– प्रियांशु कुमार
बॉलीवुड की दुनिया में सितारों की चमक कभी प्रमोशन से आती है, कभी किसी विवाद या पब्लिसिटी स्टंट से। पर कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो न शोर करते हैं, न स्टेटमेंट बस एक ट्रेलर लाते हैं और सब कुछ कह जाते हैं। विक्रांत मैसी ऐसा ही एक नाम हैं। न कोई हल्ला, न कोई कैंपेन फिर भी उनकी हर परछाईं स्क्रीन पर असर छोड़ जाती है।
हाल ही में उनकी नई फिल्म “आँखों की गुस्ताखियां” का ट्रेलर आया। यह एक दृष्टिहीन संगीतकार की कहानी है, जो देख नहीं सकता लेकिन दुनिया को महसूस करना सिखा देता है। ट्रेलर में न कोई ज़ोरदार डायलॉग हैं, न ही कोई ग्लैमर लेकिन जो है, वो सच है। यही ट्रेलर एक कलाकार की वापसी का सबसे सुंदर दस्तावेज़ बन गया है।
कुछ समय पहले विक्रांत ने ‘द साबरमती रिपोर्ट’ जैसी गंभीर फिल्म की थी और उसके बाद स्क्रीन से गायब हो गए। कई लोगों ने इसे संन्यास समझा, कई ने इसे थकावट। लेकिन शायद यह एक सोच-समझ कर लिया गया विराम था एक अंतराल जिसमें कलाकार खुद से मिलने गया था, खुद को फिर से तराशने।
आज जब बॉलीवुड में अभिनय से ज़्यादा इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की गिनती देखी जाती है, विक्रांत जैसे अभिनेता हमें याद दिलाते हैं कि सिनेमा केवल कैमरा एंगल और मार्केटिंग से नहीं, संवेदना से बनता है। विक्रांत का ट्रेलर यही कहता है कि चुप्पी भी कभी-कभी सबसे बुलंद आवाज़ होती है।
वापसी तब नहीं होती जब कोई सिर्फ लौटता है। असली वापसी तब होती है जब दर्शक फिर से महसूस करें कि अभिनय क्या होता है, जब बिना बोले कह दिया जाए कि ‘मैं अभी भी यहीं हूँ’। विक्रांत मैसी की चुप वापसी, दरअसल एक तेज़ दस्तक है—बॉलीवुड को, और हमें भी।
लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्नातक के छात्र हैं।





