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उप्र विधानसभा चुनाव 2022…12 फीसदी वाली ब्राह्मण आबादी होगी निर्णायक

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विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन*
उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के दो चरणों के मतदान हो चुके हैं। तीसरे चरण का मतदान 20 फरवरी को होने वाला है। इसके साथ ही कयास भी लगाये जाने लगे हैं कि 2022 में सूबे में किस पार्टी की सरकार बनने वाली है। जातिगण समीकरणों से निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं कि कौनसी जाति से कौनसी पार्टी को नफा-नुकसान हो रहा है। इन सबके बीच जो आबादी सबसे ज्यादा चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाली है, वह है ब्राह्मण आबादी। प्रदेश में इस आबादी की भले ही 12 फीसदी हो लेकिन सत्ता में दखल रखने की काबिलियत काफी बड़ी है। तब ही तो हर एक विधानसभा चुनाव में इस आबादी की भागीदारी अहम होती है। यही कारण है कि 2022 के उत्तरप्रदेश के विस चुनाव में ब्राह्मण वोटर्स की डिमांड बढ़ गई है।
उप्र में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब 12 फीसदी है। 403 में 60 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां, ब्राह्मण वोटर्स ही निर्णायक की भूमिका में हैं। यहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 20% से भी अधिक है। प्रयागराज समेत चार ऐसे भी विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां ब्राह्मणों की संख्या 40% से भी ज्यादा है। मतलब साफ है, यूपी की सत्ता हासिल करने में ब्राह्मण वोटर्स की अहमियत काफी अहम है। सूबे में सबकी नजर ब्राह्मण वोटर्स पर है। राजनीतिक पार्टियां इन वोटर्स को साधने में किसी तरह की कोई कसर छोड़ना नहीं चाहतीं हैं। सभी दलों ने ब्राह्मण वोटर्स को अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।
यह भी सच है कि ओबीसी, एससी और मुस्लिम वोटर्स के बाद सबसे ज्यादा ब्राह्मण वोटर्स की संख्या ही ह। करीब 12% ब्राह्मण वोटर्स न केवल चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, बल्कि चुनावी माहौल बनाने में भी आगे हैं। संख्या ठीक-ठाक होने के बावजूद ब्राह्मणों के लिए कोई खास पार्टी तय नहीं है। जैसे यादव वोटर्स को समाजवादी पार्टी के साथ, दलित वोटर्स को बहुजन समाज पार्टी के साथ जोड़कर देखा जाता है, उस तरह से ब्राह्मण वोटर्स को किसी एक विशेष पार्टी के साथ नहीं जोड़कर देखा जाता है। पहले कांग्रेस में ब्राह्मणों की भूमिका जरूर अहम थी, लेकिन अब नई पीढ़ी के आने के बाद से वह लगभग समाप्त हो चुकी है। ब्राह्मण वोटर्स के साथ सामान्य वर्ग की अन्य जातियों के वोटर्स भी जुड़ते हैं। कायस्थ, भूमिहार, बरनवाल, बनिया, राजपूत समेत अन्य जातियां इसमें शामिल हैं। आमतौर पर ठाकुर और ब्राह्मणों में मतभेद की बात कही जाती है, लेकिन कई मुद्दों पर ब्राह्मण और ठाकुर भी एक हो जाते हैं। ऐसे में किसी पार्टी के साथ ब्राह्मण वोटर्स के जुड़ने से अन्य सामान्य वर्ग की जातियों पर भी प्रभाव पड़ता है।
ब्राह्मण वोटर्स को साधने के जतन
चुनाव से ठीक पहले बसपा ने प्रदेश के सभी जिलों में ब्राह्मण सम्मेलन कराया था। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने लखनऊ में भगवान परशुराम की मूर्ति का अनावरण किया था और भाजपा ने ब्राह्मण वोटर्स को साधने के लिए ब्राह्मण नेताओं की एक कमेटी बनाई थी। ऐसे में सवाल उठता है आखिर ब्राह्मण वोटर्स यूपी की सियासत के लिए क्यों जरूरी हैं? 2007 चुनाव में बसपा ने 63 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था और इनमें 41 ने जीत हासिल की थी। मायावती की सरकार बनी थी। तब उन्होंने नारा दिया था, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है।’ मायावती का ये बड़ा सियासी दांव था और सफल भी हुआ। दलित और ब्राह्मण वोटर्स का कॉम्बिनेशन बना और सभी ने एक होकर बसपा को वोट दिया। 2012 में भाजपा ने सबसे ज्यादा 62 ब्राह्मण उम्मीदवारों को उतारा था, जबकि बसपा ने बसपा 58, सपा ने 38 और कांग्रेस ने 52 ब्राह्मण प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था। तब ब्राह्मण वोटों का बंटवारा हो गया और समाजवादी पार्टी ने यादव-मुस्लिम का गठजोड़ बनाते हुए सत्ता हासिल कर ली। 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा के 312 विधायकों में से 58 ब्राह्मण चुने गए थे। इस वक्त प्रदेश में नौ ब्राह्मण मंत्री हैं।
ब्राह्मणों को रिझाने के लिए पार्टियों ने क्या–क्या किया?
बसपा- बसपा ने 75 जिलों में का ब्राह्मण सम्मेलन कराया। मायावती खुद बोल चुकी हैं कि बसपा की सरकार बनने पर ब्राह्मणों को उचित सम्मान मिलेगा।
समाजवादी पार्टी- अखिलेश यादव ने भगवान परशुराम की मूर्ति का अनावरण किया। यह भी एलान किया कि अगर सरकार बनती है तो उत्तरप्रदेश में भगवान परशुराम की सबसे बड़ी मूर्ति बनवाई जाएगी। सपा ने कई ब्राह्मण सभाओं को भी संबोधित किया।
भाजपा- सत्ताधारी भाजपा में नौ ब्राह्मण मंत्री हैं और 58 ब्राह्मण विधायक हैं। भाजपा ने ब्राह्मण वोटर्स को अपने पाले में करने के लिए एक टीम का गठन किया। इसमें कई ब्राह्मण नेताओं और मंत्रियों को शामिल किया था।

Ramswaroop Mantri

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