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हिंसा और सहनशीलता का इतिहास रहा है हमारा

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मुनेश त्यागी

     पिछले दिनों मथुरा और वाराणसी में मस्जिदों को हटाने के लिए कई याचिकाएं दायर की गई हैं कि मंदिरों का पुनर्स्थापन किया जाए। इसे लेकर देश के जाने-माने कई इतिहासकारों ने स्थानीय प्रशासन को चेतावनी दी है कि वह औरंगजेब के पद चिन्हों पर न चलें और इतिहास को इतिहास रहने दें।

     अलीगढ़ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के  विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब ने कहा है कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने वाराणसी और मथुरा में मंदिरों का विध्वंस किया था। मगर आज मुख्य सवाल यह है कि 1670 में जो किया गया था क्या भारतीय मोनुमेंट्स एक्ट के प्रावधानों के बावजूद, उसे दोहराया जाना चाहिए?

     उन्होंने आगे कहा कि क्या हमें वही करना चाहिए जो भूतकाल में मुगल बादशाहों ने किया था? मोनुमेंट्स कानून पुरानी और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की बात करता है।

    इन्हीं विचारों का समर्थन करते हुए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मध्यकालीन लेखक और प्रोफेसर इतिहासकार नदीम रिजवी कहते हैं कि जो औरंगजेब ने किया, उसे कोई भी न्यायोचित नहीं ठहरा सकता, लेकिन हम उसकी तरह व्यवहार नहीं कर सकते और मंदिरों को पुनर्स्थापित करने के लिए  मस्जिदों को हटाने या ढहाने की बात नहीं कर सकते, फिर मुगल शासक और वर्तमान शासकों में क्या अंतर रह  जाता है?

     उन्होंने कहा कि औरंगजेब अधिकारों, मुफ्त वसीयत या कानून के समक्ष समानता, को नहीं जानता था। उन्होंने कहा कि आज हम भारतीय कानून और संसद द्वारा पारित कानूनों से निर्देशित होते हैं। सोलहवीं शताब्दी अलग थी। यह 21वीं सदी है। उसी तर्क से  क्या बौद्ध धर्म मानने वालों को उनके स्तुत्य स्थान उन्हें वापस मिलने चाहिए? जिन्हें वैष्णव और  शिव को मानने वालों ने  ढा दिया था?

     जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहासकार और प्रोफेसर आरपी बहुगुणा ने कहा कि किसी को भी आज के मुद्दों या विचारधारा को मध्यकालीन समय में नहीं देखना चाहिए, क्योंकि  तब के और आज के मुद्दों में काफी भिन्नता मौजूद है। हमें आज की हकीकत के बजाय भूतकाल के समय और वास्तव को समझना चाहिए।

   अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहासकार और प्रोफेसर मानवेंद्र के पुंडीर ने कहा कि पूजा के स्थान कानून 1991 में बनाया गया था जो ऐसे स्थानों की प्रकृति बदलने की मनाही करता है। हम इसका उल्लंघन कैसे कर सकते हैं?

      लेखक राणा साफवी ने कहा कि हमें भारत के संविधान और कानून के अनुसार रहना होगा। इतिहासकार और लेखक अनिरुद्ध कानीशेट्टी का कहना है कि प्रत्येक देश का हिंसा और अन्याय का इतिहास रहा है वहां पर सहनशीलता के भी कई उदाहरण हैं। यह बिल्कुल आश्चर्यजनक है कि हम आज के स्थान पर पुराने की नकल करना चाहते हैं।

     दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रोफेसर शालिनी जानी का कहना है कि जहां तक मुगल कालीन भारत का सवाल है हम उन दिनों की मंदिर खराब करने की राजनीति के बारे में जानते हैं। हम अपनी वर्तमान समस्याओं को भूतकाल के आधार पर नहीं सुलझा सकते। हमें इतिहास सही करने की कोशिश की जगह, इतिहास से सीखना चाहिए।

      हमारी जानकारी के मुताबिक महान अशोक के बनाएं 84000 स्तूपों को हिंदुओं ने ढा दिया था तो क्या उन्हें भी उनके उसी रूप में लौटाया जाएगा? उपरोक्त इतिहासकारों के विचारों और मंतव्यों के मद्देनजर हमारी जनता को और हमारी सरकार को, उपरोक्त बातों और विचारों पर गंभीरता से ध्यान देना करना चाहिए और उनके सुझावों को मानना चाहिए और वर्तमान मंदिर मस्जिद की राजनीति से दूर रहना चाहिए और हमें जनता की एकता को तोड़ने वालों और हिंदू मुस्लिम की नफरतभरी राजनीति करने वालों के भडकावे और झांसे में नहीं आना चाहिए।

      हमारा जोर देकर कहना है कि भूतकाल में जो हुआ, हमें उस सब को भूलकर, भारत की जनता के सुनहरे भविष्य की ओर देखना चाहिए और इतिहास के तथ्यों से सीखना चाहिए। हम इतिहास को नहीं दोहरा सकते हैं। हमें उपरोक्त इतिहासकारों के मंतव्यों और विचारों से सीखना चाहिए। आज का समय हमें इसकी इजाजत नहीं देता। यही समाज और देश हित में है। हम अपनी बात को अदम गोंडवी के इस शेर के साथ खत्म करना चाहेंगे,,,,,

हिंदू या मुसलमान के एहसासात को मत छेड़िए

कुर्सी की खातिर जज्बात को मत छेड़िये।

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है 

दफन है जो बात उस बात को मत छेड़िए।

Ramswaroop Mantri

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