प्रस्तुति : राजेंद्र प्रसाद (दिल्ली)
1926 की एक सुबह, इटली की एक अदालत में एक आदमी को लाया गया—न हथियारों के साथ, न विद्रोही नारे लगाते हुए—बल्कि अपनी शांत, गहराई से भरी आँखों में एक विचार लेकर। उसका नाम था अंतोनियो ग्राम्शी।
अदालत में बैठे जज ने मुसोलिनी की तानाशाही की ओर देखकर कहा—”हमें इस आदमी का दिमाग़ कम से कम बीस साल तक बंद रखना होगा।” सत्ता ने पहली बार इतनी स्पष्टता से यह स्वीकार किया कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन बंदूक नहीं, विचार है।
ग्राम्शी को जेल में डाल दिया गया। लेकिन वहाँ उसने जो रचा, वह आज भी दुनिया की हर तानाशाही के विरुद्ध एक जलता हुआ मशाल है—प्रिज़न नोटबुक्स। इन टिप्पणियों में उसने एक क्रांतिकारी अवधारणा रखी—”सांस्कृतिक वर्चस्व”।
उसने कहा, कोई भी सत्ता केवल लाठी, जेल और गोलियों से नहीं चलती। असली सत्ता तब स्थापित होती है जब लोग खुद उस विचारधारा को अपना लेते हैं जो उन्हें दबा रही है। जब ग़ुलामी को वे संस्कृति समझने लगते हैं, जब पितृसत्ता को मर्यादा, और जातिवाद को परंपरा कहने लगते हैं—तब सत्ता को गोली चलाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
मुसोलिनी ने ग्राम्शी को कैद किया, लेकिन उसकी चेतावनी को बखूबी समझा। उसने धर्म, राष्ट्र और संस्कृति को एक त्रिकोण में बदल दिया, जहाँ चर्च, स्कूल और मीडिया सभी एक ही बात दोहराते थे—राष्ट्र सर्वोपरि है, विरोध अपराध है, और सत्ता ईश्वर की प्रतिनिधि है।
वह जानता था कि अगर बच्चा जन्म से ही ‘महानता’ का पाठ पढ़े, अगर वह राष्ट्र को ही ईश्वर समझे, तो वह कभी सवाल नहीं पूछेगा।
भारत में यह प्रयोग वर्षों बाद दोहराया गया—और उससे भी गहराई से। संघ ने सत्ता की सीढ़ी चढ़ने से पहले चेतना की ज़मीन तैयार की। उसने मुसोलिनी की तरह सत्ता का हिंसात्मक उत्सव नहीं रचा, बल्कि ‘संस्कार’ और ‘संस्कृति’ के नाम पर धीरे-धीरे लोगों की सोच पर अधिकार कर लिया।
वह जानता था कि युद्ध बंदूक़ से नहीं, पाठ्यक्रम से जीता जाता है। इसलिए स्कूलों में पौराणिक झूठों को ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ कहकर पढ़ाया गया, विज्ञान को हटाकर आस्था को बैठाया गया, और मंदिरों को राजनीति के मंच में बदल दिया गया।
RSS की सबसे बड़ी चाल यही रही कि उसने सत्ता में आने से पहले संस्कृति को हथिया लिया। उसने वो भाषा, वो त्यौहार, वो पहनावे, वो पारिवारिक संरचना तय कर दी जो उसके ‘हिंदू राष्ट्र’ की नींव बन सके।
विद्या भारती के स्कूलों से लेकर टीवी चैनलों तक, हर जगह एक ही विचार फैलाया गया—जो ‘हमारे’ जैसे नहीं हैं, वे देशद्रोही हैं। जो संविधान की बात करता है, वह विदेशी एजेंट है। और जो सवाल पूछता है, वह ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का हिस्सा है।
संविधान को विदेशी क्यों कहा जा रहा है? क्योंकि वह बराबरी की बात करता है। वह मनु की उस व्यवस्था को अस्वीकार करता है जिसमें ब्राह्मण मुख से और शूद्र पैर से बनाए गए थे। संविधान कहता है कि कोई मनुष्य नीचा नहीं है, कोई जन्म से महान नहीं होता। और यही बात उस पूरी वर्णवादी व्यवस्था को जड़ से हिला देती है।
यही कारण है कि फूले, पेरियार और आंबेडकर को पाठ्यक्रम से हटाया जा रहा है—क्योंकि उन्होंने उस नींद को तोड़ने का दुस्साहस किया था जिसमें यह देश हजारों वर्षों से पड़ा था।
ये वही लोग थे जिन्होंने विदेशों में जाकर जाना कि मनुष्यता क्या होती है। आंबेडकर ने कहा—”मैं हिंदू के रूप में जन्मा हूँ, लेकिन मरूंगा नहीं।” फूले ने कहा—”जाति तोड़ो, शिक्षा दो।” पेरियार ने तर्क को धर्म से ऊपर रखा। ये उस भारत की आत्मा थे जिसे सदियों की चुप्पी ने मूक बना दिया था। इन्होंने बताया कि जो तुमने धर्म समझा था, वह दरअसल तुम्हारी मानसिक ज़ंजीरें थीं।
और यह लड़ाई भारत में पहली बार नहीं हो रही। यह तो उस दिन शुरू हो गई थी जब धर्म और सत्ता ने हाथ मिलाया था। यह गठजोड़ इतिहास का सबसे बड़ा पाखंड है। जब भी धर्म सत्ता के साथ आया, उसने मनुष्य को दो स्तरों पर गुलाम बनाया—शरीर पर राज्य का नियंत्रण और आत्मा पर धर्म का।
चर्च, शरिया, मनुस्मृति—तीनों ने एक ही काम किया: अपने-अपने समाज में भेदभाव को ईश्वर की इच्छा बता दिया। यूरोप में गैलीलियो को कैद किया गया क्योंकि उसने विज्ञान की बात की। भारत में दलितों को मंदिर से रोका गया क्योंकि उन्होंने ईश्वर को छूने की कोशिश की।
धर्म जब सत्ता का औजार बनता है, तब वह करुणा नहीं देता—वह अनुशासन और अधीनता माँगता है।
संघ का हिंदू राष्ट्र उसी परंपरा की आधुनिक पुनरावृत्ति है। यहाँ गाय की पूजा और स्त्री की आज़ादी एक साथ नहीं हो सकती। यहाँ संविधान विदेशी है और मनु अपनी परंपरा। यहाँ बच्चा स्कूल में मनु का श्लोक पढ़ता है लेकिन आंबेडकर का नाम नहीं जानता। यहाँ डार्विन की जगह शंकराचार्य पढ़ाया जाता है, और समानता की जगह रामराज्य का मिथक।
ग्राम्शी ने चेताया था—वर्चस्व की सबसे ख़तरनाक स्थिति वो होती है जब जनता खुद अपने दमन को न्याय समझने लगे। आज का भारत उसी मोड़ पर खड़ा है।
सवाल अब ये नहीं है कि संविधान किस देश से आया। सवाल ये है कि क्या तुम समानता चाहते हो? अगर हाँ, तो संविधान तुम्हारा है। अगर नहीं, तो तुम मनु की राख उठाकर फिर से आग लगाना चाहते हो।
ग्राम्शी फिर से ज़रूरी हो गया है। क्योंकि मुसोलिनी फिर से लौट आया है—इस बार भगवा पहने, और संस्कृति के नाम पर चेतना पर कब्जा किए हुए।
अब अगर हम चुप हैं, तो याद रखिए—विचार जब बंधक बनते हैं, तो इतिहास तानाशाही की गोद में बैठता है।
अब तय आपको करना है—आप इतिहास की किस ओर हैं? उस ओर जहाँ विचार बंद किए जाते हैं? या उस ओर जहाँ वे फिर से मुक्त होते हैं?
(चेतना विकास मिशन : 9997741245 व्हाट्सप्प.)





