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*वैदिक दर्शन : राग और द्वेष*

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           डॉ. विकास मानव

सबसे पहले राग क्या है?
“सुखानुशयी रागः”(योगसूत्र/२/७)
सुख का जो अनुवर्ती कर्म है, उसे “राग” कहते हैं।
सुखाभिज्ञस्य सुखानुस्मृतिपूर्वः सुखे तत्साधने वा यो गर्धस्तृष्णा लोभः स राग इति।
यदि हम सुख मे हैं, जैसे अभी ए/सी चल रहा है, बादल भी गड़गड़ा रहे हैं, भय है कि लाइट जाते ही ए सी बंद हो जाएगा हम आप इसके सुखानुशयी हुए, सुख का अनुशरणकर्ता हुए।
अर्थात् सुखानुभव हो चुका है, और सुखानुभव एकबार हो जाने के बाद वह सुख न मिले तो कष्ट होता है, यही दुःख या क्लेश है।

यदि यह पहले न मिला होता या जिसको नही मिला है, उसे राग नही हो सकता। उदाहरण के लिए एक मजदूर हमेशा धूप मे दिन भर काम करता है, उसे नही मालूम कि ए सी का सुख क्या है, उसे कोई क्लेश नही होगा, लेकिन एकबार भी उसे ए सी मे कुछ क्षण रहने को मिला तो जब भी भीषण गर्मी पड़ेगी उसे लगेगा कि अभी ए सी मे होते तो यह क्लेश नही होता, मन के इस भाव को क्लेश समझा जाता है। यह एक छोटा सा उदाहरण है।
सुखानुशयी पद की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जा सकती है-
अनुशेते इति,
अनु + शीङ् + णिनीः = अनुशयी सुखस्य अनुशयी इति सुखानुशयी।
सुख की स्मृति, उसका आनंदानुभव और उस साधन(तत्साधने) की प्राप्ति के प्रयास मे जो क्लेश होता है, वह राग है।
यो गर्धः, गर्ध=चाह।
अर्थात् तृष्णा = लालच = लोभ = लोलुपता = मुह मे पानी आ जाना। यह “क्लेश” है।
मन पर नियंत्रण रखने पर “समं सुखदुःखेषु” ऐसी स्थिति मे रहनेवाले मनुष्य को राग नही होता।
“तेन सुखसाक्षात्कारतः सुखस्मृतितश्च रागो भवति.”
इस जन्म की स्मृति तो स्पष्ट है, किन्तु जन्मान्तर की स्मृतियाँ कृष्ण के सिवा किसी को स्पष्ट नही होतीं, इसलिए “अनुस्मृति” शब्द से इस जन्म और जन्मान्तर, की स्मृतियाँ ग्रहीत होती हैं। इस जन्म मे अननुभव सुख-साधनो के प्रति राग की उत्त्पत्ति भी है या हो सकती है,
लेकिन कैसे?
इस प्रश्न के समाधान के लिए “अनुस्मृति” शब्द अत्यन्त आवश्यक एवं समीचीन है। जन्मान्तरीय अस्पष्ट स्मृतियों के कारण ही उन पदार्थों के प्रति, राग, (किसी वस्तु, परिस्थिति, घटना के प्रति चिपकना या आकर्षण) के कारण क्लेश पैदा होता है।
क्लेश “द्वेष” है।
योगदर्शन का सूत्र (2/8) कहता है :
“दुःखानुशयी द्वेषः”
अर्थात् दुःखाभियस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने वा यः प्रतिघो मन्युर्जिघांसा क्रोधः स द्वेष इति।।
दुःखानुभव की स्मृतिपूर्वक दुःख या दुःख के साधनभूत पदार्थ के प्रति जो प्रतिहिंसा, मन्यु (मार डालने कि इच्छा) या क्रोध होता हे,वह “द्वेष” है।
अर्थात् दुःखानुभव कर चुके व्यक्ति को, दुःख की व्यक्त अथवा अव्यक्त स्मृतिपूर्वक,दुःख के विषय मे, या फिर दुःख देनेवाले पदार्थों के विषय मे जो प्रतिहिंसा = प्रतिहन्तीति वा मन्यु = गुस्सा।
जिघांसा = हन्तुमिच्छा, हन् + सन् + अ + टाप् = मारने की इच्छा अथवा क्रोध होता है वह “द्वेष” है।
उदाहरण के लिए पेपर बिलवाला आया और हमने कहा कि इस महीने आठ दिन का पेपर नही आया, उसने कहा कि हमने स्वय़ पूरे माह का पेपर दिया है। अब बात बात में हमे क्रोध आया और दे दिया एक तमाचा या नही दिया, लेकिन द्वेष तो बढ़ा।
दोनो पक्षो मे देख लेने की बात शुरु हो गयी, इस मानसिक स्थिति मे आगे क्या होगा, ऐसा एक अज्ञात भय या हिंसित होने का जो भाव है उसे “द्वेष” कहते हैं, जिससे मनुष्य को दुःख होता है, क्लेश होता है, अवसाद होता है, जिससे मानसिक अशांति बढ़ती है, आगे क्या कुछ होगा ऐसा भाव तैयार होने लगता है जो क्लेश का कारण कहा जाता है।

Ramswaroop Mantri

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