अग्नि आलोक
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*मिथ्या प्रचार पर आधारित है जोधा अकबर की कहानी*

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         ~ सुधा सिंह 

जयपुर के रिकॉर्ड के अनुसार अकबर की शादी किसी जोधा से नहीं बल्कि ‘हरकू बाई’ से हुई थी, जो मानसिंह की दासी थी. पुरातत्व विभाग भी जोधा को एक झूठ मानता है। अकबर कालीन किसी इतिहासकार ने जोधा और अकबर की प्रेमकथा का कोई वर्णन नहीं किया !

 इतिहासकारों ने अकबर की मुख्यतया 5 बेगमें बताई हैं :

1. सलीमा सुल्तान।

2. मरियम उद ज़मानी।

3. रज़िया बेगम।

4. कासिम बानू बेगम।

5. बीबी दौलत शाद।

     अकबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा अकबरनामा में किसी जोधा से विवाह का कोई उल्लेख नहीं किया। कुछ इतिहासकारों ने अकबर की मृ’त्यु के लगभग 300 साल बाद 18 वीं सदी में मरियम उद ज़मानी को जोधा बाई बताकर एक अफवाह फैलाई. इसी अफवाह के आधार पर अकबर और जोधा की प्रेमकथा के किस्से शुरू किये गये. अकबरनामा ही नहीं  जहाँगीरनामा के अनुसार ऐसा कुछ नहीं था! 

    18 वीं सदी में मरियम को हरखा बाई का नाम देकर, उसको मानसिंह की बेटी होने का प्रचार शुरू किया गया। फिर 18 वीं सदी के अन्त में एक ब्रिटिश लेखक जेम्स टॉड ने अपनी किताब “एनैलिसिस एंड एंटीक्स ऑफ राजस्थान” में मरियम से हरखाबाई बनी रानी को जोधाबाई बताना शुरू कर दिया. इस तरह यह झूठ आगे जाकर इतना प्रबल हो गया कि आज भारत के स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया.   

     क्या हजारों की संख्या में एक साथ अग्निकुण्ड में जौ’हर करने वाली क्षत्राणियों में से कोई स्वेच्छा से किसी मुगल से विवाह कर सकती है ?

   अकबरनामा ही नहीं, जहांगीर की आत्मकथा तुजुक-ए-जहाँगीरी तक में ऐसा उल्लेख नहीं मिलता. जहाँगीर अपनी माँ जोधाबाई का एक बार भी उल्लेख नहीं करता : यह मुमकिन नहीं.

आमेर के राजा भारमल को दहेज में रुकमा नाम की एक पर्सियन दासी भेंट की गई थी, जिसकी एक छोटी पुत्री भी थी। रुकमा की बेटी होने के कारण उस लड़की को रुकमा-बिट्टी के नाम से बुलाया जाता था। आमेर की महारानी ने रुकमा बिट्टी को हीर कुवँर नाम दिया। हीर कुँवर का लालन पालन राजपूताना में हुआ, इसलिए वह राजपूतों के रीति-रिवाजों से भली भाँति परिचित थी।

     राजा भारमल उसे कभी हीर कुवँरनी तो कभी हरका कह कर बुलाते थे। राजा भारमल ने अकबर को बेवकूफ बनाकर अपनी पर्सियन दासी रुकमा की पुत्री हीर कुवँर का विवाह अकबर से करा दिया, जिसे बाद में अकबर ने मरियम-उज-जमानी नाम दिया ! 

    चूँकि राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था, इसलिये ऐतिहासिक ग्रन्थों में हीर कुवँरनी को राजा भारमल की पुत्री बताया गया, जबकि वास्तव में वह कच्छवाह की राजकुमारी नहीं, बल्कि दासी-पुत्री थी !

     राजा भारमल ने यह विवाह एक समझौते की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन के तौर पर किया था। इस विवाह के विषय में अरब में बहुत सी किताबों में लिखा गया है !

(“ونحن في شك حول أكبر أو جعل الزواج راجبوت الأميرة في هندوستان آرياس كذبة لمجلس”) हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें सन्देह है

इसी तरह इरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में, एक भारतीय मुगल शासक का विवाह एक पर्सियन दासी की पुत्री से करवाये जाने की बात लिखी है !

     अकबर-ए-महुरियत में साफ-साफ लिखा है : (ہم راجپوت شہزادی یا اکبر کے بارے میں شک میں ہیں) हमें इस हिन्दू निकाह पर सन्देह है, क्योंकि निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आँखों में आँसू नहीं थे और न ही हिन्दू गोदभराई की रस्म हुई थी ! 

      17 वीं सदी में जब परसी भारत भ्रमण के लिये आये तब उन्होंने अपनी रचना परसी तित्ता में लिखा, “यह भारतीय राजा एक पर्सियन वेश्या को सही हरम में भेज रहा है, अत: हमारे देव (अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें!” 

भारतीय राजाओं के दरबारों में राव और भाटों का विशेष स्थान होता था। वे राजा के इतिहास को लिखते थे और विरदावली गाते थे. उन्होंने लिखा है :

गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज ले ग्याली पसवान कुमारी, राण राज्या 

 राजपूता ले ली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत ! (1563 AD).

     मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है! हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतो, तुमने इतिहास में ले ली, बिना लड़े पहली जीत 1563 AD !

Ramswaroop Mantri

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