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लाल किले की कहानी, उसी की जुबानी

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सुरेश मिश्र

अगर आप एक पर्यटक के तौर पर दिल्ली आते हैं तो ऐसा हो नहीं सकता कि आप मुझसे मिले बगैर रह सकते हैं। मैं यानी लाल किला। हाल ही में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान कुछ शरारती तत्वों ने मेरे सीने पर चढ़कर जो कुछ किया, उससे दिल बहुत दुखी हो गया। हालांकि बीते करीब 400 सालों के दौरान मैं वैभव और पतन के इतने दौर से गुजर चुका हूं कि इसे भी एक दुर्भाग्यशाली पल की हिमाकत समझकर भूल जाना चाहूंगा। मेरी कहानी शुरू होती है मुगल खानदान के सबसे वैभवशाली बादशाह शाहजहां से। मेरे बारे में उन्हें पहला विचार तब आया था, जब उन्होंने अपनी राजधानी आगरा से बदलकर दिल्ली ले जाने का तय किया। वह साल 1638 का कोई माह रहा होगा जब दिल्ली में यमुना नदी के किनारे लाल पत्थरों से मेरे निर्माण की रूपरेखा बनी। मुझे बनकर तैयार होने में लगभग एक दशक का वक्त लग गया, जो लाजिमी भी था। मैं हूं ही इतना विशालकाय, करीब 92 एकड़ क्षेत्र में फैला।

शाहजहां से उसके पुत्र क्रूर औरंगज़ेब तक…

उस जमाने में दुनिया के सबसे समृद्ध बादशाह शाहजहां से रिश्ता बनाने के लिए कितने ही विदेशी राजदूतों को मैंने बादशाह का सजदा करते हुए देखा। मैंने शाहजहां के बेटों दाराशिकोह, शुजा, मुराद और औरंगजेब को जवान होते देखा और कई साल बाद यह भी कि औरंगजेब ने किस तरह से अपने भाइयों के खून पर कदम रखकर गद्दी हथियाई। मुझे याद है वह क्रूर वक्त जब औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां से शाही खजाना हासिल करने के लिए मेरी पूरी जल प्रदाय व्यवस्था ही बंद कर दी थी। तब शाहजहां ने औरंगजेब को ख़त में लिखा था- ‘पिसर तू अजब मुसलमानी, ब पिदरे जिंदा आब तरसानी। आफरीं बाद हिंदवान सद बार, मैं देहदं पिदरे मुर्दारावा दायम आब।’ (बेटा तू अजीब मुसलमान है कि जीवित पिता को पानी के लिए तरसा रहा है। प्रशंसनीय हैं वे हिन्दू जो अपने मृत पूर्वजों को भी पानी देते हैं।) शाहजहां का यह ‘अजब मुसलमान’ बेटा 1658 में लाल किले के तख्ते ताउस पर बैठा और फिर उसके शासन के पचास साल इस मुल्क के लिए जिल्लत भरे रहे।

शिवाजी को पीना पड़ा था अपमान का घूंट…

1666 में राजा जयसिंह के साथ औरंगजेब से मुलाकात के लिए आए शिवाजी को दरबार में अपमान का घूंट पीना पड़ा था। लेकिन इस अपमान के बाद मराठों ने मुगल बादशाहों को चैन न लेने दिया। तब दक्खिन से मराठा पेशवा बालाजी विश्वनाथ अपने जवान बेटे बाजीराव के साथ दिल्ली आए थे। तब मुझे यह गुमान भी नहीं था कि अगली सदी में दक्खिन के मराठे मेरे भाग्य की नई इबारत लिखेंगे। लेकिन अगली सदी आने में अभी काफी वक्त था। अभी तो मेरे प्रभामण्डल के धूमिल होने के दिन थे।

नादिर शाह ने कर लिया था तख़्त पर क़ब्ज़ा…

ईरान के आक्रान्ता नादिरशाह ने दिल्ली की सड़कों पर जो कत्लेआम किया, उसे भी देखने का दुर्भाग्य मेरी इन आंखों को मिला। यह बात 1739 की है जब बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला का शासन था। उसी दौरान नादिरशाह ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। एक झगड़े में कुछ ईरानी सिपाही क्या मारे गए, नादिरशाह ने दूसरे दिन ही दिल्ली में कत्ले आम का हुक्म दे दिया जो आठ घंटे चला जिसमें दिल्ली के करीब तीस हजार नागरिक मारे गए। नादिरशाह ने खजाने से मोती, हीरे, जवाहरात और प्रसिद्ध तख्ते ताउस पर तो कब्जा किया ही, दिल्ली छोड़ते समय 10 करोड़ रुपए भी ले गया। इसके बाद के पंद्रह साल बेहद तंगी में गुजरे। मैंने सुल्तान आलमगीर द्वितीय को लकड़ी के सिंहासन पर बैठा देखा, क्योंकि बादशाह की आय आना बंद हो गई थी और प्रशासन ठप था।

पानीपत की लड़ाई के बाद फिर लूटा गया…

1761 की पानीपत की लड़ाई में जब अफगान अहमदशाह अब्दाली जीता तो उसने न सिर्फ मेरी सारी दौलत हड़प ली बल्कि हरम की महिलाओं को भी अपने कब्जे में ले लिया। पानीपत की इस हार के दस साल बाद मैंने एक चमत्कारी मंजर देखा। मुगल बादशाह शाहआलम ने अपनी रक्षा की खातिर 1784 में मराठा सरदार महादजी सिंधिया को अपना वकील-ए-मुतलक बना दिया। यानी कालचक्र अब उलटा घूम गया था और साल 1666 में हुए शिवाजी के अपमान का बदला ले लिया गया।

ग़ालिब और ज़ौक़ की शायरियां भी सुनीं …

और फिर मैंने अंग्रेजों की बढ़ती हुई ताकत को भी देखा। 1806 में नाममात्र के मुगल बादशाह अकबरशाह द्वितीय की सल्तनत सिर्फ मुझ लाल किले तक सीमित हो गई। यह सिलसिला 1837 में उसकी मौत तक चला। उसके उत्तराधिकारी बहादुरशाह द्वितीय के वक्त शाही परिवार की गुजर-बसर अंग्रेजों से मिली पेंशन से मुश्किल से चलती थी। अब शाही रौनक की जगह शेरो-शायरी ने ले ली थी, जिनमें उर्दू के मशहूर शायर असदुल्ला खां ‘ग़ालिब’, ‘मोमिन’ और शेख़ इब्राहीम ‘ज़ौक़’ शिरकत करते थे। उनकी आला शायरी पर मैं भी कई बार ‘वाह वाह’ किए बगैर ना रह सका। लेकिन यह भी तब खत्म हो गया जब 1857 के विद्रोह में शामिल होने के कारण अंग्रेजों ने बहादुरशाह को बंदी बना लिया। मेरे सामने ही बादशाह पर मुकदमा चला। उन्हें देश निकाले की सजा दी गई। मुझसे विदा होकर अपनी बीवी, दो बेटों और एक बहू के साथ रंगून जाना पड़ा और कुछ साल बाद वहीं उनकी मौत हुई।

फिर आया आज़ादी का वह ऐतिहासिक पल…

1945-46 में आजाद हिन्द फौज के देशभक्त सेनानियों पर देशद्रोह का मुकदमा भी मेरे सामने ही चला। इस मुकदमे के खिलाफ देशभर में हुई तीखी प्रतिक्रिया भी मैंने सुनी। और फिर आया वह ऐतिहासिक पल जब मेरे ऐतिहासिक ललाट पर एक नया तिलक लगा- 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी का। मेरी प्राचीर से स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का भाषण- ‘हमने नियति के साथ एक समझौता किया था….’ सुनने का भी सौभाग्य मिला।

अद्भुत है लाल किले की हर संरचना …

लाहौरी गेट : यह किले का मुख्य द्वार है। हर साल प्रधानमंत्री इसी गेट की प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं। इस गेट का नाम लाहौरी इसलिए पड़ा क्योंकि यह लाहौर की ओर खुलता है। औरंगजेब ने यहां साढ़े 10 मीटर ऊंची प्राचीर बनवा दी थी। इस पर उस समय नजरबंद उसके पिता शाहजहां ने उसे पत्र लिखकर कहा था, ‘तूने किले को दुल्हन बनाकर उस पर घूंघट डाल दिया।’

दीवान-ए-आम : लाल पत्थर की इस इमारत में आम दरबार लगता था जहां बादशाह आम लोगों के प्रतिनिधियों से मिलते थे। 540 गुना 420 फीट आकार वाले, दोहरे पतले स्तंभों और लहरदार मेहराबों वाले इस सभागृह में ही बादशाह शाहजहां का प्रसिद्ध रत्नजड़ित मयूर सिंहासन होता था। माना जाता है कि बाद में नादिर शाह इस सिंहासन से कीमती रत्न लूटकर ले गया था।

दीवान-ए-ख़ास : सफेद संगमरमर से बने इस खूबसूरत सभागृह में बादशाह का खास दरबार लगता था जिसमें दरबार के नवरत्न और ऊंचे दर्जे वाले खास मंसबदार अपनी तय जगह पर बैठते थे। यहीं पर बादशाह के खास मेहमानों की आवभगत की जाती थी और सम्मानसूचक वस्त्र व तोहफे दिए जाते थे।

ख़ास महल : यह शासक का मुख्य महल हुआ करता था जो बहुत सुंदर और अलंकृत था। इससे एक अष्टकोणीय बुर्ज जुड़ा हुआ था, जिस पर खड़े होकर बादशाह हर सुबह ‘झरोखा दर्शन’ के वक्त आम लोगों को दर्शन देता था।

नहरे-बहिश्त : नहरे-बहिश्त यानी जन्नत की नहर। यह लाल किले की बहुत ही रोचक संरचना थी। इसमें पास ही बहने वाली यमुना नदी का पानी बहता था जो लाल किले के हर प्रमुख भवन से होकर गुजरता था।

(सुरेश मिश्र इतिहासकार और इतिहास पर दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं।

Ramswaroop Mantri

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