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धर्म, विज्ञान एवं बुद्ध

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डॉ. अभिजित वैद्य

धर्म और विज्ञान यह एक प्राचीन युद्ध है । विश्व के तत्त्वज्ञान के बारे में अगर सोचा जाए तो कई हजारों साल
पूर्व इन्सान ने विश्व, सृष्टी, जीवन तथा जीवन के विविध पहालूओं का चिंतन शुरू किया और तत्त्वज्ञान का जन्म
हुआ । विश्व की प्रकृती का राज तथा इसमें छिपा सच ढूँढने का यह प्रयास था । लेकिन इस असलीयत का पता
करते समय उसके ध्यान में आया कि इसके लिए केवल आत्मचिंतन पर्याप्त नही है और इसमें से विज्ञान की खोज
हुई । विज्ञान की खोज होने से पूर्व ईश्वर की कल्पना अनेक देव-देवता, उपासना के प्रतीक, विधी तथा कर्मकांड
विश्व की धरती पर अन्यान्य जगहों पर आदिम धर्म के रूप में जारी थे । इन आदिम धर्म ने कहीं पर
पुरोहितशाही, कही पर यज्ञ, याग, बली, नरबली, आदि प्रथाओं का निर्माण किया था । लेकिन इनमें से किसी भे
प्रथाओं, परंपराओं को संघटित धर्म का चेहरा नहीं था । इसी दरमियान प्राचीन ग्रीस, भारत तथा चीन में
तत्वज्ञान की अनेक शाखाओं ने जन्म लिया । संघटित धर्म निर्माण होने से पूर्व, प्राचीन ग्रीस तत्त्वज्ञान की
जटिलता से विवेक की ओर तथा विवेक से विज्ञान की ओर पहुँच चुका था । आगे चलकर ख्रिश्चन धर्म ने प्राचीन
ज्यू लोगों की कल्पनाओं के बलबुते पर ग्रीक तत्त्वज्ञानियों को अपनाकर दीर्घकाल तक तत्त्वज्ञान को गूढता में
तथा अध्यात्म में ढकेल दिया । युरोप में प्रबोधन का युग निर्माण हुआ और धर्म के जंजीरों से अपनी रिहाई करके
विज्ञान अग्रसर रहा । प्राचीन ग्रीस में करीबन ढाई हजार साल पहले तत्त्वज्ञान जारी था और उससे भी बहुत
पहले भरत भूमी पर वेदों का तत्त्वज्ञान निर्माण हुआ था । ऋग्वेद, अथर्ववेद तक पहुँच गया और तत्त्वज्ञान सृष्टी
एवं जीवन के चिंतन से यज्ञयाग, कर्मकांड, वर्ण व्यवस्था एवं पुरोहित शाही तक पहुँच गया । भरत भूमी पर
विज्ञान शुरू होने से ही पहले खत्म हुआ । लेकिन यह सब होने से पहले प्राचीन भारत में लोकायत बौद्ध तथा
जैन ये तीन वेद विरोधी विचारधाराएँ निर्माण हुई । इनमे से लोकायत तथा बौद्ध विचारधाराएँ विवेकवादी,
मानवतावादी, समतावादी, लोकतंत्रवादी तथा विज्ञानवादी विचारधाराएँ थी । ये जिंदा रहती तो आज भारत
की स्थिती बहुत ही अलग दिखाई देती ।
इसमें से लोकायत एवं चार्वकवादी विचारधारा ने संघटित धर्म का रूप कभी धारण नही किया और नही प्रयास
किया । लोकायत विचारधारा वैदिक लोगों द्वारा अन्यान्य मार्गो से समाप्त की । क्योंकी यह विचारधारा वैदिक
ब्राम्ह्णो, अनार्यो को साथ में लेकर वैदिक तत्त्वज्ञान के विरुद्ध में पुरी ताकत से खडी हुई थी । इस विद्रोह को
उखाडकर वैदिको के हितसंबंध जारी रखना आवश्यक था । बुद्ध विचारधारा भरत भूमी के सीमाओं को पार

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करके अनेक देशों में मजबुती से खडी रह गई I वैदिको ने फिर उसी नीति का अवलंब करके, हिंसा का उपयोग
करके बुद्ध विचारधारा को उसकी भूमि से हटाने में उन्हे यश प्राप्त हुआ । लोकायत तत्त्वज्ञान देवों के गुरु
बृहस्पती ने अनार्यो के साथ संपर्क में आने के बाद रचा हुआ तत्त्वज्ञान है ऐसा माना जाता है । भले ही ऐसा हो
लेकिन अनेक शती तक बहरने वाली वह सामुहिक विचारधारा थी यह सुनिश्चित है । विपक्ष में कहा जाए तो
सिद्धार्थ गौतम द्वारा प्रसृत यह बुद्ध विचारधारा बढती हुई आशिया खंड में लहर की तरह फैल गई । यह
विचारधारा विश्व का सबसे पहला विज्ञानवादी संघटित धर्म था इसे विश्व के सभी विद्वान स्वीकृत करते है ।
आज हमारे देश में प्राचीन वैदिक सनातन धर्म की उंगली पकडकर आई हुई हुंदुत्व की लहर विवेकवाद तथा
विज्ञान को हराकर उन्हें पीछे हटानेवाली लहर है । इसके लिए बुद्ध तथा धम्म तत्त्वज्ञान क्या है यह देखना
बहुत आवश्यक है ।
बुद्ध का जन्म तथा उनका जीवनप्रवास के बारे में उनके अनुयायियो ने अनेक किंवदंतीयाँ प्रचलित की । लेकिन
सच्चे बुद्ध को अगर समझ में लेना है तो हमें इन सभी किंवदंतीयाँ को हटाकर उसे समझाना होगा । किंवदंतीयाँ
एवं चमत्कार विज्ञान के विरोध में होते है । और बुध्द ने तो विज्ञानवादी तत्त्वज्ञान को ही जन्म दिया है इसे
भुलना नही चाहिये ।
इ.स. पूर्व छठी शती में भारत के ईशान्य कोने में शाक्यों के कोसल (प्राचीन आयोध्या) इस गणराज्य का क्षत्रीय
राज्यकर्ता शुद्धोधन तथा उसकी पत्नी महामाया का पुत्र सिद्धार्थ गौतम । आयु की आठवी ही उम्र में ज्ञान प्राप्ती
को शुरुवात किए हुए सिद्धार्थ को ब्राह्मण पंडितो की ओर से पुरा ज्ञान प्राप्त होने पर शुद्धोधन ने उसे सब्बमित्त
की ओर सौपा । उनकी ओर से सिद्धार्थ ने वेदों-उपनिषदों-दर्शनों-शास्त्रों को आत्मसात किया । आगे चलकर
आलार कलम का शिष्य भारद्वाज की ओर से इसके कपिलवस्तू स्थित आश्रम में जाकर ध्यान-धारणा की विद्या
प्राप्त की । शुद्धोधन ने इसे युद्धविद्या की भी शिक्षा दी । बचपन में ही इस बच्चे की होनहार बिरवान के होत
चिकने पात ऐसी स्थिती थी । खेत में काम करनेवाले मजदूर को देखकर बडेही दयालुपन से पूछा, “एक मेहनत
करेगा और उसका मालिक इसकी मेहनत पर जिंदा रहेगा यह उचित कैसा ? छल करना अयोग्य नही है क्या ?”
विद्वान होकर भी उन्होने शारीरिक मेहनत का कभी तिरस्कार नही किया । क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर तथा
शस्त्रविद्या की शिक्षा पाकर भी दुसरो को दुख देना उसे अच्छा नही लगता था । इसलिय वह दोस्तों के साथ
शिकार के लीए नही जाता था । उसके माता-पिता उसे क्षत्रिय होने का एहसास दिलाते थे और लडना क्षत्रियों
का धर्म है ऐसा कहते थे, राज्य के रक्षण हेतू इस धर्म का पालन करना आवश्यक है ऐसा बताते थे । इसपर वह
पूछता था, ‘’ इन्सान की हत्या करना यह कैसा धर्म ? अगर सभी एक दुसरे के साथ प्यार से रहने लगे तो क्या
बिना हिंसा राज्य का रक्षण करना संभव नही होगा ?” वह सतत चिंतन ध्यान करता था और समाधी लगाता
था । इस बच्चे की दंडपाणी नामक दुसरे शाक्य की बेटी यशोधरा के साथ शादी हुई । उन्हे जो पुत्र हुआ उसका
नाम राहुल रखा ।
सिद्धार्थ का जब जन्म हुआ तब वह बच्चा आगे जाकर बुध्द होगा ऐसी भविष्यवाणी असित ऋषी ने की थी । इसे
झूठा साबित करने के लिए शुद्धोधन ने राज्य का पुरोहित, मंत्री तथा सिद्धार्थ का दोस्त उद्यीन पर यह

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जिम्मेदारी सौप दी थी कि उसे वैषयिक सुखोपभोग में व्यस्त रखा जाए लेकिन वे असफल हो गई । किसी भी
प्रकार का मोह सिद्धार्थ को व्यस्त नही रख सका । यह सब देखकर व्यथित होकार उद्यीन ने सिद्धार्थ से कहां,
“मै तुम्हे पुरुषार्थ से दूर रहना नही पसंद करता । काम ही पुरुषार्थ है । थोर महात्मा भी विषय वासना के
शिकार हुए है ।“ सिद्धार्थ ने इसपर जवाब दिया कि, “मै ऐहिक सुख की आलोचना नही करता । पुरा विश्व
इसमें लपेट गया है । लेकीन विश्व अनित्य होने का एहसास मुझे है इसलीए मुझे इसमें रुचि नही है । जो थोर
महात्मा विषय वासना का शिकार हो चुके है उनका सर्वनाश हुआ है । जहाँ ऐहिक विषय का मोह है,
आत्मसंयमन का अभाव है वहाँ असली महात्मता हो ही नही सकती ।“
बीस वर्ष पुरे होते ही सिद्धार्थ को शाक्यों के रिवाजनुसार शाक्य संघ में दाखील होना पडा । उन्होने संघ के
प्रति निष्ठा तथा अपनी कार्यतत्परता के कारण सभी का मन जिता । आठ साल बाद शाक्यों के पडोस के
कोलियों के राज्य से नदी के पानी का वितरण करने के बारे में बडा संघर्ष हुआ । शाक्यों के सेनापती ने कोलियों
के खिलाफ युद्ध करने का प्रस्ताव रखा । “युद्ध से कोई भी मसला हल नही होता । लेकिन सामंजस्य तथा संवाद
से सभी सवाल आसान हो जाते है ।“ ऐसा कहकर सिद्धार्थ ने इस प्रस्ताव का विरोध किया । क्षत्रीय का धर्म
लडना है अतः इसका पालन करना चाहिए ऐसा सेनापती का कहना था । सिद्धार्थ का कहना था दुश्मन पर
प्यार से जीत हासिल करनी चाहिए । लेकिन सेनापती का प्रस्ताव बहुमत से सिद्ध हुआ । सिद्धार्थ ने इसका
विरोध किया । यह कृती क्षत्रिय धर्म के विरोध में होने के कारण सजा के लिए पात्र थी । गणराज्य में राजा
तथा राजपुत्र को इस तरह की सजा करने का संघ को अधिकार होता था । सिद्धार्थ के परिवार को बहिष्कृत
करके उनकी जायदाद जप्त करने का प्रस्ताव सेनापति ने रखा । मृत्यू का भी प्रावधान था । तिसरा विकल्प
परिव्राजक होने का था । सिद्धार्थ ने परिव्राजक होकार देश छोडने की तैयारी दर्शाई । इसे स्वीकृत किया गया
। गौतम ने अपने माता-पिता तथा पत्नी के साथ इसके बारे में विस्तृत चर्चा कीई और उन्हे ठीक तरह से
समझाया । यशोधरा ने कहा, “मुझे राहुल का पालन करना है अन्यथा मैं भी परिव्रजा ले सकती थी । लेकिन
आप अपने प्रियजनों को छोडकर परिव्रजा अगर लेते है तो समुचे मानवजाति के कल्याण हेतू एक नया जीवन
मार्ग की खोज किजीएगा यही मेरी इच्छा है ।“
सिद्धार्थ गौतम की अगली यात्रा अपूर्व, अजोड एवं मानव के इतिहास में अद्वितीय माननी पडेगी । विवेकवाद
तथा बुद्धिवाद की ओर की यह यात्रा है और विश्व के इतिहास में किसी भी महापुरुष ने ऐसी परिपूर्ण यात्रा की
नहीं है ।
कोसल राज्य की राजधानी कपिलवस्तू में भारद्वाज के हाथों उन्होने मुंडण किया, परिव्राजक के वस्त्र पहने
और हाथ में भिक्षापात्र लेकर उन्होने परिव्राजक अपनाया । उस वक्त सिद्धार्थ की उम्र थी केवल २९ वर्ष ।
कपिलवस्तू को छोडकर सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में निकल पडा । उन्होने तपश्चर्या का तंत्र, विविध ध्यान मार्ग,
समाधी मार्ग, आत्मक्लेश पर आधारित वैराग्य मार्ग आदि सभी का सटिकता से अध्ययन किया । फिर भी उसे
नया प्रकाश नहीं दिखता था । आत्मक्लेश को धर्म कैसा माना जाएगा यह सवाल उसे सताने लगा । उसने

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वैराग्य के मार्ग का भी त्याग किया । पीछे मुडकर देखा तो सभी मार्ग पर उसे अपयश नजर आया । उरुवेला से
गया की ओर जाते समय उसे एक पिपल वृक्ष नजर आया ।
उसके ध्यान में आया की इस दुनिया में दो समस्याएँ है- पहली है ‘दुख’ और दुसरी है – ‘इसे दूर कैसे करना है ?’
इस प्रश्न को लेकर वह चिंतन करने को बैठा तब ‘सांख्य तत्त्वज्ञान’ ने उसके मन पर कब्जा लिया था । लेकिन
दुख को कीस तरह से नष्ट किया जाए इसका विचार इस तत्त्वज्ञान ने नही किया था यह बात उसके ध्यान में आ
गई । उन्होने खुद को पहला प्रश्न किया, ‘इन्सान को दुख भूगतने की कौन-कौन सी वजह है ?’ और दुसरा प्रश्न
पूछा – ‘इस दुख को नष्ट कैसे किया जाए ?
गहरा चिंतन करने से उसे दोनों के जवाब मिल गए । इसका जवाब है – ‘सम्यक संबोधी’ (सच्ची ज्ञानप्राप्ति) ।
यह ज्ञानप्राप्ति उसे पिपल के वृक्ष के नीचे प्राप्त हुई अतः इस वृक्ष को ‘बोधी वृक्ष’ नाम प्राप्त हुआ । ज्ञानप्राप्ति
के पूर्व गौतम बोधिसत्त्व थे । ज्ञानप्राप्ति के बाद वे बुद्ध बन गए। बुद्ध होने का प्रयास करने वाला इन्सान
अर्थात बोधिसत्व । लेकिन इसके लिए बोधिसत्त्व को मुदिता (आनंद), विमलता (शुद्धता), प्रभाकरी
(तेजस्विता), अर्चीष्मती (अग्नी की तरह तेजस्वी बुद्धिमता), अभिमुखी, दुर्गडमा (दूर जाना), अचल, साधूमति
तथा धर्ममेध इन दस आवस्था से गुजरना पडता है । इन अवस्थाओं को पार करने पर बोधिसत्त्व को बुद्ध की
ज्ञानप्राप्ति होती है। इन आवस्थाओं के साथ- साथ उसे ‘दस पारमिती’ का भी अभ्यास करना पडता है ।एक
पारमिता का अर्थ है जीवन की एक अवस्था की परिपूर्ती । सिद्धार्थ गौतम ने बोधिसत्त्व बनकर इन दस
कसौटीयो को पुरा करके बुद्धत्व प्राप्त किया । लेकिन यह ज्ञानप्राप्ति उन्हे बोधिसत्त्व के नीचे उन्हे हुआ
‘साक्षात्कार’ है ऐसा मानना बुद्ध के तत्त्वज्ञान का पराजय है । क्योंकी उन्होने साक्षात्कारी ज्ञान को इनकार
किया । इसलिए इसका सही अर्थ उन्होने बोधिसत्त्व के नीचे किया हुआ गाढा चिंतन एवं साधना ऐसा मानना
उचित होगा । इस पद्धती से ज्ञान प्राप्त करके वे सच की खोज की ओर निकल पडे ।
उन्होने वेद, उपनिखद, कपिल मुनी का सांख्य तत्त्वज्ञान, ब्राह्मण, वेद-विरोधी ग्रंथ, पंथ आदि सभी का गहरा
अध्ययन किया । कपिल मुनी के तत्त्वज्ञान का बहुत बडा प्रभाव बुद्ध पर हुआ । उन्होने उनके तत्त्वज्ञान की तीन
बातों को स्वीकृत किया । एक – सत्य- जो सबूत के साथ सिध्द होना चाहीये और इसे बुद्धिवाद का आधार होना
चाहिय । भगवान का अस्तित्व है या नही या उन्होने इस विश्व का निर्माण किया इसे सिद्ध करने हेतू तर्क शास्त्र
या वस्तुस्थिती का आधार नही है तथा तिसरी बात यह है कि विश्व में दुख है । बाकी सभी तत्त्वज्ञान को गौतम
ने अस्वीकृत किया । गौतम की ओर से प्रकाश की खोज जारी रही । इस सफर में उसने अनेक रूढ कल्पनाओं को
त्याग दिया । मै कौन हुँ, कहाँ से आया हुँ , कहा जाना है इसके बारे में सोचने की वृत्ती, आत्मा का झुठापन,
शून्यवादी मत, पाखंडी मत, विश्व के विकास का प्रारंभ का कालावधी कह सकते है, ईश्वर ने सृष्टी की रचना की,
दैववादी दृष्टीकोन, कर्म का दैववादी दृष्टीकोन, ये सब उन्होने त्याग दिया व अनेक रूढ कल्पनाओं का उन्होने
त्याग किया ठीक उसी तरह उन्होने कुछ कल्पनाओं को स्वीकृत भी किया । सभी के अग्रस्थान पर मन होता है ,
मन का आकलन होने के बाद सभी चीजो का आकलन होता है, अतः मन के संस्कार महत्त्व पूर्ण है। हमारे मन में
निर्माण होनेवाली तथा बाहर से जिसका परिणाम होता है ऐसी सभी अच्छी–बुरी बातों का ‘मन’ उगमस्थान है

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। अशुद्ध मन से जो बोलता है उसके पीछे दुख आ जाता है । चित्तशुद्धी धर्म का सार है । उसके लिए पापकृत्य
को टाल देना चाहिए । लेकिन सच्चा धर्म ग्रंथो में नही है अपितु धर्म तत्वों का पालन करने में है । वे कहते थे –
“आपने कितने भी पवित्र शब्दों पढा है, उच्चारण किया है लेकिन इस तरह का बर्ताव अगर आपने नही किया तो
इसका कोई उपयोग नही । अतः किसी कल्पना का निर्माण करके उसे कृती में लाने का अर्थ है उस कल्पना को
केवल निर्माण करने से महत्वपूर्ण है ।“ कृतिशीलता के बारे में वे इतने आग्रह से कहते थे कि “मैने क्या किया है
इसे मै नही देखता लेकिन क्या करना शेष है इसे देखता हूँ ।“
ज्ञानप्राप्ति के बाद बुद्ध के मन मे अपने धम्ममार्ग की रूपरेखा निश्चित हुई । इन्सान और इन्सान का इस विश्व
से रिश्ता यह बुद्ध धर्म का केंद्र बिंदू तथा पहला अधिष्ठान रह चुका है । इन्सान दुख में , दैन्य में तथा दरिद्रता में
रहाता है यह उसका दुसरा तत्व है । पुरा विश्व दुख से भरा हुआ है । विश्व से दुख को नष्ट करना केवल इतना ही
उद्देश धम्म का है । ‘वजह’ नष्ट की गई की ‘परिणाम’ नष्ट होता है । इसे ही ‘प्रतीज्ञसमुत्पाद’ कहा जाता है ।
अगर हरेक ने पवित्रता, सदाचरण तथा शिलमार्ग का आचरण किया तो दुख नष्ट होगा । शील मार्ग के लिए दस
सद्गुणो का पालन करना आवश्यक है । शील, दान, उपेक्षा, निष्कर्म्य, वीर्य, शांती, सत्य, अधिष्ठान, करुणा तथा
मैत्री या दस सदगुण है । इन सद्गुणो का पालन का अर्थ है ‘पारमिता’। यह पूर्णत्व की अवस्था है । जिसे
अच्छा इन्सान बनना है उसने पारमिता अर्थात दस सद्गुणो के पालन के साथ–साथ ‘विशुद्धी मार्ग’ के पांच
तत्वों का पालन करना चाहीए । हिंसा, चोरी, व्यभिचार न करना, असत्य न बोलना तथा मद्य का ग्रहण नही
करना ये पांच तत्व है ।
पारमिता तथा विशुद्धी मार्ग के साथ ‘अष्टांगिक मार्ग‘ या ‘सदाचार का मार्ग’ अपनाना चाहिए । सम्यक दृष्टी,
सम्यक संकल्पना, सम्यक वाचा, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीविका, सम्यक तालीम, सम्यक स्मृती तथा सम्यक
समाधी ये अष्टांगिक मार्ग है ।
संक्षेप में – इच्छा, अभिलाषा, आसक्ती इसमें ही दुख की जड है, बिमारी का कारण तथा उपचार भी । इन सभी
को त्याग कर इन्सान निर्वाण तक पहुँच गया तो इससे मुक्ति पाता है । ‘निर्वाण अवस्था’ मन की निर्वाण
अवस्था । इस अवस्था को हरेक ने धम्म के पालन से प्राप्त करनी है। इसके लिए किसी भी ईश्वर, मुर्ती, मंदिर
तथा पंडित की आवश्यकता नही । ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, कर्म, कर्मकांड, मुर्तीपूजा, मंदिर, पांडित्य इन सबको
अस्वीकृत करने वाली निरीश्वरवादी, बुद्धिवादी, विवेकवादी, पुरोगामी और अत्यंत क्रांतिकारी विचारधारा थी
। धर्म के अवडंबर को, कर्मकांड के अतिरेक को, धर्म ग्रंथो द्वारा निर्मित गुलामी को तथा पुरोहितों के शोषण को
परेशान हुई जनता में स्वाभाविकतः लोकप्रिय हुई । इस तत्त्वज्ञान ने यज्ञ की पशुहत्या तथा कुल हिंसा को ही
निषिद्ध ठहराया । मनुष्य संहार करने वाली युद्धकर्म निषिद्ध ठहराई । दया, प्रेम तथा करूना का आग्रह किया
। जाति प्रथा नष्ट की । दास्य की पद्धती अन्यायकारक साबित की । बहुपत्नी विवाह को अनैतिक माना । स्त्री
धर्माचरण के लिए योग्य है यह सिद्ध किया । धर्म प्रसार के लिए पुरुष तथा महिलाओं ने भी घुमने की पद्धती
शुरू की ।

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मानव इतिहास के आजतक के सभी संघटित धर्म, उनके तत्त्वज्ञान को देखते हुए केवल बौद्ध धर्म ही विज्ञानवाद
के समीप पहुँचनेवाला था इसे स्वीकृत करना पडेगा । बौद्ध तत्वज्ञान का मुलभूत आधार था स्वतंत्र विचार एवं
अनुभव युक्त बातों का स्वीकार । यहाँ तक की उनकी खुद की रचना भी शिष्यो द्वारा जाँचकर पसंद हुई तभी
स्वीकृत की जाए ऐसा उन्होने कहां । बुद्ध की रचना अंधश्रद्धा, कर्मठता, कर्मकांड, ग्रंथ प्रामाण्य, साक्षात्कार
तथा अनुभूती को अमान्य करने वाली है । सत्य की निरपेक्ष खोज तथा कठोर चिकित्सा की देनेवाली है ।
वैज्ञानिक रचना का यही आधार होता है । गौतम बुद्ध ने स्वयं को कभी भी ईश्वर, प्रेषित या अवतार पुरुष
माना नही । कभी चमत्कार का दावा नही किया । उन्होने स्वयं ईश्वर को तथा निर्मिक को अमान्य किया ।
स्वर्ग एवं नरक को अस्वीकृत किया । अनेक विश्व की कल्पना उन्होने सम्मुख रखी । इस हर विश्व को
अपना–अपना सुरज है ऐसा कहा । विश्व शून्य से निर्माण होता है और शून्य की ओर चला जाता है । आरंभ एवं
अंत का यह निरंतर चक्र है । बुद्ध ने इस रचना से ईश्वर की संकल्पना को अमान्य किया । बुद्ध का जब अंत
हुवा वे स्वर्ग में गए ऐसी कल्पना नही की गई । उनके पुनरुत्थान की ओर उनके भक्त राह देखते नही रहे ।
पॅाल कारूस इस जर्मन ततत्ववेत्ता एवं धर्मशास्त्र अभ्यासक ने कहां है कि, ‘बुद्ध विश्व का पहला सकारात्मक,
मानवतावादी, मूलगामी तथा मुक्त विचारवंत था ।‘ कार्डफ विश्व विद्यालय के धर्म शास्त्र विषय के विद्वान प्रा.
जॉफ्री सॅम्यूएल का कहना है कि, ‘ पाश्चिमात्य कल्पना के अनुसार बुद्धिझम को धर्म मानना कठीन है अपितु यह
एक विज्ञानवादी तत्त्वज्ञान है ।‘ बर्ट्रांड रसेल ने कहा है कि ‘ बौध्द तत्त्वज्ञान तर्क शुद्ध एवं विज्ञानवादी तत्त्वज्ञान
है ।‘ आईनस्टाईन का कहना है कि, ‘भविष्य का धर्म विश्व के आपनी बाहों में लेनेवाले होगा ।‘ इनका यह
कहना उदधृत करके डोनाल्ड लोपेझ कहते है कि , ‘यह आईनस्टाईन की भविष्य वाणी है । भविष्य का धर्म
विश्व की ओर दंतकथा की दृष्टीकोन से नही देखेगा अपितु भैतिक शास्त्र की नजर से देखेगा । विश्व का निर्माता
जो ईश्वर जीन्होने निर्माण किए हुए चराचर को पाप पुण्य की सजा या इनाम देता है ऐसी प्राथमिक कल्पना में
वह उलझेगा नही । वह धर्म अध्यांत्म एवं निसर्ग दोनों में सुसंवाद प्रस्थापित करनेवाला होगा । वह ग्रंथ
प्रामाण्य, कर्मकांड, पुराणों की झुठी कथा, तथा मंदीरों को अमान्य करनेवाला होगा । वह शिक्षा के बजाय
मोक्ष देनेवाला होगा । इस मोक्ष का अर्थ है व्यक्ति का विश्व से एकरूप होना । यह धर्म विज्ञान से सुसंगत होगा
। आईनस्टाईन को अभिप्रेत भविष्य का धर्म ऐसा होगा । लेकिन प्राचीन काल से ऐसा एक धर्म इस पुरी युनिया
में है और वह है बुद्धने कहा हुआ धम्म ।‘ बुध्द ने कहा था कि ‘जो जीवन की एकात्मता का अनुभव लेता है उसे
सभी चराचर में खुद का प्रतिबिंब दिखाई देता है और खुद में चराचर का ।‘ विश्व के साथ एकरूप होने का
कितना बडा तत्त्वज्ञान ! इस तत्त्वज्ञान पर जब विज्ञान खडा हो जाता तो वो कभी भी विध्वंश की ओर नही
झुकता । बुद्ध कहते थे – ‘हजारों खोखला शब्दों से विश्व में शांती लानेवाला एक शब्द श्रेष्ठ है । बुद्ध के
विज्ञानवाद को समता एवं मानवता के तत्त्वज्ञान की साथ थी । उदार अंत:करण, प्यारभरी वाणी, सेवा तथा
करूना युक्त जीवन ये चीजे मानवता को नवजीवन देती है यह तीगुना सत्य सभी का सिखाओ ।‘
आज बुद्ध के सच्चे अनुयायी बुद्ध के असली विचारों से तितर-बितर हुए हैं यह बात भी सच है । लेकिन हमारी
आज की स्थिती क्या है ? आज हमारे देश में ब्राम्हण्यवाद फिर से खडा हो रहा है । ब्राम्हण्यवाद की

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परंपरा ने इस देश में ब्राह्मण विरोधी विचार तथा विज्ञान को उर्जितावस्था कभी भी आने नही दी । अपने देश
के विज्ञान का चेहरा है ‘गणपती विश्व की सबसे पहली प्लास्टिक सर्जरी थी’ ऐसा हास्यास्पद विधान विज्ञान
परिषद के उद्घाटन में करनेवाले प्रधानमंत्री, ‘हररोज गोमुत्र प्राशन करने से मुझे कोरोना नही हुआ’ दावा करने
वाली प्रज्ञासिंह तथा प्राचीन भारत में विश्व की सभी आधुनिक खोज पहले से ही थी ऐसा दावा करनेवाले
सत्ताधीश —– लेकिन इन सभी पर कमाल की रामदेव बाबा नामक व्यापारी ने। प्रदीर्घ संशोधन का दावा
करनेवाला, सैंकडो उत्पादन अल्पावधी में बाजार में लानेवाला, हजारों एकड जमीन अल्पदर में लेकर, अर्बो
रुपयों का आयुर्वेदिक साम्राज्य निर्माण करनेवाला यह बाबा । माध्यमिक शिक्षा भी पुरी न करनेवाले इस बाबा
ने कहां था ,’कोरोना ग्रस्त लोगों पर इलाज करने वाले एक हजार डॉक्टर्स अपने देश में मर गए । जिन डॉक्टर्स
को अपनी जान बचाने नही आती वे लोगों की जान कैसी बचाएगे ?’ इस विधान का सही सही अर्थ यह है कि
युध्द में देश की रक्षा हेतू सीमापर हुतात्मा हुए सैनिक को, लडाई में खुद के प्राण नही बचा-पाता वह जनता की
क्या रक्षा करेगा ? ऐसी चेष्टा करने वाला विधान करने जैसा है । जवानो की इस तरह की चेष्टा की गई तो
वह देशद्रोही होगा, लेकिन कोवीड योद्धाओं की ऐसी क्रूर चेष्टा करनेवाला रामदेव

भगवे वस्त्र परिधान करने से
देशद्रोही नही माना गया । वास्तव में इस बाबा को कम–से-कम छह महिनों तक कोविड अतिदक्षता विभाग में
काम पर रखना चाहिए । अर्थात उसे वाँर्डबाँय का काम करना पडेगा ।अन्यथा उन्होने ‘पतंजली कोवीड
अतिदक्षता विभाग‘ चलाना चाहिए । उसे किसी भी प्रकार के वैद्यकीय सामुग्री तथा आधुनिक वैद्यकीय दावों
का इस्तेमाल करने के लिए तथा तज्ज्ञ रखने के लिए पाबंदी लगाने चाहिए और कोई हिंदुत्ववादी कोवीड का
शिकार हो गया तो उसे वहाँ उपचार करने की अनिवार्यता करनी चाहिए । अन्यथा उस पर कानुनी कारवाई
करनी चाहिए । भारतीय समाज की अवैज्ञानिक प्रवृत्ती का यह उच्चारण करने वाला अधःपतन है।
हमारे समाज में सच्चा वैज्ञानिक दृष्टीकोन निर्माण करने में शिक्षा प्रणाली को अपयश प्राप्त हुआ है । विज्ञान
हमारा उपभोग तथा अर्थाजन का साधन है । और अब तो विज्ञान द्वारा दिया हुआ तंत्र विज्ञान के विरोध में
दृष्टीकोन फैलाने का हथियार बन गया है । बुद्ध का विज्ञानवादी धम्म हमने अमान्य किया और हिंदूत्वने
विज्ञानवाद को अस्वीकृत किया । हमारे देश की यह शोकांतिका है I

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