डॉ. विकास मानव
अधारयन्त वह्नयोऽभजन्त सुकृत्यया।
भागं देवेषु यज्ञियम्॥
~ ऋग्वेद [१.२.९.८]
तुमने विचारों से एक पूरी दुनियां का अलग ही निर्माण कर रखा है। ये विचार तुम्हें हँसाते हैं, रुलाते हैं। लेकिन ये हैं तो विचार ही और विचारों का वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है।
जब थोड़ा होश आता है तो पाते हो खाली हाथ। अब खाली हाथ तो भजन भी नहीं होने वाले हैं। तो सबसे पहला काम है इन विचारों से मुक्त होना।
जब इन विचारों से मुक्त होते हो तो कुछ करने के जगत में आते हो। अब इसके आगे आत्म जगत में नहीं जाना है तो कोई बात नहीं। जो जगत चल रहा है उसमें तो रहो। तो पहला काम है विचारों से मुक्त होना |
अधारयन्त वह्नयोऽभजन्त सुकृत्यया।
भागं देवेषु यज्ञियम्॥
~ऋग्वेद [१.२.९.८]
अधारयन्त = धारण करने के अयोग्य, अधःपतन को प्राप्त, नष्टप्रायः अवस्था को प्राप्त हो गये जो.
वह्नयो = हे ब्रह्मज्वालाओं
अभजन्त = विस्मृत हो गये जो जिन्हें उनके ही लोगों ने भुला दिया उनका भी, हे आत्मयज्ञ ! आपने
सुकृत्यया = सुन्दर उद्धार किया, वे भी आपसे उपकृत हुए
भागम् = यज्ञार्पित होकर
देवेषु = जीवन और देवत्व के
यज्ञियम् = यज्ञों में पुन स्थान पाये। उन्हें फिर आत्मयज्ञ ने उपकृत किया। दुर्लभ जीवन से वरद किया। उन्हें फिर अवसर दिया कि वे आत्मयज्ञ को अर्पित होकर अनंत में स्थापित हो सके। हे आत्मयज्ञ ! पतित एवं पापी का भी आप उद्धार करने वाले हैं।
रंग रंगीले कथाओं को भूलकर तुम्हे अपने ही आत्मा के सम्मुख होना है, आत्मस्थ होना है, आत्मस्थ होकर आत्मकुण्ड मे स्वयं को ही अर्पित कर के नूतन स्वरूप प्राप्त करना है। यही वीरता है।
वरना कथा के राम लक्ष्मण आदि की वीरता हमारे किसी काम की नहीं है। अपने ही ब्रम्हज्वालाओं में खुद को भस्म कर के नया तन मन प्राप्त करना है। अन्यथा सीता की अग्नि परीक्षा बेकार है अपने लिए।
दस – पंद्रह लाख से ज्यादा रूपया ले के कथा सुनाने वाले उन गेरुआधारी व्यवसायी कथा वाचकों के शामियाने में तो कुछ भी नहीं मिलने वाला है। जब लौटोगे तो हाथ खाली ही रहेगा।
संस्कृत शब्द वल्म अथवा बल्म का अर्थ बाम्बी होता है। बल्म या बाम्बी मे रहने वाला बाल्मीकि का शुद्ध अर्थ दीमक है। दीमक सूखे लकड़ी मे लगता है। अगर हरे पेड़ या खेत में लग जाए तो किसान उस को पानी से सराबोर कर देता है।
पेड़ मे कस के लगातार पानी डालने से दीमक मर जाता है। दीमक के उपचार का यह सबसे सुगम तरीका है।
ऋषिकुल के कथा को समझो तो यह संसार ही एक बाम्बी है। नाना विषय लिप्सा मोह अज्ञान अंधविश्वास कर्मकांड के पाखण्ड वाले दीमकों के बाम्बी मे ही तो तुम रह रहे हो। विषय वासनाओं काम क्रोध मद लोभ मोह आसक्ति अज्ञान संकीर्णता स्वामित्व अहम दम्भ वैमनस्य दुःख पीड़ा अतृप्तता भय रूपी दीमक से तुम तो क्या वह कथा सुनाने वाला गेरुआधारी व्यापारियों का झुण्ड भी उतना ही ग्रस्त है।
फिर भी तुम वर्षों से स्वपालित कुसंस्कार के वशीभूत वहीं दौड़े जाते हो और कोई सच बोल दे तो उसको गाली देने लगता हैं, धर्म विरोधी बोलने लगता हैं। इसी को तुलसी दास ने कहा कि जैसे बीमार को भोजन अच्छा नहीं लगता है वैसे ही पाखण्ड प्रेरित मन को सच्चाई अच्छी नहीं लगती।
उसे आडम्बर और पाखण्ड से भरा रस रसीला, रंग रंगीला कथा ही चाहिए। तुम्हारा मठ महंत और सन्त-समाज केवल कथा सुना रहा है।
बाल्मिकी कथाकार और पात्र बनकर हर गृहस्थ (क्षत्री) को बताता है कि जैसे दीमक रस (पानी) पीते ही नष्ट हो जाता है वैसे ही अपने जीवन को राम रस से सींच के रखो।
उसके हर पात्र को जिओ। तुम ही दसरथ (पिता) कौशल्या (माता, सास), पुत्र पति (राम), पत्नी (सीता) भाई (भरत, लक्ष्मण आदि), सखा (सुग्रीव), सेवक (हनुमान) हो। कथा के इन पात्रों मे तुम्हारा अपना ही अलग अलग चरित्र है जिस को तुम्हे विभिन्न कर्तव्यों के पालन के लिए जीना है। यही साधना है।
यह साधना खुद तुमको, अपने आप को राम रस से सींचते हुए, आत्मस्थ होकर करना है। उन विभिन्न चरित्रों को पल पल जीते हुए इस संसार में जीना है।
मगर कैसे?
इहेन्द्राग्नी उप हवये स्वयं तयोरित्स्तोममुश्मसि।
ता सोमं सोमपातमा॥
~ ऋग्वेद [१.२.१०.१]
इह = जीवन जगत (इहलीला) को
इन्द्र = महान अमर
अग्नी = ब्रह्मज्वालाओं में
उप = व्याप्त कर
हव्य = यज्ञ को प्राप्त हवन हो
तयो = उनमें
इत = इस प्रकार
स्तोमम = अर्पित यज्ञ होकर
उश्म = रश्मियों को प्राप्त
असि = होकर
सोमम = अमर सोम ज्योतियों का
सोमपातमा = सोम ज्यातियों का पात अर्थात दीक्षित हो, ज्योतिपात से वरद हो।
अज्ञानी जन परमेश्वर से भौतिक सुखों एवं समृद्धि की कामना करता हैं। पुत्र, धन धान्य एवं अचल सम्पत्ति की कामना करता हैं। अपरिपक्व मानसिकता के स्तरों पर जीव स्वभावतः ही ऐसा करता हैं। परन्तु परिपक्व मानसिकता के स्तर पर इनका महत्व तथा साथ दोनों क्षणभंगुर ही है।
परिपक्व मस्तिष्क के स्तर पर जीव यज्ञ से अनन्त परमपद की ही तो आकांक्षा करेगा। जो नित्य नहीं, उसे मांगना कैसा ?
नित्य पुरुष परमेश्वर से नित्य अवस्था की मांग हो तो सर्वथा उचित होगी। गुरुकुल के छात्र (ब्रह्मचारी) से गृहस्थ (क्षत्री) बने सनातन संस्कृति के लोग परिपक्व मानसिकता के स्तरों को छूते आत्मयज्ञ से यही मांग कर रहा हैं।
आत्मयज्ञ के परे उनका अस्तित्व शून्य मात्र हो जाता हैं। उनका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है। इसीलिये आत्मयज्ञ में व्याप्त होकर यज्ञ का नित्य स्वरूप पाना चाहता हैं। जिससे बारम्बार उन्हें अस्तित्वहीन होकर पुनः शून्य से आरम्भ नहीं करना हो। यह सर्वथा उचित भी है।
मठ महंत और संत ने सनातन संस्कृति की तर्क करने की शक्ति और तर्क से जीवन जीने की कला को नष्ट करके अंधभक्ति, अन्धविश्वास और अंधमान्यताओं से भर दिया।
धर्म के नाम पर कर्मकांड, मन्दिर, तीर्थ, कथा श्रवण और नाम जप के व्यापार का विस्तार किया और उसी को सनातन धर्म बोलने लगे। मठ महत और संत का यह सब से बड़ा छल है।
मानसिक रूप से एक समग्र परिपक्व चरित्र-कथा का निर्माण कर के भोगों के दीमक (बाल्मिकी) से ग्रस्त गृहस्थ जीवन को सुगम और सम्पूर्ण स्वरुप देने का प्रयास किया है। इसको समझना बहुत जरूरी है।
जब भी मन श्रीरामचन्द्र के अनुपम चरित्र और कथा के उन पात्रों के कर्तव्य-रस मे रमा रहता है तुम ईर्ष्या, और द्वेष के विषाक्त मानसिकता से बचे रहते हो। केबल राम राम जपने से न कुछ होने वाला है न कुछ होता है। राम राम जपना नहीं है बल्कि राम को जीना है।
कारण जीव (सीता) आत्मा (राम) के पुत्र को उसी कुटिया (उसी दीमक वाले संसार रूपी बाम्बी) मे जन्म देगी। वहीं से वह राम रस से खुद को सींचते हुए जीने की कला सीखेगा।





