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विचार-शक्ति और निष्क्रिय साधना

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 डॉ. विकास मानव

      विचारों का एकीकरण, केंद्रीयकरण ही विचार-शक्ति है। इसका प्रभाव और सन्तुलन-असन्तुलन हमारे जीवन पर बराबर प्रभाव डालता रहता है। जिस प्रकार जगत में जड़-चेतन अपनी-अपनी उन्नति के लिए पदार्थ, पोषक तत्व का आकर्षण करके अपना मूर्तरूप बनाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी इच्छा-शक्ति (विल पावर) की आकर्षण शक्ति यानी विचार-शक्ति के प्रवाह द्वारा सब कुछ कर सकता है जो वह चाहता है।

      प्रोफेसर एलिशा ग्रे ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘मिरेकल्स ऑफ नेचर’ में लिखा है :

     विचार-शक्ति का प्रवाह काफी रहस्यों से भरा है। देखा जाय तो विचार-शक्ति चालीस हजार से चार लाख अथवा उससे ज्यादा प्रति सेकेंड में कहीं भी पहुंच सकती है। इसे कोई भी ठोस पदार्थ नहीं रोक सकता। इसके स्पन्दन (बायब्रेशन) को केवल सूर्य का प्रकाश ही अवरुद्ध कर सकता है। भारत का अध्यात्म इस बात को पहले से जानता था। इसलिए कहा गया है कि रात्रि के उत्तर भाग में, उषाकाल में तथा सूर्यास्त के समय जब प्रदोष काल होता है और रात्रि के समय में ध्यान, धारणा, मन्त्र-जप आदि करने से और ग्रहण-काल में मंत्रों का अनवरत जप करने से बहुत ही शीघ्र सफलता मिलती है।

      विचार-शक्ति का प्रेरक मूलबीज सूक्ष्म है। शिर के एक बाल का एक लाखवां भाग जितना सूक्ष्म है, फिर भी उसमें अपार शक्ति निहित है। परा, पश्यन्ति, मध्यमा एवम बैखरी का नियमन न करने पर भी अज्ञात शक्ति द्वारा मनुष्य अपने शब्दों का जिस प्रकार कम या ज्यादा तेज स्वर में उच्चारण करता है, उसी प्रकार उसके अक्षर में स्फुरण-शक्ति उत्पन्न होती है।

       उस स्फुरण शक्ति को जैसे-जैसे केन्द्रीभूत किया जाता है, वैसे-ही-वैसे वह शक्ति तीव्र होकर इच्छा-शक्ति के अनुसार सबको आकर्षित करके कार्य का सम्पादन करती जाती है।

      भारतीय धर्म, वेद-पुराण, मन्त्र-शास्त्र आदि, बौद्ध धर्म के सूक्त महायान, धम्मपद आदि, जैन धर्म के सूक्त, कथा, पुराण, स्त्रोत्र मन्त्र आदि, पारसियों में अवस्ता, माधुवानी आदि, ईसाई धर्म में बाइबिल, न्यू टेस्टामेंट, इस्लाम में कुरान की आयतें, हदीश आदि के अक्षर, शब्द और उच्चारण आदि अपनी-अपनी विधि के अनुसार धार्मिक विचार, सार गर्भित शब्द, वाक्य और मन्त्र, उदात्त-अनुदात्त (ऊंचे-नीचे स्वर) उच्चारणों में ग्रथित किये गए हैं जिनका पूर्ण भक्ति, विश्वास एवम भावना से उच्चारण करने से उसका स्पन्दन-स्फुरण होने लगता है।

      इस आकर्षण का स्पन्दन (बायब्रेशन) वायु में प्रवाहित होने लगता है। जैसे जल में कंकड़ फेंकने से चक्राकार लहरें उत्पन्न होकर एक के पीछे एक गोलाकार स्पन्दन बनाकर सीमा तक पहुंचने की क्रिया करती हैं, उसी प्रकार विचार-तरंगे भी पदार्थ को आकर्षित करके प्रचलित कर देती हैं। पदार्थ का प्रचिलत होना ही कार्य-सिद्धि की प्रथम अवस्था है और प्रचलित पदार्थ से उत्पन्न गति से उसके मूर्तरूप बनने में किसी प्रकार की शंका नहीं रहती है।

      उसी प्रकार मंत्रों के, अक्षर, शब्द, वाक्य में दृढ़ भक्ति, विश्वास व पूर्ण समर्पण के साथ इष्ट के ध्यान के साथ अर्थ सहित उच्चारण, जप आदि करते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे स्पन्दन का आकर्षण बढ़ता जाता है। यही कारण है कि उनके प्रभाव बहुत शीघ्र दिखने लगते हैं। अनियमित, ध्यानरहित और अर्थशून्य होने से मन्त्र-सिद्धि नहीं होती।

    इस प्रकार के एक लाख जप करने की अपेक्षा स्वरयुक्त पद्धति और अर्थपूर्ण मन्त्र एक बार ही जपने से अपना प्रभाव दिखला देता है।

      प्राचीन काल में ऐसे कई उदाहरण रहे थे जब ऋषियों के श्राप की कथा और वर देने की कथा प्रचलित थी। विचार-शक्ति, इच्छा-शक्ति और मनः-शक्ति के घनीभूत दृढ़ संकल्प द्वारा श्राप या वरदान दिया जाता था। बड़े-बड़े राजा-महाराजा इन ऋषियों की आज्ञा मानते थे। उन्हें पूर्ण सम्मान भी देते थे।

     घने वन-पर्वतों में रहकर भी इनका प्रकृति पर पूर्ण नियंत्रण होता था। चेतना ही विचार-शक्ति है, मनः-शक्ति है और है– प्राण-शक्ति। सभी के मूल में चेतना ही है, चाहे उसे आत्मा कहें, प्राण कहें या कहें विचार-शक्ति, सभी उसी चेतना की अभिव्यक्ति हैं और उसकी अव्यक्त शक्ति का परिणाम हैं।

      जिस प्रकार फूल, इत्र, कपूर आदि अन्य पदार्थों की गंध होती है, उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क से प्रति क्षण निकलने वाले विचार के भी रूप और रंग होते हैं। जैसे-जैसे विचारों में परिवर्तन होता है, वैसे-ही-वैसे विचारों के रूप-रंग में भी परिवर्तन होता है। साधक सूक्ष्म दृष्टि द्वारा इनको देख सकता है और उसी के द्वारा सामने वाले की मनोदशा और चरित्र को जान लेता है।

     प्राचीन काल से भारतीय योगियों के लिए यह सब जानना कोई श्रमसाध्य कार्य नहीं था। जब विचार की प्रबल शक्ति के बारे में वैज्ञानिकों को पता चला तब इस पर गहन शोध हुआ। विशेष कैमरे और यन्त्र द्वारा जब उन्हें इस विषय मे पता चला तो वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया। मनुष्य के विचार, उसके #औरा यानी #आभामण्डल ही हैं जो अपने रंग बदलते रहते हैं।

     शान्त, ज्ञानी, सात्विक मनुष्य की आभा सिन्दूरी रंग की पाई गई है, उसी प्रकार तामसिक, क्रूर मनुष्य की आभा धुएं के रंग जैसी चारों ओर फैली मिली। इसी प्रकार अन्य मनुष्यों का उनके कर्मानुसार रंग-वलय मिला है।

      अमेरिका के प्रसिद्ध रसायन विज्ञान के वैज्ञानिक #एल्मर #गेट्स ने अपने गहन शोध से पाया कि विचार-शक्ति का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर गहरी छाप छोड़ता है। विचारों के गहन प्रभाव से उसके चरित्र का भी निर्माण होता है।

       तामसिक विचार वाला मनुष्य कभी भी चरित्रवान नहीं हो सकता। सात्विक विचार वाला मनुष्य चाहकर भी गलत चरित्र वाला नहीं हो सकता। हल्का पीला रंग शुद्ध बुद्धि का सूचक है। हल्का नीला रंग धार्मिक वृत्ति का द्योतक है। नीला रंग प्रेम-भक्ति का, गुलाबी रंग मैत्री, करुणा और वात्सल्य का, नारंगी रंग अभिमान और महत्वाकांक्षा का, हरा रंग सर्वत्र अनुकूलता का, शान्ति का, काला रंग ईर्ष्या, द्वेष और भय का, लाल रंग नाना प्रकार की विषय-वासना का, बादामी रंग लोभ, तृष्णा का, भूरा रंग स्वार्थ वृत्ति का और शुभ्र प्रकाशमय रंग परमात्मा का, साधक का और जीवन वृत्ति का सूचक है।

      विचार-शक्ति की आकृति हमारे सहज नेत्रों से नहीं दिखलाई पड़ती। इसका कारण यह है कि जैसे हमें आकाश शून्य-सा दिखलाई पड़ता है लेकिन वैसा है नहीं वह। एक छोटे-से कण भर की भी शून्यता नहीं है वहां। सर्वत्र चैतन्य भरा है। वह परिपूर्ण है। वह रिक्त नहीं है, शून्य नहीं है।

      प्रकृति का अटल नियम है–क्रिया व उसकी प्रतिक्रया। परमाणुओं का सूक्ष्म खेल चल रहा है। क्रिया के साथ प्रतिक्रिया होती रहती है। जैसे खेत में बीज पड़ता है, जल का संयोग होते ही उसमें अंकुर पैदा होता है। हम प्रत्यक्ष देखते हैं अंकुर को पैदा होते हुए। किन्तु वह क्रिया क्या है जिससे अंकुरण होता है।

       उस आंतरिक क्रिया को हम जान नहीं सकते, क्योंकि वह अज्ञेय है। उसी प्रकार हम विचारों के अंकुर को जान सकते हैं, किन्तु उनकी उत्पत्ति को नहीं जान सकते। क्योंकि उनकी उत्पत्ति और उनका परिवर्तन अज्ञेय है जिसे जाना नहीं जा सकता।

      लेकिन विचार की शक्ति और उसके रहस्यों को जब तक हम जान नहीं सकते, तब तक हम विचारों की आकृति, गुण, धर्म, रूप कैसे जान सकते हैं ?

      विचार-शक्ति की अनन्त लीलाओं को जानने-समझने-देखने के लिए हमें दिव्य ज्ञान एवम दिव्य दृष्टि चाहिए। यह बात तो सत्य है कि पंचतत्वों की भिन्न-भिन्न आकृति, उनके भिन्न-भिन्न रूप-रंग हैं, उसी प्रकार विचारों के भी हैं। उन्हें गहन योग-साधना द्वारा जानना सम्भव है।

      गीता में कृष्ण कहते हैं–जो जिस श्रद्धा-भावना में तन्मय है, वह वही है अर्थात वह श्रद्धा-भावना का स्वयं स्वरूप बन जाता है।

      कहने की आवश्यकता नहीं–जैसा मनुष्य विचार करता है, वैसा ही वह धीरे-धीरे होने भी लगता है। सकारात्मक विचार करने वाले मनुष्य के अन्दर दया, धर्म, परोपकार, तेज और स्वास्थ्य होता जाता है, उसी प्रकार नकारात्मक विचार वाला बलहीन, तेजहीन, ईर्ष्या, द्वेष, जलन आदि विभिन्न रोगों से ग्रस्त होता जाता है।

      विचार-शक्ति पदार्थ की भी आकर्षण शक्ति है। यह हम जानें या न जानें, बाह्य और आंतर जगत के समान विचार अपने आप ही आकर विचारों में सम्मिलित हो जाते हैं। उन्हें सबल या निर्बल करके कार्य को तत्पर या कर्मरहित बना देते हैं।

       यह एक सार्वभौमिक नियम की तरह है। इसका प्रवाह कभी भी रुक नहीं सकता। इसका प्रमाण ध्वनि-प्रतिध्वनि के समान है। हम किसी का भला या बुरा चाहते हैं तो वही समान विचार अवरुद्ध होकर प्रतिध्वनि की तरह हमारी तरफ वापस आता है यानी भविष्य में भले-बुरे विचार का प्रभाव हम पर भी पड़ता है। उससे हम अछूते नहीं रह सकते अर्थात भले-बुरे विचारों का समान विचारों के साथ हमारे अन्दर परिवर्तन होता है।

      हम स्वयं उस भलाई-बुराई के चक्र में फंस जाते हैं यानी अगर हम किसी का बुरा चाहते हैं तो विचार करते रहते हैं कि उस व्यक्ति का बुरा हो जाये। जब आपका विचार उस व्यक्ति तक जाता है तो वही विचार परावर्तित होकर आपके पास भी लौटकर आएगा। अगर आप किसी का भला विचार करेंगे तो उसका भी परावर्तन होकर आपके पास आएगा। इसीलिए कहा गया है कि किसी का बुरा मत सोचो। उसके कर्म पर उसे छोड़ दो–ईश्वर देखेगा।

        इसीलिए विचार को कुविचार न बनने दें, क्योंकि अखण्ड चैतन्यस्वरूप परमात्मा के अखण्ड चैतन्यरूप हममें प्रतिबिंबित है।

      महर्षि वशिष्ठ का कथन है कि मैं ही जगत में सर्वत्र हूँ, मैं ही अव्यक्त परमात्मा हूँ। भूत-भविष्य मेरे से विलग कुछ नहीं है। ऐसी भावना करो। इसका अर्थ यह है कि अनन्त परमात्मारूप में हमारा शान्त रूप है। हमें दैवीय विचार- शक्ति द्वारा सभी बन्धनों को तोड़कर बन्धनरहित होना चाहिए। दैवीय विचारों को यानी सद्विचारों का निरन्तर प्रवेश होने के लिए हृदय के द्वार पूर्णरूप से खोलकर अनन्त होना चाहिए।

       दैवीय विचारों का संचय करके दैवीय सम्पत्ति का लाभ लेना चाहिए यानी हमारे आचरण-विचरण और अनुकरण में कदम-कदम पर उसका अनुभव प्राप्त करना चाहिए। जैसे-जैसे दैवीय सम्पत्ति हमारे विचारों में उदय होगी, वैसे-ही-वैसे सरल शान्त होते जाएंगे। निरोग, बलवान, ऐश्वर्यवान होंगे।

      कोई भी नकारात्मक या सकारात्मक विचार मनुष्य या सचेतन पदार्थों में ही उत्पन्न नहीं होते। ऐसा नहीं है। प्रत्येक जड़-चेतन, दृश्य-अदृश्य पदार्थ में भी उत्पन्न होते हैं। उनका हमें आभास नहीं होता। क्योंकि उत्क्रांति परिणाम का यह नियम है कि सूक्ष्म में जो ज्ञानावस्था होती है, वह स्थूल में नहीं होती।

        इसलिए जब तक हम विचार-शक्ति को सूक्ष्म नहीं करेंगे, तब तक हम दैवीय संपत्ति के अधिकारी नहीं हो सकते। हमारी दृष्टि संकुचित है जो एक निर्धारित सीमा के बाहर के पदार्थों को नहीं देख सकती। उसे देखने के लिए दूरबीन की सहायता लेनी पड़ती है। वैसा विचार-शक्ति के लिए नहीं है। विचार-शक्ति को प्रबल करने के लिए किसी भी यन्त्र की आवश्यकता नहीं होती।

        केवल अपने विचार को एकाग्रता से जोड़ना है, क्योंकि यह प्रवाह चलता रहता है। एकाग्रता के द्वारा उसे केन्द्रीभूत करना है।

      आज जितनी ज्ञान-विज्ञान की खोज हुई और अविष्कार हुए, उसके पीछे विचार-शक्ति ही है। जब एकाग्रता के द्वारा विचार-शक्ति घनीभूत हुई तब एक झटके में अविष्कार के सूत्र मिल गए।

      विचार-शक्ति का सबसे गहरा सम्बन्ध श्वांस-प्रश्वांस से है। विचार-शक्ति बिना प्राणऊर्जा घनीभूत नहीं हो सकती। विचार में जब उत्तेजना आती है तो हमारे श्वांस-प्रश्वांस की गति बढ़ जाती है। जब विचार सामान्य होता है तब हमारा श्वांस-प्रश्वांस लयबद्ध-सा हो जाता है।

      विचार-शक्ति हमारे लिए जन्म-जरा-मृत्यु है। विचार ही हमारे माता-पिता हैं। विचार ही हमारे भाई-बन्धु हैं। विचार ही हमारे स्त्री-पुत्र हैं। विचार ही हमारे इष्ट-मित्र हैं। विचार ही हमारे तत्वदर्शी, उपदेशक, गुरु, ज्ञान-विज्ञान, कला हैं। बिना विचार के हम कुछ भी नहीं।

      हमारा अस्तित्व उसके बिना नगण्य है। जगत में विचार का अटल साम्राज्य है। जगत में विचार-शक्ति का अनुशासन है। पूरे जगत में अपरोक्ष रूप से विचार-शक्ति का ही आधिपत्य है। अगर विचार-शक्ति को आपके भीतर से निकाल दें तो आप जड़वत हो जाएंगे। सब कुछ होते हुए भी शून्य हो जाएंगे। विचार-शक्ति, , प्राण-शक्ति सब चेतना के ही विविध रूप हैं।

*निष्क्रिय साधना :*

       _अब जानिए विचारों के पार शून्य में प्रवेश कर साक्षी का स्मरण करवाने वाली ध्यान विधि :_

     परिपूर्ण शून्यता ध्यान है। यह परिपूर्ण शून्यता व्यक्ति अगर लाना चाहे, तो मेरी समझ में, उसे तीन अंगों पर अपने प्रयोग करना होता है। प्राथमिक रूप से उसका शरीर है, अगर उसे अक्रिया में जाना है, निष्क्रियता में जाना है, तो शरीर को अक्रिय छोड़ना होगा।

       शरीर को बिलकुल निष्क्रिय छोड़ना होगा, जैसे कि मृत्यु में शरीर छूट जाता है। उतना ही निष्क्रिय छोड़ देना होगा, ताकि शरीर पर जितने भी तनाव, जितने भी टेंशंस हैं, वे सब शांत हो जाएं।

      यह तो आपने अनुभव किया होगा, शरीर पर अगर कहीं भी तनाव हो; पैर में अगर दर्द हो, तो चित्त बार-बार उसी दर्द की तरफ जाएगा। अगर शरीर में कहीं कोई तनाव न हो, तो चित्त शरीर की तरफ जाता ही नहीं। यह आपको अनुभव हुआ होगा, आपको शरीर में केवल उन्हीं अंगों का पता पड़ता है, जो बीमार होते हैं।

       जो अंग स्वस्थ होते हैं, उनका पता नहीं पड़ता। अगर आपके सिर में दर्द है, तो आपको पता चलेगा कि सिर है और अगर सिर में दर्द नहीं है, तो सिर का पता नहीं चलेगा। शरीर जहां-जहां तनावग्रस्त होता है, वहीं-वहीं उसका बोध होता है। शरीर अगर बिलकुल तनाव-शून्य हो, तो शरीर का पता नहीं चलेगा।

तो शरीर को इतना शिथिल छोड़ देना है कि उसमें सारे तनाव विलीन हो जाएं, तो थोड़ी देर में देह-बोध विलीन हो जाता है। थोड़ी देर में देह है या नहीं है, यह बात विलीन हो जाती है। थोड़े दिन के ही प्रयोग में देह-बोध विसर्जित हो जाता है।.

     शरीर का परिपूर्ण तनाव-शून्य होना, शरीर से मुक्त हो जाने का उपाय है। इसलिए ध्यान के पहले चरण में हम शरीर को ढीला छोड़ देते हैं।

अभी आज प्रयोग के लिए बैठेंगे, शरीर को बिलकुल उस समय ढीला छोड़ देना है, जैसे मुर्दा हो गया। जैसे उसमें कोई प्राण नहीं है। उसमें कोई कड़ापन, कोई तनाव, कोई अकड़, कोई कायम नहीं रखनी, सब छोड़ देनी है।

     इतना ढीला छोड़ देना, जैसे यह मिट्टी का लोंदा है, हमारी इसमें कोई पकड़ नहीं, इसमें कोई जान नहीं। अपने ही शरीर को बिलकुल मुर्दा की भांति छोड़ देना है।

जब शरीर को बिलकुल शिथिल छोड़ देंगे, उसके बाद मैं दो मिनट तक आपके सहयोग के लिए सुझाव दूंगा, ये सजेशंस दूंगा कि आपका शरीर शिथिल होता जा रहा है। मेरे दो मिनट तक निरंतर कहने पर कि शरीर शिथिल हो रहा है, आपको भाव करना है कि शरीर शिथिल हो रहा है।

       सिर्फ यह भाव मात्र करना है कि शरीर शिथिल होता जा रहा है।

आप हैरान होंगे, भाव की इतनी शक्ति है कि अगर आप बहुत संकल्पपूर्वक भाव करें, तो प्राण तक शरीर से छूट जा सकते हैं।

    जिसको भारत में इच्छा-मृत्यु कहते हैं। वह केवल भाव मात्र है। अगर आप ठीक से भाव करें, शरीर वैसा ही हो जाएगा।

हम जैसा भाव करें शरीर में वैसी परिणतियां हो जाती हैं। अगर ठीक से हम भाव करें कि शरीर शिथिल हो रहा है, परिपूर्ण चित्त से भाव करें, पूरे समग्र चित्त से भाव करें कि शरीर शिथिल हो रहा है, दो मिनट में आप पाएंगे कि शरीर मृत हो गया।

      उसमें कोई प्राण नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर शरीर गिरने लगे, तो उसे रोकना नहीं है। अच्छा हो कि जरा भी उसे न रोकें, जब शरीर गिरने लगे, उसे बिलकुल गिर जाने दें। उसके बाद दो मिनट तक भाव करना है कि श्वास शांत हो रही है।

        मैं दोहराऊंगा कि श्वास शांत हो रही है, दो मिनट तक आपको भाव करना है कि श्वास शांत हो रही है। अगर हमें परिपूर्ण शून्यता में जाना है, तो शरीर का शिथिल होना अनिवार्य है, श्वास का शांत होना अनिवार्य है। दो मिनट भाव करने पर श्वास शांत हो जाती है।

       उसके बाद में दो मिनट तक कहूंगा कि चित्त मौन हो रहा है, विचार शून्य हो रहे हैं। दो मिनट तक भाव करने पर विचार शून्य हो जाते हैं। और इन छह मिनट की छोटी सी प्रक्रिया में अचानक आप पाएंगे कि एक रिक्त स्थान में, एक अवकाश में, एक शून्य में प्रवेश हो गया।

      चित्त मौन हो जाएगा। भीतर वाणी और शब्दों का उठना विलीन हो जाएगा। भीतर एक रिक्त स्थान, खाली जगह रह जाएगी, जहां कुछ भी नहीं है। न कोई विचार है, न कोई रूप है, न कोई आकृति है, न कोई गंध है, न कोई ध्वनि है, जहां कुछ भी नहीं है, केवल अकेले आप रह गए।

      उस अकेलेपन को, उस लोनलीनेस को, जहां बिलकुल अकेला मैं रह गया चारों तरफ रिक्त आकाश से घिरा हुआ, उस अकेलेपन में ही उस स्व का अनुभव उदभूत होता है, जिसको महावीर ने आत्मा कहा है, जिसको शंकर ने ब्रह्म कहा है, या जिनको और लोगों ने और नाम दिए हैं। उस सत्य का अनुभव उस अत्यंत एकाकीपन में होता है।

एकाकीपन की हम तलाश करते हैं जंगल में जाकर, वनों में भाग कर, पहाड़ों पर भाग कर, लेकिन एकाकीपन का संबंध स्थान से नहीं है, स्थिति से है। अकेलापन जंगल में जाकर नहीं खोजा जा सकता। पशु-पक्षी होंगे, उनसे ही मेल-जोल हो जाएगा, उनसे ही संगी-साथीपन बन जाएगा। 

     अकेलापन अपने में जाकर पाया जाता है, जहां सब रिक्त हो जाए और मैं बिलकुल अकेला रह जाऊं। उस अकेली स्थिति में, उस नितांत एकांत स्थिति में, जहां केवल होने मात्र की स्पंदना रह गई, वहां कुछ अनुभव होता है जो जीवन में क्रांति ला देता है।

       उसके लिए बहुत अत्यंत सरल सा छोटा सा प्रयोग है। यह प्रयोग इतना छोटा सा है कि कई दफे लग सकता है कि इतने से प्रयोग से कैसे आंतरिक साक्षात हो सकता है? लेकिन बीज हमेशा छोटे होते हैं, परिणाम में वृक्ष विराट हो जाते हैं।

     जो बीज को छोटा समझते हैं; यह भाव कर लें कि इससे क्या वृक्ष होगा, वह वृक्ष से वंचित रह जाएगा। बीज हमेशा छोटे होते हैं, परिणाम में विराट उपलब्ध हो जाता है। अत्यंत सूक्ष्म सा बीज ध्यान का बोने पर, विराट अनुभूति की फसल को काटा जा सकता है।

*चरणवद्ध रूप से कीजिये साक्षीत्व की साधना~विधि का प्रयोग* 

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पहला चरण : विश्राम में लेट जाएं या आराम कुर्सी पर बैठ जाएं और शरीर को ढीला छोड़ दें और दो से तीन मिनट तक भाव करें — “शरीर शिथिल हो रहा है… शरीर शिथिल हो रहा है…शरीर शिथिल हो रहा है…।”

दूसरा चरण : अब पुनः दो से तीन मिनट भाव करें–  “श्वास शांत हो रही है… श्वास शांत हो रही है…श्वास शांत हो रही है… ।” 

तीसरा चरण : अब भाव करें- ” विचार शून्य हो रहे हैं… विचार शून्य हो रहे हैं… विचार शून्य हो रहे हैं…!”

यदि शिथिल होने में समय लगे तो दो तीन मिनट से मिनट से ज्यादा भी कर सकते हैं। पहले चरण में शरीर शिथिल हो जाएगा।

     दूसरे में श्वास शिथिल होगी और तीसरे चरण में विचार भी शिथिल होने लगेंगे। शरीर और मन शांत होगा तो कोई विचार नहीं होगा अतः हम साक्षी होंगे। साक्षी इसलिए हो जाएंगे क्योंकि उर्जा विचारों से मुक्त हो चेतना की ओर यानी हमारी ओर लौट आएगी और हमें साक्षी की अनुभूति होगी। 

     हमें अपने आसपास की आवाजें सुनाई देगी उन्हें बिना किसी प्रतिक्रिया के सुनते रहेंगे। फिर जितनी भी देर इस स्थिति में रहना चाहें रहें। 

     इस प्रयोग में शरीर का थका हुआ होना उपयोगी होगा। विधि प्रयोग से पहले थोड़ा व्यायाम या नृत्य बेहतर रहेगा।

Ramswaroop Mantri

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