स्नेहा सिंह (वाराणसी)
_गर्मी का मौसम शुरू होते ही हमें याद आ रही हैं गाँवों के दुआरों की खपरैल वाली ठंडी कच्ची अटरियाँ,साफ़ सुथरे हवादार सायबान और याद आ रही हैं वो मोटी-मोटी दीवारों वाली ड्योढ़ियाँ जहाँ हवा और रोशनी का गुज़र तो ज़रा कम होता लेकिन गर्मी की रसाई बिल्कुल नहीं होती।जब लू चलती और सहन में लगे दरख़्तों के साये में भी बैठना मुमकिन नहीं होता,बाहरी दालान में लू के थपेड़े आने लगते तो हमेशा ठंडी रहने वाली ड्योढ़ी में बँसहटा लेकर चले जाने और वहाँ की ठंडक में बँसहटे पर आराम फ़रमाने का अपना अलग लुत्फ़ होता था।बँसहटा बाँस से बनी हल्की चारपायी होती है।_
जबकि लकड़ी की खाट भारी होती है।पुराने खपरैल वाले मकान ख़त्म होते जा रहे हैं तो ऐसे में पुराने मकानों के सायबान-दालान-सहनची-ड्योढ़ी-ओसारे-बैठके की याद भी ऐसे लोगों के ज़ेहन से धूमिल होती जा रही है जिन्होंने पुराने मकान देखे हैं और उनमें रहे हैं।
_शहरी और नई पीढ़ी तो पुराने मकानों में इस्तेमाल होने वाली जगहों और उनके बारे में प्रचलित शब्दावली से तो बिल्कुल अनभिज्ञ है।अब कम लोग जानते हैं ड्योढ़ी बारे में,ड्योढ़ी पुराने और बड़े मकानों की शान हुआ करती।पुराने मकानों में पहले बाहरी सहन पड़ता,उसके बाद सायबान-बरामदा आता।_
इस बरामदे के बाद पड़ती ड्योढ़ी।हिंदुओं और मुसलमानों की कथित उच्च जातियों में महिलाओं की रसाई ड्योढ़ी तक ही होती।वो बाहर बरामदे में या सहन में जाकर नहीं बैठतीं।जब उनके मायके से कोई मर्द रिश्तेदार आता तो महिलाएं उससे मुलाक़ात करने ड्योढ़ी में जाया करतीं।पुराने मकानों और कोठियों में इसी ड्योढ़ी के ऊपर अटारी हुआ करती।अटारी पर जाने के लिए ज़ीना मतलब सीढ़ियाँ आमतौर से ड्योढ़ी से ही जातीं।
_अटारी एक ऐसा बड़ा कमरा होता जो कोठी या मकान में बाहर से दिखायी पड़ता।अटारी दो-दो हाथ चौड़ी दीवारों वाला कमरा होता था जिसके ऊपर नरिया थपुआ वाली कच्ची छाजन होती थी।ये कच्ची छाजन गर्मी में बेहद सुकून देती।मोटी दीवारों की वजह से सर्दी और गर्मी दोनों मौसम में इसके अंदर राहत मिलती,ना शीत दीवार ठंडी कर उसे पार पाती ना गर्मी दीवार को इतना गर्म कर पाती कि उसकी गर्मी की वजह से अटरिया मतलब अटारी का अंदरूनी हिस्सा गर्म हो।_
अगर नीचे बैठका पक्का है तो अटरिया के सामने एक खुली छत भी होती जो सहनची कहलाती।पुराने घरों की बाहरी दीवार ईंट की होती हैं और कई बार बिना ईंट की दीवार भी होती है जो सिर्फ़ मिट्टी की होती है और दो-दो हाथ तक चौड़ी होती है।बिना ईंट की मोटी दीवार में आला नक़ब से सेंध काट लेना आसान होता था,इसलिए लोग बाद में कोशिश करने लगे लगे कि बाहरी दीवार में ईंट ज़रूर हो,भले कितना भी मोटा मिट्टी का तहा उसके ऊपर बाद में जमाया जाए।
_खपरैल की मज़बूत छत बनाना भी अपने आप में श्रमसाध्य कलाकारी थी।लकड़ी की बड़ेर पर बैठके की छत टिकती थी।बड़ेर पर ही छत का वज़न होता,इसलिए ये मज़बूत लकड़ी की हुआ करती।सागौन और सरई की लकड़ी बड़ेर के लिए उपयुक्त मानी जाती,खजूर की लकड़ी भी चलन में थी,बेल की लकड़ी का भी बड़ेर में इस्तेमाल होता था।लेकिन बेल की लकड़ी को एक बरसात खुले में छोड़ उसे पानी दिखाना होता,वरना बेल की लकड़ी में कीड़े लग जाते और फिर इस बड़ेर पर टिकी छत के कभी भी ढह जाने का ख़तरा उत्पन्न हो जाता।_
बड़ेर पर लगता गुल्ला और गुल्ले पर पक्की लकड़ी जैसे बबूल वग़ैरह की बैसाखी लगा करती,अब इस बैसाखी पर लगाया जाता पक्का बाँस।इस बाँस के चयन में भी बहुत सावधानी बरती जाती।कच्चा बाँस लगता तो बारिश की रिमझिम फुहार पड़ते ही उस बाँस में कीड़े लगने की संभावना बलवती हो जाती,तब छत कमज़ोर हो जाती और उसके ढहने की आशंका रहती।
_इसलिए पका बाँस लगता,पके बाँस के ऊपर कास की बारी आती थी।कास को बहुत गज्झिन लगाया जाता,मतलब ख़ूब घना लगाया जाता,मुट्ठी में बांधकर पास पास लगाया जाता।कास एक तरह की घास होती है।आमतौर पर नदी के किनारे होती है।_
आदमक़द से लंबी-लंबी होती है।सरपत से अलग घास कास होती है।जहाँ बाढ़ आती है और जलभराव होता है उस इलाक़े में कास ख़ूब होती है।कास के फूल सफ़ेद होते हैं।जब बरसात ख़त्म होती है तो कास की कटाई होती है।बाँसफोर जाति के लोग कास की कटाई का काम अधिक करते हैं,दूसरी कई जातियों में भी कास की कटाई का काम होता है लेकिन बाँसफोर का प्रतिशत अधिक है।वही कास का बोझ बना बरसात बाद कास बेचने का काम करते हैं।
_अब तो खपरैला छवाई कम हो गई लेकिन फिर भी शौक़ीनों के यहाँ खपरैला छवाई में और फेरौटी में कास काम आती है।ख़ैर,यही कास खपरैल के मकान में इस्तेमाल होती।अब इस कास के ऊपर गीली मिट्टी का लेपन होता।गीली मिट्टी का लेपन हेड मिस्त्री करते।जो हमारे वाराणसी के इलाक़े में नोनिया-लोनिया जाति के ही अधिक होते।_
ये जाति मिट्टी खोदने,नमक बनाने और मकान बनाने की माहिर थी।हेड मिस्त्री इसी बिरादरी से ज़्यादा होते,उनकी कला इसी कास के ऊपर किए जाने वाले माटी लेपन में देखी जाती।माटी लेपन में लकड़ी का सपाटा भी नहीं चलाना होता था,वरना कहीं छेद बन सकता था,ये लेपन ख़ालिस हाथ का ही कमाल होता।माटी लेपन हो जाने के बाद भूसा मिलाकर गाय के गोबर से लेपन होता।
_अब इसके ऊपर लगता था थपुआ और थपुए के जोड़ पर लगती नरिया।इसी नरिया को पकड़कर बरसात का पानी खपरैले से नीचे आता और खपरैल के नीचे बनी टपक से नीचे टपक जाता।नरिया थपुआ काली मिट्टी का बेहतर माना जाता था और कुम्हार की परख इसी में होती थी कि वो कितना मज़बूत नरिया थपुआ बनाता है।_
कई बार नरिया-थपुआ के अलग से कुम्हार होते जो सिर्फ़ नरिया थपुआ बनाते।जैसे आजकल ईंट का उद्योग है,उसी तरह से नरिया थपुआ बनाने का उद्योग भी पुराने दौर में बहुत जगहों पर चलता था।नरिया-थपुआ को भट्ठी पर मज़बूती से बनाने के लिए उसे खपड़े या कापुस से ढका जाता था।जब छत पर नरिया-थपुआ लग जाता तो छत का काम पूरा हो जाता।अब एक ऐसी छत तैयार थी जिसके भीतर गर्मी में एसी से बेहतर ठंडक होती और ये शरीर को नुकसान ना पहुंचाने वाली क़ुदरती ठंडक होती।
_हर साल बारिश आने से पहले इस खपरैल वाली छत का मुआयना करना होता,ज़रूरत होती तो फेरौटी करायी जाती।ये एक प्रकार की मरम्मत होती जिसमें लीकेज बंद किया जाता,पुराने और टूटे नरिया-थपुआ मतलब खपरैल को बदल दिया जाता।पुराने मकानों में जो बाहरी बैठका होता उसमें दिया जलाने और सामान रखने के लिए आला बना होता जो ताखा भी कहा जाता और उर्दू में ताक़ इसका नाम था।_
बैठके में कपड़ा टांगने की लकड़ी की खूंटी भी होती थी जो दीवार में ठुंकी होती।बाहरी बैठके में ही एक कमरा होता जिसे मेहमानख़ाना या गोल कमरा कहा जाता।मेहमान उस दौर में गर्मी में सहन में चारपाई पर सोया करते और बारिश-जाड़े में बैठके मतलब खुले बरामदे में उनकी चारपाई लगा बिस्तर लगा दिया जाता,लेकिन फिर भी एक गोल कमरा बैठके में ज़रूरी था जिसका इस्तेमाल कभी-कभार ही मेहमान करते।मेहमान आमतौर पर बाहरी सहन में ही बैठते और दरख़्तों के नीचे बिछी चारपाईयों पर आराम फ़रमाते।खटिया पर बैठ मिट्टी के पेंदे वाला फ़र्शी हुक्का गुड़गुड़ाते।
_सहन में बिछी ये खटिया गुड़गुड़ी से निकलकर आयी सुतली से बिनी होती।सन मतलब सनई और पटवा से सुतली बनती है और इसी से चारपायी बिनी जाती है।नारियल की रस्सी से हेठी खटिया बनती है,शौक़ीन नारियल की सुतली का इस्तेमाल अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं।सहन में पेड़ों के नीचे बिछी इन्हीं चारपाईयों पर गर्मियों की दुपहरी में लेट हवा खाने और रात में खुले आकाश में छिटके तारे निहारने का अपना अलग आनंद है।_(चेतना विकास मिशन)





