डॉ. विकास मानव
१. तत्त्वमसि
तत् त्वम् असि = तत् रूप जो अनिर्देशय है वह
तत् रूप जो ब्रह्म है वह तुम हो अर्थात् तुम ब्रह्म हो।
२. त्वं तदसि
त्वम् तद् असि = तुम तद् रूप वह ब्रह्म हो।
३. त्वंब्रह्मासि
त्वम् ब्रह्म असि = तुम ब्रह्म हो।
४. अहंब्रह्मास्मि
अहम् ब्रह्म अस्मि = मैं ब्रह्म हूँ।
सर्व प्रथम “तत्” क्या है, इसका ज्ञान करना चाहिए. याज्ञवल्क्य जी तत् पद हेतु उपदेश करते हैं :
“तत्र पारोक्ष्यशबल: सर्वज्ञत्वादिलक्षणो मायोपाधिः सच्चिदानन्दलक्षणो जगद्योनिस्तत् पदवाच्यो भवति”
तत्र अर्थात् उपरोक्त चारों महावाक्यों में जो तत् पद है उनमे से तत् पद जो पारोक्ष रूप से सबल है, उसके अतिरिक्त कोई सबल नही है। जो परमाणु से लेकर महत् तत्त्व तक सबको जानने वाला सर्वज्ञत्व लक्षणों से युक्त है.
माया अर्थात् मा + या = जो यह सबकुछ प्रतीतिरूप समक्ष हो रहा है उस प्रत्ययरूप माया की उपाधि से युक्त है.
सच्चिदानन्द = सत्(सत्य) चिद्(सूक्ष्माति सूक्ष्म चेतन) और आनन्द से युक्त लक्षण वाला है.
जगद्योनिः= समस्त विश्व के प्राकट्य का कारणरूप योनि (यो+नि = जो निसरण का मूल कारण है, प्राकट्य का मूल है, वह योनि है) वही “तत् पद” का वाच्य है।
कोई नाम न होने से उसे तत् के नाम से सर्वत्र “भवति” तत् पद का वाची होता है।
“स एवान्त:करण संभिन्न बोधोsस्मत्प्रत्यय अवलम्बनस्त्वं पदवाच्यो भवति”
स एव अन्तःकरण = जब वही तत् रूप ब्रह्म अन्तःकरण की उपाधि के कारण स्वयं से भिन्न का बोध होने से “त्वम्” पद के आश्रय को लेकर प्रकट किया जाता है, कहा जाता है। अस्मत् प्रत्यय के आलम्बन से वह ईश्वर या ब्रह्म त्वम् पद वाची हो जाता है।
“परजीवोपाधिमायाविद्ये विहाय तत् त्वम् लक्ष्यम् प्रत्यगभिन्न ब्रह्म” (पैंगलोप.3/3)
पैंगलोपनिषद के तीसरे अध्याय के तीसरे मन्त्र की अंतिम व्याख्या है। परम् की उपाधि से जो वह तत् रूप से कहा गया है वह ईश्वर है, ब्रह्म है। परन्तु जब ईश्वर और जीव की उपाधि से देखा जाता है तो जीव जिसमे भ्रमण करता है उसे ही ईश्वर मान बैठता है।
जगत की इस उपाधि से ईश्वर की उपाधि माया है और जीव की उपाधि अविद्या है। जब उपाधियों का हनन कर दिया जाय या उपाधि का परित्याग कर दिया तब तत् रूप में वह ईश्वर ही त्वम् पद हो जाता है।
इस प्रकार तत् और त्वम् दोनों पदों का एक लक्ष्य वह ब्रह्मपद हो जाता है जो प्रत्यगात्मा से अभिन्न है। इसी बोध को आधार बनाकर सर्वत्र जीवात्मा के नाम से कहा गया है।
आध्यात्म रामायण में “जीवस्य च परमात्मा च पर्यायो नात्र भेद धी:”= जीव और परमात्मा में भेद बुद्धि नही रखना चाहिए।
इसी का रूपान्तरण तुलसी ने रामचरित मानस में किया है~
“ईश्वर अंश जीव अविनाशी।
चेतन अमल सहज सुखराशी।।
अब अन्तिम पद है, “असि”
तत् और त्वम् पद को जो अभिन्न बनाता है; तत् और त्वम् पद को जोड़कर रखने का जो गोंद Gum की भाँति है वह असि पद है।
तत् पद, त्वम् पद और असि पद तीनों पदों के लिए शुकरहस्योपनिषद में इस प्रकार ध्यान हेतु उपदेश है –
तत् पदम् :
“ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यादतीतं शुद्धं बुद्धं मुक्तमप्यव्ययं च।
सत्यं ज्ञानं सच्चिदानन्दस्त्यं ध्यायेदेवंतन्महो भ्राजमानम्।।
वह ज्ञानरूप जानने योग्य है एवं ज्ञानगम्यता से परे भी है। वह विशुद्ध रूप, बुद्धिरूप, मुक्तरूप,अविनाशी रूप है।
वही सत्य, ज्ञान, सच्चिदानन्द रूप ध्यान करने योग्य है। हमे उस (तत् रूप)उस महान् तेजस्वी देव का ध्यान करना चाहिए।
त्वम् पदम् :
“जीवत्वं सर्वभूतानां सर्वत्राखण्डविग्रहम्।
चित्ताहंकारयन्तारं जीवाख्यं त्वं पदं भजे।।
त्वम् रूप में वह ब्रह्म आप ही सभी प्राणियों में जीव स्वरूप हैं। सर्वत्र अखण्ड विग्रह रूप हैं। हमारे चित्त और अहङ्कार पर नियन्त्रण करने वाले हैं। जीवों के रूपमें त्वम् पद की हम स्तुति करते हैं।
असि पदम् :
“जीवो ब्रह्मेति वाक्यार्थं यावदस्ति मनःस्थितिः।
ऐक्यं तत्त्वं लये कुर्वन्ध्यायेदसि पदं सदा।।
जीव ही ब्रह्म है, इस महावाक्य के अर्थ पर जो विचार करता है, मन को स्थिर करता है तथा “असि पद” का सदैव चिन्तन करता है, (तत् पद और त्वम् पदको ऐक्य करने वाला होने से) वह तत्त्व को ऐक्य प्रदान करने में समर्थ होता है।
(पञ्च तत्त्व अन्त में एक ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं).





