सुधा सिंह
बहुत सुसंस्कृत बौद्धिक लोग
चौक पर चौधरी की गरमागरम
मिर्ची और आलू-प्याज की पकौड़ी
नहीं खाते I
जलेबी, लवंगलता और समोसे का ख़याल
अगर सपने में भी आ जाये
तो जागकर शूगर, कोलेस्ट्रॉल आदि की चिन्ता में
मरने-मरने को हो जाते हैं I
वे रामभरोसे के भरपेट्टा भोजनालय में
तख्त पर बैठकर दोपहर या रात का
खाना खाने की सोच भी नहीं सकते
और असलम के ढाबे की
बड़े की बिरयानी के बारे में तो सोचने मात्र से
उनका हाजमा तबाह हो जाता है I
वे दोने में एक्स्ट्रा पानी माँग-माँगकर
न तो पानी बताशा खाते हैं न चाट,
और न पत्ते पर रबड़ी चाटते हैं I
और बरफ चुस्की की ओर तो वे
ताकना भी गुनाह समझते हैं I
वे यहाँ फुटपाथ पर इस बेंच पर बैठकर
चाउमिन खाने या मसाले वाली चाय पीने भी
नहीं आते जहाँ लेबर चौक के
मज़दूरों की भीड़ लगी रहती है I
इस मज़दूर बस्ती के मैदान में लगने वाले
दशहरा मेले में चरखी पर बैठकर
बच्चों के साथ बच्चा बन जाने के बारे में
सोचना भी वे या तो पागलपन मानते हैं
या बेहूदगी I
वे हमेशा धीर-गंभीर और चिन्तित रहते हैं.
बस उनका चित्त स्त्रियों की उपस्थिति में यदा-कदा
चंचल हो जाया करता है और तब थोड़ी देर को
देश-समाज की चिन्ता छोड़ वे
कुछ दूसरे उद्यमों में संलग्न हो जाते हैं I
ज्ञान और संस्कृति के आलोक से दूर
अँधेरे में जीने वाले निहायत मामूली लोगों की तरह
कुछ भी नहीं करते
बहुत सुसंस्कृत बौद्धिक लोग I
उनकी आवारगियाँ भी बहुत
सुरक्षित-संयमित-सुसंस्कारित होती हैं
और विद्रोह भी बेहद अनुशासित
और नफ़ीस होते हैं I
मुझे भी उन्होंने बहुत समझाया कि
कविता की गहन सौन्दर्यानुभूति
और उसमें जीवन के शाश्वत मूल्यों की
बसाहट के लिए
सुसंस्कृत बनना होगा और
अपनी तमाम बुरी आदतों से,
जैसे कि मुँहफटपन से, हरदम सच बोलने से,
शक्तिशाली और प्रभावशाली लोगों की
आलोचना करने से,
सबकी फटे में टाँग अड़ाने से,
बहुत आशावादी होने से,
असभ्य और झगड़ालू लोगों की संगत से,
अस्वास्थ्यकर और गँवारू खानपान की आदतों से
और हद दर्जे के चटोरेपन से
छुटकारा पाना ही होगा !
लेकिन मैं अभागन अपनी सड़कछाप आदतों से
पिण्ड न छुड़ा सकी,
ख़ुद को भव्य अकादमियों, सभागारों और
बड़े लोगों की संगत की आदी न बना सकी I
इसतरह यशस्वी प्रगतिशील बौद्धिक
बनते-बनते रह गयी,
अपना करियर ख़ुद ही बर्बाद कर लिया,
महाकवि बनने की संभावनाओं
का गला अपने हाथों से घोट दिया I





