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आंतरिक लोकतंत्र पर गम्भीर प्रश्न है?

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शशिकांत गुप्ते

जब से देश सभी राजनैतिक दलों के संगठनात्मक चुनाव होना बंद हो गया है,तब से तकरीबन सभी दलों के आंतरिक लोकतंत्र पर गम्भीर प्रश्न उपस्थित होता है?
28 दिसंबर 1885 में स्थापित दल के आंतरिक मतभेदों को लेकर, लेखक अपनी स्वयं की मानसिकता के आधार पर तर्क प्रस्तुत कर रहें हैं।
किसी दल के अध्यक्ष के चयन को लेकर यदि दल में आंतरिक बहस होती है,और किसी व्यक्ति को अध्यक्ष पद के लिए कोई नापसंद करता है। और कोई मुखर होकर विरोध करता है, तो यह आलोचना का मुद्दा कदापि नहीं है। उल्टा इसे लोकतांत्रिक सोच का परिचायक समझना चाहिए।
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जबतक राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र पुनर्जीवित नहीं होगा, तबतक देश की प्रगति सिर्फ विज्ञापनों में कैद होकर रह जाएगी।
कांग्रेस जैसे विशाल संगठन में अदने से लेकर वरिष्ठ, हरएक व्यक्ति अपने वर्चस्व को बनाएं रखने के लिए अपने समर्थकों का गुट बना लेता है, तो यह संगठन के लिए उचित नहीं है। गुटबाजी ही कांग्रेस के संगठन को कमजोर कर रही है।और यही गुटबाजी कांग्रेस को सत्ता से विमुख भी रख रही है।
वर्तमान में जहाँ कांग्रेस सत्ता में है वहाँ विराजित मुख्यमंत्री अपने संगठन के लोगों के विरोध को सहन कर रहा है और उसकी मानसिक ऊर्जा विरोधियों को संभाल ने में जाया हो रही है।
उपर्युक्त समस्या सिर्फ कांग्रेस की ही नहीं है।
कांग्रेस में अन्य दलों की तुलना में कमोवेश लोकतंत्र जिंदा है।
विश्व के सबसे दल का दम्भ भरने वाले संगठन में तो वाणी की स्वतंत्रता पर ही सवाल उठता है?
यह दल स्वयं को अन्यदलों से भिन्न स्वरूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। लेकिन यहाँ भी वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होती है।
इस दल के विशाल संगठन होने के दावे पर तब प्रश्न उपस्थित होता है,जब ये दल अन्य दलों के निर्वाचित सदस्यों को पाँच सीतारा होटल में पर्यटन करवा कर सत्ता प्राप्त करता है?
क्षेत्रीयदलों की स्थिति तो प्रायवेट लिमिटेड संस्थानों जैसी हो गई है।
कम्पनी का डारेक्टर ही दल का अध्यक्ष होता है। डारेक्टर ही अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति करता है।
जब तक प्रत्येक दल में संगठन के पदाधिकारियों के लिए नियुक्तियां बंद होकर निर्वाचन नहीं होंगे तबतक देश में लोकतंत्र कमजोर ही रहेगा?
सबसे बड़ा मुद्दा है, विकल्प का मतलब कार्बन कॉपी नहीं होना चाहिए।
वर्तमान में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के निष्पक्षता पर ही गम्भीर सवाल उपस्थित है?
इतना सब होने पर भी अपने देश के लिए एक बात अटल है। भारत के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को कोई भी मिटा नहीं सकता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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