स्वास्थ्य को मुनाफ़े का साधन नहीं मानता क्यूबा
26 जून, 1945 को सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में अपनाए गए संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय IX ‘अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक और सामाजिक सहयोग’ के अनुच्छेद 55 के पैराग्राफ 2, में कहा गया है कि ‘समान अधिकारों और लोगों के आत्मनिर्णय के सिद्धांत के सम्मान के आधार पर राष्ट्रों के बीच शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए आवश्यक स्थिरता और कल्याण की स्थिति बनाने के लिए, संयुक्त राष्ट्र सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में समस्याओं के समाधान को बढ़ावा देगा…’।
वास्तव में, स्वास्थ्य एक मानव अधिकार है, जिसे कई अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संधियों द्वारा मान्यता प्राप्त है। हालांकि, आज, स्वास्थ्य क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निवेशित निजी पूंजी का प्रभुत्व है, जिनका प्राथमिक उद्देश्य आबादी की चिकित्सकीय आवश्यकताओं को पूरा करना नहीं, बल्कि अधिकाधिक निजी मुनाफ़ा कमाना है। इस वजह से दुनिया भर में बहुत सारे लोग स्वास्थ्य बीमा से वंचित हैं।
क्यूबा स्वास्थ्य को एक बाज़ार-उत्पाद मानने से इनकार करता है और स्वास्थ्य के अधिकार को प्रभावी बनाने का प्रयास करता है। अन्य जगहों पर स्वास्थ्य की इस अवधारणा को अक्सर अपूर्ण रूप से लागू किया जाता है। क्यूबा की स्वास्थ्य की अवधारणा प्रमुख कानूनी ग्रंथों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की घोषणाओं के मूल भाव से जुड़ी है। यह पूंजीवाद द्वारा दी गई व्याख्या का विरोध करती है, जो आम तौर पर सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के दृष्टिकोण को अस्वीकार करती है। पूंजीवाद का तर्क यह है कि सार्वभौमिक कवरेज से राज्य के ख़र्च में वृद्धि होगी, जबकि उसकी असल चिंता होती है कि इससे उन लोगों के लिए मुनाफ़ा बटोरने के अवसर कम हो जाएंगे जो दूसरों के स्वास्थ्य की कीमत पर ख़ुद को समृद्ध बनाते हैं और मुनाफ़े पर एकाधिकार रखते हैं।
1959 की क्रांति के शुरुआती फ़ैसलों में ही क्यूबा ने स्वास्थ्य प्रणाली का निर्माण करने तथा इसे विकास की रणनीति के केंद्र में रखने का संकल्प लिया। तमाम प्रतिबंधों व प्राकृतिक संसाधनों की कमी के बावजूद दक्षिण के इस छोटे से देश ने स्वास्थ्य क्षेत्र में असाधारण विकास कर दिखाया। इस प्रणाली की विशेषता है इसकी सार्वजनिकता, जिसके तहत सार्वभौमिक कवरेज, साधारण परामर्श से लेकर गंभीर सर्जरी तक सभी प्रकार की स्वास्थ्य सेवाओं का पूर्ण निःशुल्क प्रावधान और इलाज की बजाय रोकथाम पर ज़ोर दिया जाता है।
इस प्रणाली की विशिष्टता है “पारिवारिक चिकित्सक और नर्स” देखभाल मॉडल। यह जनता की माँगों और उनके परिवेश में आ रहे बदलावों के अनुरूप काम करता है। यह कार्यक्रम पूरी आबादी के लिए है, जो गर्भावस्था के दौरान प्रसवपूर्व देखभाल से लेकर वृद्धों की सहायता तक, तथा वयस्क जीवन के दौरान निरंतर निगरानी और शीघ्र निदान से लाभ उठा सकती है। परामर्श केंद्र सामुदायिक जीवन के बीचोंबीच स्थित हैं, जहां स्वास्थ्य संबंधी सलाह मुफ़्त में दी जाती है तथा दोनों पक्ष बिना किसी दबाव के मिल पाते हैं (क्योंकि मरीज़ों पर समय-सीमा का बंधन नहीं होता, और चिकित्सकों पर रोगियों का हुजूम तैयार करने का, इत्यादि)।
कमज़ोर लोगों के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए नियमित रूप से घर-घर जाकर भी जाँच की जाती है। इस प्रणाली की बदौलत आपातकालीन मामलों, अस्पताल में भर्ती और सर्जरियों की संख्या में कमी आई है, कई महामारी संबंधी बीमारियों पर काबू पाया गया और देश के स्वास्थ्य संकेतकों को उल्लेखनीय रूप से संतोषजनक स्तर तक बढ़ाया जा सका है। इस प्रकार क्यूबा अधिकांश संक्रामक और ग़रीबी-संबंधी बीमारियों को ख़त्म करने में सफल रहा है और उसने एक विकसित देश के समान स्वास्थ्य ढांचा हासिल कर लिया है।
क्यूबा वर्तमान में अपने सकल घरेलू उत्पाद का 6% से अधिक और बजटीय व्यय का 27% स्वास्थ्य पर ख़र्च करता है। वहां चिकित्सा अनुसंधान को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया गया। 1959 के तुरंत बाद शिक्षा व्यवस्था में सुधार लागू किए व ऐसा मानव संसाधन तैयार किया गया कि जल्द ही उच्च योग्यता वाले वैज्ञानिकों की आवश्यकता को पूरा करना संभव बन गया। 1980 के दशक में, राज्य ने साइंटिफिक पोल बनाया, जो कि फार्मास्युटिकल उद्योगों का एक समूह था जो आत्म-निर्भर रूप से आवश्यक, प्रभावी और सस्ती दवाओं का निर्माण करने में सक्षम था तथा उभर रहे जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी काम करना शुरू कर चुका था।
उस समय, स्थानीय रूप से तैयार किए गए इंटरफेरॉन [वे प्रोटीन जिन्हें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बनाती है] तथा पहली क्यूबा मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ [लैब में बनाए गए प्रोटीन जो किसी ख़ास वाइरस/कोशिका पर काम करते हैं] का सफलतापूर्वक उत्पादन किया गया था। इसके बाद, जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव प्रौद्योगिकी केंद्र, फिनले संस्थान और कई अन्य विशिष्ट अनुसंधान केंद्र बनाए गए। 2012 में, इन सब संगठनों से मिलकर बायोक्यूबाफार्मा समूह की स्थापना की गई।
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, क्यूबा ने 1960 से 2020 के बीच जीवन प्रत्याशा और शिशु मृत्यु दर जैसे संकेतकों में संयुक्त राज्य अमेरिका को पीछे छोड़ दिया था। क्यूबन स्वास्थ्य प्रणाली की जन-जन तक पहुँच के कारण यह अन्य देशों की तुलना में कोविड-19 महामारी से अधिक मानवीय और प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम रहा। जनता को पूरी और सच्ची जानकारी दी गई। [महामारी की] प्रोटोकॉल में विशेष रूप से रीकॉम्बिनंट ह्यूमन इंटरफेरॉन अल्फा-2बी फॉर्मूला का इस्तेमाल शामिल था, लेकिन गंभीर रोगियों को दूसरी स्थानीय रूप से उत्पादित दवाएं भी दी गईं।
पूरे देश में 28,000 से अधिक मेडिकल छात्रों को तैनात किया गया था ताकि वे प्रतिदिन लगभग चालीस लाख लोगों से घर-घर जाकर जानकारी ले सकें। इस शोध के आधार पर क्यूबा ने खुद अपने टीके विकसित किए, और अपनी जनता को लगाए। क्यूबा में कोविड-19 महामारी नियंत्रित रही, और यहाँ मृत्यु दर दुनिया में सबसे कम पाई गई।
क्यूबा आज लगभग साठ देशों को अपने देश में आविष्कृत और निर्मित सैकड़ों दवाओं का निर्यात करता है। क्यूबा की प्रयोगशालाओं ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में कई देशों के साथ घनिष्ठ सहयोग स्थापित किया है, जिनमें वैश्विक उत्तर के देश भी शामिल हैं। लेकिन विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण और पूर्व के साथ, और उसमें भी ब्रिक्स के भीतर —जिसमें क्यूबा जनवरी 2025 में शामिल हुआ है— ये सहयोग निर्यात और संयुक्त उद्यमों के संदर्भ में फलदायी रूप से विकसित हो रहे हैं। चीन के साथ इस क्षेत्र में व्यापार 2000 के दशक से तेज हुआ है। रूस के साथ भी महत्त्वपूर्ण समझौते हुए हैं।
महामारी के दौरान क्यूबा के टीके वियतनाम, वेनेजुएला, ईरान, भारत, पाकिस्तान और अर्जेंटीना द्वारा ख़रीदे गए। 50 से अधिक देशों ने क्यूबा द्वारा निर्मित रीकॉम्बिनंट इंटरफेरॉन अल्फ़ा 2बी भी ख़रीदा है। 2,600 डॉक्टरों की ब्रिगेड – महामारी फैलने के समय 59 देशों में पहले से मौजूद 28,000 डॉक्टरों के अलावा – लगभग 40 देशों में कोविड-19 से लड़ने के लिए भेजी गई थी। क्यूबा की अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एकजुटता अब 76 देशों में 50,000 से अधिक क्यूबन स्वास्थ्य पेशेवरों की उपस्थिति के रूप में दिखाई देती है, जिनमें से आधे डॉक्टर हैं।
ये सभी गतिविधियाँ, जिनका उद्देश्य न केवल क्यूबा की आबादी, बल्कि दुनिया भर के लोगों का कल्याण करना है, द्वीप पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद की जा रही हैं, जो उसे संसाधनों, बाज़ारों और ज्ञान हस्तांतरण तक सामान्य पहुँच से वंचित करते हैं। इन प्रतिबंधों के तहत अमेरिकी निर्यातकों को विशेष लाइसेंस प्राप्त करने पड़ते हैं और सख़्त व हतोत्साहित करने वाली प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है। चूँकि ये प्रतिबंध क्षेत्रीय सीमाओं से परे हैं, इन्हें नज़रअन्दाज़ करने की कोशिश करने वाली विदेशी कंपनियों के लिए अमेरिकी अदालतों से भारी जुर्माने का जोख़िम रहता है।
डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पहले कार्यकाल के दौरान लगाए गए कड़े प्रतिबंध, बाइडेन प्रशासन के तहत और कोविड-19 महामारी के दौरान भी काफ़ी हद तक लागू रहे, जब वाशिंगटन ने क्यूबा पर दवाइयाँ, मेडिकल ऑक्सीजन और जीवन रक्षक उपकरण, या टीके बनाने के लिए आवश्यक सामग्री खरीदने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
इन उत्पादों की उपलब्धता कम करके क्यूबा में तंगी बढ़ाई गई तथा उसकी जनता, विशेष रूप से सबसे संवेदनशील तबक़ों को बीमारी के ख़तरे में झोंक दिया गया। लेकिन संभावित मानवीय त्रासदी टल गई क्योंकि सरकार ने सभी के लिए मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा की गारंटी देने वाले समाजवादी मॉडल को जारी रखने का संकल्प नहीं छोड़ा।। यह प्रतिबंध क्यूबा के लोगों के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है और ग़रीब देशों के साथ एकजुटता में चलाए जा रहे चिकित्सा अभियानों के लिए बाधा भी। इस तरह स्वास्थ्य सेवा के अधिकार को सीमित करके अमेरिका एक अपराध कर रहा है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की इस आक्रामकता और प्रतिबंधों की अमानवीयता के बावजूद क्यूबा के स्वास्थ्य संकेतक दक्षिण के किसी भी देश के लिए अकल्पनीय हैं और उत्तर के देशों के बराबर हैं। यह केवल राज्य द्वारा नियोजित विकास रणनीति के कार्यान्वयन के कारण ही संभव हो पाया है। यह एक ऐसी रणनीति है, जिसने 1960 के दशक की शुरुआत से ही स्वास्थ्य और अनुसंधान को प्राथमिकता दी है। ये दोनों क्षेत्र निजी निवेश, कड़ी प्रतिस्पर्धा या मुनाफ़े की लालसा के बिना, सार्वजनिक बजट द्वारा वित्तपोषित और जन की सेवा करने वाली स्वास्थ्य प्रणाली के बीच विकसित हुए हैं।
इनका विकास स्वास्थ्य पेशेवरों के समर्पण, शोधकर्ताओं के बीच तालमेल और ग्रह के अन्य लोगों के प्रति उदारता पर आधारित है। क्यूबा यह दर्शाता है कि अत्यधिक वित्तीय बाधाओं के बावजूद, अपनी आबादी को निःशुल्क गुणवत्तापूर्ण देखभाल प्रदान करना और अपनी सीमाओं से परे अपने चिकित्सा संसाधनों को साझा करना संभव है। इस प्रकार, यह एक बेहतर दुनिया के निर्माण में योगदान दे रहा है जहाँ स्वास्थ्य एक बाज़ार-उत्पाद और अमीर लोगों का विशेषाधिकार न होकर सब का अधिकार होगा।
अंत में, हम क्यूबा सरकार से स्वास्थ्य और अन्य आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखने का आह्वान करते हैं, साथ ही अन्य देशों से भी इसका अनुसरण करने का आह्वान करते हैं। हम उन सभी एकतरफ़ा दमनकारी उपायों को तत्काल और बिना शर्त हटाने की अपनी माँग भी दोहराते हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन हैं।
(यूरोप-थर्ड वर्ल्ड सेंटर द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 16 जून से 11 जुलाई 2025 तक चले 59वें सत्र के दौरान प्रस्तुत लिखित वक्तव्य का संक्षिप्त अंश। रेमी हेरेरा नेशनल सेंटर फ़ॉर साइंटिफिक रिसर्च के शोधकर्ता हैं और ‘ए पीपल्स हिस्ट्री ऑफ़ क्यूबा: 1492-प्रेज़ेंट’ के लेखक। यह किताब न्यूयॉर्क के पैल्ग्रेव मैकमिलन द्वारा शीघ्र प्रकाश्य है।)





