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तिज़ारत नहीं है सियासत,ना ही एमहमित है फ़ोटो की?

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शशिकांत गुप्ते

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनैतिक संगठन सर्वोपरि होता है। संगठन का वर्चस्व सरकार पर होना चाहिए और सरकार का वर्चस्व प्रशासन पर होना चाहिए।
लोकतंत्र के चार स्तंभों में एक विधयिका भी है।
विधयिका;- विधान निर्मात्री (संस्था) (जैसे—विधान परिषद्, विधान सभा, लोक सभा, राज्य सभा आदि)।
लोकतंत्र में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव सम्पन्न होने पर जिस राजनैतिक दल को बहुमत मिलता है। उस दल के विधायकों द्वारा जिस व्यक्ति को विधायक दल नेता चुना जाता है। वह मुख्यमंत्री बनता है।
यही प्रक्रिया लोकसभा में होती है।
पिछले अनेक वर्षों से राजनैतिक दलों द्वारा चुनाव के पूर्व ही किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के लिए प्रस्तुत किया जाता है। प्रस्तुत किए व्यक्ति को चेहरा कहा जाता है।
यह परंपरा सैद्धांतिक रूप से उचित नहीं हैं।
सियासत में विचारहीनता की जब इन्तिहा हो जाती है और राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव हो जाता है। तब चेहरा महत्वपूर्ण हो जाता है।
अब तो हद हो गई, तस्वीर की भी एहमियत बढ़ गई है।
अपने देश के केंद्रीय मंत्री के समक्ष नतमस्तक होना चाहिए।
मोहतरमा ने देश को तस्वीर की एहमियत से अवगत करवाया है।
इस मुद्देपर सीतारामजी ने कहा, जब इस घटना का समाचार पढ़,सुन,और देखते ही सन 1971 में प्रदर्शित फ़िल्म सच्चा झूठा के इस गीत का मुखड़ा याद आ गया। इस गीत को लिखा है। गीतकार इंदीवरजी ने।
दिल को देखो, चेहरा न देखो
चेहरे ने लाखों को लूटा
हाँ, दिल सच्चा और चेहरा झूठा,

तस्वीर मतलब स्मृति (Memory) होती है।
बहुत सी तस्वीरों को देख पुरानी याद ताजा हो जाती है,और याद करने वाला स्वप्नलोक में विचरण करने लगता है। फ़िल्मी भाषा में इसे flashback कहतें हैं।
इस संदर्भ में गीतकार मजरूह सुलतानपुरीजी ने सन 1961 में प्रदर्शित फ़िल्म माया में लिखे गीत के मुखड़ा का स्मरण होता है।
तस्वीर तेरी दिल में
जिस दिन से उतारी है
फिरूँ तुझे संग ले के
नए-नए रंग ले के
सपनों की महफ़िल में

पिछले लगभग आठ वर्षो से देश की जनता सिर्फ सपनों की महफ़िल में ही तो भटक रही है।
चेहरे की वास्तविक एहमियत के लिए शायर ख़ुशबीर सिंह शाद का ये शेर सटीक है।
रफ़्ता रफ़्ता सब तस्वीरें धुँधली होने लगती हैं
(रफ्ता रफ्ता का अर्थ धीरे धीरे क्रम कर्म से)
कितने चेहरे एक पुराने एल्बम में मर जाते हैं

लेकिन तस्वीर की एहमियत इसतरह भी आंकी जाती है। बहुत सी तस्वीरें असलियत बयां करती है।
शायर नज़ीर इलाहाबादी फरमातें हैं।
तेरी तस्वीर तो वा’दे के दिन खिंचने के क़ाबिल है
कि शर्माई हुई आँखें हैं घबराया हुआ दिल है

आदमी को कुछ बोलने के पहले सोच समझकर ही अपने विचार अभिव्यक्त करना चाहिए।
इस मुद्दे पर प्रख्यात शायर गुलज़ारजी का यह शेर मौजु है।
जिसकी आवाज़ में सिलवट हो, निगाहों में शिकन
( सिलवट का अर्थ सिकुड़न)
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़े जाते

एक शायर मोहम्मद अहमद रज्मजी अपने शेर के माध्यम से समझतें है। तस्वीर सबकुछ नहीं है,और सिर्फ शब्दों के इजहार से कुछ नहीं होता है।
शायर का शेर प्रस्तुत है।
हर्फ़ को लफ़्ज़ न कर लफ़्ज़ को इज़हार न दे
कोई तस्वीर मुकम्मल न बना उस के लिए

इसलिए सियासत में चेहरे और तस्वीरों को एहमियत देना उचित नहीं है।
एहमियत देना व्यक्तिपूजक मानसिकता को दर्शाता है।
व्यक्ति को एहमियत उसके अच्छे कार्यों से मिलती है।
Respect must be commanded not demanded
सम्मान अर्जित किया जाता है,मांगा नहीं जाता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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