नेताजी सुभाष चंद्र बोस के एक नारे
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’’ ने पूरे देश में आजादी के दीवानों में जोश से भर दिया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
के अग्रणी नेताओं में से एक सुभाष चंद्र बोस मां भारती के एक ऐसे सच्चे सपूत थे जिनके नेतृत्व में आजाद हिंद फौज ने भारत
की स्वाधीनता के लिए लड़ाई लड़ी थी और अंग्रेजों को चुनौती दी थी। नेताजी ने आजाद हिंद सरकार का भी गठन किया था
जिसके 75 साल पूर्ण होने पर इतिहास में पहली बार साल 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराया
था। 23 जनवरी 2021 को नेताजी के 125वीं जयंती के अवसर पर भारत सरकार ने स्मरणोत्सव मनाने के लिए एक साल
तक चलने वाले समारोह का शुभारंभ किया और उनकी जन्म जयंती 23 जनवरी को पराक्रम दिवस मनाने का भी लिया
निर्णय…
वर्ष 1897 में 23 जनवरी को ओडिशा के कटक में जन्में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने युग से काफी आगे की सोच रखते थे
और आजादी से उनका मतलब सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति तक ही सीमित नहीं था बल्कि वह राष्ट्र की नींव को मजबूत
कर देश को आत्मनिर्भर भी बनाना चाहते थे। वह गरीबी को, अशिक्षा को, बीमारी को, वैज्ञानिक उत्पादन की कमी को देश
की सबसे बड़ी समस्याओं में गिनते थे। यही कारण है कि उनकी आजाद हिंद सरकार ने हर क्षेत्र से जुड़ी योजनाएं बनाई थी।
इसका अपना बैंक था, मुद्रा थी, अपना डाक टिकट था, अपना रेडियो स्टेशन था, अपना जनतंत्र था। नेताजी ऐसे व्यक्ति थे
जिन्होंने पूरे भारत में जाति, पंथ, रंग, भाषा, क्षेत्रवाद की दीवारों को ढहा कर पूरे देश को एक राष्ट्र के सूत्र में पिरोने का काम
किया था। उन्होंने देशवासियों को एकता का जो मंत्र दिया और वह मंत्र कितना असरदायक था इसका उदाहरण है पंजाब के
कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लन, जनरल शाहनवाज खान और कर्नल प्रेम कुमार सहगल। आजाद हिंद सेना के इन सैनिक
अधिकारियों का जब कोर्ट मार्शल हुआ तो संप्रदायिक आधार पर अकाली दल ने कर्नल ढिल्लन व मुस्लिम लीग ने जनरल
शाहनवाज खान का केस लड़ने का प्रस्ताव दिया लेकिन इन सैनिक अधिकारियों ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था और उस
समय यह नारा काफी बुलंद हुआ था ‘लाल किले से आई आवाज- सहगल, ढिल्लन, शाहनवाज।’ महात्मा गांधी से ‘नेताजी’
की उपनाम पाने वाले सुभाष चंद्र बोस का दिया हुआ नारा ‘जय हिंद’ आज भारत का राष्ट्रीय नारा बन चुका है। आजादी के
अमृत महोत्सव के इस कड़ी में इस बार सुभाष चंद्र बोस के सहयोगी और आजाद हिंद फौज के सिपाहियों कैप्टन अब्बास
अली, रासबिहारी बोस, गुरबख्श सिंह ढिल्लन, कर्नल निजामुद्दीन की कहानी। जिन्होंने ना केवल अंग्रेजों से लोहा लिया
बल्कि नेताजी के ‘भारत बुला रहा है। रक्त, रक्त को आवाज दे रहा है। उठो, हमारे पास अब गंवाने के लिए समय नहीं है’ के
आह्वान पर देश की खातिर प्राण न्यौछावर करने को उठ खड़े हुए थे।

कैप्टन अब्बास अली
अंग्रेजी सेना छोड़ आजाद
हिंद फौज में हुए थे शामिल
जन्म : 3 जनवरी 1920, मृत्यु : 11 अक्टूबर 2014
‘ऐ दरिया-ए-गंगा तू खामोश हो जा, ऐ दरिया-ए-सतलज तू स्याहपोश हो जा…भगत सिंह तुमको फिर से आना पड़ेगा…
हुकूमत को जलवा दिखाना पड़ेगा।’ इन पंक्तियों को गाकर नौजवानों की कई पीढ़ियों को इंकलाब का पाठ पढ़ाने वाले बुलंद
आवाज वाले कैप्टन अब्बास अली का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा में 3 जनवरी 1920 को हुआ था। वे
स्वाधीनता सेनानियों के परिवार से थे और उनके दादा रुस्तम अली खान को 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद उत्तर
प्रदेश के बुलंदशहर में फांसी दी गई थी। जब अंग्रेजों ने भगत सिंह को फांसी दी, उस समय अब्बास अली महज 11 साल के थे।
बावजूद इसके वह विरोध प्रदर्शनों में भाग लेते रहे और नौजवान भारत सभा में शामिल हो गए जिसकी स्थापना भगत सिंह
और उनके साथियों ने की थी। बाद में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वे ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य
बने और 1939 में वह विद्रोह के इरादे के साथ ब्रिटिश इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए। 1940 में उन्हें जापान के खिलाफ लड़ाई
में दक्षिण-पूर्व एशिया के मोर्चो पर भेजा गया। हालांकि, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जब 1944 में सिंगापुर से सशस्त्र क्रांति
का बिगुल फूंका तो उनकी ललकार सुनकर कैप्टन अब्बास अली ने अंग्रेजी सेना की नौकरी छोड़ दी और वे आजाद हिंद फौज
में शामिल हो गए। बाद में उन्होंने म्यांमार के वर्तमान प्रांत रखाइन में ब्रिटिश सेना के साथ लड़ाई लड़ी लेकिन जब
जापानियों ने मित्र देशों की सेना के समक्ष समर्पण कर दिया तो अब्बास अली के साथ आजाद हिंद फौज के 60 हजार से
अधिक सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद अब्बास अली को उनके तीन साथियों के साथ मुल्तान के किले में
रखा गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। अब्बास अली का कोर्ट मार्शल किया गया और आखिरकार 1946 में उन्हें फांसी
की सजा सुनाई गई। बाद में जब देश आजाद हो गया तो उन्हें रिहा कर दिया गया।

रासबिहारी बोस
जन्म : 25 मई 1886, मृत्यु : 21 जनवरी 1945
आजाद हिंद फौज को खड़ा करने वाले प्रमुख नेता
जब नेताजी देश से बाहर निकल कर जर्मनी गए तो रासबिहारी बोस को लगा कि आजाद हिंद फौज का नेतृत्व सुभाष चंद्र
बोस से बेहतर कोई और नहीं कर सकता है। ऐसे में उन्होंने नेताजी को आमंत्रित करने का निर्णय लिया और जब नेताजी
सुभाष चंद्र बोस 20 जून 1943 को टोक्यो पहुंचे तो रासबिहारी बोस ने उनसे भेंट कर बांग्ला में बात की और देश को अंग्रेजों
की गुलामी से मुक्त कराने का संकल्प लिया। रासबिहारी बोस को नेताजी से काफी उम्मीदें थी। दरअसल, ऐसा होना
स्वाभाविक था क्योंकि दोनों व्यक्तियों में काफी समानाताएं थी। दोनों बोस थे, बंगाली थे, क्रांतिकारी थे और साथ ही एक
दूसरे के प्रशंसक भी थे। ऐसे में रासबिहारी बोस ने 5 जुलाई को सिंगापुर में आजाद हिंद फौज की कमान नेताजी के हाथों में
सौंप दी और खुद को सलाहकार की भूमिका तक सीमित कर लिया। रासबिहारी बोस से जो मदद हो सकती थी, उन्होंने की।
माना जाता है कि आजाद हिंद फौज की कमान मिलने के बाद ही नेताजी की असली लड़ाई शुरु हुई थी। रासबिहारी बोस का
जन्म 25 मई, 1886 को बंगाल के वर्धमान जिले के सुभलदा गांव में हुआ था। स्कूली दिनों से ही वह क्रांतिकारी गतिविधियों
की ओर आकर्षित होने लगे थे और बहुत ही कम उम्र में उन्होंने क्रूड बम बनाना सीख लिया था। बंकिम चंद्र के उपन्यास आनंद
मठ से उनके अंदर क्रांति की भावना उमड़ पड़ी थी और उन पर स्वामी विवेकानंद और सुरेंद्रनाथ बनर्जी के राष्ट्रवादी भाषणों
का भी बहुत प्रभाव था। ऐसा माना जाता है कि खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में मजिस्ट्रेट किंग्सफर्ड को
मारने के लिए जिस बम का इस्तेमाल किया था उसे रासबिहारी बोस ने ही बनाया था। इतना ही नहीं, उन्होंने 1912 में
क्रांतिकारियों के नेतृत्व में उस समय के भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग को मारने की भी योजना बनाई थी लेकिन वे इस
प्रयास में विफल रहे और गदर आंदोलन में सक्रिय हो गए। अंग्रेजों के निशाने पर आने और उससे बचने के लिए वह किसी की
सलाह पर जापान चले गए थे और भारत की मदद के लिए जापानी सरकार को तैयार किया था। उन्होंने एक जापानी लड़की
से शादी की थी और जापान सरकार ने रासबिहारी बोस को दूसरे सबसे बड़े अवॉर्ड ‘ऑर्डर ऑफ राइजिंग सन’ से भी
सम्मानित किया था। वह एक असाधारण नेता थे जिनके सांगठनिक कौशल ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक बड़े हिस्से का
निर्माण किया। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।

दोनों बोस थे, बंगाली थे, क्रांतिकारी थे और साथ ही एक दूसरे के प्रशंसक भी थे।
आजाद हिंद फौज को पांच रेजिमेंट में बांटा गया था
सुभाष ब्रिगेड- नेतृत्व कर रहे थे कर्नल शाहनवाज खान।
गांधी ब्रिगेड- कर्नल इनायत कियानी के नेतृत्व में।
आजाद ब्रिगेड- कर्नल गुलजारा सिंह।
नेहरू ब्रिगेड- ले. कर्नल गुरबक्श सिंह ढिल्लन।
झांसी की रानी रेजिमेंट – कैप्टन लक्ष्मी सहगल। यह महिलाओं की ब्रिगेड थी।

गुरबख्श सिंह ढिल्लन
जन्म : 18 मार्च 1914
मृत्यु : 06 फरवरी 2006
आजादी के दीवाने लाखों नौजवानों को
एक सूत्र में बांधने का किया था काम
पढ़ाई-लिखाई में तेज होने और कद-काठी भी ठीक होने के कारण गुरबख्श सिंह ढिल्लन के पिता के एक दोस्त ने उन्हें सेना में
भर्ती होने की सलाह दी थी। फिर क्या था। उन्होंने तैयारी शुरु कर दी और 1933 में इंडियन आर्मी में भर्ती हो गए। 14 वीं
पंजाब रेजिमेंट में चुने जाने और ट्रेनिंग के बाद वह 1941 में द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने के लिए मलेशिया चले गए। हालांकि,
उनके जीवन में अहम मोड़ तब आया जब 1942 में जापान की सेना ने उन्हें युद्ध बंदी बना लिया। जेल में रहने के दौरान
उनका मन बदल गया और उन्होंने अपने देश की खातिर लड़ने का मन बनाया और ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ने को तैयार
हो गए। ऐसे में जब वह जेल से छूटे तो वह सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाले आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए और देश के
लिए अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार हो गए। आजाद हिंद फौज के सिपाही के तौर पर ढिल्लन ने खूब बहादुरी
दिखाई और अपने पराक्रम का परिचय देते हुए अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया। हालांकि, युद्ध में जापानियों के हार के कारण
ढिल्लन सहित आजाद हिंद फौज के कई सिपाहियों को 1945 में गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर ‘लाल किला ट्रायल’
नामक ऐतिहासिक मुकदमा चलाया गया। ढिल्लन के मुकदमे की पैरवी के लिए देश के कई नामचीन वकील सामने आए और
अदालत में उनके बचाव में जबर्दस्त पैरवी की। उन पर मुकदमा चलाने का मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया और लोगों का
आक्रोश खुलकर सामने आने लगा। नेताजी ने भारतीयों के एक सूत्र में बंधने की जो कल्पना की थी वो साकार होने लगी थी
और भयानक साम्प्रदायिक दंगों के बावजूद, धर्म की दीवारें, इस ट्रायल के आगे टूट चुकी थी। दूर-दराज से आकर लोग
लालकिले के बाहर जमा होने लगे थे। ऐसे में अंग्रेजों को समझ आ गया था कि अगर इन तीनों को सजा दी गई तो पूरे देश में
विद्रोह की आग भड़क उठेगी। ऐसे में अंग्रेजों ने मजबूर होकर गुरबख्श सिंह ढिल्लन सहित आजाद हिंद फौज के सभी सैनिकों
को रिहा कर दिया। इस मुकदमे का महत्व इसलिए भी है कि इसने हमारी आजादी के संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाया। 5
नवंबर, 1945 से 31 दिसंबर, 1945 यानी 57 दिन तक चला यह मुकदमा हिन्दुस्तान की आजादी के संघर्ष में टर्निंग पाईंट
था। यह मुकदमा कई मोर्चों पर हिन्दुस्तानी एकता को मजबूत करने वाला साबित हुआ। भारत सरकार ने 1998 में गुरबख्श
सिंह ढिल्लन को देश सेवा के लिए ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया था।
गुरबख्श सिंह ढिल्लन को देश सेवा के लिए ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।

कर्नल निजामुद्दीन
जिन्होंेने नेताजी को बचाने पीठ पर गोलियां खाईं
वाराणसी में 9 मई 2014 का दिन था जब एक मंच पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बुजुर्ग के पांव छूए
थे। वह बुर्जुग व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि कर्नल निजामुद्दीन थे जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अगुवाई वाले संगठन आजाद
हिंद फौज के सदस्य रहे थे। माना जाता है कि वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गाड़ी चलाया करते थे और 11 भाषाओं के
जानकार होने के साथ-साथ गजब के निशानेबाज भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने लड़ाई में एक बार अंग्रेजों का विमान मार
गिराया था। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के ढकवा गांव में पैदा होने वाले कर्नल निजामुद्दीन को सुभाष चंद्र बोस ने कर्नल
का नाम दिया था और वह बर्मा में उनकी गाड़ी चलाते थे। नेताजी से उनके मजबूत रिश्तों का संकेत इस बात से मिलता है कि
वर्ष 2015 में सुभाष चंद्र बोस की प्रपौत्री राज्यश्री चौधरी, निजामुद्दीन से मिलने आजमगढ़ गई थीं। माना जाता है कि
निजामुद्दीन ब्रिटिश आर्मी में पैराट्रूपर थे लेकिन अपने मद्रासी और कश्मीरी सैनिकों के साथ सेना छोड़ वह सुभाष चंद्र बोस
के साथ चले गए थे। कर्नल निजामुद्दीन आजाद हिंद फौज से जुड़ी हुई एक बात का जिक्र अक्सर किया करते थे और कहते थे
उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को बचाने के लिए अपनी पीठ पर तीन गोलियां खाई हैं। वह बताया करते थे कि किसी ने नेताजी को
निशाना बना कर गोलियां चलाई थी और उन्हें बचाने के प्रयास में उनके पीठ पर तीन गोलियां लगी थी जिसे डॉक्टर लक्ष्मी
सहगल ने निकाला था। निजामुद्दीन की मृत्यु आजमगढ़ के मुबारकपुर में फरवरी 2017 में हुई। n
नेताजी से उनकी पहली मुलाकात सिंगापुर में हुई थी और वहां आजाद हिंद फौज की भर्ती चल रही थी।
जिन्हें दुश्मन भी
करते थे सैल्यूट

फील्ड मार्शल भारतीय थल सेना का सर्वोच्च पद है। लेकिन आजाद भारत के इतिहास में सिर्फ जनरल को इस तक पहुंचने का
मौका मिला है, उनमें से एक हैं जनरल कोडांदेरा मदप्पा करियप्पा। सेना के पहले भारतीय कमांडर इन चीफ, जिन्होंने 15
जनवरी 1949 को पद ग्रहण किया और इसीलिए हर वर्ष इस दिन को ‘सेना दिवस’ के रूप में मनाया जाता है…
जन्म : 28 जनवरी 1899, मृत्यु : 15 मई 1993
शौर्य, सामर्थ्य और अनुशासन के मामले में भारतीय सेना दुनिया के किसी भी देश की सबसे बेहतरीन सेनाओं में शामिल है
तो इसका श्रेय उन जनरल को भी जाता है, जिन्होंने समय-समय पर सेना की कमान संभाली। इन सबमें पहला नाम है,
जनरल केएम करियप्पा का, जो न केवल अपने अनुशासन, बल्कि निडरता, अडिग फैसले के साथ देशप्रेम के लिए आज भी
याद किए जाते हैं। वर्ष 1922 में स्थाई कमीशन लेकर सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर सेवा देने वाले करियप्पा फील्ड
मार्शल के उस शीर्ष पद तक पहुंचने वाले दूसरे जनरल थे। 5 सितारा रैंक का यह सम्मान उनके अलावा सिर्फ जनरल सैम
मानेक शॉ को हासिल है। 28 जनवरी 1899 में कर्नाटक के कुर्ग में शनिवर्सांथि नामक स्थान पर जन्मे फील्ड मार्शल करियप्पा
ने महज 20 वर्ष की आयु में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी शुरू की थी। उनके पिता कोडांडेरा माडिकेरी में एक राजस्व
अधिकारी थे। उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे किस्से हैं, जिनमें न सिर्फ उनके व्यक्तित्व, बल्कि सहयोगियों के बीच सम्मान,
अनुशासन और निडरता भरे उनके फैसलों का जिक्र होता है।
लेह को भारत का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका
नवंबर 1947 में करियप्पा को सेना के पूर्वी कमान का प्रमुख बना कर रांची में तैनात किया गया। लेकिन दो महीने के अंदर
ही जैसे ही कश्मीर में हालत खराब हुए, उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल डडली रसेल के स्थान पर दिल्ली और पूर्वी पंजाब का जीओसी
इन चीफ बनाया गया। उनकी बनाई गई योजना के तहत भारतीय सेना ने पहले नौशेरा और झंगर पर कब्जा किया और फिर
जोजिला, द्रास और कारगिल से भी हमलावरों को पीछे धकेल दिया।
पाकिस्तान ने सम्मान सहित लौटाया बेटा
बात 1965 की है जब भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था। जनरल करियप्पा काफी समय पहले रिटायर होकर
कर्नाटक के मेरकारा में अपने घर पर रह रहे थे। वहीं उनके बेटे नंदा करियप्पा भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट थे।
युद्ध के आखिरी दिन फ्लाइट लेफ्टिनेंट नंदा करियप्पा पाकिस्तानी ठिकानों पर बमबारी करने वाले मिशन को लीड कर रहे
थे। ग्राउंड अटैक के दौरान उनका विमान नष्ट हुआ और करियप्पा को पाकिस्तान ने बंदी बना लिया। पाकिस्तान के राष्ट्रपति
अयूब खान जनरल करियप्पा के अधीन सेना में काम कर चुके थे। उन्होंने जनरल करियप्पा को पेशकश की कि अगर वे चाहें
तो उनके बेटे को छोड़ा जा सकता है। करियप्पा ने विनम्रता से इनकार करते हुए कहा कि नंदू मेरा नहीं, देश का बेटा है। उसके
साथ वही बर्ताव किया जाए जो दूसरे युद्धबंदियों के साथ किया जा रहा है।
पाकिस्तानी सैनिकों ने अपने हथियार किए नीचे
भारत-पाकिस्तान युद्ध खत्म होने के बाद करियप्पा भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने भारत-पाकिस्तान सीमा पर गए थे।
इस दौरान उन्होंने सीमा पार कर ‘नो मैन लैंड’ में प्रवेश कर लिया। उन्हें देखते ही पाकिस्तनी कमांडर ने आदेश दिया कि वो
वहीं रुक जाएं, वरना उन्हें गोली मार दी जाएगी। भारतीय सीमा से किसी ने चिल्ला कर कहा ये जनरल करियप्पा हैं। ये
सुनते ही पाकिस्तानी सिपाहियों ने अपने हथियार नीचे कर लिए।
जनरल करियप्पा 1953 में सेना से रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने काम जारी रखा और 1956 तक ऑस्ट्रेलिया
और न्यूजीलैंड में बतौर हाई कमीश्नर काम किया।





