–तेजपाल सिंह ‘तेज’
1. भूमिका: क्या सचमुच सब ठीक है?
देश में हर दिन यह कहा जा रहा है कि सब कुछ ठीक है। विकास हो चुका है, राष्ट्र सुरक्षित है, संस्कृति पुनर्जागृत हो रही है। लेकिन जब बेरोज़गार युवा अपने ही घरों में कुंठा से भर रहे हों, जब मध्यमवर्ग फीस, कर्ज और महंगाई के बोझ से दबा हो, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है—आख़िर यह किसका विकास है?
2. बेरोज़गारी और धर्म का विकल्प:
आज रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी प्रश्नों का उत्तर धर्म में खोजा जा रहा है। युवाओं से कहा जा रहा है, नौकरी नहीं है तो चिंता मत करो भविष्य अंधकारमय है तो मंदिर जाओ। सवाल मत पूछो, श्रद्धा रखो। धर्म यहाँ आस्था नहीं, बल्कि राजनीतिक औज़ार बनता दिख रहा है- एक ऐसा औज़ार जो सवाल पूछने की क्षमता को कुंद कर देता है।
3. नेताओं के बच्चे और आम जनता के बच्चे:
यहाँ एक असहज लेकिन ज़रूरी प्रश्न खड़ा होता है, जब आम युवाओं को “राष्ट्रधर्म” निभाने के लिए सड़कों पर झंडे थमाए जा रहे हैं, तब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के बच्चे क्या कर रहे हैं? उदाहरण के तौर पर अजीत डोवाल—जिन्हें देश की सुरक्षा का सबसे बड़ा रणनीतिकार कहा जाता है, उनके बच्चे विदेश में सुरक्षित जीवन और व्यापार में स्थापित हैं। तो सवाल उठता है—जो जोश देश के युवाओं में भरा जा रहा है, वही जोश सत्ता-परिवारों के बच्चों में क्यों नहीं?
4. राष्ट्रवाद बनाम वास्तविक सुरक्षा
हर आतंकी घटना के बाद भावनाओं को उबाल दिया जाता है। युवाओं से बदले की आग जलाने को कहा जाता है। लेकिन जब वास्तविक जांच, जवाबदेही और पारदर्शिता की बात आती है, तो एक गहरा सन्नाटा छा जाता है। राष्ट्रवाद यदि सिर्फ भावनात्मक उत्तेजना बनकर रह जाए और ठोस नीतियों से कट जाए, तो वह सुरक्षा नहीं—राजनीतिक तमाशा बन जाता है।
5. धर्मगुरु, बाबाओं की विलासिता और सवालों की अनुपस्थिति
आज साधु-संत सादगी के प्रतीक नहीं रहे। करोड़ों की गाड़ियाँ, चार्टर्ड प्लेन, आलीशान आश्रम— लेकिन कोई नहीं पूछता:
· पैसा कहाँ से आया?
· टैक्स क्यों नहीं?
· जवाबदेही क्यों नहीं?
आम आदमी अगर 10–20 लाख कमा ले तो जांच बैठ जाती है, लेकिन धर्म की आड़ में अरबों की संपत्ति पवित्र मान ली जाती है।
6. हिंदू राष्ट्र का प्रश्न: किसके लिए?
जब “हिंदू राष्ट्र” की बात होती है, तो सवाल उठना चाहिए—
· क्या इसमें दलित बराबरी से घोड़े पर चढ़ सकेगा?
· क्या मंदिरों में पुजारी बनने का अधिकार जाति से मुक्त होगा?
· क्या संविधान सर्वोच्च रहेगा या मनुस्मृति?
अगर हिंदू राष्ट्र का अर्थ समानता नहीं, बल्कि पुराना जातिगत वर्चस्व है, तो यह राष्ट्र नहीं—पुनरावृत्ति होगी।
7. मनुस्मृति बनाम संविधान:
यह बहस सिर्फ किताबों की नहीं है, यह तय करती है कि भारत का भविष्य न्याय पर टिकेगा या जन्म पर। संविधान सवाल पूछने का अधिकार देता है। मनुस्मृति सवाल दबाने की परंपरा सिखाती है। इसी टकराव से आज की राजनीति जन्म लेती है।
8. विपक्ष भी उसी जाल में:
विडंबना यह है कि जो राजनीति कभी मंदिर–मस्जिद से दूरी बनाने का दावा करती थी, वह भी अब उसी राह पर चल पड़ी है। क्योंकि उसे समझ आ गया है—विकास के मुद्दे चुनाव नहीं जिताते, भावनाएँ जिताती हैं।
9. निष्कर्ष: चेतना का सवाल:
आज का सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी या महंगाई नहीं—सबसे बड़ा संकट है चेतना का ह्रास। जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है, जब धर्म सोचने का विकल्प बन जाता है –
तब लोकतंत्र चुपचाप विदा लेने लगता है। अब निर्णय हमें करना है—
· झंडा हाथ में लेकर भावनाओं में बहना है, या
· सवाल हाथ में लेकर भविष्य बचाना है –क्योंकि धर्म से राष्ट्र बन सकता है,
लेकिन सवालों के बिना लोकतंत्र नहीं।
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