सुरेश कौशिक
यह लेफट-राईट का फण्डा फ्रांस की नेशनल असेंबली से शुरू हुआ था, जहाँ आम आदमी बाईं तरफ बैठते थे, और अमीर लोग दाईं तरफ।
१७८९-१७९९ के मध्य फ्रांस की क्रान्ति के दौरान चयनित जनप्रतिनिधियों को राष्ट्रीय असेम्बली में देश की प्रगति के सम्बन्ध में वाता्र हेतु एक बैठक में बुलाया गया। पूंजी को संरक्षण देने वाले कंजरवेटिव फार्स के प्रतिनिधि असेमबली के दायी तरफ तथा सबका जीवन सबका भोजन की मांग करने वाला दल बायी और बैठा। इसी प्रथा को आगे जाकर लैफट फ्रन्ट अर्थात वाम पन्थी व राईट फ्रन्ट अर्थात दक्षिण पन्थी नाम से जाना जाने लगा। चूंकि उस सभा में बायें बैठने वाले लोग सामन्त और उद्योगपति थे अत- बाद में दक्षिण पन्थियों को पूंजीवादी भी कहा जाने लगा।
“इस हिसाब से तो कॉंग्रेस भी दक्षिणपंथी है।”
“हाँ, बिलकुल। लेकिन यहाँ पर मामला थोड़ा सा पेचीदा हो जाता है। वामपंथ और दक्षिणपंथ केवल आर्थिक नीतियाँ नहीं, बल्कि सामजिक नीतियाँ भी हैं। फ्रांस की असेंबली में बैठने वाले उन लोगों के विचारों के आधार पर। अभी तक हमने आर्थिक नीतियों की बात की। जैसा कि मैंने बताया कि वामपंथी मतलब साम्यवादी (कम्युनिस्ट) या समाजवादी। और दक्षिणपंथी मतलब पूँजीवादी।”
दक्षिणपन्थी अर्थात वामपन्थी अपने विचारों में जहां उदार, लिबरल होते हैं वहीं दक्षिणपन्थी की उदारता केवल पूंजी में होती है विचारों में वे बडे रूढीवादी होते हैं। “सामाजिक नीति में वामपंथी को लिबरल या उदारवादी कहा जाता है। यह आर्थिक नीति के उदारवादी से बिलकुल अलग है, जो पूँजीवाद की निशानी है। लिबरल लोग आधुनिक विचारों वाले होते हैं। सामाजिक नीति में दक्षिणपंथी को परंपरावादी या रूढ़िवादी (कंज़र्वेटिव) कहा जाता है। राष्ट्रवादी शब्द इससे मिलता-जुलता है।”
” अगर सामाजिक नीति के दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी होते हैं, तो क्या सामाजिक नीति में वामपंथी राष्ट्र-विरोधी होते हैं?”
“बिल्कुल नहीं, यहां तर्क राष्ट्रवादी का है राष्ट्र-प्रेमी का नहीं। राष्ट्रवाद एक बिलकुल अलग चीज़ है। सोशल राइट-विंग वाले, यानि सामाजिक नीति में दक्षिणपंथी लोग चाहते हैं कि बाकी देश के लोग हमारे देश में नहीं आएँ। अपनी संस्कृति को लेकर कट्टर होते हैं। जबकि सोशल लेफ्ट-विंग वाले, यानि लिबरल दूसरी संस्कृतियों को अपने में मिलने देते हैं। वैसे भारत में भारतीय संस्कृति, जैसे कि हिंदुस्तानी संगीत या शास्त्रीय नृत्य को बढ़ावा देने वालों में लिबरल यानि वामपंथी ही ज़्यादा हैं। दक्षिणपंथी यानि हिंदुत्व वाले ऐसी वाहियात चीज़ों को बचा रहे हैं जो भारतीय संस्कृति है ही नहीं। जैसे कि यह हिंदुत्व की कट्टरता हिंदू धर्म में नहीं है।” तो फिर का काहे की भारतीयता, काहे का हिन्दु।
“हाँ, हिंदू धर्म को कोई कट्टर कैसे कह सकता है। यह तो हज़ारों नदियों के संगम की तरह है। विभिन्न दर्शन ही इसके मूल आधार है। और हिंदू धर्म ही क्या, भारतीय संस्कृति ही कितनी संस्कृतियों का समनव्य है। कितने लोग यहाँ बाहर से आए। कभी हमने मुग़लई समोसे को पंजाबी समोसा बना दिया। तो अंग्रेज़ों की संस्कृति का पॉप म्यूजिक पंजाबी पॉप बन गया। फिर पहनावे में सलवार कमीज़ तो बाहर से आया लेकिन अब भारतीय संस्कृति का हिस्सा है।”
देखा जाए तो सामाजिक तौर पर दक्षिणपंथी होना इतना बुरा नहीं है। अपने देश की संस्कृति को जानना और गर्व महसूस करना अच्छा है। लेकिन जो लोग संस्कृति का विनाश करने पर तुले हुए हैं। इसलिए ये हिंदुत्व वाले दक्षिणपंथी कहलाने के लायक भी नहीं हैं। ये लोग केवल कट्टर लोगों की श्रेणी में आते हैं।”
“और कॉंग्रेस?” – “कॉंग्रेस सामाजिक नीति में वामपंथी है, यानि लिबरल। लेकिन आर्थिक नीति में दक्षिणपंथी, यानि पूँजीवादी।”
इस तरह के एक नहीं बहुत से उदाहरण हैं।
• जैसे चीन का माओ जेदोंग आर्थिक नीति में वामपंथी था, खुद को कम्युनिस्ट कहता था, लेकिन सामाजिक नीति में राष्ट्रवादी, यानि दक्षिणपंथी।
• डोनाल्ड ट्रंप दोनों नीतियों में दक्षिणपंथी है। यानि वह पूँजीवादी भी है, और रूढ़िवादी भी।
खैर, इसके अलावा सामाजिक नीति में वामपंथी, यानि लिबरल सामान्य तौर पर समलैंगिकों के अधिकारों के पक्ष में होंगे, फाँसी की सजा के विरुद्ध होंगे। लेकिन यह जरूरी नहीं कि हरेक आदमी हरेक मुद्दे पर वैसा ही सोचे। इसको लिबरल या रूढ़िवादी के बजाए इस तरह देखना चाहिए कि कितना प्रतिशत लिबरल और कितना प्रतिशत रूढ़िवादी।”
उस हिसाब से वामपंथी इतने खतरनाक तो नहीं लगते?”
“कौनसे वामपंथी? आर्थिक नीति वाले या सामजिक नीति वाले?”
“ओह! बड़ी फ़ज़ीहत है। अब इन वामपंथी और दक्षिणपंथी शब्दों को छोड़ ही देते हैं। अब साम्यवादी, समाजवादी, पूँजीवादी, लिबरल (उदारवादी) और रूढ़िवादी शब्दों का इस्तेमाल करेंगे।”
पूरी दुनिया इसी गड़बड़ में तो उलझी हुई है। वो भगत सिंह और लेनिन वाली बात वहीं रह गई। भगत सिंह के फाँसी पर चढ़ने से पहले आखिरी इच्छा थी कि उन्हें लेनिन की जीवनी पढ़ने दी जाए। लेनिन ही रूस की अक्टूबर क्रांति के अग्रणी नेता थे। उनकी पार्टी का नाम बोलशेविक पार्टी था। 1917 में वे लोग रूस के ज़ार, यानि राजा के महल में घुस गए और उसे गद्दी से हटा दिया। एक पोलिटब्युरो बना, जिसके सात सदस्यों में से एक लीओन ट्रोट्स्की थे। लेकिन तब भी राजा की सेना, वाइट आर्मी से लेनिन की रेड आर्मी की लड़ाई तीन साल तक चलती रही। ट्रोट्स्की रेड आर्मी के संस्थापक और कमांडर थे। आख़िरकार रेड आर्मी जीत गई।
लेनिन ने सोवियत के लिए एक एम्बलम, यानि चिन्ह बनाने की प्रतियोगिता करवाई, जिसके विजेता येवजेनी कैमज़ोल्किन थे, जिन्होंने वह प्रसिद्द दराती और हथौड़े वाले चिन्ह बनाया।
यह किसानों और मज़दूरों की एकता का प्रतीक था। मार्क्स ने दुनिया के सभी वर्कर्स को आपस में एकता बना लेने की हिदायत दी थी।
• लेनिन ने औरतों और मज़दूरों के बच्चों के पढ़ने का इंतज़ाम किया, जिन्हें पहले पढ़ने नहीं दिया जाता था।
• व्यस्क मज़दूरों के लिए भी शाम की कक्षा लगाई।
• कारखानों को मजदूरों की चुनी हुई कमिटी के नीचे कर दिया गया।
• चर्च, राजा और ज़मींदारों से ज़मीन लेकर किसानों में बाँट दी गई।
• मज़दूरों के आठ घंटे प्रति दिन और चालीस घंटे प्रति सप्ताह का नियम बनाया। जो आज भारत की सरकारी नौकरियों में होता है।
इसका राजनीतिक पहलू लेनिन का ही दिमाग था। मार्क्स और ऐंगल्स ने मुख्यतः एक आर्थिक नीति ही बताई थी। मार्क्स ने बहुत साल तो अपनी किताब दास कैपिटल, यानि पूँजी के ऊपर शोध करने और लिखने में ही लगा दिए थे। उनकी राजनीतिक सोच के अंतर्गत पहले प्रोलेटेरियन की अस्थाई तानाशाही थी, जो जरूरी बदलाव करेगी। श्रेणी मतभेद को मिटा देगी। और दूसरी स्टेज थी एक बिना सरकार वाला देश, जहाँ सब लोग मेहनत से कमाते हैं और देश का विकास करते हों जिसमें बाहरी ताकतों का कम से कम हस्तक्षेप हो।
इसलिए लेनिन की पहली स्टेज को मार्क्स से प्रेरित देखा जा सकता है। लेकिन हाथ में आई हुई सत्ता को फिर कौन जाने देता है। खैर, अगर लेनिन ऐसा करते भी, तब भी क्या ऐसा देश चल पाता, इसमें संदेह है।
लेनिन ने आक्रामक रूप से अपने खिलाफ हरेक विरोध को दबाया। इसे वॉर कम्युनिज्म कहा जाता है। अपराधियों और विरोधियों को गुलग नाम के लेबर कैंप में डाला गया, जहाँ उनसे बहुत काम करवाया जाता था। लेकिन अर्थव्यवस्था सही से चल नहीं पाई।
अब लेनिन एक नई आर्थिक नीति (NEP) लेकर आए, जिसके तहत कुछ समय तक पूँजीवादियों को रहने दिया जाए। यह एक मिश्रित अर्थव्यवस्था थी, जहाँ प्राइवेट लोगों के पास छोटे उद्यम हो सकते थे, जबकि बैंक, विदेश व्यापार और बड़े उद्योग सरकार के पास थे। इन छोटे प्राइवेट उद्यमियों को नैप-मैन कहा जाने लगा। और कुछ किसानों ‘कुलक’ को बाकी किसानों के ऊपर रखा गया। आखिरकार यह नीति कारगर हुई, और रूस तरक्की करने लगा।
फिर लेनिन की मृत्यु हो गई। और तब आया स्टालिन। ट्रोट्स्की के बहुत विरोध के बावजूद। ज़ाहिर तौर पर स्टालिन ने ट्रोट्स्की को बर्दाश्त नहीं किया। पोलिटब्युरो से निकाला गया, उसके बाद देश से निकाला गया। फिर स्टालिन ने दूसरे देश में अपना हत्यारा भेजकर ट्रोट्स्की को मरवा दिया।
स्टालिन एक खलनायक निकला। उसने बचे-खुचे पूँजीवादियों को हटाया, और एक तानाशाह बन गया। इसने अपनी नीतियों को नाम दिया स्टालिनवाद।
इसने तबाही मचा दी। मार्क्स के नाम पर इसने हरेक वो चीज़ की, जिसके मार्क्स खिलाफ थे। इसने कुलक किसानों पर गुस्सा निकाला। सभी किसानों को अपनी ज़मीन एकत्रित कर खेती करने को मजबूर किया। बहुत से खेत राज्य के अधीन थे। इसने खेती से ज़्यादा ध्यान उद्योग पर दिया।
मज़दूरों को लेकर लेनिन की नीति को हटाया। उसके सलाहकार यूरी लैरिन के कहने पर मशीनें लगातार चलने लगी और मज़दूरों से शिफ्ट में लगातार काम करवाया जाने लगा। यह जरूरी नहीं था कि सभी लोगों की छुट्टी इतवार को हो। इसलिए पूरा परिवार बहुत समय तक आपस में मिल नहीं पाता था। लोग इकट्ठे गिरजाघर भी नहीं जा पाते थे। लेकिन इस सबके बावजूद तरक्की नहीं हुई। क्योंकि मशीन और मज़दूर दोनों थक गए थे। ग्यारह साल बाद वापस लोगों को इतवार मिला, लेकिन फिर भी अत्याचारी नीतियाँ रुकी नहीं। इसकी तानाशाही में नस्लवाद भी फैला। अकाल भी आए। लोग भी मारे गए।
लेकिन इसके नेतृत्व में रूस ने द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा, जिसके बाद अमेरिका और रूस सुपरपावर बनकर निकले। इसने नुक्लियर हथियार भी बनाए। यह हिटलर जैसा ही था। बस यह फ़र्क़ कि हिटलर लोगों को कम्युनिज्म के नाम पर डराकर सत्ता में आया, और स्टालिन कम्युनिज्म का नाम लेकर।
स्टालिन की मौत के बाद ही नए नेता का आना हो सका। अगले नेता निकिता खरुशचेव ने रूस से स्टालिन की सभी नीतियों को हटाना और रूस को स्टालिन-मुक्त करना शुरू किया। स्तालिनग्रैड शहर का नाम बदलकर वोल्गा नदी के नाम पर वोल्गोग्रैड रख दिया गया। फिर रूस तरक्की की राह पर बढ़ा, और विकसित देश बना।





