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*संविधान का अधूरा सपना: बराबरी की खोज में भारत*

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-तेजपाल सिंह  ‘तेज’

 

          भारत का संविधान दुनिया के सबसे प्रगतिशील लोकतांत्रिक दस्तावेजों में से एक है। यह सिर्फ़ शासन का ढांचा नहीं,  बल्कि एक सामाजिक क्रांति का संकल्प है — जहाँ जाति, वर्ग, धर्म, लिंग, और जन्म की असमानताओं को मिटा कर एक नए, समतामूलक भारत की नींव रखी गई थी। 26 नवंबर 1949 को जब संविधान सभा ने इसे अपनाया, तो डॉ. भीमराव अंबेडकर ने एक ऐतिहासिक चेतावनी दी — “हमने एक व्यक्ति को एक वोट देकर राजनीतिक समानता दी है,
लेकिन जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं आएगी,यह राजनीतिक समानता टिक नहीं सकेगी।” आज, सात दशकों से अधिक समय बाद, यह सवाल फिर सामने खड़ा है — क्या संविधान का वह सपना पूरा हुआ? या हमने उसे केवल किताबों और समारोहों तक सीमित कर दिया? इन्हीं सवालों को लेकर डॉ. लक्ष्मण यादव की वाणी एक आईना बन जाती है, जो हमें दिखाती है कि संविधान सिर्फ़ “लागू” नहीं हुआ — उसे भीतर से कमजोर कर दिया गया है। डॉ. अंबेडकर की चेतावनी से लेकर डॉ. लक्ष्मण यादव की पुकार तक — क्या सच में संविधान पूरी तरह लागू हो पाया है?

 1. संविधान की ऐतिहासिक आत्मा: संघर्ष से जन्मा दस्तावेज़:

          संविधान किसी दान या उपहार का परिणाम नहीं था। यह सदियों के शोषण, जातीय भेदभाव, और औपनिवेशिक दमन के   विरुद्ध संघर्ष का निष्कर्ष था। अछूतों, स्त्रियों, किसानों, मजदूरों, और वंचित वर्गों ने अपने अधिकारों के लिए  जो लंबी लड़ाई लड़ी — वही संविधान का प्राण बनी। डॉ. अंबेडकर ने इसे सामाजिक इंजीनियरिंग का दस्तावेज़ कहा था, जो भारत को आधुनिक, न्यायपूर्ण, और समानता-आधारित राष्ट्र बनाता है। संविधान ने पहली बार कहा कि कोई ब्राह्मण या शूद्र नहीं होगा — सब नागरिक होंगे। यह वही क्रांति थी जिसने धर्मग्रंथों की ऊँच-नीच को कानून के सामने निष्प्रभावी कर दिया। पर इतिहास का यह गौरव आज विडंबना में बदलता जा रहा है। कानूनी बराबरी तो है, पर सामाजिक वास्तविकता अब भी असमान है। गांवों में आज भी जाति के नाम पर हत्या होती है, और संविधान दिवस पर हम उसी हिंसा की खबरें पढ़ते हैं।

 

2. सामाजिक समानता: अधूरी यात्रा:

          इंद्रा मेघवाल, रोहित वेमुला, डॉ. पायल तड़वी —ये नाम सिर्फ़ व्यक्ति नहीं, बल्कि उस अधूरी यात्रा के पड़ाव हैं जहाँ समानता की सड़क अब भी टूटी पड़ी है। संविधान ने छुआछूत को अपराध घोषित किया, पर मानसिक छुआछूत आज भी समाज की नसों में है। अभी भी कोई “घोड़े पर चढ़” नहीं सकता, कोई “मूंछ रख” नहीं सकता, कोई “पानी का घड़ा छू” नहीं सकता। डॉ. अंबेडकर ने कहा था— जाति भारत के सामाजिक जीवन का विष हैऔर जब तक यह विष समाप्त नहीं होगास्वतंत्रता केवल छलावा है।” आज, जब शासन सत्ता जातीय गणना से कतराती है, तो यह साफ है कि सत्ता की  सुविधा के लिए जाति भुला दी जाती है, पर सत्ता की राजनीति के लिए जाति को भुनाया जाता है। यही विरोधाभास संविधान की आत्मा को चोट पहुंचाता है।

3. आर्थिक असमानता: नया रूप, पुराना संकट:

          संविधान कहता है कि राज्य सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करेगा। लेकिन आज सरकारी नौकरियाँ लगातार घट रही हैं, पेंशन योजनाएँ समाप्त कर दी गई हैं, और “संविदा कर्मियों” का एक नया अस्थायी वर्ग तैयार हो गया है — जो काम तो सरकारी करता है, पर अधिकार किसी निजी कंपनी के जैसे रखता है। डॉ. लक्ष्मण यादव कहते हैं — “मौजूदा प्रधानमंत्री ने अपने बुजुर्गों की पेंशन बंद कर दी। सरकारी नौकरियाँ लगभग 1% से भी कम रह गई हैं।” यह केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक नीति का क्षरण है। क्योंकि सरकारी नौकरी और शिक्षा ही वह माध्यम थे जिनसे वंचित समाज मुख्यधारा में प्रवेश कर पाया था। अब जब वे दरवाज़े बंद हो रहे हैं, तो संविधान की सीढ़ियाँ ही हटा ली गई हैं।

4. शिक्षा: संविधान की रीढ़ पर हमला:

          संविधान के अनुच्छेद 21A ने सभी को शिक्षा का अधिकार दिया। पर आज शिक्षा बाज़ार में बिकने वाला उत्पाद बन चुकी  है। नई शिक्षा नीति (2020) के तहत “स्व-वित्तपोषित” पाठ्यक्रमों ने गरीब और वंचित वर्गों को उच्च शिक्षा से दूर धकेल दिया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की फीस 440% तक बढ़ी। सरकार कहती है — हम ऋण देंगे।” पर एक गरीब छात्र के लिए ऋण, अवसर नहीं, बोझ है। और जब शिक्षा बिकेगी, तो अवसर वर्ग-जाति के हिसाब से बँट जाएगा। यही कारण है कि डॉ. यादव कहते हैं — “जब शिक्षा बिक गई, तो आधा आरक्षण खत्म हो गया।” क्योंकि निजी संस्थानों में न आरक्षण है, न सामाजिक जिम्मेदारी। और यही है संविधान को भीतर से समाप्त करने की चाल — कलम छीन लो, तलवार पकड़ा दो।

5. संस्थागत क्षरण और लोकतंत्र का ह्रास:

          भारत का संविधान शक्ति-संतुलन की व्यवस्था देता है — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — तीनों स्वतंत्र। पर आज इन संस्थाओं की स्वतंत्रता पर गहरा सवाल है। चुनाव आयोग, जो संविधान की आत्मा है, अब कार्यपालिका के नियंत्रण में आ गया है।  ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाएं विपक्ष को कुचलने के औज़ार बन गई हैं। लोकतंत्र चुनावों तक सीमित कर दिया गया है, और मशीनों ने दिमाग को “हैक” कर लिया है। डॉ. अंबेडकर की चेतावनी याद आती है —“अगर सत्ता चलाने वाले लोग नैतिक न हुए, तो सबसे अच्छा संविधान भी बेकार साबित होगा।” आज वही स्थिति है —संविधान तो बचा है, पर उसका नैतिक तंत्र नष्ट हो रहा है।

6. धर्म और राजनीति: संविधान के लिए सबसे बड़ा खतरा:

          संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को भारत की आत्मा में रखा। पर आज धर्म राजनीति का हथियार बन गया है। मंदिर और मस्जिद के नाम पर वोट माँगे जा रहे हैं, जबकि अस्पताल और स्कूल गायब हैं। डॉ. यादव का प्रश्न सीधा है — “अगर सरकार मंदिर बना सकती है, तो वहाँ अस्पताल क्यों नहीं बना सकती? वहाँ स्कूल क्यों नहीं बना सकती?” संविधान हर धर्मग्रंथ से ऊपर है —यही उसकी ताकत है, और यही कुछ लोगों के लिए असहज सच्चाई। जब धर्म को संविधान से ऊपर रखा जाएगा, तो लोकतंत्र केवल धर्मतंत्र में बदल जाएगा।

 

7. नागरिक का कर्तव्य: गांव लौटना, समाज से जुड़ना:

          बाबा साहब की एक कथा हमें याद रखनी चाहिए। जब उनके समुदाय का एक युवक ICS बना, तो बाबा साहब ने कहा — “महीने में दो बार अपने गाँव जाओ।” क्योंकि जब समाज का बच्चा किसी को सफलता में देखता है, तो उसके भीतर विश्वास जन्म लेता है। आज यही काम हमें करना है। हम पढ़े-लिखे लोग केवल अपने कमरे और दफ़्तरों में सीमित न रहें।
गाँवों तक जाएँ, संविधान को सरल भाषा में समझाएँ। क्योंकि जब जनता को अपने अधिकारों का बोध होगा, तभी संविधान जीवित रहेगा।

संविधान को बचाने का अर्थ:

          सारांशत: संविधान कोई पत्थर की लकीर नहीं, यह एक जीवंत दस्तावेज है — जो हर पीढ़ी से संवाद चाहता है। पर अगर हम मौन रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी —“जब तुम थे, तब सरकारी शिक्षा थी, सरकारी नौकरी थी, संविधान जिंदा था। तुम  हमारे लिए क्या छोड़कर गए?” आज हमें यह स्वीकार करना होगा — संविधान संकट में है। पर संकट में ही उसकी सबसे बड़ी संभावना भी छिपी है। अगर हम पढ़ेंगे, समझेंगे, और गाँव-गाँव में संविधान का पाठ पहुँचाएँगे, तो यह दस्तावेज़ फिर से जी उठेगा। क्योंकि अंततः — संविधान किताब में नहींजनता की चेतना में ज़िंदा रहता है। डॉ. लक्ष्मण यादव की  आवाज़ हमें याद दिलाती है — संविधान को बचाने का अर्थ है बराबरीन्याय और वैज्ञानिक सोच को बचाना। और यही आज हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है। (https://www.facebook.com/watch/?v=943274674448337&rdid=bJxsRmOFr4qRHQOc)

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With Best Regards

Tejpal Singh ‘Tej’

Mobile : 9911414511

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