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मन का विज्ञान : स्वप्न में प्रवेश की प्रक्रिया, सब-कांसियस और अन-कांसियस माइंड

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 डॉ. विकास मानव

_विचार टुकडों में बनी कहानियां हैं तो स्वप्न उन्ही कहानियों पर टुकडों में बनी फिल्में।_

     रात को जब हम सोते हैं तो हमारे भीतर जो विचार चल रहे होते हैं, वे स्वप्न में परिवर्तित हो जाते हैं। शरीर शिथिल होकर गहरी श्वास लेते हुए जैसे ही नींद में प्रवेश करने लगता है तो हमारा चेतन मन सोने लगता है और अचेतन मन जागने लगता है।

सोते समय चेतन मन का जो अंतिम विचार होता है उसका सिरा जागते ही अचेतन के हाथ लग जाता है और अचेतन उसे स्वप्न में बदलना शुरू कर देता है। यानि जागते में जो विचार है वही सोने के बाद स्वप्न में बदल जाता है। इस तरह से स्वप्न की शुरुआत होती है। जैसे दिन में हमारे विचार बदलते रहते हैं।

      _हम एक विचार से दूसरे विचार पर बहते रहते हैं, ज्यादा देर तक रूक नहीं पाते हैं उसी भांति हमारे स्वप्न भी बदलते रहते हैं। नींद में जो स्वप्न आते हैं वे हमारे दिन भर की घटनाओं से संबंधित होते हैं। सिर्फ उनका स्वरूप बदल जाता है।_

स्वप्न हमारे जागरण में जो घटित होता है उसी का प्रतिफलन है। दिन में जो विचार हम करते हैं, ज्यादातर ऐसे विचार जिन्हें या तो हम पूरा नहीं कर पाते हैं या फिर पूरे होने की संभावना कम होती है तो रात को हमारा अचेतन उसे सपने के रूप में दिखाकर पूरा करता है।

     _सिर्फ उसका तरीका बदल जाता है इसलिए हम समझ नहीं पाते हैं, क्योंकि दिन में जब हम विचार करते हैं तो ज्यादातर शब्दों का, भाषा का प्रयोग करते हैं और रात को अचेतन जब सपना दिखाता है तो भाषा प्रतिकों की होती है, चित्रों की होती है, फिल्म जैसी होती है।_

       अब जैसे कि हमारा कोई मित्र रात-दिन काम की भागदौड में लगा हुआ है, तो हम अक्सर विचार करते हैं और उसके विषय में हम चर्चा करते हुए कहते हैं कि “देखो तो सही! यह कितना काम कर रहा है, कितनी भागदौड़ कर रहा है?” 

     और मित्र जब मिलता है तो हम स्वयं भी उसे कहते हैं कि “भाई थोड़ा बैठो बतियाओ भी! दिन भर काम की भागदौड़ में ही लगे रहते हो?”  

बस हमने एक सपने का बीज दिन में ही बो दिया है। यही भागदौड़ वाली बात यदि सपने में आएगी तो फिल्म की तरह आएगी।

     _हमने बार-बार उसके ज्यादा काम करने को कहने के लिए “भागदौड़” शब्द का प्रयोग किया है और भागदौड़ यानी दौड़ने का पर्याय है घोड़ा। अतः सपने में हम देखेंगे कि हमारा वही मित्र घोड़ा बनकर दौड़ा चला आ रहा है, उसका चेहरा तो वही है लेकिन शरीर घोड़े का है।_

       हम उससे बातें करते हैं, गले मिलते हैं, लेकिन हमारे मन में कोई प्रश्न नहीं उठ रहा है कि वह घोड़ा कैसे बन गया! क्योंकि हमारा प्रश्न उठाने वाला चेतन मन तो सो गया है और हमारे अचेतन मन के पास भागदौड़ शब्द को अभिव्यक्त करने के लिए घोड़े से बेहतर और कोई प्रतीक ही नहीं होता है, इसलिए वह दिन में हमारे द्वारा मित्र के लिए प्रयुक्त “भागदौड़” शब्द को “घोड़ा” बनाकर स्वप्न में प्रस्तुत करता है। यह तो हुई दिन में हुई बातचीत के स्वप्न बनने की बात। 

दूसरे, अक्सर हम अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं होते हैं, हम और-और उन्नती करना चाहते हैं। दूसरों से आगे निकलना चाहते हैं। और कई प्रतिस्पर्धी हैं जो हमारे आगे बढ़ने में बाधा दे रहे हैं।

       हम दिन में इसी बात का विचार भी करते हैं तो रात को अचेतन हमारी इसी बात को पूरा करवाने के लिए हमें गाड़ी में बिठाकर रेस करवाने लगेगा, हमें तेज कार रेसिंग करने का स्वप्न आएगा और जो व्यक्ति हमारे आगे बढ़ने में बाधा दे रहा है वही व्यक्ति या उससे मिलते-जुलते चेहरे वाला व्यक्ति स्वप्न में आकर हमें टक्कर मारते हुए हमसे आगे निकल जाता है और हमारी नींद टूट जाती है। क्योंकि दिन में भी इसी व्यक्ति ने हमारी राह में रोड़े अटकाए थे! 

       यदि हम ज्यादा थके हुए हैं या हम किसी कारणवश आधी रात के बाद सोए हैं, तो हमारी नींद में कोई व्यवधान न हो इसलिए हमारा अचेतन तुरंत स्वप्न का निर्माण करने लगता है। यदि हम प्रयोग करेंगे तो बात आसानी से हमारी समझ में आ जाती है। 

       _हम देर आधी रात के बाद सोए हैं और हमें दो घंटे बाद उठना है तो हम अपने मोबाइल फोन में दो घंटे बाद का अलार्म भर लेते हैं और सो जाते हैं। दो घंटे बाद जब अलार्म बजता है तो यदि हमें कहीं बाहर जाना है। हमारी गाड़ी का समय हो गया है या हमारा इंटरव्यू है या परीक्षा है, यानी बहुत ही जरूरी काम है, तब तो हमारा अचेतन अलार्म बजने पर हमें जगा देगा।_

     यदि जरूरी काम नहीं है तो वह हमें नहीं जागाएगा बल्कि हमारी नींद खराब न हो इसके लिए तुरंत एक स्वप्न का निर्माण करने लग जाएगा क्योंकि शरीर को और आराम की जरूरत है। अभी नींद पूरी नहीं हुई है।

      _वह अलार्म को किसी गीत संगीत से जोड़ देगा, या दर्शा देगा कि आवाज किसी दूसरे घर में से आ रही है ताकि हम सोए रहें। और यदि हमने अलार्म के साथ कंपन भी चालू किया हुआ है, तो वह स्वप्न में ही बताएगा कि किसी मित्र का फोन आया है और बेटा हमारा फोन लाकर हमें दे गया है और हम स्वप्न में ही फोन रीसिव कर अपने मित्र से बातें करने लगे हैं।_

        लेकिन वास्तव में तो हमारे फोन का अलार्म और कंपन अब भी बज रहा होता है, तो अलार्म से हमारी नींद न टुटे इसलिए अब वह हमें बताएगा कि पत्नी के फोन पर फोन आया है और हम स्वप्न में अपने मित्र से बात करते हुए बेटे को आवाज लगा रहे होते हैं कि “मम्मी से कहो फोन उठाए।” 

यानी हमारा अचेतन शरीर को आराम के लिए या कहें आलस्य के लिए हमें स्वप्नों में उलझाए रखता है? इसीलिए हमें सोते समय संकल्प करके अचेतन को यह कहना है कि “मुझे ध्यान में प्रवेश करना है।” क्योंकि हमारे चेतन मन ने उससे हमेशा सोने और आलस्य करने को ही कहा है और वह इतना भोला है कि उसे जो भी कहो, वह मान लेता है।

      _सपने में दोस्त घोड़ा बन गया उसने मान लिया। अतः हम उसे ध्यान करने को कहेंगे तो वह मान लेगा और आलस्य को खत्म करके हमें सुबह जल्दी जगा देगा।_

       इस तरह से हमारा अचेतन हमरी नींद नहीं टूटे इसका सारा प्रयास करता है। यदि हम नींद में जाग जाते हैं तो स्वप्न विदा हो जाता है और हमारा ध्यान में प्रवेश हो जाता है। विचार और स्वप्न दोनों के बाहर आ जाना ध्यान है। ध्यान की सारी विधियां सारे प्रयास हमें विचार और स्वप्न से बाहर लाने के लिए ही हैं।

*अपेक्षित स्वप्न में प्रवेश कैसे करें :*

      स्वप्न में प्रवेश करने के लिए हमें दिन में अपने विचारों से शुरूआत करनी होगी। हमें प्रयास करना होगा कि दिन में कैसे हमारे विचार रूक जाए ताकि रात में स्वप्न भी विदा हो जाए और हमारा ध्यान में प्रवेश हो जाए। 

     _दिन में यदि हम विचारों को देखने का प्रयास करते हैं तो वे और भी ज्यादा आक्रमण करने लगते हैं। सीधे विचारों को पकड़ना पानी पर लकीर खींचने जैसा है क्योंकि विचार बहुत शूक्ष्म है वे हमारी पकड़ में नहीं आते हैं।_

      विचार इसलिए भी हमारी पकड़ में नहीं आते हैं क्योंकि विचार तीसरे तल पर चल रहे होते हैं और हम खड़े हुए होते हैं पहले स्थूल शरीर के तल पर। 

स्थूल शरीर हमारा पहला तल है, दूसरा तल भाव का है, तीसरा विचार का है और चौथा निर्विचार का तल है और तीसरे तल विचार से निर्विचार में प्रवेश करना ही साधना करना कहलाता है। 

       _हम सतत तीसरे विचार के तल में उलझे हुए हैं। हमें तीसरे तल विचार से निर्विचार में जाना है, लेकिन हम खड़े हुए हैं पहले तल स्थूल शरीर में इसलिए हम तीसरे तल पर चल रहे विचारों को देखने में असमर्थ होते हैं। अतः हमें साधना भी हमारे पहले तल स्थूल शरीर से ही शुरू करनी होगी क्योंकि न तो दूसरा भाव वाला तल हमारी पकड़ में आता है, क्रोध आता है और हम उसमें उलझ जाते हैं। और न ही तीसरा विचार वाला हमारी पकड़ में आता है, क्योंकि विचारों को हम रोक पाने में असमर्थ हैं।_

       हमारी पकड़ में हमारा शरीर आता है क्योंकि यह स्थूल है और भाव इससे शूक्ष्म है और विचार भाव से भी शूक्ष्म है। 

सूक्ष्म का दूसरा सिरा स्थूल है। सूक्ष्म मन का दूसरा सिरा स्थूल शरीर है। जैसे बिजली का दूसरा सिरा बल्ब है जो स्थूल है। बिजली सूक्ष्म है। सीधे बिजली का उपयोग हम नहीं कर सकते हैं बिना बल्ब के! हम अपने सूक्ष्म मन को नहीं पकड़ सकते बिना अपने स्थूल शरीर के! 

     _तो हमें अब न तो तीसरे तल पर चल रहे विचारों को देखना है और न ही दूसरे भाव के तल पर क्रोध को रोकने का प्रयास करना है। हमने दोनों प्रयास करके देख लिये हैं और हम असफल ही हुए हैं। अब हमें अपने शरीर को देखना है, जो स्थूल है और हमारी पकड़ में आता है। स्थूल बल्ब को हम पकड़ सकते हैं,सूक्ष्म बिजली को नहीं पकड़ सकते हैं!_ 

        हमारा शरीर क्या-क्या करता है, हमें उन सब चिजों को देखना है। यदि हम अपने शरीर की क्रियाओं को देखना शुरू करते हैं तो बहुत सी बातें हमारे सामने प्रकट होने लगेगीं। हमने अनुभव किया है कि जब भी हमें क्रोध आता है तो पहले हमें भीतर पता चल जाता है कि ‘अब हमें क्रोध आ रहा है।’ क्योंकि क्रोध आने से पहले हमारा शरीर क्रोध को उठाने के लिए तेज और गहरी-गहरी श्वास लेता है ताकि उर्जा उपर उठे और हम क्रोध कर सकें। कामवासना में भी यही होता है, कामवासना को उठाने के लिए भी हमारा शरीर गहरी-गहरी श्वास लेकर उर्जा को उपर उठाता है ताकि कामवासना में प्रवेश किया जा सके।  भावों को प्रकट करने के लिए हमारा शरीर गहरी-गहरी श्वास लेकर उर्जा को उपर उठाता है।

      _हर भाव में काम में, क्रोध में, प्रेम में, श्वास की गति, श्वास की लय अलग-अलग होती है। और बिना श्वास को बदले हमारा शरीर भावों को उठाने में समर्थ नहीं है।_

       यदि हम अपने शरीर की क्रियाओं को देखने लगते हैं तो अपने भावों को उठने के पहले ही रोक सकते हैं। जैसे ही हमारे भीतर क्रोध का भाव उठता है तो श्वास की गति, सामान्य गति से अलग हो जाती है। शरीर श्वास को बदलने लगता है, गहरी और तेज श्वास लेने लगता है। बस! यहीं से शुरू करना है। 

जब भी हमें कोई भाव पकड़े और उस भाव को क्रिया में बदलने के लिए हमारा शरीर तेजी से गहरी श्वास लेकर श्वास की गति में परिवर्तन करने लगे, उस परिवर्तन को हमें वहीं रोक देना है। श्वास को तेज की जगह गहरी और धीमी कर लेना है, वैसी कर लेना है जैसी ध्यान में या प्रेम में होती है, धीमी और गहरी।

      _यदि हम भाव के उठते समय श्वास की गति के बदलाव को रोक लेते हैं तो हम उस भाव को उठने का आधार ही खींच लेते हैं, उसकी सीढ़ी ही खींच लेते हैं। हम तुरंत अनुभव करते हैं कि वह भाव विदा हो रहा है और हम एक दूसरी ही भावदशा में प्रवेश करने लगते हैं। ध्यान वाली भावदशा, प्रेम वाली भावदशा। यहां पर हमने भाव को क्रिया यानी क्रोध बनने से रोक लिया और सीधे दूसरे तल पर भाव को ही पकड़ लिया है। यानी स्थूल शरीर से दूसरे भाव वाले तल पर हमारा प्रवेश हो जाता है।_

        इस तरह से दूसरे तल पर भाव हमारी पकड़ में आने लगते हैं। चूंकि भाव को उठाने से रोकने के लिए जैसे ही हम श्वास की गति में बदलाव करते हैं हम अपनी श्वास के साथ ही अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं। साक्षी तो हम पहले तल शरीर की क्रियाओं को देखने पर ही हो जाते हैं लेकिन दूसरे भाव वाले तल पर पहुंच कर हमें साक्षी का अनुभव होगा। 

दूसरे तल पर भाव में बहने की अपेक्षा उर्जा  साक्षी की ओर बहने लगती है। जो ऊर्जा भाव में बहने जा रही थी वही उर्जा साक्षी को मिलने लगती है। श्वास को बदलने का प्रयास ही हमें श्वास और शरीर का साक्षी बना देता है। क्योंकि जो साक्षी भाव में बहने जा रहा था वही साक्षी अब श्वास को बदलने का प्रयास कर रहा है? यहां हमें साक्षी का स्मरण होने लगता है। 

       _जब हम श्वास को बदलकर दूसरे तल पर चल रहे भाव को पकड़ने में कामयाब हो जाते हैं तो तीसरे तल पर चल रहे विचार हमें दिखलाई पड़ने लगते हैं क्योंकि विचार ही भाव में परिवर्तित होता है।_

        पहले तीसरे तल पर क्रोध का विचार आता है और वह विचार दूसरे तल पर आकर भाव यानी क्रोध बनता है और पहले तल स्थूल शरीर पर आकर क्रिया बनता है और हमारा हाथ सामने वाले पर उठ जाता है। 

जब हम पहले तल स्थूल शरीर की क्रिया को देखने लगते हैं तो दूसरे तल पर भाव हमारी पकड़ में आ जाता है और जब श्वास में बदलाव कर भाव को उठने से पहले ही रोक देते हैं तो तीसरे तल पर चल रहे विचार हमें दिखलाई पड़ने लगते हैं कि यह रहा क्रोध करवाने वाला विचार!

     _अब हम सीढ़ी-दर-सीढ़ी आए हैं। सीधे तीसरे तल पर नहीं घुसे हैं! सही रास्ते से आए हैं। अब हमें यहां विचारों को देखना आसान हो जाता है। यहां तक कि विचार फिल्म की तरह चलते हुए और दिखलाई पडने लगते हैं। और जब हम विचारों को देखने लगते हैं तो विचार गिरने लगते हैं, विलीन होने लगते हैं, फिल्म का पर्दा खाली दिखलाई पड़ने लगता है।_  

       जब दिन में हमारे विचार विलीन होने लगते हैं तो रात नींद में प्रवेश करने पर स्वप्न भी विदा होने लगते हैं और हम नींद में भी जागने लगते हैं। क्योंकि विचार ही स्वप्न बनते हैं। दिन में विचार नहीं तो रात में स्वप्न नहीं। जब विचार और स्वप्न दोनों विदा होने लगते हैं तो हमारा चौथे निर्विचार वाले तल पर प्रवेश होने लगता है। यानी ध्यान में प्रवेश होने लगता है। अर्थात अनाहत में प्रवेश होने लगता है। 

*पुनश्च:*

     हमें अपने शरीर की समस्त क्रियाओं को अपनी निगरानी में लेना होगा। हमें अपने जीवन के हर काम को होश में करना होगा तभी हम भाव और विचार में प्रवेश कर निर्विचार के द्वार पर पहुंच पाएंगे। और यह एक दिन की बात नहीं है।

       _हमें सतत साधना होगा, क्योंकि ध्यान विधियां गत्यात्मकता और समय मांगती है। हम शरीर, भाव और विचारों से इतने एकात्म से हो गए हैं कि इस एकात्म को तोड़ने में समय लगता है। अतः साधना में सतत प्रयास, जागरूकता और धैर्य अनिवार्य है।_

*सब-कांसियस ब्रम्हचारियों का तल :*

       _ब्रह्मश्चर्य यानी ब्रह्म में विचरण. ब्रह्मचारी वह है जो सुपर सत्ता में होशपूर्वक विचरण करता है या सक्रिय रहता है, कर्म करता है. जो स्वस्थ है, वह ब्रह्मचारी है. स्वस्थ यानी ‘स्व’ में स्थित, सत्य में जीवित. इस प्रकार ब्रह्मचर्य का कुंवारे रहने से कोई संबध नहीं है._

     जब चेतन और अचेतन दोनों अवस्था में इंसान पूरे होश में हो, तब ये कौन सी स्थिति है, और इसके आगे क्या हो सकता है?

    जब हम मन के चेतन और अचेतन दोनों तलों पर जाग जाएंगे, तो ही ब्रम्हचर्य में प्रवेश कर जाएंगे.

चेतन मन के प्रति जागना ही अचेतन में प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त करता है। चेतन मन और अचेतन मन दोनों तलों पर हम एक साथ नहीं जाग पाते हैं। क्योंकि चेतन मन के प्रति जागने के बाद ही हमारा अचेतन मन में प्रवेश होगा। और ज्यों ही अचेतन मन में प्रवेश होगा, चेतन मन खोने लगता है।

      _ठीक उसी भांति जिस भांति घर में प्रवेश करने पर हमारी परछाई खो जाती है। इसलिए हम सिर्फ अचेतन पर ही जाग सकते हैं, चेतन पर जागते ही वह साये की तरह विलीन होने लगता है। जैसे पानी पर से लहरें विलीन होने लगती है और पानी में घुल जाती है उसी भांति चेतन मन के प्रति जागते ही चेतन मन विलीन हो अचेतन में घुल जाता है। लेकिन हमें पहले चेतन मन पर ही जागना होगा।_

       पहले हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि चेतन मन और अचेतन मन दोनों पर कैसे जागा जाए या दोनों के प्रति कैसे होश-पूर्ण हुआ जाए? 

सीधे चेतन मन से हम जागने की या होश-पूर्ण होने की शुरुआत नहीं कर सकते हैं। क्योंकि जब भी हमने चेतन मन से होश साधने की कोशिश की है हमें असफलता ही मिली है।

      _जब भी हमने विचारों को देखना चाहा है तो वे और भी तिव्र गति से चलने लगते हैं। विचारों को पकड़ना या उन्हें सीधे देखना पानी पर लकीर खींचने जैसा है, खींच भी नहीं पाते हैं और मिट जाती है।_

        सीधे चेतन मन के प्रति या कहें कि विचारों के प्रति होश-पूर्ण होना बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि मन शूक्ष्म है, विचार शूक्ष्म है और सूक्ष्म रास्ता हमारी पकड़ में नहीं आता है। और यात्रा तो उसी रास्ते से होगी जिस रास्ते को हम पकड़ सकें, जिस पर हमारे पैर जमने लगे। 

चेतन मन पर जागने के लिए पहले हमें शरीर के तल पर जागना होगा। क्योंकि शरीर स्थूल है और स्थूल हमारी पकड़ में आता है। चेतन मन सूक्ष्म है और शूक्ष्म हमारी पकड़ में नहीं आता है। दूसरे यह कि मन और शरीर दोनों एक-दूसरे का अनुगमन करते हैं क्योंकि शरीर का ही दूसरा छोर मन है। यानी वे एक-दूसरे से संयुक्त हैं!

     _यदि हम शरीर को प्रभावित करते हैं तो मन भी प्रभावित होता है और यदि मन को प्रभावित करते हैं तो शरीर भी प्रभावित होने लगता है। अर्थात यदि हम शरीर को नशे में ले जाते हैं, तो मन भी नशे में झूमने लगता है और यदि हम मन में क्रोध का विचार करते हैं तो शरीर भी क्रोधित होने लगता है!_

          अतः यदि मन को, विचार को होश पूर्वक देखना है तो पहले शरीर को होश पूर्वक देखना होगा। क्योंकि शरीर ही मन का दूसरा छोर है जो हमारी पकड़ में आता है। और अंततः तो एक छोर, दूसरे छोर को भी अपने साथ समेट लेता है।

यानी एक सिरे पर शरीर की क्रिया पकड़ में आ जाएगी तो दूसरे सिरे पर इस क्रिया से संबंधित चल रहा विचार भी हमारी पकड़ में आ जाएगा। सीधे विचार यानी मन को पकड़ना मुश्किल है। और फिर मन तो शरीर के भीतर है, बाहर तो शरीर है और शरीर ही हमारी पकड़ में आता है। भीतर का मन हमारी पकड़ में कैसे आएगा? 

       _यदि हम अपने स्थूल शरीर की क्रियाओं के प्रति होश साधने लगते हैं, जो हमारी पकड़ में आती है। अपने शरीर की क्रियाओं, उठने, बैठने, चलने-फिरने, क्रोध करने, श्वास लेने इत्यादि को होश पूर्वक देखने लगते हैं तो हमारा अचेतन में प्रवेश होना शुरू हो जाता है।_

       अपने शरीर की क्रियाओं के प्रति जागना ही अचेतन मन में प्रवेश करने की शुरुआत है। जब हम अपने शरीर की क्रियाओं को देखने लगते हैं तो हमारे विचार रूक जाते हैं। और जैसे ही विचार रूकते हैं, हम अचेतन मन के संपर्क में आ जाते हैं, या कहें कि अचेतन के निकट आ जाते हैं। 

हमारा ध्यान जहां होता है हमारी उर्जा उस दिशा में गति करने लगती है और उस केंद्र को सक्रिय करती है जिस पर हमारा ध्यान होता है। पूरे समय हमारा ध्यान मष्तिष्क में होता है जिससे हमारा मष्तिष्क सक्रिय होने लगता है और विचारों को जन्म देने लगता है।

      _मष्तिष्क विचारों का केंद्र है जहां पर विचार चलते हैं। यदि हम अपना ध्यान मष्तिष्क से हटाकर अपने शरीर की क्रियाओं पर लगाते हैं तो हमारे विचार रूक जाएंगे क्योंकि हमने अपना ध्यान उस केंद्र से हटा लिया है जहां विचार चलते हैं और वहां लगा दिया है जहां शरीर किसी क्रियाकलाप को अंजाम दे रहा है।_

       यानी हमने अपने विचारों के साथ कुछ भी नहीं किया है, विचारों से हमने कोई छेड़छाड़ नहीं की है। सिर्फ अपने ध्यान को विचारों से हटाकर चलने पर लगा दिया है। और विचार अब इसलिए भी नहीं आएंगे क्योंकि मष्तिष्क से ध्यान हटने पर मष्तिष्क विचार भी नहीं कर पाएगा क्योंकि उसे हमारे ध्यान की उर्जा नहीं मिलेगी। वो हमारे ध्यान देने की ऊर्जा से ही सक्रिय है। 

हम चल रहे हैं और हमने अपना ध्यान चलने की प्रक्रिया पर लगा दिया है तो विचार रूक जाएंगे। क्योंकि हम दो काम एकसाथ नहीं कर सकते हैं। या तो हम विचार कर सकते हैं या फिर अपने चलने को देख सकते हैं।

     _चलने की प्रक्रिया को देखने के लिए हमें विचारों से ध्यान तो हटाना ही पड़ेगा और विचारों से ध्यान हटाते ही हम निर्विचार में प्रवेश कर जाते हैं।_

         ठीक इसी तरह जिस तरह से हम अपनी परछाई को बाहर छोड़कर घर में प्रवेश कर जाते हैं। जितने समय तक हमारा ध्यान चलने पर होगा उतने समय तक विचार नहीं आएंगे और हम निर्विचार रहेंगे, विचार तभी आएंगे जब हमारा ध्यान चलने की प्रक्रिया से हटकर मष्तिष्क में जाएगा जहां विचार चलते हैं! 

यहां पर हमें साक्षी का स्मरण होने लगेगा। क्योंकि हमारा जो साक्षी है वह विचारों में बह रहा था। उसे हमने विचारों से हटाकर चलने की प्रक्रिया को देखने पर लगा दिया है। विचारों में साक्षी बह रहा था, यानी सोया हुआ था, हमने जैसे ही उसे विचारों से हटाकर चलने की प्रक्रिया को देखने में लगाया तो वह अचानक देखने लगा अर्थात होश से भर गया है।

     _या कहें कि जाग गया है, अपने आप में लौट आया है। अब साक्षी चलने की प्रक्रिया को देख रहा है। जब हम साक्षी हो जाते हैं और चलने की प्रक्रिया को देखने लगते हैं तो एक बात और भी घटती है। जो ऊर्जा विचारों में बह रही थी, वह ऊर्जा अब साक्षी की ओर बहने लगती है और हमारा साक्षी होना और भी मजबूत होने लगता है।_ 

        हम चल रहे हैं और हमारा ध्यान चलने की प्रक्रिया पर है। हमारा दांया पैर आगे उठा और बांया पैर पीछे छूट गया है… अब हमारा बांया पैर आगे उठा है और दांया पीछे छूट गया है। इस बात को मन में दोहराना नहीं है। सिर्फ इस बात का स्मरण हमें होता रहे। यानी पैरों के चलने की प्रक्रिया हमारे ध्यान में हो। 

      _पैरों पर ध्यान केंद्रित नहीं करना है। वह एकाग्रता हो जाएगी और हमारा चलना मुश्किल होगा। हमारा ध्यान पैरों के चलने पर तो हो ही, साथ ही इस बात पर भी हो कि पैरों के चलने के साथ ही हमारे हाथ भी आगे-पीछे गति करते हुए हमारे चलने की प्रक्रिया में सहयोग दे रहे हैं।_

         चलने के लिए संतुलन बनाने के लिए हमारे हाथ, पैरों की विपरीत दिशा में गति करते हैं। दांया हाथ बांए पैर के साथ गति कर रहा है और बांया हाथ दांए पैर के साथ गति कर रहा है। अतः चलते हुए पैरों के साथ ही हाथों का गति करना भी हमारे ध्यान में हो। 

      _हम चल रहे हैं, इसका हमें पूरा होश हो। चलने के साथ ही हमारे हाथ भी गति कर रहे हैं, इसका हमें होश हो। हमारे आसपास कई तरह की आवाजें आ रही है, इन आवाजों के प्रति भी हमारा ध्यान हो।_

       हम बिना किसी विरोध के सभी आवाजों को सुनते हैं। हमें इस बात पर भी कोई प्रश्न नहीं उठाना है कि पीछे यह गाड़ी वाला बिना वजह के हार्न क्यों बजा रहा है? हमें इसे स्वीकार करना है, हार्न में भी संगीत को तलाशना है।

यदि हम किसी भी बात को अस्वीकार करते हैं तो तुरंत चेतन मन उपस्थित हो जाता है और हमारा होश खोने लगता है। इसलिए स्वीकार भाव को ध्यान के प्राथमिक चरण में जोड़ा है। और गुरु भी शिष्यों से यही शर्त रखते थे कि जो भी कहा जाए वह करना है, कोई प्रश्न नहीं उठाना है। 

      _चलते हुए हमें अपने पैरों का ही साक्षी नहीं होना है, पूरे शरीर का साक्षी होना है। कपड़े यदि थोड़े से भी तंग हैं उसका हमें होश हो। जूता यदि ढीला या तंग हो, तो उसका भी हमारा होश हो। ध्यान में हमें अपने चारों ओर के वातावरण और अपने शरीर की क्रियाओं का पूरा होश रखना है।_

         अतः जिस तरह से दीया अपने चारों ओर रोशनी बिखेरता है, उसी तरह से हमें भी अपने चारों ओर ध्यान को बिखेरना है। सिर्फ एक जगह पर ध्यान केंद्रित करना एकाग्रता है। वह दिये की रोशनी नहीं, टार्च की रोशनी है, और वह ध्यान नहीं है। 

यदि हम अपने शरीर की क्रियाओं और अपने आसपास के वातावरण के प्रति होशपूर्ण हो जाते हैं तो हमारे विचार रुक जाते हैं। यानी हमारा चेतन मन सो जाता है और अचेतन जाग जाता है और हम अपने को अचेतन मन के तल पर खड़ा हुआ पाते हैं। 

       _जब हम चलते हैं तो चलने के लिए ऊर्जा को उपर उठाने के लिए हमारा शरीर नाभि तक गहरी श्वास लेता है, जिससे हमारे शरीर में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है और आक्सीजन हमारे शरीर में पड़ी हुई उर्जा को सक्रिय करती है और हम चलने लगते हैं। श्वास नाभि तक जाती है तो हमारा शरीर शिथिल होता है, और रीढ़ सीधी होती है जिससे शरीर का उपरी हिस्सा रीढ़ पर टंग जाता है जो शरीर के शिथिल होने में और भी मदद करता है।_

        यदि शरीर शिथिल होगा तो श्वास नाभि से चलेगी और शरीर में तनाव नहीं होगा और यदि शरीर में तनाव नहीं होगा तो मन में भी कोई तनाव नहीं होगा और विचारों को टिकने के लिए जगह नहीं होगी। हम निर्विचार होंगे यानी अचेतन पर होंगे।

      _अतः स्वास नाभि से चलने पर हमारा शरीर शिथिल अवस्था में आ जाता है। और यदि शरीर शिथिल हो जाता है तो विचार यानी चेतन मन भी शिथिल हो जाता है और हम अचेतन के निकट आ जाते हैं।_

        चलने पर भी हम अचेतन मन के निकट होते हैं बशर्ते रीढ़ सीधि हो। यदि चलते समय या बैठते समय रीढ़ सीधि होगी तभी शरीर शिथिल होगा और शरीर शिथिल होगा तो ही हम अचेतन के निकट होंगे और यदि रीढ़ झुकी होगी तो शरीर तनाव में होगा और हम विचारों में होंगे।

यानी शरीर शिथिल और विश्राम में होगा तो हम अचेतन के निकट होंगे और शरीर में तनाव होगा तो हम चेतन मन के निकट होंगे। 

      _जब हम शरीर की क्रियाओं के प्रति होश पूर्ण हो जाते हैं तो क्रिया की उर्जा हमारी ओर बहने लगती है। पहले हम क्रोध के साथ बह जाते थे तो हमारी सारी ऊर्जा क्रोध में नियोजित हो जाती थी। लेकिन अब हम क्रोध को देख रहे हैं तो उर्जा हमारी ओर, देखने वाले की ओर यानी साक्षी की ओर बहने लगती है, और हम अपने को अपने क्रोध का साक्षी हुआ पाते हैं।_

       हमारे साक्षी होते ही क्रोध की उर्जा साक्षी को मिलने लगती है और क्रोध विलीन होने लगता है। 

       _शरीर की क्रियाओं के प्रति होश साधने पर हमें वह कारण दिखाई पड़ता है जिससे क्रिया का जन्म हुआ। क्रोध का वह भाव दिखाई पड़ता है जिससे क्रोध की क्रिया हुई। और जब हम क्रोध के भाव के उठने पर भाव में न बहते हुए उसे देखने लगते हैं तो भाव की उर्जा हमारी ओर बहने लगती है और भाव विलीन होने लगता है।_

        यानी हमने क्रोध की क्रिया और क्रोध के भाव की उर्जा का देखने में, साक्षी साधना में उपयोग कर लिया है। 

जब पहले तल पर शरीर की क्रियाओं की उर्जा साक्षी को मिलने लगेगी तो दूसरे तल पर भाव दिखाई पड़ने लगेंगे। और जब दूसरे तल पर भाव की ऊर्जा भी साक्षी को मिल जाएगी तो तीसरे तथ तल पर हमें विचार दिखाई पड़ने लगेंगे। जब विचार दिखाई पड़ने लगते हैं तो विचारों की उर्जा भी हमारी ओर बहने लगती है और विचार गिरने लगते हैं। बालू की तरह बिखरने लगते हैं। 

      _धीरे-धीरे दो विचारों के बीच गैप दिखाई पड़ने लगती है। विचार रूक रूक कर आते हैं। ज्यों-ज्यों हमारा साक्षी गहराने लगता है त्यों-त्यों विचार गिरने लगते हैं। यदि पैंतालीस मिनट से एक घंटे यदि हम इस निर्विचार वाली स्थिति में ठहर जाते हैं तो हमारा ध्यान में प्रवेश हो जाता है और… हम अचेतन मन के तल पर प्रवेश कर जाते हैं।_

        दिन में विचार विलीन होंगे तो रात में स्वप्न भी विदा होने लगेंगे। नींद में भी हम जागे हुए रहेंगे। सपने आएंगे लेकिन बीच-बीच में जागने का अनुभव भी होता रहेगा। 

   जब हम चेतन और अचेतन दोनों तलों पर होश में होते हैं तो यह है ध्यान में प्रवेश करने वाली स्थिति। 

*इसके आगे की स्थिति क्या है?*

       एक घंटा यदि हम दो विचारों के बीच, यानी निर्विचार में ठहर जाते हैं तो हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो जाता है। और यदि हम चौबिस घंटे निर्विचार में ठहर जाते हैं तो हमारा अति-चेतन यानी सब-कांसियस मन के तल पर प्रवेश हो जाता है। 

     _सब-कांसियस के तल पर प्रवेश, यह पूरी तरह से निर्विचार वाली स्थिति है। जिसे चौथे शरीर में प्रवेश करना कहा गया है।_

        चेतन मन में हम रहते हैं जहां पर विचार ही विचार हैं। अचेतन मन में प्रवेश करने पर विचार आते भी हैं, हम निर्विचार भी होते हैं। कभी विचार आते हैं और कभी नहीं आते हैं। लेकिन सब-कांसियस में प्रवेश करने के बाद यदि हम चाहेंगे तो विचार आएंगे और यदि हम नहीं चाहेंगे तो विचार नहीं आएंगे। यहां हम विचारों को आॅन-आफ कर सकेंगे। 

        सब-कांसियस में प्रवेश इस स्थिति को हम दूसरे अर्थों में ब्रम्हचर्य भी कह सकते हैं। यहां आकर हम ब्रम्हचारी हो जाते हैं। जो सुख, जो आनंद कामवासना में उतरने पर हमें थोड़ी देर को ही मिलता है। वही आनंद इस स्थिति में हमें चौबीसों घंटे मिलने लगता है अतः कामवासना विदा हो जाती है।

      _कामवासना में हमारा थोड़ी देर के लिए सब-कांसियस मन में प्रवेश हो जाता है और हम आनंदित होते हैं।_

         यदि हम सब-कांसियस मन में प्रवेश कर जाते हैं तो यह आनंद चौबीसों घंटे मिलने लगता है, अंधी वाली कामवासना गिर जाती है और हम ब्रम्हचर्य में प्रवेश कर जाते हैं।

*अन-कांसियस में प्रवेश स्व-जागरण और सब-कांसियस में प्रवेश परमानंद का मार्ग :*

         कुंडलिनी जागरण (स्व-जागरण) घटित होता है अचेतन मन के तल पर, अन-कांसियस के तल पर। जब हम अचेतन मन में प्रवेश करते हैं तब कुंडलिनी जागरण घटित होता है.

       _बात यहां पर दोनों ओर से घट सकती है, यदि हम प्रयास से कुंडलिनी जागरण घटा लेते हैं तो हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो जाता है और यदि हम अचेतन मन में प्रवेश कर जाते हैं तो कुंडलिनी जागरण घटित हो जाता है।_

        पहले हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि अचेतन मन में प्रवेश कैसे करें? क्योंकि कुंडलिनी जागरण का तो हमें कोई भी पता नहीं है कि कुंडलिनी जागरण क्या है और कैसे घटित होगा? हां, अचेतन मन का हमें पता है कि अचेतन क्या है और कैसे काम करता है।

अचेतन हमें सपने दिखाता है। जो हमारी इच्छाएं दिन में अधूरी रह जाती है उन्हें वह रात सपने में पूरी करता है। हां, सपने में उसकी भाषा बदली हुई होती है, इसलिए हम समझ नहीं पाते हैं।

     _सारी चीजें याद भी यही रखता है। हम काम का विचार करते हुए जा रहे हैं और हमारे हाथ स्वतः ही अगले मोड़ पर हमारी गाड़ी का हेंडिल अपने घर की ओर मोड़ देते हैं जबकि हम तो विचारों में खोए हुए थे? यह काम अचेतन संचालित करता है।  रोज-रोज हेंडिल मोड़ने की वजह से यह बात अचेतन मन में दर्ज हो जाती है कि आगे से मोड़ना है और अचेतन ठीक समय पर हाथों को गाड़ी मोड़ने का आदेश दे देता है।_

        इसके लिए चेतन मन को सोचने की कोई जरूरत नहीं होती है, चेतन मन को सोचने की जरूरत तब होती है जब हम अनजान रास्ते पर जा रहे हों और वहां पर मुड़ना हो! 

       _अचेतन हमारा सबसे बड़ा राज़दार है। हमारी सारी स्मृति, भूत और भविष्य के सारे सपने सब इसमें दर्ज हैं।_

       हमने क्या-क्या पाप किये हैं और क्या-क्या पुण्य किये हैं वह सब इसमें दर्ज हे। हमारे पिछले जन्म की स्मृतियां भी इसमें दर्ज हैं, क्योंकि मृत्यु में हमारा अचेतन मन हमारे साथ जाता है।

 चेतन मन तो शरीर के साथ यहीं छूट जाता है और अचेतन मन हमारे साथ जाता है इसलिए इसमें पिछले जन्म की स्मृतियां भी दर्ज हैं। और अचेतन ही हमें अगले जन्म के लिए प्रेरित करता है।

     _हमारी कामनाएँ, हमारी वासनाएं इसी अचेतन मन में दर्ज होती है और उन्हीं के अनुसार यह हमें अगले जन्म में ले जाता है। अचेतन हमारा वाहन है अगले जन्म की यात्रा करने के लिए। जिस दिन अचेतन छूट जाएगा उस दिन से हमारा अगला जन्म भी छूट जाएगा और हम आवागमन से मुक्त होंगे।_

       अचेतन को छोड़ने के लिए हमें पहले अचेतन में प्रवेश करना होगा। जिस तल को छोड़ना है उस तल पर प्रवेश तो करना ही होगा, तभी हम उससे अगले तल में प्रवेश कर सकेंगे और यह तल छूट जाएगा! यानी हमें जिस सीढ़ी को छोड़ना है, पहले उस पर चढना होगा, फिर अगली सीढ़ी पर पैर रखेंगे तो यह पिछली सीढ़ी स्वतः ही छूट जाएगी।

   *कैसे प्रवेश करें अचेतन मन के तल पर?*

        अचेतन मन के तल पर प्रवेश करने के लिए पहले हमें चेतन मन को समझना होगा। चेतन मन जिसमें हम उलझे हुए हैं। जिसने हमें विचारों में उलझा रखा है। जब तक हम इसकी उलझन से बाहर नहीं आते हैं तब तक हम अचेतन मन में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। 

      _चेतन मन ने हमें उलझा रखा है। यह हमें अपने अनुसार संचालित करता है। और हम भी गुलामों की भांति इसकी जी हुजूरी में लगे रहते हैं। हमने कभी भी अपने शरीर की नहीं सुनी है। जो हमारे चेतन मन का ठोस आधार है। जो हमारे सुख दुख का साथी है। जो कभी कोई प्रश्न नहीं उठाता है! इसे जैसा करने को कहा, वैसा इसने किया है। हमने इसकी कभी सुनी ही नहीं है। इसलिए हम अचेतन मन से दूर हैं।_

       अच्छा संगीत बज रहा है और हमारे पैर थिरकने लगे हैं। पैरों में नाचने के लिए उर्जा उठी है, शरीर नाचना चाहता है और हमारे मन ने कहा कि “नाचना नहीं आता है, लोग क्या कहेंगे?” और हमने अपने को नाचने से रोक लिया। लोग क्या कहेंगे इस भय से हमने नाचने का आनंद गंवा दिया है।

   एक अवसर हमने गंवा दिया है जब हम अचेतन मन के निकट आ जाते। हमारा अचेतन में प्रवेश होने लगता।

दूसरी बात, जब संगीत पर पैरों में थिरकन हुई तो हमारे शरीर ने पैरों में उर्जा को भेज दिया है नाचने के लिए। शरीर मन की भाषा नहीं जानता है, उसे पता नहीं है कि मन नाचने नहीं देगा। शरीर ने नाचने की तैयारी कर ली और मन ने कहा कि नहीं नाचना है। तो जो ऊर्जा अपने श्रोत से आई है उसे वापस लौटाना मुश्किल ही नहीं है, असंभव भी है।

      _जो ऊर्जा शरीर ने नाचने के लिए पैरों में भेजी, और हम नहीं नाचे,  वह उर्जा वहीं अटक गई है। वह उर्जा परेशानी पैदा करेगी। हम कुर्सी पर बैठेंगे तो हमारे दोनों पैर हिलने लगेंगे, क्योंकि जैसे ही हम कुर्सी पर बैठते हैं और पैरों को जमीन पर टिकाते हैं तो हमारे पैर शिथिल हो जाते हैं। और पैरों के शिथिल होते ही जो ऊर्जा नाचने के लिए उठी थी और अटकी पड़ी है वह उर्जा सक्रिय होने लगती है और हम अपने दोनों पैरों को हिलाने लगते हैं।_

         यदि कोई हमसे पूछ बैठे कि “आप अपने दोनों पैर क्यों हिला रहे हैं?” तो हमारे पास कोई जवाब नहीं होता है, क्योंकि यह सारी चीजें अचेतन संचालित करता है। 

       यदि पैर नहीं हिलाएंगे तो रात को नींद में एंठन पैदा होगी और हमारी नींद बाधित होगी।

ध्यान में बैठने पर भी पैरों में अकड़न होगी हमारा ध्यान बाधित होगा। 

कई बार किसी से बहस में बात इतनी बढ़ जाती है कि भीतर मन कहता है कि “एक लात दे साले को।” जैसे ही मन लात मारने को कहता है, वैसे ही हमारा शरीर लात मारने के लिए पैरों में उर्जा को भेज देता है।

      _अब हमने लात नहीं मारी, क्योंकि बहस अपने से बड़े से हो रही थी। यहां लात खाने की तैयारी करनी पड़ रही थी। वह लात मारने के लिए उठी हुई उर्जा, लात नहीं मारने से वहीं पैरों में अटक जाती है।_

      नाचने के लिए पैरों में उठी हुई उर्जा और लात मारने के लिए पैरों में उठी हुई उर्जा हमारे पैरों में एंठन और अकड़न पैदा करेगी जो हमारे ध्यान में और नींद में दोनों में बाधा पैदा करेगा। हमें नाचकर और दौड़कर पैरों में और पूरे शरीर में दबी हुई सारी ऊर्जा को मुक्त करना है और साक्षी को देना है।

        नाचने में हम अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं और दौड़ने में भी हम अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं। अतः नाचने और दौड़ने में हमारे शरीर में दबी पड़ी ऊर्जा मुक्त हो साक्षी की ओर बहने लगती है। 

      _नृत्य में हम अचेतन मन के निकट होते हैं। जब हम नाचते हैं तो हमारा चेतन मन विलीन हो जाता है और अचेतन जाग जाता है क्योंकि शरीर अपने सारे तनाव भूलकर नाचने लगता है। हमारा सारा ध्यान संगीत पर होता है, ढोलक की थाप पर होता है। संगीत के साथ पैरों के उठने पर होता है।_

         इसलिए हमें विचार नहीं आते हैं और हम निर्विचार हो झूमने लगते हैं और हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो जाता है। नृत्य में जो आनंद है वह चेतन मन के विलीन होने और अचेतन मन में प्रवेश होने से आता है। 

        अचेतन मन में प्रवेश करने के लिए हमें अपने शरीर की बात सुनना होगी। हमारा शरीर क्या कहता है हमें उस पर ध्यान देना होगा। शरीर ने नाचना चाहा और हमने लोगों के भय से रोक लिया।

शरीर को नींद आ रही है और हम किसी काम में लगे हुए हैं। शरीर कह रहा है कि अब भोजन ज्यादा हो गया है और हम स्वाद के लिए खाए जा रहे हैं। यही कारण है कि हमारा शरीर कभी भी उस तल पर नहीं आ पाता है जिस तल पर अचेतन मन में प्रवेश होता है। 

       चेतन मन शरीर की सुन नहीं रहा है। शरीर को अपने हिसाब से ही चलाता है। यदि चेतन मन शरीर की सुनने लगे तो शरीर उस तल पर आने लगता है जिस तल पर अचेतन मन में प्रवेश किया जा सके। लेकिन यदि हमारा अचेतन मन में प्रवेश होगा तो चेतन मन को विदा लेनी होगी।

       इसलिए चेतन मन जिंदा रहने के लिए हमारे शरीर की नहीं सुनता है और उसे अपने अनुसार ही चलाता रहता है। 

अचेतन मन में प्रवेश करने के लिए हमें चेतन मन की नहीं सुनते हुए अपने शरीर की बात सुननी है। हमें अपने शरीर की प्रकृति के अनुकूल काम करने होंगे। जब शरीर को भूख लगे तब भोजन देना है और भोजन इतना ही देना है जितनी इसकी जरूरत है। जब शरीर को नींद आए तब सोना है। जब यह नाचना चाहे तब नाचना है। जब यह भाव में भरकर रोना चाहे तब इसे रोने देना है।

     _जब यह कोई खेल खेलकर पसीना बहाना चाहता है तो बहाने देना है। हमें अपने शरीर को सहयोग करना है उस काम में, जो काम यह करना चाहे! यानी हमारे शरीर को जिस काम को करने में आनंद आए वह काम हमें करना है।_

       यदि हम अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार जीने लगते हैं तो यह संतुलित होने लगता है। और शिथिल और शांत हो विश्राम में जाने लगता है। चेतन मन शरीर का दूसरा छोर है। यदि पहला छोर विश्राम में जाएगा तो दूसरा छोर भी विश्राम में जाएगा। यदि शरीर थका हुआ होगा और विश्राम में जाएगा तो चेतन मन भी विश्राम में जाएगा क्योंकि मन को उर्जा शरीर से ही मिलती है।

      _यदि शरीर दिन में काम करने, खेलने और श्रम करने से थक गया है, शरीर के पास अपनी कोई उर्जा नहीं बची है तो मन को विचार करने के लिए ऊर्जा नहीं मिलती है और वह भी सोने लगता है।_

       जैसे ही चेतन मन सोने लगता है वैसे ही अचेतन जागने लगता है। और जब अचेतन जागने लगता है तो अचानक हमें भीतर एक सन्नाटा सुनाई पड़ता है जो विचारों की अनुपस्थिति में आ खड़ा होता है।

       यह सन्नाटा तो पहले से ही अचेतन मन पर होता आया है लेकिन विचारों में उलझे होने के कारण हमें सुनाई नहीं पड़ता है।

      _यह सन्नाटा हमने कई बार सुना है। जब हमारा एक्सीडेंट होते-होते बचा था, तब हमने इस सन्नाटे को सुना है, उस समय हमारे दिल की धड़कन तेज हो गई थी, शरीर में कंपकंपी छूट गई थी और दिमाग में एक सन्नाटा छा गया था, यह सन्नाटा निर्विचार का था, एक्सीडेंट में मौत के भय से विचार रूक गये थे और हम निर्विचार हो अचेतन में प्रवेश कर गए थे और हमें सन्नाटा सुनाई देने लगा था।_

        दिन में हम श्रम करते हैं तो हमारी श्वास गहरी होकर नाभि तक जाती है जिससे हमारे शरीर में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। और पसीना बहने के कारण तनाव और विचार पैदा करने वाले तत्व शरीर के बाहर चले जाते हैं जिससे हमारा होश बढ़ता है और हम साक्षी होकर अचेतन मन के सन्नाटे को सुनने लगते हैं।

जब हम सन्नाटे को सुनने लगते हैं तब हमें साक्षी का स्मरण होने लगता है क्योंकि हमारा साक्षी सतत विचारों में खोया रहता है इसलिए हम उसका अनुभव नहीं कर पाते हैं। जब शरीर के थकने पर चेतन मन भी थककर सोने लगता है तब हमें अचेतन का सन्नाटा सुनाई देने लगता है और हम स्वयं को अपने शरीर के साथ ही अचेतन के इस सन्नाटे का साक्षी हुआ पाते हैं। जो सन्नाटे को सुन रहा है, यही साक्षी है। 

      _जब हम अपने शरीर के अनुसार आहार लेते हैं, सम्यक आहार लेते हैं। जब हम अपने शरीर के अनुसार श्रम करते हैं, मेहनत करके पसीना बहाते हैं और जब हम अपने शरीर के अनुसार ही नींद भी लेते हैं तो हमारा शरीर हल्का और शुद्ध होने लगता है और शरीर जब हल्का और शुद्ध होने लगेगा तो हमें अचेतन का सन्नाटा आसानी से सुनाई देने लगेगा।_

        जब हम रात को सोते समय नींद आने के पहले अचेतन मन के सन्नाटे को सुनने लगते हैं तब हमारे विचार रूके हुए होते हैं। क्योंकि शरीर के थके हुए होने पर चेतन मन भी थककर सोने लगता है और दूसरा यह कि हम या तो विचार कर सकते हैं या फिर सन्नाटे को सुन सकते हैं।

       शरीर के थके होने पर विचार करना मुश्किल होता है जबकि सुनना सहज होता है अतः हम सहज ही सुनने की ओर प्रवाहित होने लगते हैं। 

जब हम निर्विचार में हो रहे सन्नाटे को सुनते रहते हैं… सुनते रहते हैं… सुनते रहते हैं…बिना किसी विचार के तो पैंतालीस मिनट से एक घंटे में हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो जाता है और कुंडलिनी जागरण घटित हो जाता है। हम अपने को अपने शरीर का साक्षी हुआ पाते हैं।

     _यानि शरीर जमीन पर पड़ा है और हम खड़े हैं। अपने शरीर को देखते हुए। इसे कहते हैं साक्षी का घटना। यहां मृत्यु का पूरा आभास होगा। लेकिन हम शरीर में ही होंगे, सिर्फ हमारा शरीर से तादात्म्य टूट जाएगा। विधियां छूट जाएंगी, क्योंकि सारी विधियां साक्षी तक ही ले जाती है।_

      विधियों की व्यर्थता समझ में आ जाएगी और हमारी साक्षी साधना शुरू हो जाएगी 

जब अचेतन मन में प्रवेश करने के बाद कुंडलिनी उर्जा उपर उठती है और हमारे अचेतन मन के तल को जाग्रत करने लगती है, सक्रिय करने लगती है और जब कुंडलिनी उर्जा से हमारा अचेतन पूरी तरह से जाग्रत हो जाता है या हम अचेतन मन पर पूरी तरह से जाग जाते हैं, साक्षी हो जाते हैं तब स्वतः ही हमारा अतिचेतन या कहें कि सब-कांसियस मन में प्रवेश हो जाता है और हम तुरीय को, या कहें कि चौथे शरीर को उपलब्ध हो जाते हैं। 

*पुनश्च :*

    कुंडलिनी जागरण इतना सस्ता नहीं है कि हाथों को उपर-नीचे करने और थोड़ी बहुत उछल-कूद करने से घटित हो जाएगा! सतत साधना होगा। धैर्य इतना रखना होगा कि अगले जन्म में भी परिणाम मिलते हैं तो हमें मंजूर है। गहन साधना से गुजरना होगा। शरीर को साधना होगा। शरीर की प्रकृति के अनुसार जीना होगा।.

     _जब तक हम साधना के प्रमुख तीन चरणों को पूरा नहीं करते हैं, सम्यक भोजन, सम्यक श्रम और सम्यक नींद को नहीं अपनाते हैं, तब तक अचेतन मन में प्रवेश और कुंडलिनी जागरण घटित होना मुश्किल है।_

     यदि हम संकल्प और धैर्य पूर्वक आगे बढ़ते हैं तो बहुत कम समय में बहुत कुछ घटित हो सकता है। जब घटित होता है तब स्व के जागरण के अलोक में सब-कांसियस यानी परमानंद में प्रवेश का द्वार स्वतः दिखने लगता है. 

       {चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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