शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी ने आज मिलते ही पूछने लगे,हम कबतक सिर्फ पढेलिखे ही रहेंगे,शिक्षित कब होंगे?
मैने कहा, मै कुछ समझा नहीं।
सीतारामजी ने कहा,यह बहुत ही गम्भीर प्रश्न है? जब हम शिक्षित हो जाएंगे तब हमारी कथनी करनी में अंतर नहीं होगा। शिक्षित होंगे तो हम धर्मभीरु नहीं होंगे,हम धर्म की सही परिभाषा समझकर स्वयं के आचरण में शुद्धता लाएंगे। हम सर्वधर्मसमभाव की धारणा को अंगीकृत करेंगे। शिक्षत होने पर धार्मिकता चोला ओढ़कर हम सियासतदानों को सदाचार का उपदेश देंगे,हम स्वयं सियासत से दूर ही रहेंगे। शिक्षित होंने पर अंधविश्वास को त्याग देंगे।
चिकित्सा की पढ़ाई कर हम चिकित्सा का व्यवसाय करंगे,व्यापार नहीं करेंगे। चिकित्सा के व्यवसाय में सलग्न होकर हम स्वयं में मानवता को जागृत करेंगे।
शिक्षित होने पर हम वास्तुकार अभियंता की पढ़ाई कर कभी भी भवन,पुल और सड़क निर्माण की सामग्री में मिलावट नहीं करेंगे।
भूगर्भ अभियंता की पढ़ाई कर हम शिक्षित होंगे तो हम प्राकृतिक संपदाओं का संतुलित दोहन करंगे। शिक्षित होने पर नदियों,तालाबों के तटों पर भवन निर्माण कर देश की अचल संपत्ति और जनधन को जोखिम उठाने के लिए बाध्य नहीं नहीं करेंगे।
राजनीतिशास्त्र का अध्ययन कर जनहित के लिए जो भी नीति बनाएंगे,उन नीतियों पर शुद्ध नीयत रखते हुए अमल करेंगे। राजनीतिशास्त्र में शिक्षित होने पर कभी हम जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करेंगे। शिक्षित होने पर अपनी उपलब्धियों का यथार्थ में एहसास करवाएंगे। कभी भी इश्तिहारों में छद्म उपलब्धियों का बखान नहीं करेंगे।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा हमारी कथनी करनी में अंतर नहीं होगा।
शिक्षित होने हम अपनी लकीर को बड़ा करने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। दूसरों की लकीर पोंछा कर हम बड़े होने का स्वांग नहीं रचेंगे।
सीतारामजी के विचारों को सुनकर मैने सीतारामजी से कहा, सम्भवतः आप अब विभिन्न जाँच एजेंसियों के लिए सुपात्र नहीं कुपात्र बन गएं हैं।
सीतारामजी ने कहा जब हम जन आंदालनों में सक्रिय थे,तब यह नारा लगाते थे।
सच कहना अगर बगावत है
तो समझों हम भी बागी हैं
शशिकांत गुप्ते इंदौर





