सुरेश उपाध्याय
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम मे सेवा अवधि के दौरान मुझे एक विभागीय जांच कारवाई मे प्रस्तुतकर्ता अधिकारी का दायित्व सौंपा गया. जिला मुख्यालय से काफी दूर स्थित इस गांव को शहर से जोडने के यातायात के साधन सीमित थे तथा यात्रा समय भी बहुत लगता था. गांव मे ठहरने व भोजन आदि की भी कोई व्यवस्था नही थी. अत: जांचकर्ता अधिकारी ने प्रारम्भिक जांच शुरू करने उपरांत आवश्यक दस्तावेज की फोटोप्रति प्राप्त करके निकटस्थ जिला मुख्यालय पर अगली तिथि पर उपस्थित रहने के आदेश आरोपी अधिकारी, बचाव प्रतिनिधि, प्रस्तुतकर्ता अधिकारी व गवाहो को प्रदान कर दिए. यह आदेश तो सबके लिए बिन मांगी मुराद जैसा था. जांच से जुडी टीम को सुविधाजनक जिला मुख्यालय व पर्यटन स्थल मिल गया था तो स्थानीय कर्मियो को उनकी आवभगत व दिनभर अटैंड करने के तनाव से मुक्ति मिल गई थी.
जिला मुख्यालय पर जांच प्रक्रिया के दौरान मेरे कार्यालय के एक सहकर्मी ने मोबाइल फोन से बताया कि ‘ आपके घर चोरी हो गई है, अत: शीघ्र लौट आओ.’ मेरे घर पर चोरी होने का यह पहला ही अवसर था लेकिन मैंने कभी सुन रखा था कि आजकल चोर सिर्फ नकद राशि, सोना – चांदी के जेवरात व सिक्के आदि की ही चोरी करते है. मेरे घर मे सिर्फ पांच के नोट की एक गड्डी अर्थात पांच सौ रूपए रखे थे, अत: निश्चिंत होकर प्रत्यूत्तर मे मैंने इतना ही कहा ‘ जांच कारवाई पुरी होने के बाद रास्ते मे पैतृक घर पर सबसे मिलने के बाद ही आ पाऊंगा.’
चोरी की घटना के बाद वापसी तक पडोसी ने अपना ताला लगा दिया था. उन्होने ताला खोलते हुए बताया कि, ‘ सुबह दर्शन के लिए जाते हुए आपके यन्हा निचे के कमरे की लाइट जल रही थी और कुछ खटपट की आवाज आ रही थी. सामान्यत: आप इस कमरे का उपयोग नही करते है, मुझे कुछ शंका हुई और मैंने पुछा कौन है तो उधर से आवाज आई “ मै हू “. मैंने सोचा आप है, यह सोचकर मै चला गया और मंदिर से वापस लौटा तो ताला खुला दिखा तथा मैंने अपना ताला लगा दिया.’
मेरे धन्यवाद कहने पर उन्होने नुकसान के बारे मे पुछा तो मैंने कहा ‘ घर मे पांच सौ रूपए रखे थे, इससे ज्यादा नुकसान की गुंजाइश नही है.’ उनके जाने के बाद पुरा घर टटोला तो वही पांच की एक गड्डी गायब थी. पुराने अखबार देखने पर एक समाचार पर नजर पडी ‘ फलाने क्षेत्र मे बिती रात तीन चोरिया हुई, दो सज्जनो के यन्हा चोरी की राशि का उल्लेख था तथा मेरे नाम के साथ लिखा था – वे अभी बाहर गए है, उनके वापस लौटने पर नुकसान की जानकारी मिल पाएगी.’
कार्यालय पन्हुचते ही सहकर्मीयो ने मेरी टेबल को चारो ओर से घेर लिया. मेरा उदास व लटका चेहरा देखकर उनके चेहरे की उदासी और गहरी हो गई. सबसे वरिष्ठ व्यास जी ने हिम्मत करके धीरे से कहा ‘ सर, कितना नुकसान हुआ.’ मैंने नुकसान की जानकारी देते हुए कहा ‘नगण्य है’.
‘ तो फिर आप इतना उदास क्यो है ?, क्या और कोई बात है ?, ‘ सबने एक स्वर मै कहा.
मैंने कहा ‘ मै बहुत शर्मिदा हू, क्षेत्र मे दो अन्य जगह हजारो का नुकसान हुआ और मेरे यन्हा सिर्फ पांच सौ रूपए का नुकसान हुआ है. घर से आंखे निची करके निकला हू, लोग घूर घूर कर देख रहे थे तथा उनके यह शब्द मुझे तीर की तरह चुभ रहे थे – बडा अफसर बना फिरता है और घर मे सिर्फ पांच सौ रूपट्टी, इससे तो मास्साब व पटवारी सा ही अच्छे निकले. चोरी के बाद इस तरह की बदनामी व अपमान मै सह नही पा रहा हू.’
इतना सुनकर सब खिलखिलाकर हंस दिए और मै भी अपने आप को रोक न सका.
दो दिन बाद सम्बंधित थाने का एक सिपाही ढूंढते ढूंढते कर्यालय पन्हुच गया और चौकीदार से पुछकर सीधे मेरी टेबल पर आया और बोला – ‘ आप ही फलाने है, फलानी जगह पर रहते है और आपके ही घर चोरी हुई थी.’ मेरे हा कहते ही सिपाही ने कडक आवाज मे कहा ‘ दो दिन हो गए आपको आए हुए और आपने थाने मे सम्पर्क नही किया. चोरी की रिपोर्ट नही लिखवाई, न नुकसान की जानकारी ही दी. हम आपको ढूंढते फिर रहे है और पुलिस खामोखा बदनाम होती है.’ मैंने कहा ‘ मेरा कोई नुकसान नही हुआ, अत: मैंने न सम्पर्क किया न ही रपट लिखवाई.’ पुलिस जवान गुस्से मे बोला ‘सब आप ही तय कर लेंगे, अखबार मे छपा उसका क्या, कल से कह देंगे पुलिस ने रिपोर्ट नही लिखी, फौरन थानेदार साहब से आकर मिलिए.’ डरते डरते मैने एक तरफ ले जाकर किसी तरह उनकी नाराजगी दूर की तथा उनके साथ ही थाने के लिए चल दिया. कक्ष मे थानेदार से जवान की कुछ गुफ्तगु हुई तथा बाहर आकर जवान ने कहा ‘ एक आवेदन लिख दो चोरी मे कोई नुकसान नही हुआ है, आखिर मामले का खातमा तो करना पडेगा.’ उन्हे धन्यवाद देकर मै गुनगुनाते हुए बाहर आ गया – ‘ जान बची और लाखो पाए / लौट के अपमानित घर को आए’.





