मुनेश त्यागी

आज वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, बड़े भाई, कमांडर इन चीफ, और भी कई नामों से पुकारे जाने वाले, वीरों के वीर, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का 130वां जन्मदिन है वह 25 दिसंबर 1891 को गढ़वाल में पैदा हो गए थे। अपनी रोजी रोटी के लिए और गांव घर की गरीबी स्थिति के कारण वह फौज में शामिल हो गए थे। फौज में रहते रहते ही लड़ने के लिए फ्रांस गए, मेसोपोटामिया गए, इराक गए।
वहां पर नस्ली आधार पर फौज के अंदर भेदभाव देखा, भारतीय सैनिकों का शोषण देखा। वहीं से उनके दिलो-दिमाग में अंग्रेजों के शोषण के प्रति उनके असमानता और भेदभाव के प्रति, उनसे नफरत पैदा हो गई थी। उसके बाद उनका पोस्टिंग पेशावर में तैनात किया गया। उन्हीं दिनों पेशावर में भारत के स्वतंत्र आंदोलन की जंग को जारी रखते हुए कांग्रेस के स्वतंत्रता सेनानियों हिंदू और मुस्लिम ने संपूर्ण आजादी का नारा दिया और इसमें हिंदू और मुसलमान मिलकर काम कर रहे थे।
अंग्रेजों ने हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए गढ़वाली सेना को इन स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने का आदेश दिया था। इसी के तहत 23 अप्रैल 1930 को पेशावर कांड हुआ जिसमें चंद्र सिंह गढ़वाली ने अपने साठ वीर सैनिकों के साथ हिंदू और मुसलमानों पर गोली चलाने से मना कर दिया और सीजफायर का आदेश दिया।
23 अप्रैल 1930 को वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके 60 साथी देखते ही देखते भारत के वीर बन गए। उन्होंने अपनी जिंदगी या अपने परिवार, अपने सुखचैन सब दाव पर लगा दिए जब 23 अप्रैल 1930 को चंद्र सिंह गढ़वाली ने अपने साठ साथियों को आदेश दिया की गोली मत चलाओ "सीजफायर" और हिंदू मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों के ऊपर गोली चलाने से मना कर दिया और वे देखते ही देखते हिंदू मुस्लिम एकता के सबसे बड़े सिपाही बन गए। उन्होंने गढ़वाल का नाम पूरी दुनिया में पूरे देश में किया। गढ़वाल के लोग उनके इस ऋण को कभी भी नहीं उतार सकते।
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को इस घटना के बाद 20 वर्ष की सजा दी गई ।वह 11 वर्ष 3 माह 18 दिन जेल में रहे और 6 वर्ष तक तन्हाई और बेड़िया में रहे।जेल में उनकी मुलाकात कामरेड ज्वाला प्रसाद और शहीद ए आजम भगत सिंह के साथी शिव वर्मा और यशपाल से हुई जहां वे भाववादी से साम्यवादी हो गए और ता जिंदगी कम्युनिस्ट पार्टी में है गुजारी और समाजवाद जनवाद और साम्यवाद के हामी और पैरोकार रहे।
उन्हें लोगों ने अनेक नाम से पुकारा गांधीजी और जवाहरलाल नेहरू और उनके साथी उन्हें "बड़ा भाई" के नाम से बुलाते थे अलाहाबाद के छात्र "commander-in-chief" बुलाते थे और महान विद्वान और लेखक, क्रांतिकारी राहुल सांकृत्यायन उन्हें "पेशावर क्रांति का जनक" मानते थे,
उनके दिल में औरतों के लिए सबसे ज्यादा मान और सम्मान था। उनके शोषण को उनके हजारों साल पुराने असम्मान और शोषण को उन्होंने देखा था और महसूस किया था। गढ़वाली जी औरत और मर्द में भेद नहीं करते थे वह अपने लड़के लड़की को बराबर समझते थे। उन्होंने अपनी पूरी जमीन, जायदाद अपने लड़के और लड़की में बराबर बराबर बांट दी थी यहां से पता चलता है कि उनकी करनी और कथनी में कोई अंतर नहीं था।
उनका मानना था कि भारत के पहाड़ी इलाकों को विकास की विशेष जरूरत है और उस जरूरत के हिसाब से ही उसका विकास हो सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अलग से नीति और नियम बनाने पड़ेंगे तभी पहाडी क्षेत्र उन्नति कर सकते हैं।
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली मजहब की संकीर्णता से दूर थे, वे दासता से मुक्ति चाहते थे, साम्राज्यवाद का विनाश चाहते थे, पूंजीवाद का की बर्बादी चाहते थे। वह साम्यवाद और समाजवाद को ही ब्रह्मास्त्र मानते थे। जनता की मुक्ति आतंकवाद में नहीं साम्यवाद में है।
वह जनता का और किसान मजदूर का राज और सरकार चाहते थे। उनका मानना था कि पूंजीवादी सरकार और व्यवस्था इस जनता की मुक्ति नहीं कर सकती, उसको मुक्ति नहीं दिला सकती। अपने सपनों का भारत बनाने के लिए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के बाद भारतीय सेना का यह पहला विद्रोह था जिसको वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने अंजाम दिया था। यह आंदोलन, यह संघर्ष अपने पीछे विद्रोहों की, जनता के आजादी के संघर्षों की एक श्रंखला छोड़ता है जिसे 1942 के करो या मरो आंदोलन में, 1945 में सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के रूप में और 1946 के नेवी विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। इन विद्रोहों ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद की चूलें हिला दी थीं। इनका श्रेय गढ़वाल सेना के 60 सैनिकों को जाता है जिसका नेतृत्व चंद्र सिंह गढ़वाली कर रहे थे। यहां पर गढ़वाली जी के नेतृत्व में गढ़वाल के 60 सैनिक भारत की आजादी के आंदोलन के, सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी होकर निकलते हैं।
उन्होंने सारी जिंदगी रुढियों और पाखंडों को तोड़ा। उनकी विचारधारा पर चलकर 3000 गढ़वाली सैनिक इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल हुए और सुभाष चंद्र बोस का नेतृत्व स्वीकार किया।उनके नारे थे,,, जनता का जनवाद जिंदाबाद, इंकलाब जिंदाबाद, हिंदू मुस्लिम एकता जिंदाबाद, पूंजीवाद हो बर्बाद। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि पूंजीवाद इस देश की समस्याओं का हल नहीं कर सकता।उनकी भविष्यवाणी में कितना दम था जिसे हम आज देख रहे हैं कि उनकी मृत्यु के 40-41 वर्ष के बाद भी उनकी भविष्यवाणी ज्यों की त्यों सच है क्योंकि आज भी जनता बेरोजगारी ,भुखमरी,विनाश, अन्याय, गरीबी शोषण, भेदभाव, सांप्रदायिकता, जातिवाद, ऊंच-नीच, छोट बड़ाई और क्षेत्रवाद के जाल से नहीं निकल पाई है और उसी में फंसी हुई है और अभी उसके आगे निकलने की कोई किरण या रास्ता भी दिखाई नहीं देता।


हां केवल वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के विचारों पर चलकर ही इस देश की जनता का किसानों का, मजदूरों का कल्याण किया जा सकता है और इससे ही उन्हें मुक्ति मिल सकती है। चंद्र सिंह गढ़वाली ने जो ख्वाब देखे थे जो सपने देखे थे यह उनके ख्वाबों का, सपनों का भारत नहीं है, यह उनके साथियों के विचारों का भारत नहीं है वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को याद करते हुए उनके साथियों सामाजिक शत-शत नमन वंदन और अभिनंदन।





