राम !
इस गलत फहमी में मत रहना
कि तुम्हारे लौट आने भर से
हो गई थी अयोध्या की
काली रातें प्रकाशित…..!
याद रखना राम
तुम्हारे राजमहलों और राजपथों को
प्रदीप्त करते उन लाखों दीपकों में
जो तेल और बाती जले थे
वे किसानों और मजदूरों के
खून-पसीने की कमाई थे…!
और यह भी याद रखना राम
कि वह भी
ऐसी ही तेल, रूई और चिंगारी का कमाल था
कि एक रात
अतिप्रकाशित हो उठी थी लंका भी…!
राम !
बहुत ज्वलनशील होता है
किसानों और मजदूरों का पसीना…!
साभार सुप्रसिद्ध कवि व लेखक- रामकिशोर मेहता ,अहमदाबाद, गुजरात, संपर्क - 919408230881, ईमेल - ramkishoremehta9@gmail.com
संकलन -निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, -9910629632,ईमेल-nirmalkumarsharma3@gmail.com




