डॉ. विकास मानव
कुंडलिनी जागरण में दो केंद्र अहम हैं : नाभि और स्वास. नाभि की साधना में हमें चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्मरण रखना होता है, नाभि का। श्वास के साथ नाभि भी पेट की गति के साथ उपर नीचे हो रही है। बस इतना ही स्मरण रखना है। इसके विषय में सोचना- विचारना नहीं है। सिर्फ इस बात का ख्याल भर रखना होता है। नाभि के प्रति इतना ध्यान रखना है, कि श्वास जब भीतर आई तो नाभि पेट के साथ उपर उठी है और श्वास जब बाहर गयी तो नाभि पेट के साथ नीचे गयी है। यानि पेट के साथ नाभि का डोलना हमारे ध्यान में हो!
श्वास की साधना में भी चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्मरण रखना होता है कि अब श्वास भीतर गई है, और अब श्वास बाहर गई है। इस बात का ध्यान रखना है, स्णरण रखना है कि श्वास जब भीतर जाए और श्वास जब बाहर आए, तो यह बात हमारी देखरेख में हो, हमारी निगरानी में हो। न तो इस विषय में सोचना- विचारना है, और न ही श्वास को कोई गति देना है।
श्वास को अपनी लय में ही चलने देना है। सिर्फ श्वास को भीतर- बाहर, आते- जाते महसूस करना है, उसका ध्यान रखना है।
हम यात्रा नाभि से भी शुरु कर सकते हैं और श्वास से भी शुरु कर सकते हैं। यदि हम नाभि को साधते हैं, श्वास की लय के साथ नभि के उपर उठने, और नीचे गिरने को सतत देखते रहते हैं, तो धीरे- धीरे श्वास भी हमारे ध्यान में आने लगेगी। नाभि के साथ ही श्वास के प्रति भी हमारी सजगता बढ़ने लगेगी।
यदि हम आती- जाती श्वास के प्रति सजग रहते हैं, तो धीरे- धीरे नाभि भी हमारी निगाह में आने लगती है, श्वास के साथ ही नाभि के प्रति भी हमारी सजगता बढ़ने लगती है। यानी एक सिरा, दूसरे सिरे को भी अपने में समेट लेता है अत: श्वास से या कि नाभि से, जहां से हमें सहज लगे, हम यात्रा शुरु कर सकते हैं। अंततः तो दोनों छोर एक हो जाएंगे! हां, हमें शुरु एक छोर से करना है। नाभि से या कि श्वास से।
हमारा ध्यान जिस दिशा में होता है, हमारी ऊर्जा उसी दिशा में बहनी शुरू हो जाती है। हमारा ध्यान यदि दुश्मन के विचार पर होगा तो ऊर्जा क्रोध बनकर बाहर की ओर गति करने लगती है, और हमारा ध्यान यदि कामवासना के विचार पर होगा तो हमारी उर्जा काम केंद्र की ओर गति करने लगती है। इसी तरह हमारा ध्यान यदि नाभि पर होगा तो हमारी उर्जा नाभि चक्र की ओर बहते हुए, नाभि चक्र को सक्रिय करने लगती है ।
हमारा ध्यान सतत हमारे सिर में होता है, जहां हमारे मस्तिष्क में विचार चल रहे होते हैं । अतः हमारी सारी ऊर्जा विचारों में खर्च हो रही होती है, जिससे हम थकान और तनाव अनुभव करने लगते हैं । यदि हम अपने मस्तिष्क से, जो कि सोच विचार करता है, अपना ध्यान हटाकर नाभि पर ले जाते हैं, तो जो ऊर्जा विचार बनकर हमें तनाव दे रही थी वही उर्जा हमारे नाभि चक्र को सक्रिय करने लगती है। और हम निर्विचार हो जाते हैं।
यदि हम विचारों को रोकने का प्रयास करते हैं तो वे और भी दोगुनी गति से आक्रमण करने लगते हैं ।
यहां हम विचारों के साथ कुछ नहीं कर रहे हैं, अपने ध्यान को मस्तिष्क से हटाकर नाभि पर ले आते हैं। हमने अपना ध्यान उस जगह से हटा लिया है जहां पर विचार पैदा होते हैं। और वहां नाभि पर लगा दिया है, जो विचार नहीं करती है। अतः नाभि पर ध्यान को लाने से हमारे विचार रुक जाते हैं या कि हम निर्विचार हो जाते हैं और हमारी जो ऊर्जा विचार बन कर बह रही थी, वही ऊर्जा नाभि चक्र को मिलने लगती है।
ध्यान जिस चीज पर होता है, वह चीज प्रभावित होने लगती है । यदि हम नाभि पर ध्यान ले जाते हैं तो नाभि प्रभावित होने लगती है नाभि डांवाडोल होने लगती है। हमने महसूस किया है कि झूला झूलते समय जब झूला नीचे आता है तो हमारी नाभि डावांडोल होती है, इस भय से कि कहीं मैं गिर ना जाऊं! यानी मौत के भय से। अर्थात नाभि चक्र यदि सोया रहा तो हमें मौत का भय सताता रहेगा। भय और संकट के क्षणों में हमारा शरीर मल-मूत्र त्यागने लगेगा, खतरे के समय कई लोग शौचालय की ओर भागते हैं, यह नाभि चक्र के सोए होने का लक्षण है ।
यदि हम नाभि चक्र पर ध्यान ले जाते हैं तो वह जागृत होने लगता है, और जब नाभि चक्र जागृत होने लगता है तो हमारा अभय में प्रवेश होने लगता है । हम निर्भय होने लगते हैं। और जब हम निर्भय होने लगते हैं, तो हमारा ध्यान में प्रवेश करना आसान होने लगता है।
हम नाभि पर ध्यान ले जाते हैं तो हमारे विचार रुक जाते हैं क्योंकि हमने अपनी चेतना की नाव को विचारों से हटाकर नाभि पर लगा दिया है। और नाभि सोच- विचार नहीं करती है। अतः हम निर्विचार हो जाते हैं। और जैसे ही हम निर्विचार होते हैं, हमें देखने वाले का, यानी साक्षी का अनुभव होना शुरू हो जाता है, उस साक्षी का जो विचारों में खोया हुआ था।
नाभि पर ध्यान ले जाने पर साक्षी विचारों से मुक्त हो नाभि को देखने लगता है। पहले साक्षी विचारों में डूबा हुआ विचारों से एक हो गया था, विचारों और साक्षी के बीच में फासला ही नहीं था! लेकिन अब नाभि पर ध्यान ले जाते ही साक्षी विचारों से दूरी पर हो गया, और नाभि पर ध्यान ले जाते ही साक्षी को अपने होने का अनुभव होता है ! साक्षी अपने-आप को नाभि को देखते हुए पाता है। यानी यहां पर हमें पहली दफा साक्षी का बोध होगा। नाभि को जो देख रहा है वही साक्षी है!
हमारा ध्यान जैसे ही नाभि पर होता है, हमारी जो ऊर्जा विचारों में खर्च हो रही थी, वह ऊर्जा देखने वाले की ओर, यानी साक्षी की ओर बहने लगती है और साक्षी, जो अब नाभिचक्र को देख रहा है। ऊर्जा साक्षी से बहती हुई नाभि चक्र को मिलने लगती है।
विचारों के कारण हमारा शरीर तनाव में रहता है। हम जैसे ही अपना ध्यान विचारों से हटाकर नाभि पर ले आते हैं, हम निर्विचार हो जाते हैं। निर्विचार होते ही हमारे शरीर से तनाव हट जाते हैं और तनाव के हटते ही हमारा शरीर शिथिल होने लगता है, और शरीर के शिथिल होते ही हमारी श्वांस गहरी हो स्वत: नाभि तक जाने लगती है।
हमारी श्वांस जब गहरी हो नाभि को छूती है, तो नाभि से नीचे मूलाधार पर श्वांस की चोंट से कंपन होने लगते हैं, क्योंकि श्वास में छुपी प्राण ऊर्जा मूलाधार पर सोई हुई कुंडलिनी उर्जा को सक्रिय करती है। जाग्रत करती है। क्योंकि प्राण ऊर्जा कुंडलिनी का भोजन है! जैसे हम यज्ञ में आहुति देते हैं और अग्नि प्रज्वलित होती है ठीक उसी भांति कुंडलिनी उर्जा भी प्राण ऊर्जा के मिलते ही ऊपर उठने लगती है! और नाभि चक्र को सक्रिय करती हुई स्वाधिष्ठान चक्र में प्रवेश करने लगती है।
उर्जा जब दूसरे भाव वाले तल स्वाधिष्ठान में प्रवेश करती है। हमारे भीतर कोई भाव नहीं होता है, क्योंकि नाभि पर ध्यान ले जाने पर विचार बंद हो गये। और विचार नहीं तो भाव भी नहीं होता है! यानी हमारा भाव वाला दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र शांत और शिथिल होता है! अतः कुंडलिनी उर्जा स्वाधिष्ठान में प्रवेश कर जाती है।
हमारा ध्यान नाभि पर होता है और कोई विचार नहीं होता है, तो हमारा तीसरा विचारों वाला चक्र मणिपुर भी शांत और शिथिल होता है, ऊर्जा दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय करती हुई तीसरे मणिपुर चक्र में प्रवेश कर जाती है।
ध्यान नाभि पर होता है जिससे मन में विचार नहीं होते और विचार नहीं होने से शरीर शांत और शिथिल हो जाता है, जिससे हमारी श्वांस गहरी हो नाभि तक जाती है। जिससे कुंडलिनी उर्जा को सतत प्राण ऊर्जा मिलती रहती है, जिससे वह जागृत हो चक्रों को सक्रिय करने लगती है। और मणिपुर से उर्जा अनाहत में प्रवेश करती है और कुंडलिनी जागरण शुरू हो जाता है।
*कुंडलिनी जागरण की साधना में लोग पागल क्यों हो जाते हैं?*
बिना प्रशिक्षक के सबकुछ साध लेने का अहंकार और ओवर कॉंफिडेंस यह दिन दिखाता है.
कुंडलिनी जागरण में खतरा तो है! लेकिन खतरा उसे ही है जो बेहोश है। जो साक्षी नहीं है। हम बिना साक्षी को जगाए सीधे कुंडलिनी जागरण के उपायों में नहीं जा सकते हैं।
बिना साक्षी के कुंडलिनी जागरण असंभव है! क्योंकि कुंडलिनी जागरण घटित होता है अचेतन मन में प्रवेश करने के बाद! और बिना साक्षी के अचेतन मन में प्रवेश होता ही नहीं है।
कुंडलिनी जागरण जब होगा तो वह अचानक ही नहीं हो जाएगा! महिनों पहले हमें इसका आभास होना शुरू हो जाएगा कि कुछ घटने वाला है और मुझे और-और सजग होते जाना है। कुंडलिनी जागरण उसे ही घटेगा जिसके जीवन में ध्यान प्रथम है। जो ध्यान के लिए अपना जीवन दांव पर लगा सकता है। जो उठते-बैठते, चलते-फिरते सतत साध रहा है। जो देख रहा है अपने शरीर की क्रियाओं को, शरीर पर आए भावों को।
जो चेतन मन से अचेतन मन में प्रवेश कर गया है। उसे पता रहेगा कि कुछ होने वाला है और वह इसके लिए तैयार रहता है।
पागल वे ही लोग होते हैं जो खुद को बहुत ज्ञानी समझते हैं। किसी को अपना गुरु नहीं मानते हैं। और स्वयं खोज करने लगते हैं। या फिर जो गुरु उन्हें सिखा रहा है उसे भी कुंडलिनी जागरण का कोई अनुभव नहीं है। इन्हें योग का कुछ भी पता नहीं होता है और ये उल्टी -सीधी साधनाएं करने लगते हैं।
पागल होने का मुख्य कारण है गलत ढंग से ध्यान विधियों का प्रयोग करना। कुंडलिनी जागरण करने के लिए साधक पहले प्राणायाम करता है। प्राणायाम से मूलाधार चक्र सक्रिय होता है और मूलाधार चक्र जब सक्रिय होता है तो वह हमारे दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र पर उर्जा भेजने लगता है।
स्वाधिष्ठान चक्र भाव का चक्र है। हमने जो भी भीतर दबाया है वह स्वाधिष्ठान चक्र में भरा हुआ है। हमने हंसना, रोना, नाचना, क्रोध करना सब कुछ दबाया है। जब हम प्राणायाम करते हैं तो शरीर में प्राण तत्व की मात्रा बढ़ जाती है जिससे मूलाधार चक्र सक्रिय होता है और ऊर्जा दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र को भेजने लगता है।
उर्जा उपर जाकर स्वाधिष्ठान चक्र से टकराने लगती है तो दमित आवेग बाहर आने लगते हैं। यानि रोना, हंसना, नाचना, क्रोध करना इत्यादि जो हमने भीतर दबा लिया है वह हमारे शरीर में घटने लगता है।
उर्जा स्वाधिष्ठान चक्र में तभी प्रवेश करेगी जब उसे दमित आवेगों से रिक्त किया जाएगा। प्राणायाम के बाद मूलाधार से उठी उर्जा को स्वाधिष्ठान में प्रवेश देने के लिए साधक दमित आवेगों को बाहर निकालता है। जिसे रेचन करना कहते हैं। हंसना, रोना, नाचना, उछलकूद करना, जो शरीर करना चाहे वह करने देता है ताकि स्वाधिष्ठान चक्र इन भावों से रिक्त हो जाए और उसमें उर्जा प्रवेश कर सके. बस! यहीं भूल हो जाती है!!
साधक प्राणायाम करके उर्जा तो उपर उठा लेता है लेकिन वह उर्जा को रास्ता देने के लिए शरीर शुद्धि के उपाय नहीं करता है। रेचन नहीं करता है। पसीना नहीं निकालता है, आंसू नहीं निकालता है। यानि दमित आवेगों को शरीर से बाहर नहीं निकालता है। अतः स्वाधिष्ठान चक्र के भीतर प्रवेश करने की अपेक्षा उर्जा द्वार पर ही इकत्रीत होने लगती है।
प्राणायाम को एक अनुपात में किया जाता है। शरीर को जितने प्राण तत्वों की जरूरत है उसके ही अनुरूप प्राणायाम किया जाता है। साधक बिना यह जाने की शरीर को कितनी उर्जा की जरूरत है वह प्राणायाम ही करता रहता है और अपने शरीर में प्राण तत्व बढ़ाता रहता है तथा वह रेचन नहीं करता है। रोज रोज प्राणायाम करने से स्वाधिष्ठान चक्र पर उर्जा इकत्रीत होती रहती है और एक दिन उर्जा की चोंट से स्वाधिष्ठान चक्र का द्वार खुल जाता है और उसमें भरे सारे दमित आवेग टूट पढ़ते हैं।
उसका साक्षी होना खो जाता है। क्योंकि जरा सा होश और अपार उर्जा जैसे पूरे मकान में आग लगी है और हमारे पास एक बाल्टी ही पानी है! ऐसे में साक्षी खो जाता है और आदमी कभी हंसता है, कभी रोता है, कभी नाचता है, कभी खुद से ही बात करने लगता है। वह चेतन मन में गहरा उतर जाता है जहां पर होश बिल्कुल भी नहीं है। और वह पागल हो जाता है।
दूसरा कारण यह है कि अति प्राणायाम करने से शरीर में आक्सीजन की मात्रा अधिक हो जाती है जिससे रात को नींद आनी बंद हो जाती है। क्योंकि नींद में जीतनी आक्सीजन चाहिए उससे कई गुना ज्यादा आक्सीजन शरीर में प्राणायाम द्वारा पहले ही भरी जा चुकी है।
तो शरीर को नींद की जरूरत नहीं रह जाती है। और यदि तीन महीने तक नींद बाधित होती है तो अचेतन मन से संबंध टूट जाता है और साधक पागल हो जाता है।
इसलिए साधना के पहले चरण से ही साक्षी का स्मरण शुरू करना पड़ता है। साक्षी का काम सिर्फ देखना ही है, इसलिए साधक अपने शरीर की क्रियाओं को देखता है। उनका साक्षी होता है। और दस मिनट, पंद्रह मिनट, जरुरत से ज्यादा प्राणायाम नहीं करता है। ताकि एकदम से कोई द्वार नहीं टूटे और दमित आवेग धीरे-धीरे बाहर आएं और हम उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके रोज निकालते रहें। हम उन्हें बाहर निकालने में शरीर को सहयोग करें और हमारा साक्षी होना खोये नहीं और-और बढ़ता रहे।
जो लोग सक्रिय ध्यान का दूसरा रेचन वाला चरण नहीं करते हैं वे बाहर तो दिन भर ज्ञान-ध्यान की बातें करते रहते हैं और घर में चिढ़चिढ़ाहट, और क्रोध से भरे रहते हैं। क्योंकि उर्जा सतत चोंट कर रही होती है। वे सक्रिय ध्यान के दूसरे रेचन वाले चरण में रोते नहीं हैं- इसलिए चाहे जहां पर सहज ही उनका रोना फूट जाता है और वे रोना शुरू कर देते हैं।
बिना साक्षी के कुंडलिनी जागरण असंभव है। बिना साक्षी के कुंडलिनी जागरण के उपायों में पागल हो जाने का पूरा पूरा खतरा है। अतः सिद्ध प्रशिक्षक के सानिध्य में सतत होश बनाए रखना, हर क्षण जागरुक रहना ही कुंडलिनी साधना का आधार है।
*कुंडलिनी जागरण से आमूल परिवर्तन :*
चौथे शरीर में सच में ही कुंडलिनी जगी है, यह आपके कहने और अनुभव करने से सिद्ध नहीं होगा. वह तो झूठ में भी अनुभव का भरम होगा और आप कहोगे।
नहीं. वह तो आपका जो वस्तुजगत का व्यक्तित्व है, उससे तय हो जाएगा कि वह घटना घटी है या नहीं घटी है; क्योंकि उसमें तत्काल फर्क पड़ने शुरू हो जाएंगे।
इसलिए आचरण कसौटी है—साधन नहीं है. भीतर कुछ घटा है, उसकी कसौटी है। प्रत्येक प्रयोग के साथ कुछ बातें अनिवार्य रूप से घटित होनी शुरू होंगी। जैसे चौथे शरीर की शक्ति के जगने के बाद दुर्विचार, दुराचार असंभव. किसी भी तरह का मादक द्रव्य नहीं लिया जा सकता। अगर लिया जाता है, और उसमें रस है, तो जानना चाहिए कि किसी मिथ्या कुंडलिनी के खयाल में पड़ गए हो। वह नहीं संभव है।
कुंडलिनी जागने के बाद हिंसा करने की वृत्ति सब तरफ से विदा हो जाएगी—हिंसा करना ही नहीं, हिंसा करने की वृत्ति! क्योंकि हिंसा करने की जो वृत्ति है, हिंसा करने का जो भाव है, दूसरे को नुकसान पहुंचाने की जो भावना और कामना है वह तभी तक हो सकती है जब तक कि कुंडलिनी शक्ति नहीं जगी है। जिस दिन वह जगती है, उसी दिन से आपको दूसरा दूसरा नहीं दिखाई पड़ता, कि उसको तुम नुकसान पहुंचा सको। अब आत्मवत दिखेगा. तब हिंसा रोकनी नहीं पड़ेगी, आप हिंसा नहीं कर पाओगे। अगर तब भी रोकनी पड़ रही हो, तो जानना चाहिए कि अभी वह जगी नहीं है। अगर अब भी संयम रखना पड़ता हो हिंसा पर, तो समझना चाहिए कि अभी कुंडलिनी नहीं जगी है।
अगर आंख खुल जाने पर भी लकड़ी से टटोल—टटोलकर चलते हो, तो समझ लेना चाहिए आंख नहीं खुली है— भला आप कितना ही कहते हो कि आंख खुल गई है। अभी लकड़ी नहीं छोड़ते और टटोलना अभी जारी रखे हुए हो, टटोलना भी बंद नहीं करते। तो साफ समझा जा सकता है।
हमें पता नहीं है कि आपकी आंख खुली है कि नहीं खुली लेकिन लकड़ी और टटोलना और डर—डरकर चलना बताता है कि आंख नहीं खुली है।
तो चरित्र में आमूल परिवर्तन होगा। और सारे नियम, जो कहे गए हैं महाव्रत, वे सहज हो जाएंगे। तो समझना कि सच में ही आथेंटिक है—साइकिक ही है, लेकिन आथेंटिक है।
अब आगे जा सकते हो, क्योंकि आथेंटिक से आगे जा सकते हो; अगर झूठी है तो आगे नहीं जा सकते। चौथा शरीर मुकाम नहीं है, अभी और शरीर हैं।





