अग्नि आलोक
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*जेपी की सम्पूर्ण क्रांति का हीरो बनने की तमन्ना थी, जो कभी पूरी ना हो सकी*

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शिवकांत वाजपेयी 

——-इमरजेंसी लग चुकी थी और उसी समय हमारा कालेज में प्रवेश हो चुका था,उम्र का सोलहवाँ पड़ाव पार कर चुके थे तरुणाई का आक्रोश जे पी आंदोलन ने कूट कूट कर भर दिया था , कालेज से भाग भाग कर जेपी आंदोलन के पीछे भागने में अद्भुत आनंद आता था, जॉर्ज फ़र्नाडिस से मिलने में एनर्जी मिलती थी, पर जब भी कुछ सक्रिय होते कि कोई वरिष्ठ बोल देता—अबे अभिमन्यु मत बन और उत्साह ठंडा हो जाता,पर मन नहीं मानता,मन करता कि दो चार बम फेंक दूँ इसी उत्कंठा में कलकत्ता गया आनन्दमार्गीयों से मिला जिसमे बड़े बुद्धिजीवी लोग थे उनसे ग्लिसरीन से विस्फोटक बनाने का टेक्निक सीखा (जो अब भूल चुका हूँ), वापस आया, आनंदमार्ग प्रतिबंधित हो गया, उन्हें जेल में ठूँसा जाने लगा खैर हम बच गए,मन उद्वेलित था ही,  भगवद्गीता पढ़ता था याद आया कि अब वैचारिक क्रांति करूँ कविताएँ लिखना शुरू किया और भाषण देना छोटे छोटे ग्रुपों में चालू कर दिया,

इसी बीच कालेज में सोशल गेदरिंग आ गए, तत्कालीन शिक्षा मंत्री अजीज कुरैशी मुख्य अतिथि थे और मुझे भी बोलने का मौका मिला, बस क्या था एक झन्नाटेदार कविता पढ़ दी जो कुछ दिन पहले ही लिखी थी,असर उल्टा हुआ, आयोजक ने माइक छीन लिया हाल तालियों से गूँज रहा था पुलिस ने नियंत्रण किया और कविता अधूरी रह गई जिसे मैंने बाहर आकर सुनाया,

बाहर निकलते ही एसपी सुरजीत सिंह चिल्लाया कहाँ है वो लड़का मैं पास गया पूँछा कौन— वो बोला कि वो वाजपई, मैंने कहा रुकिए बुलाकर लाता हूँ और कालेज के पिछले गेट से दौड़ लगा दी, बाद में पता लगा मेरे मित्र पृथ्वीराज धुलधोये ने सुरजीत सिंग को काफ़ी समझाया तब मैं उस दिन बच पाया.

   इमरजेंसी विरोधियों में मेरा नाम तो शुमार हो गया था, सुरजीत सिंह ने एक छात्र को तो जीप से घसीट कर पीटा था जिसे देखकर रूह काँप उठी थी और अंदर तक उस ग़ुलाम के प्रति नफ़रत भर चुकी थी.

  खैर, अपने ही घर जाना आना कम कर दिया था, दोस्त के घर पढ़ाई का बहाना बनाकर बस जेपी की सम्पूर्ण क्रांति का हीरो बनने की तमन्ना थी, जो कभी पूरी ना हो सकी,पर जब जसलोक में उनसे एक लंबी मुलाक़ात हुई और उन्होंने मुझे पहचान लिया और बोले अरे तुम वही शिवकान्त हो जिसने मुझे भीड़ में घुसकर वो हाथ से लिखी कविता दी थी—? तुमसे तो मैं मिलना चाहता था पर उस कविता के नीचे अपना पता तो लिख दिये होते महाराज —कैसे ढूंढता तुझे, खैर आज मैं ख़ुश हूँ मेरी क्रांति आगे भी ज़िंदा रहेगी. यही उनसे दूसरी और आख़िरी मुलाक़ात थी.(चूँकि मैं भी मेडिकल फील्ड में आ चुका था तो मुलाक़ात आसान थी)

 अब मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई सुरजीत सिंह ने मेरी खोज खबर निकाल ली थी और मेरे इलाके के थाने में भेजकर मुझे उठाने के आदेश थे, चूँकि उम्र के अट्ठारह साल पूरे नहीं हुए थे तो मौखिक वारंट था ,खैर क़िस्मत अच्छी थी कि मुझे इसकी जानकारी मिल गई थी और मैं तुरन्त भूमिगत हो गया, पिताजी उसी इलाक़े में सम्मानित शिक्षक थे तो पुलिस ने उन्हें परेशान नहीं किया.

वो कविता वैसी की वैसी ही पुरानी डायरी से प्रस्तुत है

यह कविता “वाइस ऑफ़ इंदौर “ने 1979 में गणतंत्र विशेषांक में प्रकाशित की थी वो भी मिल गई है

शिवकांत वाजपेयी 

Ramswaroop Mantri

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