समाजवादी आंदोलन का समापन हो गया, ये मान लेना मुझे उचित नहीं लगता।
समाजवादी आंदोलन की बुनियाद जिस मौलिक भारतीय विचारधारा पर आधारित है, उसके अंत की घोषणा करना एक पलायनवादी कदम है।
हो सकता है कि व्यक्तिगत रूप से हम, चाहे जिस कारण से भी, निराश हो गए हों, लेकिन हमारी निराशा को वर्तमान अंधेरों के आगे हथियार डालकर, सारे आंदोलन की निराशा निरुपित करना कहाँ तक ठीक है?
वर्तमान पीढ़ी से भले ही कोई विशेष उम्मीद न हो लेकिन भविष्य की पीढ़ियों पर अपनी नाउम्मीदी कैसे थोपी जा सकती है?
गांधी, लोहिया और जयप्रकाश जानते थे कि जिस सपने को साकार करने का बीड़ा उन्होंने उठाया है,वह न केवल उनके, अपितु उनके बाद आने वाली कई पीढ़ियों के दौर में भी साकार होने वाला नहीं है।लेकिन फिर भी वे कभी भी निराश नहीं हुए, अलबत्ता उनके खुद के जीवन मे आए निराशा के दौर में भी वे रणनीतियां बदलते रहे लेकिन हाथ पर हाथ धरकर कभी भी नहीं बैठे।
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी द्वारा छेड़े गए संघर्ष के दौरान कुछ लोग संघर्ष से उपजने वाली तकलीफों को सह नहीं पाए और उन्होंने संघर्ष से अपना हाथ खींच लिया।इस तरह मैदान छोड़कर भागने वालों से, तब गांधीजी ने,अपने अखबार ‘इंडियन ओपीनियन के 13फरवरी,1909के अंक में लिखे एक लेख के जरिये कहा था कि:-
“…जो लोग मैदान छोड़कर भाग गए हैं, हम उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराना चाहते हैं।वे यह तो जानते हैं कि आंदोलन जारी रखने लायक है।वे इसलिए साथ नहीं दे पाए क्योंकि यह आंदोलन जितनी कुर्बानी मांगता है, उतनी वे नहीं दे सकते।इस तरह हारे हुए लोगों को, दूसरों को भी अपने रास्ते पर खींचने की कोशिश नहीं करना चाहिए।बल्कि उन्हें सरकार को इत्तला कर देना चाहिए कि अपनी कमजोरी की वजह से ही उन्होंने घुटने टेके हैं तथा जो लोग अभी भी मैदान में डटे हुए हैं, उनकी सफलता की वे कामना करते हैं और उनके हाथ मजबूत करने के लिए उनसे जो कुछ भी बन पड़ेगा, वे करेंगे।इतना तो वे निश्चित ही कर सकते हैं।अगर वे इतना भी नहीं करते तो यह माना जाएगा कि अपनी कमजोरी की वजह से उन्होंने घुटने नहीं टेके हैं, बल्कि जानबूझकर उन्होंने देशद्रोह किया है।वे अखबारों में इस आशय का वक्तव्य दे सकते हैं कि वे खुद तो गिर गए हैं लेकिन वे नहीं चाहते कि दूसरे भी गिर जाएं।”
लोहिया ने भी ‘निराशा के कर्तव्य’शीर्षक से एक लंबा लेख लिखकर ,निराशा के दौर में समाजवादियों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाई थी।
और जेपी ने तो आपातकाल के दौरान लिखी अपनी एक ऐतिहासिक कविता के जरिये कहा था कि :-
“जग जिसे कहता विफलता, थी शोध की वे मंजिलें।
मंजिलें वे अनगिनत हैं, गंतव्य भी अति दूर है।
रुकना नहीं मुझको कहीं, अवरुद्ध जितना मार्ग हो।
निज कामना कुछ है नहीं, सबकुछ समर्पित ईश को तो,
विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी, और यह विफल जीवन
शत शत धन्य होगा यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कंटकाकीर्ण मार्ग यह, कुछ सुगम बन जाए”
आरएसएस के लिए भी उसके शुरुआती दौर का समय उसकी विचारधारा के लिए सर्वथा विपरीत दौर था।सारा देश आजादी की लड़ाई के हिंसक और अहिंसक उस माहौल में रसमग्न था जो आरएसएस को तब से लेकर आजतक फूटी आंखों भी नहीं सुहाता रहा है।लेकिन आरएसएस तब भी अपने स्वयंसेवकों के दिलोदिमाग को आशा और विश्वास के संस्कारों से संस्कारित करता रहता था।एक गीत तब आरएसएस में गाया और दोहराया जाता था कि:-
घना अंधकार है, धूमिल है नभ सारा,
उल्कापिंड टूट रहे, भूतल विदीर्ण सारा,
ऐसे में साथी, क्या आस छोड़ दोगे?
शपथ है, गुहारूँ जब, पाहरू प्रतीति देना।
विजय की कामना हो।”
समाजवादी आंदोलन के लिए तो परिस्थितियां दिन ब दिन, अपनी तेजस्वी, क्रांतिकारी विचारधारा के लिए अनुकूल ही होती जा रही हैं क्योंकि स्वतंत्रता संघर्ष की विचारधारा पर मोदीराज के दौर में हमले दिन पर दिन,तेज होते जा रहे हैं, विषमता की खाई को, सत्तापोषित राजनीति के जरिये,गहरा किया जा रहा है, शोषित पीड़ित जनता की कराह और छटपटाहट की अभिव्यक्ति के सारे लोकतांत्रिक दरवाज़ों को बंद किया जा रहा है।अभिव्यक्ति का सेफ्टी वाल्व नहीं रहेगा तो जो विस्फोट होगा उसकी हिंसात्मक परिणति को टालने के लिए, ‘मारेंगे नहीं तो मानेंगें भी नहीं’ वाली गांधी-लोहिया-जेपी की संघर्ष शैली के दिन तो आने ही लगे हैं।
देशभर में सत्तापोषित अन्याय, शोषण अत्याचार के खिलाफ हो रहे सारे अहिंसात्मक आंदोलनों में, क्या आपको समाजवादी आंदोलन की विचारधारा की गूंज सुनाई नहीं देती?
इन आंदोलनों की गूंज को सुनकर ही किसी शायर ने ये कहा है कि:-
‘सर-ए-तस्लीम-ख़म रखते हैं,
ये तहज़ीब है अपनी।
अगर फरमान बेजा हो तो
ठुकराना भी आता है!’
अंत में, फिर किसी शायर की ज़ुबान में, आपसे गुजारिश है कि,
इक न इक शम्मा अंधेरे में जलाए रखिये!
रौशनी होके रहेगी, माहौल बनाए रखिए!
–– विनोद कोचर’





