,मुनेश त्यागी
आज दुनिया में समाजवादी समाज की स्थापना करने वाले महान समाजवादी क्रांतिकारी लेनिन की पुण्यतिथि की सौंवी वर्षगांठ मनाई जा रही है। ये वही लेनिन हैं जिन्होंने सबसे पहले मार्क्सवादी विचारों को अमली जामा पहनाते हुए, दुनिया में मार्क्सवादी विचारों के अनुसार क्रांतिकारी समाजवादी समाज की स्थापना की, लुटेरे सामंती और पूंजीवादी समाज का खात्मा किया और रूस में 1917 में पहली बार किसानों और मजदूरों के संगठित और क्रांतिकारी आंदोलन के तहत क्रांति सम्पन्न की और सबसे पहले रूस में समाजवादी समाज की शुरुआत की।

वे रूस में स्थित लेना नदी के किनारे रहते थे। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा वहीं व्यतीत किया था, इसलिए लोग उन्हें “लेनिन” के नाम से जानने और पुकारने लगे। बाद में इन्हीं लेनिन की अपनी महान क्रांतिकारी उपलब्धियों के कारण उन्हें “लेनिन द ग्रेट” यानी “महान लेनिन” की उपाधि से विभूषित किया गया और आज भी दुनिया में ज्यादातर लोग उन्हें इसी नाम से जानते हैं।
व्लादिमिर इलयिच लेनिन की पुण्यतिथि (21 जनवरी 1924) के अवसर पर उन्हें शत शत नंदन वंदन और क्रांतिकारी अभिवादन। लेनिन महान जिन्होंने रूस में पहली सर्वहारा कांति की और किसानों मजदूरों को अपना भाग्य विधाता यानी सर्वे सर्वा मालिक बनाया। लेनिन के नेतृत्व में रूस में एक ऐसी सरकार कायम की गई जिसमें किसानों और मजदूरों के कल्याण का बोलबाला था जो किसान और मजदूरों की सरकार थी, जो आम जनता के हितों को आगे बढ़ाने वाली कल्याणकारी सरकार थी।
लेनिन अपनी युवावस्था में ही एक अध्ययनशील, पढ़ाकू और मजदूरों के लिए संघर्षरत हो गए थे। उन्होंने कुछ दिन वकालत की। कुछ दिनों बाद ही वे मार्क्स के शिष्य हो गए थे और मार्क्सवाद में विश्वास करने लगे थे। उनका मानना था कि किसानों मजदूरों की एकता कायम करके एक क्रांतिकारी क्रांतिकारी पार्टी के माध्यम से ही समाज में बुनियादी परिवर्तन किया जा सकता है, समाज का क्रांतिकारी परिवर्तन किया जा सकता है और समाज में क्रांति की जा सकती है। उनके इन्हीं विचारों की वजह से जारशाही सरकार ने उन्हें देश निकालें दिए, रूस के बाहर भेजा, बेहद कठिन जिंदगी जीने पर मजबूर किया, मगर लेनिन अपने सिद्धांतों और आदर्शों से टस से मस न हुए और वे विदेशों में रहते हुए रूसी क्रांति का, रूसी मजदूर किसान आंदोलनों का नेतृत्व करते रहे।
उनका मानना था कि क्रांतिकारी विचार ही क्रांतिकारी परिवर्तन करते हैं। क्रांतिकारी विचारों के बिना क्रांति या क्रांतिकारी समाज और सरकार कायम नहीं की जा सकती। मेहनतकशों की सत्ता और सरकार से ही देश में और दुनिया में न्याय, भाईचारा और सुरक्षा, कायम की जा सकती है और पूंजीवादी व्यवस्था कभी भी अन्याय शोषण और युद्ध का खात्मा नहीं कर सकती। क्रांतिकारी आंदोलन के द्वारा इस शोषणकारी पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा करके ही समाजवादी व्यवस्था कायम की जा सकती है।
अपने इन्हीं सिद्धांतों को लेकर महान लेनिन ने रूस में 1917 में क्रांति की और दुनिया में सबसे पहले 1917 में किसानों मजदूरों का राज और सत्ता कायम की और किसानों मजदूरों को अपना भाग्य विधाता बनाया और सामंती और पूंजीवाद के मानने वालों की इस बात का खंडन किया कि किसान और मजदूर, अपनी सत्ता कायम नहीं कर सकते, अपना राज नहीं चला सकते, अपनी सरकार नहीं बना सकते।
लेनिन एक बहुत अध्यनशील, पढ़ाकू और एक बड़े लेखक थे। उन्होंने अपने जीवन में “मजदूरों के मित्र कौन हैं?”, “एक कदम आगे दो कदम पीछे”, “क्या करें?”, “साम्राज्यवाद पूंजीवाद के अंतिम अवस्था है”, “राज और क्रांति”, “वामपंथी कम्युनिज्म एक बचकाना मर्ज”, जैसी अनेक महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिनका अध्ययन करके दुनिया के करोड़ों लोगों ने लेनिन के आदर्शों को अपनाया और अपने-अपने देशों में क्रांतिकारी सरकार और क्रांतिकारी सताएं कायम कीं, पूंजीवाद का विनाश किया।
लेनिन ने अपने जीवन में किसने और मजदूरों को क्रांतिकारी समाजवादी विचारों से अवगत कराने के लिए छोटी-छोटी पुस्तक माला लिखीं,उनके द्वारा उन्हें शिक्षित और प्रशिक्षित किया। बाद में मार्क्स और लेनिन के विचारों से प्रभावित होकर दुनिया के अनेक देशों में क्रांतियां हुईं, मजदूरों और किसानों के राज्य कायम हुए, उनकी सरकारें बनीं, उनकी सत्ता बनी और लोग किसान मजदूर इतिहास में पहली बार, अपने भाग्य विधाता बने।
लेनिन के नेतृत्व में रूस में कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण किया गया, जिसने किसानों मजदूरों को संगठित करके 1917 की रूसी क्रांति की। इस क्रांति के बाद रूस के सभी लोगों को रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार और बुजुर्गों की पेंशन की व्यवस्था की गई, सबको बिजली मुफ्त दी गई, दुनिया में सबसे पहले महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन दिया गया, खेती का सामूहिककारण किया गया, जमीन सबकी बनाने की नीति बनाई गई, सबका काम करना जरूरी कर दिया गया और यह भी निश्चित किया गया कि जो काम नहीं करेगा उसे खाने का अधिकार भी नहीं होगा।
रूसी क्रांति के बाद सारे देश और सारे गांवों में पुस्तकालयों का जाल बिछा दिया गया, सबका लिखना पढ़ना जरूरी कर दिया गया। लेनिन ने “सतत क्रांति” की बात की और कहा की क्रांति एक आग की तरह है, जिस प्रकार आग को जलाने के लिए ईंधन की जरूरत होती है, उसी प्रकार क्रांतिकारी बने रहने के लिए सशस्त्र संघर्ष और अध्ययन की जरूरत होती है। जो लोग ऐसा नहीं करते, वे क्रांतिकारी नहीं बने रह सकते। रूसी क्रांति के बाद दुनिया में सबसे पहले रूस में 8 घंटे का काम, 8 घंटे की नींद और 8 घंटे पढ़ना लिखना गाना नाटक संगीत खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियां जरूरी कर दी गई।
लेनिन के विचारों पर चलकर कम्युनिस्टों ने सामंती और पूंजीपतियों की इस बात का खंडन किया की मजदूर और किसान क्रांतिकारी नहीं बन सकते, अपनी सरकार और सत्ता कायम नहीं कर सकते, क्रांतिकारी समाज का क्रांतिकारी रूपांतरण नहीं कर सकते। दुनिया में आज भी बहुत से मुल्क है जहां लेनिनवाद के अनुसार सरकारी कायम की गई और जनता का कल्याण किया गया और हजारों साल पुराने अन्याय, शोषण, जुल्म, अन्याय, भेदभाव, जातिवाद और नस्ली भेदभाव का खात्मा किया।
सबसे पहले रूस, चीन, पूर्वी यूरोप, क्यूबा, वियतनाम, कोरिया, मंगोलिया, में लेनिनवावादी सरकारें कायम की गईं। आज भी दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में किसानों मजदूरों के संघर्ष सबसे तेज हैं जो लेनिनवादी सिद्धांतों और आदर्शों पर चलकर अपने जीवन में नव निर्माण कर रहे हैं।
लेनिन ने दुनिया को सत्ता का प्रयोग किसान और मजदूरों और आम जनता के हित के लिए करना सिखाया। उन्होंने सत्ता का इस्तेमाल चंद लोगों की खुशियों के लिए, चंद लोगों की तानाशाही के लिए, चंद लोगों के कल्याण के लिए नहीं किया और ना ही उन्होंने सत्ता का प्रयोग अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपने रिश्तेदारों के लिए किया।
उन्होंने दुनिया को दिखाया कि कैसे किसान और मजदूरों की सत्ता का प्रयोग और सरकार का प्रयोग, जनता के कल्याण के लिए, किसानों के कल्याण के लिए और मजदूरों के कल्याण के लिए किया जा सकता है। पूरी दुनिया में लेनिन ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया की अर्ध पिछड़े देश में कैसे कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में क्रांति की जा सकती है और कैसे क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ाया जा सकता है।
लेनिन की क्रांति इस मायने में सबसे बड़ी घटना थी कि उसने इंसान इंसान के बीच में समता, समानता, न्याय, भाईचारे, शांति और स्वतंत्रता की कामना की स्थापना की। उसने जातियों का भेद मिटाया और रुस से जातिवाद का समूल खात्मा किया। सबसे पहले आदमी को आदमी बनाया, इंसान का हमदर्द बनाया और आपस में भाईचारा कायम किया।
क्रांति ने दिखाया कि क्रांतिकारी समाज कैसे औरतों को बराबरी का दर्जा दे सकता है। यह रूस की पहली समाजवादी क्रांति थी जिसका नेतृत्व लेनिन कर रहे थे जिसने दुनिया में पहले पहल स्थापित किया और दुनिया को दिखाया कि कैसे पूरी जनता को आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा प्रदान की जा सकती है? कैसे सबको काम मुहैया कराया जा सकता है? कैसे सब को मुफ्त इलाज दिया जा सकता है? और कैसे जमीन का वितरण करके कृषि समस्या का निपटारा किया जा सकता है? और किसान और मजदूर को अपना भाग्य विधाता बनाया जा सकता है और कैसे नस्ली और जातिवाद की समस्या का समाधान किया जा सकता है?
महान लेनिन की क्रांति ने यह भी स्थापित किया कि यदि नेतृत्व सही है तो वह किसान और मजदूर को अपना भाग्य विधाता बना सकता है, रूस की क्रांति ने यही सिद्ध किया और असल बात यह है कि इस क्रांति का प्रणेता और नेता और कोई नहीं बल्कि लेनिन के नेतृत्व में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी यानी बोलशेविक पार्टी थी।
यह कॉमरेड लेनिन ही थे कि जिन्हें दुनिया की कम्युनिस्ट, प्रोग्रेसिव, प्रगतिशील, बौद्धिक और जनवादी ताकतों ने “क्रांति का जनक” माना और उन्हें इतिहास में “लेनिन द ग्रेट” यानी “महान लेनिन” की उपाधि से सम्मानित किया। लेनिन इस उपाधि को पाने के लिए सबसे ज्यादा हकदार थे क्योंकि उन्होंने शोषणकारी पूंजीवादी समाज का नक्शा बदला, समाज में क्रांतिकारी व्यवस्था स्थापित की और दुनिया को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, अन्याय, शोषण, जुल्म और भेदभाव की बुनियादी समस्याओं से निजात देने वाली समाजवादी व्यवस्था कायम की और और दुनिया में सबसे पहले समता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित समाज की स्थापना की।
महान लेनिन भारत की आजादी के, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समर्थक थे। उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्यवाद द्वारा भारत की गुलामी की जंजीरें तोड़ने की वकालत की थी और भारत के स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन किया था। 1920 में लेनिन ने भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में मदद की थी और एमएन राय की थीसिस में बदलाव किए थे। यह लेनिन की सरकार ही थी जिसने भारत में स्थापित भारत की पहली सरकार को मान्यता प्राप्त की थी जो 1915 में काबुल में स्थापित की गई थी और जिस के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप सिंह और प्रधानमंत्री बरकतुल्लाह खान थे।
यह लेनिन की महानता ही थी कि हमारे देश के अधिकांश क्रांतिकारी लेनिन के विचारों से और रूसी क्रांति के सफल परिणामों से प्रभावित थे और उनके इन्हीं विचारों की वजह से हमारे क्रांतिकारी शहीद भारत में रूसी क्रांतिकारी समाज जैसी क्रांतिकारी व्यवस्था भारत में स्थापित करना चाहते थे। अपनी फांसी के समय, शहीदे आजम भगत सिंह अपने समय के महान नेता कामरेड लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे।
लेनिन के विचारों का कमाल देखिए कि जब 1990 में रूस में समाजवादी क्रांति असफल हो गई। इसकी असफलता का सबसे बड़ा कारण था कि वहां की कम्युनिस्ट पार्टी और सरकार ने लेनिन द्वारा बताए गए सतत क्रांति के सिद्धांतों का इस्तेमाल नहीं किया उन पर गौर नहीं किया और अंततः उसकी गलत नीतियों के कारण, वहां पर क्रांति असफल हो गई। आज दुनिया के समस्त समाजवादी क्रांतिकारियों को उन गलतियों और कमजोरियों से सबक लेने की सबसे बड़ी जरूरत है ताकि देश और विदेश में समाजवादी, जनवादी और धर्मनिरपेक्ष क्रांतिकारी अभियान को जोरदार तरीके से जारी रखा जा सके।
आज समाजवादी विचारों को मानने वाली तमाम समाजवादी वामपंथी ताकतों कि यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे लेनिन के विचारों को आत्मसात करके, भारत में क्रांतिकारी समाज व्यवस्था परिवर्तन करें, ताकि हजारों साल से जारी शोषण और अन्याय पर टिकी इस जन विरोधी, शोषक और अन्यायी व्यवस्था का खात्मा करके, एक ऐसी व्यवस्था कायम की जाए जिसमें पूरी जनता का कल्याण हो, जिसमें सबको रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य मिले और यह काम सिर्फ और सिर्फ लेनिन के विचारों पर चलकर ही किया जा सकता है। लेनिन की सौंवी पुण्यतिथि पर यही उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।





