*प्रेमसिंह सियाग*
दिन-रात खेतों में पसीने से तर-बतर।एक ही उम्मीद कि इस बार बच्चे की फीस के लिए कर्ज न लेना पड़े!शायद पिछली फीस की उधारी चुकता हो जाएं!
दूसरी फसल से शायद बिटिया के हाथ पीले कर दूंगा!
जब मंडी में पहुंचा तो बोर्ड पर लिखा था कि अपनी फसल कहीं पर भी बेच सकते हो!
गेट के बाहर ढेर लगाकर ऊपर बैठा है!इस इंतजार में कि कोई मेरी फसल खरीद लें और घर लौट जाऊं!
सारे सपने धूमिल हो चुके है।अब एक ही उम्मीद बाकी है कि वापिस न उठाना पड़े और कोई खरीद लें!
जब खाली हाथ घर लौटेगा तो बेटा खाली हाथ स्कूल नहीं जा पायेगा और न बिटिया खाली हाथ ससुराल!
इन खाली स्थानों को भरने की कोशिश करते-करते हर चार घंटे में एक किसान अपने घर के सपनों में खाली स्थान छोड़कर रुखसत हो जाता है।
यह भारत का किसान है।यहाँ हर किसान खालीस्थानी है।यह मानवता के लिए,पूरे देश के लिए राष्ट्रीय शर्म की बात है कि किसान खालीस्थानी है।
हाँ, भारत का किसान खालीस्थानी है इसलिए अपने जीवन के खाली स्थानों को भरने की उम्मीदों का बोझ कांधों पर लेकर दिल्ली बॉर्डर पर 11 महीनों से बैठा है।
मैं भी खालीस्थानी का बेटा हूँ।आप भी खालीस्थानी के बेटे हो।आओ मिलकर कहें कि #किसानों_दिल्ली_चलो और जीवन के इस खाली स्थान को भरने का प्रयास करें।
*प्रेमसिंह सियाग*




