शशिकांत गुप्ते
महामारी अब नए नाम के साथ आरही है। सम्भवतः नाम बदलने का रोग बीमारी को भी लग गया।
इस नए ओमिक्रांन बीमारी ने शेयर बाजार को गिरा दिया। शेयर यह अंग्रेजी शब्द है। हिंदी में इसे अंश कहतें हैं।
शेयर कागज़ का होता है। समाचार माध्यमों को कागज़ के बने शेयर के गिरने की आवाज भी सुनाई देती है। इसीलिए सामाचारों की सुर्ख़ियों में लिखतें हैं,शेयर धड़ाम से नीचे गिरा।
लेखक इस मुद्दे पर अपने विचार पाठकों के साथ शेयर (Share) अर्थात साझा करना चाहता है।
शेयर का बाजार होता है। बाजार में शेयरों की कीमत घटती बढ़ती है। शेयर व्यापार में सलग्न लोग प्रतिदिन शेयरों की खरीदी बिक्री करतें हैं। इस व्यापार को ट्रेडिंग कहतें हैं।
यह होता है शुद्ध Speculation मतलब सट्टा।
Speculation का एक अर्थ अनुमान भी होता है। इस व्यापार में शरीक लोगों के अनुमान हमेशा सही निकलेंगे जरूरी नहीं हैं।
Speculation का महत्व तो राजनीति में भी बहुत है। चुनाव के समय सट्टा बाजार सक्रिय हो जाता है।
लोकतंत्र जनता के वोट की कीमत अमूल्य होती है।दुर्भाग्य से चुनाव के दौरान इस अमूल्य वोट कीमत का आकलन सट्टेबाजी से होता है।चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की योग्यता,सट्टेबाजों के अनुमान के आगे गौण हो जाती है। इसीतरह राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों में किए गए वादें चुनाव जीतने के बाद भलेही जुमलों में तब्दील हो जाएं, लेकिन किस दल की सरकार बनेगी इसका अनुमान भी सट्टेबाजी से लगया जाता है।
यह सुनने पढ़ने और देखने में भलेही हास्यास्पद लगे लेकिन वास्तविकता में होता तो है।
इसीतरह बहुत से उत्पादकों की उत्पादन करने वाली मशीनों के कलपुर्जे आर्थिक तंगी से भलेही जाम हो गए हो बावजूद विज्ञापनों के आधार पर उद्योगों को सक्रिय रूप से चलायमान दर्शाया जाता है। ऐसे उद्योगों के शेयर पर भी बाजार में तेजी मंदी का खेल चलता ही है? ऐसे ही एक राजनैतिक दल है,जो देश में सर्वत्र कीचड़ फैलाने के लिए आमादा है।यह दल भी विश्व का सबसे बड़ा दल होने का दावा करता है। वास्तविक रूप में यह दल देश के बहुत से राज्यों में दूसरें तीसरें नंबर पर है।
शेयर बाजार के उतार चढ़ाव को समाचार माध्यमों में इतना महत्व दिया जाता है,मानो यह सट्टे का खेल ही देश की अर्थनीति का मापदण्ड है।
इसतरह जानबूझकर ग़लतफहमी पैदा की जाती है।
यह एक रणनीति के तहत किया जाता है। यह रणनीति जनता के मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सुनियोजित षडयंत्र के आधार पर बनाई जाती है।
यह तो सट्टेबाजी की बात हुई।
व्यवहारिक प्रश्न तो यह है कि वह दिन कब आएंगे जब समाचार माध्यमों को आसमान छूती महंगाई दिखाई देगी?बेरोजगारों का आक्रोश कब सुनाई देगा?चिकित्सा व्यवस्था की दुर्दशा से पीड़ित मरीजों के वेदनाओं की कराह कब सुनाई देगी? कुपोषण से कुपित लोगों की खामोश चीख समाचार माध्यमों को सुनाई नहीं देती है?
हरएक क्षेत्र में Speculation की आदत के कारण बहुत से लोग Calculation करना भूल गएं हैं।अब सिर्फ Manipulation करतें हैं।
अंत यही विचार साझा करना है कि अति का अंत होता ही है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





