स्वच्छता और स्वाद मेें अपनी अलग पहचान रखने वाले इंदौर में इस बार इस बार लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव का स्वाद फिका है। कांग्रेस उम्मीदवार अक्षय बम द्वारा नाम वापस लेने के बाद इंदौर मेें चुनाव औपचारिकता भर रह गया है। कांग्रेस ने नोटा का प्रचार कर इंदौर में भाजपा वर्सेस नोटा का माहौल बनाने की कोशिश की।

अब देखना है कि इंदौर में सबसे ज्यादा नोटा को वोट देने का रिकार्ड बनता है, या प्रदेश में सबसे बड़ी भाजपा उम्मीदवार की जीत का। चुनाव नीरस होन के कारण इस बार इंदौर में पूर्व के चुनावों की तुलना में मतदान कम होने की आशंका जताई जा रही है। वैसे इंदौर में लोकसभा चुनाव में मतदान हमेशा 50 प्रतिशत से ज्यादा रहा है। चुनावी मैदान से कांग्रेस के बाहर होने के कारण प्रचार भी जोर नहीं पकड़ पाया।
चुनाव प्रचार के अंतिम दिन पहला और आखिरी रोड शो व आमसभा मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इंदौर में ली। भाजपा के कार्यकर्ता भी ‘जीत रहे है तो फिर मेहनत क्यों’ के अनमनेे भाव के साथ बैठकों में जा रहे है। भीतर से उनका भी उत्साह चुनाव के लिए नहीं बचा। यही स्थिति इंदौर के वोटरों के साथ भी है।
इंदौर में हमेशा 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदान
इंदौर मेें वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में 69.32 प्रतिशत मतदान हुआ था। इंदौरवासी मतदान मेें हमेेशा आगे रहे हैै। वर्ष 2004 के चुनाव में प्रदेश में सिर्फ 48.9 प्रतिशत वोटिंग हुआ था, तब इंदौर में 50.9 प्रतिशत मतदान हुआ था।
इंदौर मेें आठ लोकसभा चुनाव में वर्ष 1991 में ही 48.59 प्रतिशत मतदान हुआ था। उसके बाद कभी भी 50 प्रतिशत से कम मतदान नहीं हुुआ। आठ चुनावों में सबसे ज्यादा वोटिंग पिछले लोकसभा चुनाव में हुई। तब 69.32 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। पिछले चुनाव मेें भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी की पांच लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हुई थी। पिछली बार इंदौर में 5 हजार से ज्यादा नोटा मेें वोट गए थे। इस बार कांग्रेस के परंपरागत वोटर का झुकाव नोटा की तरफ भी हो सकता है।




