। तो एक जन्‍म का पुनर्जीवन तो बहुत कठिन नहीं है। थोड़ी कठिनाई तो होती है। क्‍योंकि हम सबने अपनी उम्र की आइडेंटिटी बना रखी है। जो आदमी पचास साल का हो गया है, वह पाँच साल  पीछे हटने को राजी नहीं होगा।

       वह पचास साल का सख्‍ती से रहना चाहता है। इसलिए जिन लोगों को पुनर्जीवन में लौटना है, थोड़ी याद करनी है, उन्‍हें थोड़े अपने को बिलकुल फ़िक्स्ड आइडेंटिटी है। उन्‍हें थोड़ा ढीला करना चाहिए

अब जैसे उदाहरण के लिए एक आदमी अपने बचपन को याद करना चाहता है। अच्‍छा होगा की वह बच्‍चों के साथ खेले। दिन में घंटा भर निकाल ले और बच्‍चों के साथ खेले। उसके पचास साल होने का जो फिकसेशन है, वह जो गंभीर होने की आदत है। वह थोड़ी छूट जाए। अच्‍छा होगा कि वह दौड़ें, तेरे, नाचे, अच्‍छा होगा की घंटे भर के लिए बचपन में जीए होश पूर्वक तो ध्‍यान में भी उसका लौटना आसान हो जाएगा।

      और ध्‍यान रहे :  चेतना की कोई उम्र नहीं होती। चेतना पर सिर्फ फिकसेशन होता है। चेतना की कोई उम्र नहीं होती। कि पाँच साल की चेतना कि दस साल की चेतना। या पचास साल की चेतना। सिर्फ ख्‍याल है। आँख बंद कर के बताएं कि आपकी चेतना की कितनी उम्र है।

       तो आँख बंद करके आप कुछ भी नहीं बता पायेंगे। आप कहेंगे कि मुझे डायरी देखनी होगी। कैलंडर का पता लगाना होगा। जन्‍म-पत्री देखनी होगी। असल में दुनिया में जब तक जन्‍म-पत्री नहीं थी। कैलंडर नहीं था, सालों की गणना नहीं थी। आंकड़े कम थे। दुनियां में किसी को अपनी उम्र का पता ही नहीं होता था। आज भी आदिवासियों में आप जाकर पूँछें कि कितनी उम्र है। तो वह बड़ी मुश्‍किल में पड़ जायेंगे।

      क्‍योंकि किसी की संख्‍या पंद्रह पर खत्‍म हो जाती है। किसी की दस पर खत्‍म हो जाती है। किसी की पाँच पर खत्‍म हो जाती है।

एक आदमी से किसी ने पूछा की कितनी उम्र है? वह घर का नौकर था। उसने कहा होगा यही कोई पच्‍चीस साल। उसकी उम्र होगी कम से कम साठ साल की। तो घर के लोग हैरान रह गये। उन्होंने पूछा तुम्‍हारे लड़के की उम्र कितनी होगी। तो उसने कहा कि होगी कोई पच्‍चीस साल। क्‍योंकि पच्‍चीस जो था वह आखरी आंकड़ा था।

     उसके आगे तो कुछ था ही नहीं। उन्‍होंने कहा तुम्‍हारी भी उम्र पच्‍चीस साल और तुम्‍हारे लड़के की उम्र भी पच्‍चीस साल ऐसा कैसे हो सकता है? हमें कठिनाई हो सकती है क्‍योंकि हमारे पास पच्‍चीस के बाद भी आंकड़ा है। उसके लिए पच्‍चीस के बाद कोई संख्‍या नहीं है। पच्‍चीस के बाद असंख्‍य शुरू हो जाता है। उसकी कोई संख्‍या नहीं होती।

उम्र तो हमारे बाहर के कैलंडर, तारीख दिनों को हम हिसाब लगा कर पता लगा लेते है। अगर भीतर हम झांक कर हम देखें तो वहां कोई उम्र नहीं होती। अगर कोई भीतर से ही पता लगाना चाहे की मेरी उम्र कितनी है तो नहीं पता लगा पायेगा।

       क्‍योंकि उम्र बिलकुल बाहरी माप जोख है। लेकिन बाहरी माप जोख भीतर के चित्त पर फिक्सेशन बन जाती है। वहां जाकर कील की तरह ठूक जाता है।

 हम कीलें ठोकते चले जाते है। कि अब में पचास साल का हो गया हूं, अब इक्‍यावन साल का हो गया हूं। ये सब हम चेतना पर ठोकते चले जाते है। अगर ये बहुत सख्‍त है। तो कठिनाई होगी पीछे लौटने में। इसलिए बहुत गंभीर आदमी बचपन की स्‍मृति में नहीं लोट सकता। जिसको हम सीरियस कहते है। इस तरह के लोग रूग्ण‍ होते है। असल में सीरियसनेस एक बीमारी है। मानसिक बीमारी। जो बहुत गंभीर है, वे सदा बीमार होते है। उनका पीछे लौट आना बहुत मुश्‍किल है।

       थोड़ा सा जिनका चित्त हलका है। निर्भार है, जो बच्‍चों के साथ खेल सकता है। जो बच्‍चों के साथ हंस सकता है। उस को लौटाना बहुत आसान है। 

        तो बाहर की जिंदगी में फिकसेशन को तोड़ने की फ्रिक करे।  चौबीस घंटे अपनी उम्र को याद मत रखें। और जब भी अपने बेटे से कहें तो यह मत कहें कि मैं जानता हूं। क्‍योंकि मेरी उम्र इतनी है। उम्र से जानने का कोई संबंध नहीं है।

     अपने छोटे बच्‍चे के साथ ऐसा व्‍यवहार मत करें कि आपके और उसके बीच पचास साल का फासला है। दोस्‍ती का हाथ आगे बढ़ाएं।

*बच्चे के साथ बच्चा होकर रहना :*

        एक स्‍त्री ने एक छोटी सी किताब लिखी है—एक छोटे बच्‍चे के साथ बच्‍चा होकर रहने की। उस स्‍त्री की उम्र तो सत्‍तर साल है। सत्‍तर साल की स्‍त्री ने एक छोटा सा प्रयोग किया। एक पाँच साल के बच्‍चे के साथ दोस्‍ती करने का। मुश्‍किल है बहुत, आसान मामला नहीं है। पाँच साल के बच्‍चे का बाप होना आसान है, मां होना आसान है, भाई होना आसान है, गुरु होना आसान है, दोस्‍त होना इतना आसान नहीं है।

       कोई मां-बाप दोस्‍त नहीं हो पाता। जिस दिन दुनिया में मां-बाप बच्‍चों के दोस्‍त हो सकेंगे उस दिन हम दुनिया को आमूल बदल देंगे। यह दुनिया बिलकुल दूसरी हो जायेगी। यह दुनिया इतनी कुरूप, इतनी बदशक्‍ल नहीं रह जायेगी। लेकिन दोस्‍ती का हाथ ही नहीं बढ़ पाता। 

         उस स्‍त्री ने सच में एक अद्भत प्रयोग किया। उसने वर्षों तक वह प्रयोग किया। एक तीन साल के बच्‍चे से दोस्‍ती करनी शुरू की और पाँच साल के बच्‍चे तक, दो साल की उम्र तक निरंतर दो साल उससे सब तरह की दोस्‍ती निभाई। उसकी दोस्‍ती का ख्‍याल थोड़ा समझ लेना उपयोगी है। वैसी स्‍त्री को पीछे लौट जाना बहुत आसान हो जायेगा।

       वह सत्‍तर साल की बूढ़ी स्‍त्री उस बच्‍चे के साथ जो उसका दोस्‍त है, समुन्दर के तट पर गई है। तो बच्‍चा दौड़ रहा है, कंकड़-पत्‍थर बीन रहा है। तो वह भी दौड़ रही है। कंकड़-पत्‍थर बीन रही है। क्‍योंकि बच्‍चे और उसके बीच में जो एज बैरियर है। जो आयु का बड़ा भारी व्‍यवधान है वह टूटेगा कैसे। फिर वह कंकड़-पत्‍थर ऐसे नहीं बीन रही है कि सिर्फ दोस्‍ती बढ़ाने के लिए है।

      वह सच में उन कंकड़-पत्‍थरों को उस आनंद से देखने की कोशिश कर रही है। जिसे बच्‍चा देख रहा है। वह बच्‍चे की भी आंखे है, अपनी भी आंखे देखती है। कंकड़-पत्‍थर को भी ऐसे देख रही है जैसे वो बेहद कीमती हीरे है। और सच उसे वो ऐसे ही लगने लगे। उनके अद्भत रंग आकर उसे मोहित कर रहे थे। उनको हाथ लगा कर देखती। उन्‍हें चूमती उन्‍हें आंखों से लगाती।

       बच्‍चा जिस पुलक से भरा होता, वह भी उसी पुलक से उन पत्‍थरों को देखती। कभी समुद्र के झाग पकड़ती, कभी उस के साथ तितलियों को पकड़ने के लिए उनके पीछे दौड़ती। अगर रात दो बजे बच्‍चा उठ आया और उसने कहा कि चलो बाहर, कुछ खेलेंगे, बाहर झींगुर बोल रहे हैं। उनकी आवज सुनेंगे।

      तो उसने कभी नहीं कहा कि मैं नहीं जाती। कि अभी रात है अब तुम सो जाओ। वह बच्‍चे के साथ ही हो  लेती। अगर बाहर जरा भी शोर होने से झींगुरों का बोलना बंद न हो जाए। बच्‍चा अगर दबे पाव चलता तो वह भी बच्‍चे के साथ दबे पाँव चलती।

दो साल की यह दोस्‍ती अनूठे परिणाम लाई। और उस स्‍त्री ने लिखा है की मैं भूल ही गई की मैं सत्‍तर साल की हूं। और मैंने जो पाँच साल का होकर जो कभी नहीं जाना वह उस सत्‍तर साल की उम्र में पाँच साल का होकर जाना। सारी दुनिया एक वंडर लेंड़ बन गई। सारा जगत एक परियों का जगत हो गया। मैं सच में दौड़ने लगी और पत्‍थर बीनने लगी और तितलियां पकड़ने लगी। उस बच्‍चे और मेरे बीच में सारी आयु के फासले गिर गये।

        वह बच्‍चा मुझ से ऐसे ही बातें करने लगा जैसे में भी पांच साल की ही हूं। और मैं भी उस बच्‍चे के साथ ऐसे ही बातें करने लगी जैसे में भी अभी पाँच साल की हो गई हूं।

      उसने पूरी किताब लिखी है अपने दो साल के अनुभवों की, सेंस आफ वंडर, और उसमें उसने लिखा है कि मैंने फिर से पा लिया आश्‍चर्य का भाव। अब मैं कह सकती हूं, कि कहीं भी बड़े से बड़े संत ने अगर कुछ भी पाया होगा, तो इससे ज्‍यादा नहीं हो सकता। जो मुझे दिखाई पड़ रहा है।

जब जीसस से किसी ने पूछा कि कौन होंगे वे लोग जो तुम्‍हारे स्‍वर्ग के राज्‍य में प्रवेश करेंगे। तो जीसस ने कहा कि वे जो बच्‍चों की भांति होंगे।

बच्‍चे शायद किसी ऐसे बड़े  स्‍वर्ग में रहते ही हैं। हम सब सिखा पढ़ा कर उनका स्‍वर्ग उनसे छीन लेते है। लेकिन जरूरी है कि यह स्‍वर्ग छीने,क्‍योंकि छीना गया स्‍वर्ग जब वापस मिलता है। तब उसका अनूठापन और ही होता है। लेकिन वापस बहुत कम लोगों को मिल पाता है।

        पैराडाइंज लास्‍ट की हालत बहुत लोगों की जिंदगी में होती है। पैराडाइंज रिगेंड की हालत बहुत कम लोगों की जिंदगी में आती है। खोते तो हम सब है स्‍वर्ग को, लेकिन उस स्‍वर्ग की वापसी नहीं हो पाती। अगर मरते-मरते तक कोई फिर बच्‍चा हो जाए। तो स्‍वर्ग वापस लोट आता है। और अगर बूढ़ा आदमी बच्‍चे की आंखों से दुनिया को  देख सके तो उसकी जिंदगी में जैसी शांति और जैसा आनंद और जैसा ब्‍लिस की वर्षा हो जाती है। उसका अनुमान लगाया जा सकता है।

तो बाहर की जिंदगी में जिन्‍हें पीछे जाति-स्‍मरण में लौटना है। उन्‍हें अपने एज के फिकसेशन को तोड़ना होगा। कभी राह चलते किसी बच्चे का हाथ पकड़ कर उसके साथ दौड़ने लगें भूल जायें कि आपकी उम्र कितनी है। और मजा यह है कि उम्र सिर्फ याद है और कुछ भी नहीं।

       सिर्फ एक ख्‍याल है। एक विचार है जो मजबूती से पकड़ लिया गया है। बाहर की जिंदगी में उम्र की फिक्‍सेन को तोड़े और भीतर की जिंदगी में जब ध्‍यान को बैठे तो एक-एक साल पीछे खिसकने लगें। एक-एक जन्‍म दिन वापस लोट आने लगें। धीरे-धीरे लौटें तो इस जन्‍म के आखरी तक लौट आने में कोई कठिनाई नहीं है। पिछले जन्‍म में जाने का जो सूत्र है, वह मैं नहीं कह सकता हूं। इसको न कहने का कारण है।

     अगर कोई कुतूहलवश उसका प्रयोग करे,तो पागल हो सकता है। क्‍योंकि अगर पिछले जन्‍म की स्‍मृतियां एकदम से टूट पड़ें तो उन्‍हें संभालना मुश्‍किल है।

ऊपर जिस लड़की का मैंने जिक्र किया है, उसे तीन जन्‍मों की स्‍मृति याद है। किसी कारण से नहीं आकस्‍मिक, प्रकृति की किसी भूल से। उसे तीन जन्‍म स्‍मरण है। प्रकृति बहुत इंतजाम करती है। कि आपके पिछले जन्‍म की पूरी की पूरी परत को दबा देती है।

       इस जन्‍म की स्‍मृतियां उस परत के पास बननी शुरू होती है। वह परत गहरे रूप से आपके पिछले जन्‍म को आपसे तोड़े रखती है।

इस लिए जिन मुल्‍कों में यह ख्‍याल है—जैसे मुसलमान मुल्‍कों में या ईसाई मुल्‍कों में—कि पिछला जन्‍म नहीं होता है, जिन मुल्‍कों में यह ख्‍याल है कि पिछला जन्‍म नहीं होता है। उन मुल्कों में पिछले जन्‍म की स्‍मृतियों के बच्‍चें नहीं पैदा होते। क्योंकि उस तरफ ध्‍यान ही नहीं दिया जाता है।

       जैसे हमने पक्‍का मान लिया कि इस दिवाल के पास कुछ भी नहीं है। तो हम धीरे-धीरे इस दीवाल की तरफ देखना ही बंद कर देंगे। लेकिन इस देश में जैनों में, बौद्धो में, हिंदुओं में कितना ही भेद हो, एक बात में मत भेद नहीं है, वह है पिछले जन्‍म का आस्‍तित्‍व। वह पुनर्जन्‍म की यात्रा में कोई भेद नहीं है।

      इस लिए इस देश का चित्त हजारों सालों से पिछले जन्‍म के होने की संभावना से भरा हुआ है।

तो कई बार अचानक यह संभावना होती है कि अगर पिछले जन्‍म में मरते वक्‍त कोई व्‍यक्‍ति गहरा भाव लेकर मर जाए, तो याद रह जायेगी।

        एक मरता हुआ आदमी अगर यह बहुत गहरा भाव रख ले कि जो मैं इस जिंदगी में था वह मुझे याद रह जाए। तो बिना किसी यौगिक प्रक्रिया के, बिना किसी ध्यान  के प्रयोग के, उसे अगले जन्‍म में याद रह जाएगा। लेकिन तब वह दिक्‍कत में पड़ जाएगा।

उस लड़की का पहला जन्‍म उसका आसाम में हुआ जहां वह सात साल की लड़की होकर मर गई। तो सात साल की लड़की जितनी आसामी बोल सकती है, उतनी वह बोलती है। सात साल की लड़की जितने आसामी-नाच नाच सकती है, उतना वह नाचती है। हालांकि वह तो पैदा हुई मध्‍यप्रदेश में अभी, आसाम कभी गई नहीं, आसामी भाषा से उसका कोई संबंध नहीं है। दूसरा जन्‍म उसका वाराणसी में हुआ।

     अभी वहां वह कोई साठ साल की होकर मरी। सड़सठ वर्ष। और अभी वह ग्‍यारह की है। तो कुल मिला कर तीनों जन्‍मों की बयासी। आप उसकी आंखें देखें तो 82 साल की बूढ़ी जैसी आंखें है। और चेहरा जैसे अट्ठत्तर साल की औरत का हो। और वो अभी केवल 15 साल की लड़की है।

      लेकिन उतना ही पीला, जर्द, चिंतित, परेशान, जैसे मौत करीब हो। क्‍योंकि उसकी स्‍मृतियों की शृंखला अट्ठत्‍तर साल की है। उसके भीतर उसे अट्ठत्‍तर साल के स्‍वीकेंस, शृंखला का बोध है।

       उसकी कठिनाई बहुत बढ़ गई है। क्‍योंकि उसके पिछले जन्‍म के जो लोग है। उसके संबंधी, वे सब जबलपुर में मेरे पड़ोस में रहते थे। इस लिए उसे वो मेरे पास लाए। उसने अपने पिछले जन्‍म के सारे संबंधियों को हजारों की भिड़ में पहचान लिया। कोई उसका लड़का है। कोई उसकी बहु है। कोई उसकी लड़की का लड़का है। हजारों की भिड़ में छिपा कर खड़ा किया गया और उस लड़की ने उन सब को पहचान लिया।

      जिस घर में वह थी अब तो वह घर उन्‍होंने छोड़ दिया। वह तो कोई गांव में घर है। अब तो वे जबलपुर रहते है। उसने उस घर में गड़ा हुआ धन भी बता दिया। जो खोदने से मिल गया।

जो पड़ोस में मेरे सज्‍जन रहते थे। उनकी वह पिछले जन्‍म में बहन थी। उस के सर पर एक चोट लगी थी। तो उस लड़की ने जैसे ही उसे पहचाना, तो कहा की अरे यह चोट तेरी अभी तक मिटी नहीं।

        तो उन्‍होंने कहा कि यह चोट मुझे कब लगी पता नहीं। क्‍या तुम बता सकती हो? उसने कहा कि यह चोट जिस दिन तेरी शादी हुई तू घोड़े से गिर गया था। घोड़ा बिचक गया और तू गिर पडा। लेकिन तब उसकी उम्र कोई आठ या नौ साल की थी। जब उसकी शादी हुई थी। तो उसे  भी याद नहीं है। तब इस बात का पता लगवाया गया की उनके गांव में किसी को भी इस बात की याद है।

       एक बूढ़ी औरत ने इस बात की गवाही दी कि हां, यह लड़का गिरा था। और इसको चोट लग गई थी। और यह घोड़े से ही गिरने की इसकी चोट है। हांलाकि उसको खुद याद नहीं है।

इस लड़की के पिता को मेंने कहा कि इसकी स्‍मृतियों को भूला देने का उपाय करें। में इसमें थोड़ा सहयोगी हो सकता हूं। इसे ले आएं तो इसकी स्‍मृति सात दिन में भूला दी जाए। अन्‍यथा ये लड़की मुश्‍किल में पड़ जायेगी। उसकी कठिनाई बहुत है। क्योंकि न तो वह स्‍कूल में पढ़ सकती है। क्‍योंकि अट्ठत्‍तर साल की बूढी स्‍त्री को आप स्‍कूल में भरती कर सकते है। वह कुछ सीख नहीं सकती। क्‍योंकि वह सीखी ही हुई है। वह खेल नहीं सकती। वह गंभीर है। वह घर में हर एक की आलोचना करती है। वह उतनी ही कलह से भरी हुई है। जितना अट्ठत्‍तर साल का पुरूष या स्‍त्री भरी हुई होती है। वह घर-घर में सबको आलोचना, निंदा और सबको कौन क्‍या गड़बड़ कर रहा है। उस सब का हिसाब रखती है। अभी इस उम्र में। 

       लेकिन उसके घर के लोग को तो आनंद आ रहा था। क्‍योंकि भीड़ लगती थी। लोग देखने आते थे। कोई पैसे भी चढ़ा देता। नारियल,फल, और मिठाईया भी आने लगी। राष्‍ट्रपति ने उन्‍हें दिल्‍ली भी बुलवाया गया। अमरीका से भी एक निमंत्रण आ गया कि उसको अमेरिका ले आओ। तो बड़े खुश थे। उन्‍होंने मेरे पास लाना बंद कर दिया। हम भुलाना नहीं चाहते। यह तो बड़ी अच्‍छी बात है।

आज इस बात को हुए कोई सात साल हो गए। आज वह लड़की पागल है। अब वे मुझसे कहते है। कि आकर कुछ कीजिए। मैंने कहा कि अब बहुत मुश्‍किल मामला हो गया है। जब कुछ हो सकता था तब आप राज़ी नहीं हुए। अब तो होश भी नहीं है उसको। अब तो अनर्गल हालत में कनफ्यूज्‍ड हो गई है।

       अब तो उसको यह भी पता नहीं चलता कि कौन सी स्‍मृति किस जन्‍म की है। यह भाई इस जन्‍म का है कि पिछले जन्‍म का है। यह पिता इस जन्‍म का है कि पिछले जन्‍म का है। यह सब कनफ्यूज्‍ड हो गया।

प्रकृति की व्‍यवस्‍था ऐसी है कि आप जितना झेल सकते है। उतनी ही आपको स्‍मृति रह जाती है। इसलिए दूसरे जन्‍म की स्मृतियों के पहले विशेष साधना से गुजरना होता है। जो आपको इस योग्‍य बाना दे कि आपको कोई चीज कन्‍फ्यूज नहीं कर सकती।

असल में दूसरे जन्‍म की स्‍मृति में जाने के लिए सबसे जरूरी जो शर्त है।

        वह यह है कि जब तक आपको ये जगत एक सपने की भांति मालूम न होने लगे—एक लीला, एक खेल—तब तक आपको पिछले जन्‍म की स्‍मृति में ले जाना उचित नहीं है। क्‍योंकि अगर आपको यह जगत एक खेल मालूम होने लगे। तो फिर कोई डर नहीं है। फिर आपके चित पर कोई चोट पड़ने वाली नहीं है। खेल की और स्‍मृतियां है उनसे कोई हर्जा होने वाला नहीं है।

लेकिन अगर आपको यह जगत बहुत वास्‍तविक मालूम हो रहा है।

         आप अगर अपनी पत्‍नी को बहुत वास्‍तविक मान रहे है। और कल आपको स्‍मरण आ जाए कि पिछले जन्‍म में वह आपकी मां थी, तो आप बड़ी मुश्‍किल में पड़ जायेगे। कि अब क्‍या करें। इसको पत्‍नी मानें की मां मानें।

*प्रतिक्रमण एक प्रभावी प्रविधि :*

         सूत्र :  अपने अवधान को ऐसी जगह रखो जहां अतीत की किसी घटना को देख रहे हो और अपने शरीर को भी। रूप के वर्तमान लक्षण खो जाएंगे और  रूपांतरित होओगे।

     आप अपने अतीत को याद कर रहे हो। चाहे वह कोई भी घटना हो; बचपन, प्रेम, पिता या माता की मृत्यु, कुछ भी हो सकता है। उसे देखो। लेकिन उससे एकात्म मत होओ। उसे ऐसे देखो जैसे वह किसी और के जीवन में घटा हो।

     उसे ऐसे देखो जैसे वह घटना पर्दे पर फिर से घट रही हो, फिल्माई जा रही हो, और तुम उसे देख रहे हो—उससे अलग, तटस्थ, साक्षी की तरह।

उस फिल्म में, कथा में बीता रूप फिर उभर जाएगा। यदि अपनी कोई प्रेम—कथा स्मरण कर रहे हो, अपने प्रेम की पहली घटना, तो अपनी प्रेमिका के साथ स्मृति के पर्दे पर प्रकट होओगे और अतीत का रूप प्रेमिका के साथ उभर आएगा। अन्यथा  उसे याद न कर सकोगे। अपने इस अतीत के रूप से भी तादात्म्य हटा लो.

         पूरी घटना को ऐसे देखो मानो कोई दूसरा पुरुष किसी दूसरी स्त्री को प्रेम कर रहा है, मानो पूरी कथा से तुम्हारा कुछ लेना—देना नहीं है; आप महज द्रष्टा हो, गवाह हो।

यह विधि बहुत—बहुत बुनियादी है। इसे बहुत प्रयोग में लाया गया—विशेषकर बुद्ध के द्वारा। इस विधि के अनेक प्रकार हैं। इस विधि के प्रयोग का अपना ढंग तुम खुद खोज ले सकते हो।

      उदाहरण के लिए, रात में जब सोने लगो, गहरी नींद में उतरने लगो तो पूरे दिन के अपने जीवन को याद करो। इस याद की दिशा उलटी होगी, यानी उसे सुबह से न शुरू कर वहां से शुरू करो जहां आप हो।

अभी बिस्तर में पड़े हो तो बिस्तर में लेटने से शुरू कर पीछे लौटो। और इस तरह कदम—कदम पीछे चलकर सुबह की उस पहली घटना पर पहुंचो जब  नींद से जागे थे। अतीत स्मरण के इस क्रम में सतत याद रखो कि पूरी घटना से तुम पृथक हो, अछूते हो।

          उदाहरण के लिए, पिछले पहर आपका किसी ने अपमान किया था; अपने रूप को अपमानित होते हुए देखो, लेकिन द्रष्टा बने रहो। उस घटना में फिर नहीं उलझना है, फिर क्रोध नहीं करना है। अगर क्रोध किया तो तादात्म्य पैदा हो गया। तब ध्यान का बिंदु हाथ से छूट गया।

       इसलिए क्रोध मत करो। वह अभी आपको अपमानित नहीं कर रहा है, वह पिछले पहर के रूप को अपमानित कर रहा है। वह रूप अब नहीं है। आप तो एक बहती नदी की तरह हो जिसमें आप के रूप भी बह रहे हैं।

   बचपन में एक रूप था, अब वह नहीं है। वह जा चुका। नदी की भांति आप निरंतर बदलते जा रहे हो।

रात में ध्यान करते हुए जब दिन की घटनाओं को उलटे क्रम में, प्रतिक्रम में याद करो तो ध्यान रहे कि आप साक्षी हो, कर्ता नहीं। क्रोध मत करो। वैसे ही जब  कोई प्रशंसा करे तो आह्लादित मत होओ। फिल्म की तरह उसे भी उदासीन होकर देखो।

प्रतिक्रमण बहुत उपयोगी है, खासकर उनके लिए जिन्हें अनिद्रा की तकलीफ हो।  ठीक से नींद नहीं आती है, अनिद्रा का रोग है, तो यह प्रयोग बहुत सहयोगी होगा। क्यों? क्योंकि यह मन को खोलने का, निर्ग्रंथ करने का उपाय है। जब तुम पीछे लौटते हो तो मन की तहें उघडने लगती हैं।

        सुबह में जैसे घड़ी में चाबी देते हो वैसे तुम अपने मन पर भी तहें लगाना शुरू करते हो। दिनभर में मन पर अनेक विचारों और घटनाओं के संस्कार जम जाते हैं; मन उनसे बोझिल हो जाता है। अधूरे और अपूर्ण संस्कार मन में झूलते रहते हैं, क्योंकि उनके घटित होते समय उन्हें देखने का मौका नहीं मिला था।

         इसलिए रात में फिर उन्हें लौटकर देखो—प्रतिक्रम में। यह मन के निर्ग्रंथ की, सफाई की प्रक्रिया है। और इस प्रक्रिया में जब तुम सुबह बिस्तर से जागने की पहली घटना तक पहुंचोगे तो आपका मन फिर से उतना ही ताजा हो जाएगा जितना ताजा वह सुबह था। और तब वैसी नींद आएगी जैसी छोटे बच्चे को आती है।

 इस विधि को अपने पूरे अतीत जीवन में जाने के लिए भी उपयोग कर सकते हो। महावीर ने प्रतिक्रमण की इस विधि का बहुत उपयोग किया है।

अभी अमेरिका में एक आंदोलन है, जिसे डायनेटिक्स कहते हैं। वे इसी विधि का उपयोग कर रहे हैं, और वह बहुत काम की साबित हुई है।

 डायनेटिक्स वाले कहते हैं :  तुम्हारे सारे रोग तुम्हारे अतीत के अवशेष हैं—तलछट। और वे ठीक कहते हैं। अगर तुम अपने अतीत में लौटो, अपने जीवन को फिर से खोलकर देख लो, तो उसी देखने में बहुत से रोग विदा हो जाएंगे। और यह बात बहुत से प्रयोगों से सही सिद्ध हो चुकी है।

       बहुत लोग किसी ऐसे रोग से पीड़ित होते हैं जिसमें कोई चिकित्सा, कोई उपचार काम नहीं करता है। यह रोग मानसिक मालूम होता है। तो उसके लिए क्या किया जाए? यदि किसी को कहो कि तुम्हारा रोग मानसिक है तो उससे बात बनने की बजाय बिगड़ती है। यह सुनकर कि मेरा रोग मानसिक है, किसी भी व्यक्ति को बुरा लगता है। तब उसे लगता है कि अब कोई उपाय नहीं है।

     वह बहुत असहाय महसूस करता है। तो प्रतिक्रमण एक चमत्कारिक विधि है। अगर पीछे लौटकर अपने मन की गांठें खोलो तो धीरे— धीरे उस पहले क्षण को पकड़ सकते हो जब यह रोग शुरू हुआ था।

 उस क्षण को पकड़कर पता चलेगा कि यह रोग अनेक मानसिक घटनाओं और कारणों से निर्मित हुआ है। प्रतिक्रमण से वे कारण फिर से प्रकट हो जाते हैं.

अगर उस क्षण से गुजर सको जिसमें पहले पहल इस रोग ने तुम्हें घेरा था, अचानक पता चल जाएगा कि किन मनोवैज्ञानिक कारणों से यह रोग बना था। तब कुछ करना नहीं है, सिर्फ उन मनोवैज्ञानिक कारणों को बोध में ले आना है। इस प्रतिक्रमण से अनेक रोगों की ग्रंथियां टूट जाती हैं और अंततः रोग विदा हो जाते हैं। जिन ग्रंथियों को जान लेते हो वे ग्रंथियां विसर्जित हो जाती हैं और उनसे बने रोग समाप्त हो जाते हैं।

       यह विधि गहरे रेचन की विधि है। अगर इसे रोज कर सको तो एक नया स्वास्थ्य और एक नई ताजगी का अनुभव होगा। अगर हम अपने बच्चों को रोज इसका

प्रयोग करना सिखा दें तो उन्हें उनका अतीत कभी बोझिल नहीं बना सकेगा। तब बच्चों को अपने अतीत में लौटने की जरूरत नहीं रहेगी।

      वे सदा यहां और अब, यानी वर्तमान में रहेंगे। तब उन पर अतीत का थोड़ा सा भी बोझ नहीं रहेगा, वे सदा स्वच्छ और ताजा रहेंगे।

     इसे रोज कर सकते हो। पूरे दिन को इस तरह उलटे क्रम से पुन: खोलकर देख लेने से नई अंतर्दृष्टि प्राप्त होगी।  मन तो चाहेगा कि यादों का सिलसिला सुबह से शुरू करें। लेकिन उससे मन का निर्ग्रंथन नहीं होगा। उलटे पूरी चीज दुहरकर और मजबूत हो जाएगी। इसलिए सुबह से शुरू करना गलत होगा।

भारत में ऐसे अनेक तथाकथित गुरु हैं जो सिखाते हैं कि पूरे दिन का पुनरावलोकन करो और इस प्रक्रिया को सुबह से शुरू करो। लेकिन यह गलत और नुकसानदेह है। उससे मन मजबूत होगा और अतीत का जाल बड़ा और गहरा हो जाएगा।

       इसलिए सुबह से शाम की तरफ कभी मत चलो, सदा पीछे की ओर गति करो। और तभी तुम मन को पूरी तरह निर्ग्रंथ कर पाओगे, खाली कर पाओगे, स्वच्छ कर पाओगे।

        मन तो सुबह से शुरू करना चाहेगा, क्योंकि वह आसान है। मन उस क्रम को भलीभांति जानता है, उसमें कोई अड़चन नहीं है। प्रतिक्रमण में भी मन उछलकर सुबह पर चला जाता है और फिर आगे चला चलेगा। वह गलत है, वैसा मत करो। सजग हो जाओ और प्रतिक्रम से चलो।

        इसमें मन को प्रशिक्षित करने के लिए अन्य उपाय भी काम में लाए जा सकते हैं। सौ से पीछे की तरफ गिनना शुरू करो—निन्यानबे, अट्ठानबे, सत्तानबे। प्रतिक्रम से सौ से एक तक गिनो। इसमें भी अड़चन होगी, क्योंकि मन की आदत एक से सौ की ओर जाने की है, सौ से एक की ओर जाने की नहीं।

        इसी क्रम में घटनाओं को पीछे लौटकर स्मरण करना है। क्या होगा? पीछे लौटते हुए मन को फिर से खोलकर देखते हुए साक्षी हो जाओगे। अब उन चीजों को देख रहे हो जो कभी आपके साथ घटित हुई थीं, लेकिन अब साथ घटित नहीं हो रही हैं। अब तो सिर्फ साक्षी हो, और वे घटनाएं मन के पर्दे पर घटित हो रही हैं।

        अगर इस ध्यान को रोज जारी रखो तो किसी दिन अचानक दुकान पर या दफ्तर में काम करते हुए खयाल होगा कि क्यों नहीं अभी घटने वाली घटनाओं के प्रति भी साक्षीभाव रखा जाए! अगर समय में पीछे लौटकर जीवन की घटनाओं को देखा जा सकता है, उनका गवाह हुआ जा सकता है—दिन में किसी ने आपका अपमान किया था और आप बिना क्रोधित हुए उस घटना को फिर देख सकते हो—तो क्या कारण है कि उन घटनाओं को जो अभी घट रही हैं, नहीं देखा जा सके? कठिनाई क्या है?

         कोई अपमान कर रहा है।  अपने को घटना से पृथक कर सकते हो और देख सकते हो कि कोई अपमान कर रहा है। तुम यह भी देख सकते हो कि आप अपने शरीर से, अपने मन से और उससे भी जो अपमानित हुआ है, पृथक हो। सारी चीज के गवाह हो सकते हो। और अगर ऐसे गवाह हो सको तो फिर  क्रोध नहीं होगा। क्रोध तब असंभव जाएगा। क्रोध तो तब संभव होता है जब तादात्म्य करते हो, अगर तादात्म्य नहीं है तो क्रोध असंभव है। क्रोध का अर्थ तादात्म्य है।

*यह विधि कहती है :*

     अतीत की किसी घटना को देखो, उसमें तुम्हारा रूप उपस्थित होगा। यह सूत्र तुम्हारी नहीं, तुम्हारे रूप की बात करता है। तुम तो कभी वहां थे ही नहीं। सदा किसी घटना में तुम्हारा रूप उलझता है, तुम उसमें नहीं होते। जब तुम मुझे अपमानित करते हो तो सच में तुम मुझे अपमानित नहीं करते। तुम मेरा अपमान कर ही नहीं सकते, केवल मेरे रूप का अपमान कर सकते हो। मैं जो रूप हूं तुम्हारे लिए तो उसी की उपस्थिति अभी है और तुम उसे अपमानित कर सकते हो। लेकिन मैं अपने को अपने रूप से पृथक कर सकता हूं।

       यही कारण है कि हिंदू नाम—रूप से अपने को पृथक करने की बात पर जोर देते आए हैं। तुम तुम्हारा नाम—रूप नहीं हो, तुम वह चैतन्य हो जो नाम—रूप को जानता है। और चैतन्य पृथक है, सर्वथा पृथक है।

लेकिन यह कठिन है। इसलिए अतीत से शुरू करो, वह सरल है। क्योंकि अतीत के साथ कोई तात्कालिकता का भाव नहीं रहता है। किसी ने बीस साल पहले तुम्हें अपमानित किया था, उसमें तात्कालिकता का भाव अब कैसे होगा! वह आदमी मर चुका होगा और बात समाप्त हो गई है। यह एक मुर्दा घटना है।

       अतीत से याद की हुई। उसके प्रति जागरूक होना आसान है। लेकिन एक बार तुम उसके प्रति जागना सीख गए तो अभी और यहां होने वाली घटनाओं के प्रति भी जागना हो सकेगा। लेकिन अभी और यहां से आरंभ करना कठिन है।

        समस्या इतनी तात्कालिक है, निकट है, जरूरी है कि उसमें गति करने के लिए जगह ही नहीं हो ! थोड़ी दूरी बनाना और घटना से पृथक होना कठिन बात है।

इसीलिए सूत्र कहता है कि अतीत से आरंभ करो। अपने ही रूप को अपने से अलग देखो और उसके द्वारा रूपांतरित हो जाओ।

        इसके द्वारा रूपांतरित हो जाओगे, क्योंकि यह निर्ग्रंथन है—एक गहरी सफाई है, धुलाई है। और तब तुम जानोगे कि समय में जो तुम्हारा शरीर है, तुम्हारा मन है, अस्तित्व है, वह तुम्हारा वास्तविक यथार्थ नहीं है, वह तुम्हारा सत्य नहीं है। सार—सत्य सर्वथा भिन्न है। उस सत्य से चीजें आती—जाती हैं और सत्य अछूता रह जाता है। तुम अस्पर्शित रहते हो, निर्दोष रहते हो, कुंवारे रहते हो। सब कुछ गुजर जाता है, पूरा जीवन गुजर जाता है।

       शुभ और अशुभ, सफलता और विफलता, प्रशंसा और निंदा, सब कुछ गुजर जाता है। रोग और स्वास्थ्य, जवानी और बुढ़ापा, जन्म और मृत्यु, सब कुछ व्यतीत हो जाता है और तुम अछूते रहते हो। लेकिन इस अस्पर्शित सत्य को कैसे जाना जाए?

         इस विधि का वही उपयोग है। अपने अतीत से आरंभ करो। अतीत को देखने के लिए अवकाश उपलब्ध है, अंतराल उपलब्ध है, परिप्रेक्ष्य संभव है। या भविष्य को देखो, भविष्य का निरीक्षण करो। लेकिन भविष्य को देखना भी कठिन है। सिर्फ थोड़े से लोगों के लिए भविष्य को देखना कठिन नहीं है।

         कवियों और कल्पनाशील लोगों के लिए भविष्य को देखना कठिन नहीं है। वे भविष्य को ऐसे देख सकते हैं जैसे वे किसी यथार्थ को देखते हैं। लेकिन सामान्‍यत: अतीत को उपयोग में लाना अच्छा है, तुम अतीत में देख सकते हो।

       जवान लोगों के लिए भविष्य में देखना अच्छा रहेगा। उनके लिए भविष्य में झांकना सरल है, क्योंकि वे भविष्योन्मूख होते हैं। बूढ़े लोगों के लिए मृत्यु के सिवाय कोई भविष्य नहीं है। वे भविष्य में नहीं देख सकते हैं, वे भयभीत हैं। यही वजह है कि बूढ़े लोग सदा अतीत के संबंध में विचार करते हैं।

       वे पुन: —पुन: अपने अतीत की स्मृति में घूमते रहते हैं। लेकिन वे भी वही भूल करते हैं। वे अतीत से शुरू कर वर्तमान की ओर आते हैं। यह गलत है। उन्हें प्रतिक्रमण करना चाहिए।

       अगर वे बार—बार अतीत में प्रतिक्रम से लौट सकें तो धीरे— धीरे उन्हें महसूस होगा कि उनका सारा अतीत बह गया। और तब कोई आदमी अतीत से चिपके बिना, अटके बिना मर सकता है। अगर तुम अतीत को अपने से चिपकने न दो, अतीत में न अटको, अतीत को हटाकर मर सको, तब तुम सजग मरोगे, तब तुम पूरे बोध में, पूरे होश में मरोगे।

       तब मृत्यु तुम्हारे लिए मृत्यु नहीं रहेगी, बल्कि वह अमृत के साथ मिलन में बदल जाएगी। अपनी पूरी चेतना को अतीत के बोझ से मुक्त कर दो, उससे अतीत के मैल को निकालकर उसे शुद्ध कर दो, और तब तुम्हारा जीवन रूपांतरित हो जाएगा।

प्रयोग करो। यह उपाय कठिन नहीं है। सिर्फ अध्यवसाय की, सतत चेष्टा की जरूरत है। विधि में कोई अंतर्भूत कठिनाई नहीं है। यह सरल है। और तुम आज से ही इसे शुरू कर सकते हो। आज ही रात अपने बिस्तर में लेटकर शुरू करो, और तुम बहुत सुंदर और आनंदित अनुभव करोगे। पूरा दिन फिर से गुजर जाएगा।

        लेकिन जल्दबाजी मत करो। धीरे— धीरे पूरे क्रम से गुजरो, ताकि कुछ भी दृष्टि से चूके नहीं। यह एक आश्चर्यजनक अनुभव है, क्योंकि अनेक ऐसी चीजें तुम्हारी निगाह के सामने आएंगी जिन्हें दिन में तुम चूक गए थे। दिन में बहुत व्यस्त रहने के कारण तुम बहुत—बहुत चीजें चूकते हो, लेकिन मन उन्हें भी अपने भीतर इकट्ठा करता जाता है, तुम्हारी बेहोशी में भी मन उनको ग्रहण करता जाता है।

       तुम सड़क से जा रहे थे और कोई आदमी गा रहा था। हो सकता है कि तुमने उसके गीत पर कोई ध्यान न दिया हो, तुम्हें यह भी बोध न हुआ हो कि तुमने उसकी आवाज भी सुनी। लेकिन तुम्हारे मन ने उसके गीत को भी सुना और अपने भीतर स्मृति में रख लिया था। अब वह गीत तुम्हें पकड़े रहेगा, वह तुम्हारी चेतना पर अनावश्यक बोझ बना रहेगा।

       तो पीछे लौटकर उसे देखो, लेकिन बहुत धीरे— धीरे उसमें गति करो। ऐसा समझो कि पर्दे पर बहुत धीमी गति से कोई फिल्म दिखायी जा रही है। ऐसे ही अपने बीते दिन की छोटी से छोटी घटना को गौर से देखो, उसकी गहराई में जाओ। और तब तुम पाओगे कि तुम्हारा दिन बहुत बड़ा था। वह सचमुच बड़ा था, क्योंकि मन को उसमें अनगिनत सूचनाएं मिलीं और मन ने सबको इकट्ठा कर लिया।

तो प्रतिक्रमण करो

       धीरे— धीरे तुम उस सबको जानने में सक्षम हो जाओगे जिन्हें तुम्हारे मन ने दिनभर में अपने भीतर इकट्ठा कर लिया था। वह टेप रेकार्डर जैसा है। और तुम जैसे—जैसे पीछे जाओगे, मन का टेप पुंछता जाएगा, साफ होता जाएगा। और जब तक तुम सुबह की घटना के पास पहुंचोगे, तुम्हें नींद आ जाएगी। और तब तुम्हारी नींद की गुणवत्ता और होगी। वह नींद भी ध्यानपूर्ण होगी।

       और दूसरे दिन सुबह नींद से जागने पर अपनी आंखों को तुरंत मत खोलो। एक बार फिर रात की घटनाओं में प्रतिक्रम से लौटो। आरंभ में यह कठिन होगा। शुरू में बहुत थोड़ी गति होगी। कभी कोई स्‍वप्‍न का अंश, उस स्‍वप्‍न का अंश जिसे ठीक जागने के पहले तुम देख रहे थे, दिखाई पड़ेगा। लेकिन धीरे— धीरे तुम्हें ज्यादा बातें स्मरण आने लगेंगी, तुम गहरे प्रवेश करने लगोगे।

      तीन महीने के बाद तुम समय के उस छोर पर पहुंच जाओगे जब तुम्हें नींद लगी थी, जब तुम सो गए थे।

और अगर तुम अपनी नींद में प्रतिक्रम से गहरे उतर सके तो तुम्हारी नींद और जागरण की गुणवत्ता बिलकुल बदल जाएगी। तब तुम्हें सपने नहीं आएंगे, तब सपने व्यर्थ हो जाएंगे। अगर दिन और रात दोनों में तुम प्रतिक्रमण कर सके तो फिर सपनों की जरूरत नहीं रहेगी।

*मनोवैज्ञानिक कहते हैं :*

        सपना भी मन को फिर से खोलने, खाली करने की प्रक्रिया है। और अगर तुम स्वयं यह काम प्रतिक्रमण के द्वारा कर लो तो स्वप्न देखने की जरूरत नहीं रहेगी। सपना इतना ही तो करता है कि जो कुछ भी मन में अटका पड़ा था, अधूरा पड़ा था, अपूर्ण था, उसे वह पूरा कर देता है।

तुम सड़क से गुजर रहे थे और तुमने एक सुंदर मकान देखा और तुम्हारे भीतर उस मकान को पाने की सूक्ष्म वासना पैदा हो गई।

       लेकिन उस समय तुम दफ्तर जा रहे थे और तुम्हारे पास दिवा—स्वप्न देखने का समय नहीं था। तुम उस कामना को टाल गए, तुम्हें यह पता भी नहीं चला कि मन ने मकान को पाने की कामना निर्मित की थी। लेकिन वह कामना अब भी मन के किसी कोने में अटकी पड़ी है। और अगर तुमने उसे वहां से नहीं हटाया तो वह तुम्हारी नींद मुश्किल कर देगी।

       नींद की कठिनाई यही बताती है कि तुम्हारा दिन अभी भी तुम पर हावी है और तुम उससे मुक्त नहीं हुए हो। तब रात में तुम स्वप्न देखोगे कि तुम उस मकान के मालिक हो गए हो, और अब तुम उस मकान में वास कर रहे हो। और जिस क्षण यह स्वप्न घटित होता है, तुम्हारा मन हलका हो जाता है।

       सामान्यत: लोग सोचते हैं कि सपने नींद में बाधा डालते हैं, यह सर्वथा गलत है। सपने नींद में बाधा नहीं डालते। सच तो यह है कि सपने नींद में सहयोगी होते हैं। सपनों के बिना तुम बिलकुल नहीं सो सकते हो। जैसे तुम हो, तुम सपनों के बिना नहीं सो सकते हो। क्योंकि सपने तुम्हारी अधूरी चीजों को पूरा करने में सहयोगी हैं।

     ऐसी चीजें हैं जो पूरी नहीं हो सकतीं। तुम्हारा मन अनर्गल कामनाएं किए जाता है, वे यथार्थ में पूरी नहीं हो सकती हैं। तो क्या किया जाए? वे अधूरी कामनाएं तुम्हारे भीतर बनी रहती हैं और तुम आशा किए जाते हो, सोच—विचार किए जाते हो। तो क्या किया जाए? तुम्हें एक सुंदर स्त्री दिखाई पड़ी और तुम उसके प्रति आकर्षित हो गए। अब उसे पाने की कामना तुम्हारे भीतर पैदा हो गई, जो हो सकता है संभव न हो। हो सकता है वह स्त्री तुम्हारी तरफ ताकना भी पसंद न करे। तब क्या हो?

       स्‍वप्‍न यहां तुम्हारी सहायता करता है। स्वप्न में तुम उस स्त्री को पा सकते हो। और तब तुम्हारा मन हलका हो जाएगा। जहां तक मन का संबंध है, स्वप्न और यथार्थ में कोई फर्क नहीं है। मन के तल पर क्या फर्क है? किसी स्त्री को यथार्थत: प्रेम करने और सपने में प्रेम करने में क्या फर्क है?

      कोई फर्क नहीं है। अगर फर्क है तो इतना ही कि स्वप्न यथार्थ से ज्यादा सुंदर होगा। स्वप्न की स्त्री कोई अड़चन नहीं खड़ी करेगी। स्वप्‍न तुम्हारा है और उसमें तुम जो चाहो कर सकते हो। वह स्त्री तुम्हारे लिए कोई बाधा नहीं पैदा करेगी। वह तो है ही नहीं, तुम ही हो। वहां कोई भी अड़चन नहीं है, तुम जो चाहो कर सकते हो। मन के लिए कोई भेद नहीं है, मन स्वप्न और यथार्थ में कोई भेद नहीं कर सकता है।

         उदाहरण के लिए तुम्हें यदि एक साल के लिए बेहोश करके रख दिया जाए और उस बेहोशी में तुम सपने देखते रहो तो एक साल तक तुम्हें बिलकुल पता नहीं चलेगा कि जो भी तुम देख रहे हो वह सपना है। सब यथार्थ जैसा लगेगा, और स्वप्न सालभर चलता रहेगा। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को सौ साल के लिए कोमा में रखा दिया जाए तो वह सौ साल तक सपने देखता रहेगा, और उसे क्षणभर के लिए भी संदेह नहीं होगा कि जो मैं कर रहा हूं वह स्वप्न में कर रहा हूं। और यदि वह कोमा में ही मर जाए तो उसे कभी पता नहीं चलेगा कि मेरा जीवन एक स्वप्न था, सच नहीं था।

       मन के लिए कोई भेद नहीं है, सत्य और स्‍वप्‍न दोनों समान हैं। इसलिए मन अपने को सपनों में भी निर्ग्रंथ कर सकता है। अगर इस विधि का प्रयोग करो तो सपना देखने की जरूरत नहीं रहेगी। तब तुम्हारी नींद की गुणवत्ता भी पूरी तरह बदल जाएगी। क्योंकि सपनों की अनुपस्थिति में तुम अपने अस्तित्व की आत्यंतिक गहराई में उतर सकोगे। और तब नींद में भी तुम्हारा बोध कायम रहेगा।

        कृष्ण गीता में यही बात कह रहे हैं कि जब सभी गहरी नींद में होते हैं तो योगी जागता है। इसका यह अर्थ नहीं कि योगी नहीं सोता है। योगी भी सोता है, लेकिन उसकी नींद का गुणधर्म भिन्न है। तुम्हारी नींद ऐसी है जैसी नशे की बेहोशी होती है। योगी की नींद प्रगाढ़ विश्राम है, जिसमें कोई बेहोशी नहीं रहती है। उसका सारा शरीर विश्राम में होता है; एक—एक कोश विश्राम में होता है, वहां जरा भी तनाव नहीं रहता। और बड़ी बात कि योगी अपनी नींद के प्रति भी जागरूक रहता है।

        इस विधि का प्रयोग करो। आज रात से ही प्रयोग शुरू करो, और तब फिर सुबह भी इसका प्रयोग करना। एक सप्ताह में तुम्हें मालूम होगा कि तुम विधि से परिचित हो गए हो। एक सप्ताह के बाद अपने अतीत पर प्रयोग करो। बीच में एक दिन की छुट्टी रख सकते हो, किसी एकांत स्थान में चले जाओ। अच्छा हो कि उपवास करो—उपवास और मौन। स्वात समुद्र—तट पर या किसी झाडू के नीचे लेटे रहो और वहां से, उसी बिंदु से अपने अतीत में प्रवेश करो। अगर तुम समुद्र—तट पर लेटे हो तो रेत को अनुभव करो, धूप को अनुभव करो और तब पीछे की ओर सरको। और सरकते चले जाओ, अतीत में गहरे उतरते चले जाओ और देखो कि कौन सी आखिरी बात स्मरण आती है।

         तुम्हें आश्चर्य होगा कि सामान्यत: तुम बहुत कुछ स्मरण नहीं कर सकते हो। सामान्यत: अपनी चार या पांच वर्ष की उम्र के आगे नहीं जा सकोगे। जिनकी याददाश्त बहुत अच्छी है वे तीन वर्ष की सीमा तक जा सकते हैं। उसके बाद अचानक एक अवरोध मिलेगा जिसके आगे सब कुछ अंधेरा मिलेगा। लेकिन अगर तुम इस विधि का प्रयोग करते रहे तो धीरे— धीरे यह अवरोध टूट जाएगा और तुम अपने जन्म के प्रथम दिन को भी याद कर पाओगे।

          वह एक बड़ा रहस्योदघाटन होगा। तब धूप, बालू और सागर—तट पर लौटकर तुम एक दूसरे ही आदमी होगे। यदि तुम श्रम करो तो तुम गर्भ तक जा सकते हो। तुम्हारे पास मां के पेट की स्मृतियां भी हैं। मां के साथ नौ महीने होने की बातें भी तुम्हें याद हैं। तुम्हारे मन में उन नौ महीनों की

कथा भी लिखी है। जब तुम्हारी मां दुखी हुई थी तो तुमने उसको भी मन में लिख लिया था। क्योंकि मां के दुखी होने से तुम भी दुखी हुए थे। तुम अपनी मां के साथ इतने जुड़े थे, संयुक्त थे कि जो कुछ तुम्हारी मां को होता था वह तुम्हें भी होता था। जब वह क्रोध करती थी तो तुम भी क्रोध करते थे। जब वह खुश थी तो तुम भी खुश थे। जब कोई उसकी प्रशंसा करता था तो तुम भी प्रशंसित अनुभव करते थे। और जब वह बीमार होती थी तो उसकी पीड़ा से तुम भी पीड़ित होते थे।

यदि तुम गर्भ की स्मृति में प्रवेश कर सको तो समझो कि राह मिल गई। और तब तुम और गहरे उतर सकते हो।

        तब तुम उस क्षण को भी याद कर सकते हो जब तुमने मां के गर्भ में प्रवेश किया था। इसी जाति—स्मरण के कारण महावीर और बुद्ध कह सके कि पूर्वजन्म है और पुनर्जन्म है। पुनर्जन्म कोई सिद्धात नहीं है, वह एक गहन अनुभव है। अगर तुम उस क्षण की स्मृति को पकड़ सको जब तुमने मां के गर्भ में प्रवेश किया था तो तुम उससे भी आगे जा सकते हो, तुम अपने पूर्व—जीवन की मृत्यु को भी याद कर सकते हो। और एक बार तुमने उस बिंदु को छू लिया तो समझो कि विधि तुम्हारे हाथ लग गई। तब तुम आसानी से अपने सभी पूर्व—जन्मों में गति कर सकते हो।

        यह एक अनुभव है, और इसके परिणाम आश्चर्यजनक हैं। तब तुम्हें पता चलता है कि तुम जन्मों—जन्मों से उसी व्यर्थता को जी रहे हो जो अभी तुम्हारे जीवन में है। एक ही मूढ़ता को तुम जन्मों—जन्मों में दुहराते रहे हो। भीतरी ढंग—ढांचा वही है, सिर्फ ऊपर—ऊपर थोड़ा फर्क है। अभी तुम इस स्त्री के प्रेम में हो, कल किसी अन्य स्त्री के प्रेम में थे। कल तुमने धन बटोरा था, आज भी धन बटोर रहे हो। फर्क इतना ही है कि कल के सिक्के और थे, आज के सिक्के और हैं। लेकिन सारा ढांचा वही है, जो पुनरावृत्त होता रहा है।

और एक बार तुम देख लो कि जन्मों—जन्मों से एक ही तरह की मूढ़ता एक दुश्चक्र की भांति घूमती रही है तो अचानक तुम जाग जाओगे और तुम्हारा पूरा अतीत स्‍वप्‍न से ज्यादा नहीं रहेगा। तब वर्तमान सहित सब कुछ स्वप्न जैसा लगेगा। तब तुम उससे सर्वथा टूट जाओगे और अब नहीं चाहोगे कि भविष्य में फिर यह मूढ़ता दुहरे.

         तब वासना समाप्त हो जाएगी। क्योंकि वासना भविष्य में अतीत का ही प्रक्षेपण है, उससे अधिक कुछ नहीं है। तुम्हारा अतीत का अनुभव भविष्य में दुहरना चाहता है। वही तुम्हारी कामना है, चाह है।

      पुराने अनुभव को फिर से भोगने की चाह ही कामना है। जब तक आप इस पूरी प्रक्रिया के प्रति होशपूर्ण नहीं होते हो तब तक वासना से मुक्त नहीं हो सकते। कैसे हो सकते हो? आपका समस्त अतीत एक अवरोध बनकर खड़ा है; वह चट्टान की तरह आपके सिर पर सवार है और वही आपको आपके भविष्य की ओर धकिया रहा है। अतीत कामना को जन्म देकर उसे भविष्य में प्रक्षेपित करता है।

       _अगर आप अपने अतीत को स्‍वप्‍न की तरह जान जाओ तो सभी कामनाएं बांझ हो जाएंगी। कामनाओं के गिरते ही भविष्य समाप्त हो जाता है। इस अतीत और भविष्य की समाप्ति के साथ आप रूपांतरित हो जाते हो।_  (चेतना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

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