डॉ. प्रिया
यदि हम एक हज़ार व्यक्तियों को लें तो उनमें नौ सौ निन्यानवे व्यक्ति दुष्ट, स्वार्थी, कपटी और बदमाश मिलेंगे और अच्छा-भला व्यक्ति मिलेगा केवल एक और उस एक को खोजने निकलेंगे तो पहले उन नौ सौ निन्यानवे से भेंट होगी और वे नौ सौ निन्यानवे व्यक्ति आपको भेंटस्वरूप एक-एक बुराई देते जायेंगे।
अन्त में परिणाम यह होगा कि जब तक हम उस एकाकी अच्छे व्यक्ति के पास पहुंचेंगे, तब तक हम स्वयं इतने भारी बदमाश, स्वार्थी, कपटी और चरित्रहीन बन चुके होंगे कि उस एकमात्र अच्छे चरित्रवान व्यक्ति का प्रभाव न पड़ सकेगा हम पर।
इसलिए हे बन्धु ! यदि जीवन को गंगाजल की तरह हम पवित्र शुद्ध और निर्मल (हालाँकि गंगाजल भी इसी तरह दुष्ट लोगों के कारण लगातार प्रदूषित होता जा रहा है) रखना चाहते हैं तो कम-से- कम व्यक्तियों के संपर्क में आएं।
संसार में सबसे सरल काम है संसार में–दूसरे की निन्दा करना, बुराई करना, दूसरों में दोष निकालना और सबसे कठिन काम है–आत्मपरीक्षण। हम हर समय अच्छे और सज्जन होने का मुखौटा लगाये दूसरों को धोखा देते रहते हैं। यह बात भले ही दूसरों से छिपी रहे परन्तु अपनी आत्मा को भी जो धोखा देना है, वह कैसे छिपा रह सकेगा ? सबसे छिपा लेंगे अपने पापों को लेकिन अपनी आत्मा से कभी नहीं छिपा सकेंगे।
संसार, समाज से दूर आत्मलीन व्यक्ति अंतर्मुखी होता है, वह दूसरों की तुलना में असामान्य भी होता है। साधारण लोग उसे समझ नहीं सकते। उन्हें समझाने की उसे आवश्यकता भी नहीं है। वे समझेंगे भी तो बेवकूफ। वे यह नहीं समझेंगे कि ऐसे आत्मलीन अंतर्मुखी व्यक्ति के ह्रदय में एक दर्द रहता है और वह दर्द है–उसका प्राण और उसका अश्रुसिंचित भावुक जीवन।
भावुक जीवन में कई लोग अपने बनकर आ जाते हैं, पर वे ठहरते नहीं। स्वार्थ के वशीभूत होकर जीवन के किस अंधे मोड़ पर खो जाते हैं, पता भी नहीं चलता।





