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हम तो इनके हाथ का पानी भी पीना पसन्द न करें

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पंकज यादव

गंगा_जमुनी_तहज़ीब, वसुधैव कुटुम्बकम, हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई, इंसानियत, कौमी एकता, साम्प्रदायिक सद्भाव, धर्म-निरपेक्षता, सामाजिक समरसता, उदारवाद आदि…..ये सब वे शब्द और विचारधाराएं हैं, जो वर्तमान में भारतीय जनमानस के मनोदशा के हिसाब से आमतौर पर प्रासंगिक प्रतीत नहीं होतीं, या यूँ भी कह सकते हैं कि इन सब विचारों को फॉलो करने वाले गिने-चुने लोग ही वर्तमान भारतीय समाज में अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। अपने चारों ओर के लोगों की मानसिकता और मनोदशा को देखकर मुझे संशय होता है कि यह सब विचार कभी भारतीय समाज की पहचान रहे भी होंगे भला??
हालिया वाकया कल का है जब मुझे पुनः ये सोचना पड़ा, जब कल मुझे मेरी मिसेज ने कल हुई एक घटना के विषय में बताया कि उनके साथ पढ़ाने वाली एक शिक्षिका उनके साथ ही कहीं से गुजर रही थीं, रास्ते में मुस्लिम समुदाय के कुछ नौजवान गर्मी और प्यास से परेशान लोगों के लिए सड़क पर पानी के पाउच वितरित कर रहे थे। मेरी मिसेज ने अपनी साथी शिक्षिका से कहा कि आप चाहें तो ये पानी के पाउच ले सकते हैं, बदले में उनको सुनने को मिला, “हम तो इनके हाथ का पानी भी पीना पसन्द न करें।” मिसेज ने कहा कि ये तो पाउच में पैकेज्ड है, पुनः प्रत्युत्तर मिला, “इनके तो पैकेज्ड पानी पर भी हमें भरोसा नहीं है।”

  मिसेज की साथी शिक्षिका तथाकथित उच्च कुलीन जाति से ताल्लुक रखतीं हैं और इनके पिता जी स्वास्थ्य सेवाएं देने का कार्य करते हैं। मिसेज के द्वारा इस वाकये को सुनने के बाद मैं काफी देर सोचता रहा कि नफ़रतें और भेदभाव भारतीय जनमानस की विचार-प्रक्रिया में कितनी गहराई तक उतर चुका है, कि लोगों को पीने के पानी में भी धर्म और जाति नज़र आने लगा है, मैं सोच रहा था कि कैसे ये कथित उच्च कुलीन शिक्षिका अपनी कक्षाओं में विविधता और विभिन्न धर्मों से जुड़े विद्यार्थियों को स्वीकार कर पाती होंगीं और किस प्रकार इनको ऐसे संस्कार देने वाले इनके पिता अपने मरीजों के जाति-धर्म को देखे बिना उनके लिए स्वास्थ्य सेवाएं दे पाते होंगे?? 
सोच तो मैं ये भी रहा था कि स्विगी और जोमैटो के ज़माने में भी पैकेज्ड फ़ूड और पैकेज्ड कोल्ड ड्रिंक और अन्य पैकेज्ड खाद्य सामग्रियों को इस्तेमाल करते वक्त किस प्रकार इस तरह की मानसिकता वाले लोग ये सुनिश्चित कर पाते होंगे कि ये पैकेज्ड खाद्य सामग्रियां उन तक पहुंचने से पहले सिर्फ ऐसे धर्म और जाति के लोगों के हाथों से होकर ही गुज़रते होंगे, जिनका छुआ हुआ खाने-पीने में उनको कोई प्रॉब्लम न हो।
Pankaj Yadav

Ramswaroop Mantri

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